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बालकाण्ड · सर्ग 26

ताटका-वध

सर्ग 25सर्ग-सूचीसर्ग 27

श्लोक 1 (bala.26.1)

मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मजः । राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रतः ॥ २६-१ ॥

munervacanamaklībaṃ śrutvā naravarātmajaḥ | rāghavaḥ prāñjalirbhūtvā pratyuvāca dṛḍhavrataḥ || 26.1 ||

मुनि के निर्भीक वचन सुनकर, श्रेष्ठ पुरुष के पुत्र दृढ़व्रती राघव ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

श्लोक 2 (bala.26.2)

पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात् । वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया ॥ २६-२ ॥

piturvacananirdeśāt piturvacanagauravāt | vacanaṃ kauśikasyeti kartavyamaviśaṅkayā || 26.2 ||

पिता की आज्ञा से और पिता के वचन के सम्मान से, तथा यह कौशिक (विश्वामित्र) का वचन है यह जानकर, मुझे बिना किसी शंका के इसे करना ही है।

श्लोक 3 (bala.26.3)

अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना । पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं च तद्वचः ॥ २६-३ ॥

anuśiṣṭo'smyayodhyāyāṃ gurumadhye mahātmanā | pitrā daśarathenāhaṃ nāvajñeyaṃ ca tadvacaḥ || 26.3 ||

अयोध्या में गुरुजनों के बीच महात्मा पिता दशरथ ने मुझे यह आदेश दिया था; उनका वह वचन अनादरणीय नहीं हो सकता।

श्लोक 4 (bala.26.4)

सोऽहं पितुर्वचः श्रुत्वा शासनाद्ब्रह्मवादिनः । करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम् ॥ २६-४ ॥

so'haṃ piturvacaḥ śrutvā śāsanādbrahmavādinaḥ | kariṣyāmi na saṃdehastāṭakāvadhamuttamam || 26.4 ||

अतः पिता के वचन का पालन करते हुए और वेदवेत्ता विश्वामित्र की आज्ञा से मैं ताटका-वध का यह श्रेष्ठ कार्य अवश्य करूँगा, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 5 (bala.26.5)

गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्यास्य हिताय च । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥ २६-५ ॥

gobrāhmaṇahitārthāya deśasyāsya hitāya ca | tava caivāprameyasya vacanaṃ kartumudyataḥ || 26.5 ||

गो और ब्राह्मणों के हित के लिए, इस देश के कल्याण के लिए, तथा अप्रमेय शक्तिशाली आपके वचन को पूरा करने के लिए मैं तैयार हूँ।

श्लोक 6 (bala.26.6)

एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बध्वा मुष्टिमरिन्दमः । ज्याघोषमकरोत्तीव्रं दिशः शब्देन नादयन् ॥ २६-६ ॥

evamuktvā dhanurmadhye badhvā muṣṭimarindamaḥ | jyāghoṣamakarottīvraṃ diśaḥ śabdena nādayan || 26.6 ||

यह कहकर शत्रुदमन राम ने धनुष के मध्य भाग को मुट्ठी में पकड़कर प्रत्यंचा की भीषण टंकार की, जिससे सभी दिशाएँ गूँज उठीं।

श्लोक 7 (bala.26.7)

तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिनः । ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता ॥ २६-७ ॥

tena śabdena vitrastāstāṭakāvanavāsinaḥ | tāṭakā ca susaṃkruddhā tena śabdena mohitā || 26.7 ||

उस ध्वनि से ताटका वन के निवासी भयभीत हो उठे, और ताटका भी अत्यंत क्रुद्ध होकर उस शब्द से चकित हो गई।

श्लोक 8 (bala.26.8)

तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता । श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यतः शब्दो विनिस्सृतः ॥ २६-८ ॥

taṃ śabdamabhinidhyāya rākṣasī krodhamūrcchitā | śrutvā cābhyadravat kruddhā yataḥ śabdo vinissṛtaḥ || 26.8 ||

उस शब्द पर ध्यान देकर क्रोध से मूर्छित राक्षसी उसे सुनते ही उस दिशा की ओर क्रुद्ध होकर दौड़ पड़ी, जहाँ से वह ध्वनि निकली थी।

