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बालकाण्ड · सर्ग 20

दशरथ का इनकार और विश्वामित्र का क्रोध

सर्ग 19सर्ग-सूचीसर्ग 21

श्लोक 1 (bala.20.1)

तच्छ्रुत्वा राजशार्दूलो विश्वामित्रस्य भाषितम् । मुहूर्तमिव निस्सज्ञः सज्ञावानिदमब्रवीत् ॥ १ ॥

tacchrutvā rājaśārdūlo viśvāmitrasya bhāṣitam | muhūrtamiva nissajñaḥ sajñāvānidamabravīt

विश्वामित्र के इन वचनों को सुनकर वह राजशार्दूल एक क्षण के लिए मानो चेतनाशून्य हो गए; फिर सचेत होकर उन्होंने यह कहा।

श्लोक 2 (bala.20.2)

ऊनषोडशवर्षो मे रामो राजीवलोचनः । न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसैः ॥ २ ॥

ūnaṣoḍaśavarṣo me rāmo rājīvalocanaḥ | na yuddhayogyatāmasya paśyāmi saha rākṣasaiḥ

"मेरे कमलनयन राम की आयु अभी सोलह वर्ष भी पूरी नहीं हुई है; मुझे उनमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता नहीं दिखाई देती।

श्लोक 3 (bala.20.3)

इयमक्षौहिणी पूर्णा यस्याहं पतिरीश्वरः । अनया संवृतो गत्वा योद्धाहं तैर्निशाचरैः ॥ ३ ॥

iyamakṣauhiṇī pūrṇā yasyāhaṃ patirīśvaraḥ | anayā saṃvṛto gatvā yoddhāhaṃ tairniśācaraiḥ

यह मेरी संपूर्ण सेना है, जिसका मैं स्वामी और नियंता हूँ; इसके साथ जाकर मैं स्वयं उन निशाचरों से युद्ध करूँगा।

श्लोक 4 (bala.20.4)

इमे शूराश्च विक्रान्ता भृत्या मेऽस्त्रविशारदाः । योग्या रक्षोगणैर्योद्धुं न रामं नेतुमर्हसि ॥ ४ ॥

ime śūrāśca vikrāntā bhṛtyā me'straviśāradāḥ | yogyā rakṣogaṇairyoddhuṃ na rāmaṃ netumarhasi

मेरे ये सेवक शूरवीर, पराक्रमी और अस्त्र-विद्या में निपुण हैं; वे राक्षसों के समूहों से युद्ध करने में सक्षम हैं; आपके लिए राम को ले जाना उचित नहीं है।

श्लोक 5 (bala.20.5)

अहमेव धनुष्पाणिर्गोप्ता समरमूर्धनि । यावत् प्राणान् धरिष्यामि तावद्योत्स्ये निशाचरैः ॥ ५ ॥

ahameva dhanuṣpāṇirgoptā samaramūrdhani | yāvat prāṇān dhariṣyāmi tāvadyotsye niśācaraiḥ

मैं स्वयं धनुष हाथ में लेकर युद्ध के मोर्चे पर रक्षक बनूँगा; जब तक मेरे प्राण रहेंगे, तब तक मैं उन निशाचरों से युद्ध करता रहूँगा।

श्लोक 6 (bala.20.6)

निर्विघ्ना व्रतचर्या सा भविष्यति सुरक्षिता । अहं तत्रागमिष्यामि न रामं नेतुमर्हसि ॥ ६ ॥

nirvighnā vratacaryā sā bhaviṣyati surakṣitā | ahaṃ tatrāgamiṣyāmi na rāmaṃ netumarhasi

इस प्रकार आपका वह व्रताचरण निर्विघ्न और सुरक्षित रहेगा; मैं स्वयं वहाँ आऊँगा, राम को ले जाना आपके लिए उचित नहीं है।

श्लोक 7 (bala.20.7)

बालो ह्यकृतविद्यश्च न च वेत्ति बलाबलम् । न चास्त्रबलसंयुक्तो न च युद्धविशारदः ॥ ७ ॥

bālo hyakṛtavidyaśca na ca vetti balābalam | na cāstrabalasaṃyukto na ca yuddhaviśāradaḥ

क्योंकि वे अभी बालक हैं, उनकी शिक्षा भी पूर्ण नहीं हुई है; उन्हें बल-अबल का ज्ञान नहीं है, न वे अस्त्र-बल से युक्त हैं और न ही युद्धकला में निपुण हैं।