श्लोक 9 (bala.26.9)

तां दृष्ट्वा राघवः क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम् । प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत ॥ २६-९ ॥

tāṃ dṛṣṭvā rāghavaḥ kruddhāṃ vikṛtāṃ vikṛtānanām | pramāṇenātivṛddhāṃ ca lakṣmaṇaṃ so'bhyabhāṣata || 26.9 ||

उस क्रुद्ध, विकृत मुखवाली और विशालकाय राक्षसी को देखकर राघव ने लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 10 (bala.26.10)

पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपुः । भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च ॥ २६-१० ॥

paśya lakṣmaṇa yakṣiṇyā bhairavaṃ dāruṇaṃ vapuḥ | bhidyeran darśanādasyā bhīrūṇāṃ hṛdayāni ca || 26.10 ||

लक्ष्मण, देखो इस यक्षिणी का भयंकर और भीषण रूप; इसे देखकर तो भीरु लोगों के हृदय ही विदीर्ण हो जाएँ।

श्लोक 11 (bala.26.11)

एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम् । विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम् ॥ २६-११ ॥

etāṃ paśya durādharṣāṃ māyābalasamanvitām | vinivṛttāṃ karomyadya hṛtakarṇāgranāsikām || 26.11 ||

देखो, यह मायाबल से युक्त होकर कितनी दुर्जेय है; फिर भी आज मैं इसके कान और नाक की नोक काटकर इसे पीछे लौटा दूँगा।

श्लोक 12 (bala.26.12)

न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम् । वीर्यं चास्या गतिं चापि हन्यतामिति मे मतिः ॥ २६-१२ ॥

na hyenāmutsahe hantuṃ strīsvabhāvena rakṣitām | vīryaṃ cāsyā gatiṃ cāpi hanyatāmiti me matiḥ || 26.12 ||

स्त्री-स्वभाव से रक्षित इस राक्षसी को मारने का मेरा मन नहीं है; मेरा विचार तो केवल इसके बल और गति को नष्ट करने का है।

श्लोक 13 (bala.26.13)

एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता । उद्यम्य बाहू गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत ॥ २६-१३ ॥

evaṃ bruvāṇe rāme tu tāṭakā krodhamūrcchitā | udyamya bāhū garjantī rāmamevābhyadhāvata || 26.13 ||

राम के इस प्रकार कहते-कहते ही क्रोध से उन्मत्त ताटका भुजाएँ उठाकर गरजती हुई राम की ओर ही दौड़ पड़ी।

श्लोक 14 (bala.26.14)

विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिर्हुंकारेणाभिभर्त्स्य ताम् । स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत ॥ २६-१४ ॥

viśvāmitrastu brahmarṣirhuṃkāreṇābhibhartsya tām | svasti rāghavayorastu jayaṃ caivābhyabhāṣata || 26.14 ||

किंतु ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने हुंकार से उसे धिक्कारते हुए कहा, 'दोनों राघवों का कल्याण हो और विजय हो।'

श्लोक 15 (bala.26.15)

उद्धुन्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ । रजो मेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत् ॥ २६-१५ ॥

uddhunvānā rajo ghoraṃ tāṭakā rāghavāvubhau | rajo meghena mahatā muhūrtaṃ sā vyamohayat || 26.15 ||

भयंकर धूल उड़ाती हुई ताटका ने अपने विशाल धूलि-मेघ से दोनों राघवों को क्षणभर के लिए मोहित कर दिया।

श्लोक 16 (bala.26.16)

ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ । अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघवः ॥ २६-१६ ॥

tato māyāṃ samāsthāya śilāvarṣeṇa rāghavau | avākirat sumahatā tataścukrodha rāghavaḥ || 26.16 ||

फिर माया का सहारा लेकर उसने दोनों राघवों पर पत्थरों की भारी वर्षा कर दी; इस पर राम अत्यंत क्रुद्ध हो गए।

श्लोक 17 (bala.26.17)

शिलावर्षं महत्तस्याः शरवर्षेण राघवः । प्रतिवार्योपधावन्त्याः करौ चिच्छेद पत्रिभिः ॥ २६-१७ ॥

śilāvarṣaṃ mahattasyāḥ śaravarṣeṇa rāghavaḥ | prativāryopadhāvantyāḥ karau ciccheda patribhiḥ || 26.17 ||

उसकी भारी पाषाण-वर्षा को बाणों की वर्षा से रोककर, राघव ने आक्रमण करती हुई उस राक्षसी की दोनों भुजाएँ अपने पंखयुक्त बाणों से काट डालीं।

श्लोक 18 (bala.26.18)

ततश्च्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम् । सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद् हृतकर्णाग्रनासिकाम् ॥ २६-१८ ॥

tataścchinnabhujāṃ śrāntāmabhyāśe parigarjatīm | saumitrirakarot krodhād hṛtakarṇāgranāsikām || 26.18 ||

इसके बाद भुजाएँ कटी हुई, थकी हुई और समीप ही गरजती हुई उस राक्षसी के कान और नाक की नोक सौमित्र (लक्ष्मण) ने क्रोधवश काट दी।

श्लोक 19 (bala.26.19)

कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकशः । अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया ॥ २६-१९ ॥

kāmarūpadharā sā tu kṛtvā rūpāṇyanekaśaḥ | antardhānaṃ gatā yakṣī mohayantī svamāyayā || 26.19 ||

किंतु इच्छानुसार रूप धारण करने वाली वह यक्षी अनेक रूप बनाकर अपनी माया से उन्हें मोहित करती हुई अंतर्ध्यान हो गई।

श्लोक 20 (bala.26.20)

अश्मवर्षं विमुंचन्ती भैरवं विचचार सा । ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः ॥ २६-२० ॥

aśmavarṣaṃ vimuṃcantī bhairavaṃ vicacāra sā | tatastāvaśmavarṣeṇa kīryamāṇau samantataḥ || 26.20 ||

भयानक पाषाण-वर्षा करती हुई वह अदृश्य होकर विचरने लगी; तब दोनों भाई चारों ओर से पत्थरों से घिर गए —

श्लोक 21 (bala.26.21)

दृष्ट्वा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् । अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी ॥ २६-२१ ॥

dṛṣṭvā gādhisutaḥ śrīmānidaṃ vacanamabravīt | alaṃ te ghṛṇayā rāma pāpaiṣā duṣṭacāriṇī || 26.21 ||

यह देखकर गाधि-पुत्र श्रीमान् विश्वामित्र ने कहा, 'राम, अब दया करना छोड़ो; यह पापिनी दुराचारिणी है।

श्लोक 22 (bala.26.22)

यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया । वध्यतां तावदेवैषा पुरा संध्या प्रवर्तते ॥ २६-२२ ॥

yajñavighnakarī yakṣī purā vardheta māyayā | vadhyatāṃ tāvadevaiṣā purā saṃdhyā pravartate || 26.22 ||

यह यक्षी यज्ञ में विघ्न डालने वाली है; इससे पहले कि यह अपनी माया से पुनः बलवती हो जाए, संध्या होने से पहले ही इसका वध कर दो।

श्लोक 23 (bala.26.23)

रक्षांसि संध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि । इत्युक्तस्स तु तां यक्षीमश्मवृष्ट्याभिवर्षिणीम् ॥ २६-२३ ॥

rakṣāṃsi saṃdhyākāle tu durdharṣāṇi bhavanti hi | ityuktassa tu tāṃ yakṣīmaśmavṛṣṭyābhivarṣiṇīm || 26.23 ||

क्योंकि संध्या के समय राक्षस अजेय हो जाते हैं।' यह सुनकर राम ने पत्थरों की वर्षा करती उस यक्षी के सामने —

श्लोक 24 (bala.26.24)

दर्शयन् शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकैः । सा रुद्धा बाणजालेन मायाबलसमन्विता ॥ २६-२४ ॥

darśayan śabdavedhitvaṃ tāṃ rurodha sa sāyakaiḥ | sā ruddhā bāṇajālena māyābalasamanvitā || 26.24 ||

शब्दवेध की अपनी कला दिखाते हुए बाणों से उसे रोक दिया। बाणों के इस जाल से रुककर मायाबल से युक्त वह —