श्लोक 8 (bala.20.8)

न चासौ रक्षसां योग्यः कूटयुद्धा हि ते ध्रुवम् । विप्रयुक्तो हि रामेण मुहूर्तमपि नोत्सहे ॥ ८ ॥

na cāsau rakṣasāṃ yogyaḥ kūṭayuddhā hi te dhruvam | viprayukto hi rāmeṇa muhūrtamapi notsahe

वे उन राक्षसों के समक्ष नहीं टिक सकते, जो निश्चय ही कपटपूर्ण युद्ध करने वाले हैं। राम से वियुक्त होकर मैं एक क्षण भी सहन नहीं कर सकूँगा,

श्लोक 9 (bala.20.9)

जीवितुं मुनिशार्दूल न रामं नेतुमर्हसि । यदि वा राघवं ब्रह्मन्नेतुमिच्छसि सुव्रत ॥ ९ ॥

jīvituṃ muniśārdūla na rāmaṃ netumarhasi | yadi vā rāghavaṃ brahmannetumicchasi suvrata

जीवित रहना भी कठिन हो जाएगा, हे मुनिश्रेष्ठ! अतः राम को ले जाना उचित नहीं है। किंतु, हे सुव्रत ब्राह्मण! यदि आप राघव को ले ही जाना चाहते हैं,

श्लोक 10 (bala.20.10)

चतुरंगसमायुक्तं मया सह च तं नय । षष्टिर्वर्षसहस्राणि जातस्य मम कौशिक ॥ १० ॥

caturaṃgasamāyuktaṃ mayā saha ca taṃ naya | ṣaṣṭirvarṣasahasrāṇi jātasya mama kauśika

तो उन्हें मेरी चतुरंगिणी सेना सहित और मेरे साथ ही ले जाइए। हे कौशिक! मुझे जन्म लिए साठ हजार वर्ष बीत चुके हैं,

श्लोक 11 (bala.20.11)

कृच्छ्रेणोत्पादितश्चायं न रामं नेतुमर्हसि । चतुर्णामात्मजानां हि प्रीतिः परमिका मम ॥ ११ ॥

kṛcchreṇotpāditaścāyaṃ na rāmaṃ netumarhasi | caturṇāmātmajānāṃ hi prītiḥ paramikā mama

और यह पुत्र मुझे अत्यंत कठिनाई से प्राप्त हुआ है; अतः राम को ले जाना उचित नहीं है। अपने चारों पुत्रों में मुझे सबसे अधिक प्रेम,

श्लोक 12 (bala.20.12)

ज्येष्ठे धर्मप्रधाने च न रामं नेतुमर्हसि । किं वीर्या राक्षसास्ते च कस्य पुत्राश्च के च ते ॥ १२ ॥

jyeṣṭhe dharmapradhāne ca na rāmaṃ netumarhasi | kiṃ vīryā rākṣasāste ca kasya putrāśca ke ca te

अपने ज्येष्ठ और धर्मप्रधान पुत्र से है; अतः राम को ले जाना उचित नहीं है। उन राक्षसों का पराक्रम कैसा है? वे किसके पुत्र हैं और कौन हैं?

श्लोक 13 (bala.20.13)

कथं प्रमाणाः के चैतान् रक्षन्ति मुनिपुंगव । कथं च प्रतिकर्तव्यं तेषां रामेण रक्षसाम् ॥ १३ ॥

kathaṃ pramāṇāḥ ke caitān rakṣanti munipuṃgava | kathaṃ ca pratikartavyaṃ teṣāṃ rāmeṇa rakṣasām

उनका आकार कैसा है, और हे मुनिपुंगव! उनकी रक्षा कौन करता है? तथा राम को उन राक्षसों के विरुद्ध किस प्रकार प्रतिकार करना होगा,

श्लोक 14 (bala.20.14)

मामकैर्वा बलैर्ब्रह्मन् मया वा कूटयोधिनाम् । सर्वं मे शंस भगवन् कथं तेषां मया रणे ॥ १४ ॥

māmakairvā balairbrahman mayā vā kūṭayodhinām | sarvaṃ me śaṃsa bhagavan kathaṃ teṣāṃ mayā raṇe

क्या मेरी सेना के साथ, हे ब्रह्मन्, या स्वयं मुझे उन कपटी योद्धाओं से लड़ना होगा? हे भगवन्! यह सब मुझे बताइए कि युद्ध में मुझे उनसे किस प्रकार निपटना होगा,

श्लोक 15 (bala.20.15)

स्थातव्यं दुष्टभावानां वीर्योत्सिक्ता हि राक्षसाः । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १५ ॥

sthātavyaṃ duṣṭabhāvānāṃ vīryotsiktā hi rākṣasāḥ | tasya tadvacanaṃ śrutvā viśvāmitro'bhyabhāṣata

उन दुष्ट-स्वभाव और अपने बल के मद में उन्मत्त राक्षसों के समक्ष किस प्रकार डटे रहना होगा।" उनका यह वचन सुनकर विश्वामित्र ने कहा।

श्लोक 16 (bala.20.16)

पौलस्त्यवंशप्रभवो रावणो नाम राक्षसः । स ब्रह्मणा दत्तवरस्त्रैलोक्यं बाधते भृशम् ॥ १६ ॥

paulastyavaṃśaprabhavo rāvaṇo nāma rākṣasaḥ | sa brahmaṇā dattavarastrailokyaṃ bādhate bhṛśam

"पुलस्त्य वंश में उत्पन्न रावण नामक एक राक्षस है; ब्रह्मा से वरदान पाकर वह तीनों लोकों को अत्यंत पीड़ित करता है।

श्लोक 17 (bala.20.17)

महाबलो महावीर्यो राक्षसैर्बहुभिर्वृतः । श्रूयते च महाराजा रावणो राक्षसाधिपः ॥ १७ ॥

mahābalo mahāvīryo rākṣasairbahubhirvṛtaḥ | śrūyate ca mahārājā rāvaṇo rākṣasādhipaḥ

सुना जाता है कि रावण, जो राक्षसों का अधिपति है, महान बलशाली और पराक्रमी है, तथा अनेक राक्षसों से घिरा रहता है,

श्लोक 18 (bala.20.18)

साक्षाद्वैश्रवणभ्राता पुत्रो विश्रवसो मुनेः । यदा न खलु यज्ञस्य विघ्नकर्ता महाबलः ॥ १८ ॥

sākṣādvaiśravaṇabhrātā putro viśravaso muneḥ | yadā na khalu yajñasya vighnakartā mahābalaḥ

वह साक्षात् वैश्रवण का भाई और मुनि विश्रवा का पुत्र है। वह महाबली रावण स्वयं तो यज्ञ में विघ्न डालने नहीं आता;

श्लोक 19 (bala.20.19)

तेन संचोदितौ तौ तु राक्षसौ च महाबलौ । मारीचश्च सुबाहुश्च यज्ञविघ्नं करिष्यतः ॥ १९ ॥

tena saṃcoditau tau tu rākṣasau ca mahābalau | mārīcaśca subāhuśca yajñavighnaṃ kariṣyataḥ

बल्कि उसी की प्रेरणा से वे दोनों महाबली राक्षस, मारीच और सुबाहु, यज्ञ में विघ्न डालने आते हैं।"

श्लोक 20 (bala.20.20)

इत्युक्तो मुनिना तेन राजोवाच मुनिं तदा । न हि शक्तोऽस्मि संग्रामे स्थातुं तस्य दुरात्मनः ॥ २० ॥

ityukto muninā tena rājovāca muniṃ tadā | na hi śakto'smi saṃgrāme sthātuṃ tasya durātmanaḥ

मुनि द्वारा यह कहे जाने पर राजा ने तब मुनि से कहा: "मैं उस दुरात्मा रावण के समक्ष युद्ध में टिक पाने में समर्थ नहीं हूँ।

श्लोक 21 (bala.20.21)

स त्वं प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम पुत्रके । मम चैवाल्पभाग्यस्य दैवतं हि भवान् गुरुः ॥ २१ ॥

sa tvaṃ prasādaṃ dharmajña kuruṣva mama putrake | mama caivālpabhāgyasya daivataṃ hi bhavān guruḥ

अतः, हे धर्मज्ञ! आप मेरे इस छोटे पुत्र पर तथा मुझ अल्पभाग्य पर कृपा कीजिए; आप मेरे गुरु होने के साथ-साथ मेरे लिए देवता के समान भी हैं।

श्लोक 22 (bala.20.22)

देवदानवगंधर्वा यक्षाः पतगपन्नगाः । न शक्ता रावणं सोढुं किं पुनर्मानवा युधि ॥ २२ ॥

devadānavagaṃdharvā yakṣāḥ patagapannagāḥ | na śaktā rāvaṇaṃ soḍhuṃ kiṃ punarmānavā yudhi

देव, दानव, गंधर्व, यक्ष, पक्षी और सर्प भी युद्ध में रावण को सहन करने में समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 23 (bala.20.23)

स तु वीर्यवतां वीर्यमादत्ते युधि रावणः । तेन चाहं न शक्तोऽस्मि संयोद्धुं तस्य वा बलैः ॥ २३ ॥

sa tu vīryavatāṃ vīryamādatte yudhi rāvaṇaḥ | tena cāhaṃ na śakto'smi saṃyoddhuṃ tasya vā balaiḥ

क्योंकि वह रावण युद्ध में बलवानों के बल को भी हर लेता है; इसलिए न तो मैं और न ही मेरी सेनाएँ उससे युद्ध करने में समर्थ हैं,

श्लोक 24 (bala.20.24)

सबलो वा मुनिश्रेष्ठ सहितो वा ममात्मजैः । कथमप्यमरप्रख्यं संग्रामाणामकोविदम् ॥ २४ ॥

sabalo vā muniśreṣṭha sahito vā mamātmajaiḥ | kathamapyamaraprakhyaṃ saṃgrāmāṇāmakovidam

चाहे मेरी सेना के साथ हो, हे मुनिश्रेष्ठ, या मेरे पुत्रों सहित। मेरा यह बालक देवताओं के समान सुंदर तो है, परंतु युद्ध की विधियों में अनभिज्ञ है,

श्लोक 25 (bala.20.25)

बालं मे तनयं ब्रह्मन्नैव दास्यामि पुत्रकम् । अथ कालोपमौ युद्धे सुतौ सुन्दोपसुन्दयोः ॥ २५ ॥

bālaṃ me tanayaṃ brahmannaiva dāsyāmi putrakam | atha kālopamau yuddhe sutau sundopasundayoḥ

अतः, हे ब्रह्मन्! मैं अपने इस बालक पुत्र को किसी भी दशा में नहीं दूँगा। इसके अतिरिक्त, युद्ध में काल के समान भयंकर वे दोनों, मानो सुंद-उपसुंद के ही पुत्र हों,

श्लोक 26 (bala.20.26)

यज्ञविघ्नकरौ तौ ते नैव दास्यामि पुत्रकम् । मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ ॥ २६ ॥

yajñavighnakarau tau te naiva dāsyāmi putrakam | mārīcaśca subāhuśca vīryavantau suśikṣitau

आपके यज्ञ में विघ्न डालने वाले वे दोनों, उनके सम्मुख मैं अपने पुत्र को नहीं भेजूँगा। मारीच और सुबाहु दोनों ही बलशाली और सुशिक्षित हैं;

श्लोक 27 (bala.20.27)

तयोरन्यतरं योद्धुं यास्यामि ससुहृद्गणः । अन्यथा त्वनुनेष्यामि भवन्तं सह बान्धवैः ॥ २७ ॥

tayoranyataraṃ yoddhuṃ yāsyāmi sasuhṛdgaṇaḥ | anyathā tvanuneṣyāmi bhavantaṃ saha bāndhavaiḥ

मैं स्वयं अपने मित्रगणों के साथ जाकर उन दोनों में से किसी एक से युद्ध करूँगा। अन्यथा, अपने बंधु-बांधवों सहित मैं आपसे क्षमा-याचना करूँगा।"

श्लोक 28 (bala.20.28)

इति नरपतिजल्पनाद्द्विजेन्द्रं कुशिकसुतं सुमहान् विवेश मन्युः । सुहुत इव मखेऽग्निराज्यसिक्तः समभवदुज्वलितो महर्षिवह्निः ॥ २८ ॥

iti narapatijalpanāddvijendraṃ kuśikasutaṃ sumahān viveśa manyuḥ | suhuta iva makhe'gnirājyasiktaḥ samabhavadujvalito maharṣivahniḥ

राजा के इस प्रकार बोलने पर कुशिकपुत्र उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के मन में अत्यंत क्रोध उत्पन्न हो गया; और वह महर्षिरूपी अग्नि उसी प्रकार प्रज्वलित हो उठी जैसे यज्ञ में घी की आहुति पड़ने पर अग्नि भड़क उठती है।

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