श्लोक 25 (bala.26.25)

अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्षमणं च विनेषुदी । तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव ॥ २६-२५ ॥

abhidudrāva kākutsthaṃ lakṣamaṇaṃ ca vineṣudī | tāmāpatantīṃ vegena vikrāntāmaśanīmiva || 26.25 ||

तीव्र चीत्कार करती हुई राम और लक्ष्मण की ओर झपटी। वेग से गिरती हुई वज्र के समान उस पराक्रमी राक्षसी को —

श्लोक 26 (bala.26.26)

शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च । तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा ॥ २६-२६ ॥

śareṇorasi vivyādha sā papāta mamāra ca | tāṃ hatāṃ bhīmasaṃkāśāṃ dṛṣṭvā surapatistadā || 26.26 ||

राम ने बाण से उसका वक्षस्थल बींध दिया; वह गिरकर मर गई। उस भीषण राक्षसी को मरा हुआ देखकर देवराज इंद्र ने —

श्लोक 27 (bala.26.27)

साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन् । उवाच परमप्रीतः सहस्राक्षः पुरन्दरः ॥ २६-२७ ॥

sādhu sādhviti kākutsthaṃ surāścāpyabhipūjayan | uvāca paramaprītaḥ sahasrākṣaḥ purandaraḥ || 26.27 ||

और अन्य देवताओं ने भी काकुत्स्थ की 'साधु-साधु' कहकर प्रशंसा की। तब परम प्रसन्न सहस्राक्ष पुरंदर (इंद्र) ने कहा —

श्लोक 28 (bala.26.28)

सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन् । मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्राः सर्वे मरुद्गणाः ॥ २६-२८ ॥

surāśca sarve saṃhṛṣṭā viśvāmitramathābruvan | mune kauśika bhadraṃ te sendrāḥ sarve marudgaṇāḥ || 26.28 ||

और सभी देवताओं ने अत्यंत हर्षित होकर विश्वामित्र से कहा, 'हे मुनि कौशिक, आपका कल्याण हो! इंद्र सहित समस्त मरुद्गण —

श्लोक 29 (bala.26.29)

तोषिताः कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे । प्रजापतेः कृशाश्वस्य पुत्रान्सत्यपराक्रमान् ॥ २६-२९ ॥

toṣitāḥ karmaṇānena snehaṃ darśaya rāghave | prajāpateḥ kṛśāśvasya putrānsatyaparākramān || 26.29 ||

इस कार्य से प्रसन्न हैं; अब राघव के प्रति अपना स्नेह प्रकट करो। सत्यपराक्रमी प्रजापति कृशाश्व के पुत्रों को —

श्लोक 30 (bala.26.30)

तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय । पात्रभूतश्च ते ब्रह्मंस्तवानुगमने रतः ॥ २६-३० ॥

tapobalabhṛto brahman rāghavāya nivedaya | pātrabhūtaśca te brahmaṃstavānugamane rataḥ || 26.30 ||

जो तपोबल से संपन्न हैं, हे ब्रह्मन्, राघव को प्रदान करो। हे ब्रह्मन्, आपके अनुगमन में तत्पर यह राम उनके योग्य पात्र है —

श्लोक 31 (bala.26.31)

कर्तव्यं सुमहत्कर्म सुराणां राजसूनुना । एवमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम् ॥ २६-३१ ॥

kartavyaṃ sumahatkarma surāṇāṃ rājasūnunā | evamuktvā surāḥ sarve jagmurhṛṣṭā vihāyasam || 26.31 ||

क्योंकि इस राजकुमार को देवताओं का एक महान कार्य करना है।' यह कहकर सभी देवता हर्षित होकर आकाश मार्ग से चले गए —

श्लोक 32 (bala.26.32)

विश्वामित्रं पूजयन्तस्ततः संध्या प्रवर्तते । ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः ॥ २६-३२ ॥

viśvāmitraṃ pūjayantastataḥ saṃdhyā pravartate | tato munivaraḥ prītastāṭakāvadhatoṣitaḥ || 26.32 ||

विश्वामित्र का सम्मान करते हुए चले गए, और तब संध्या हो गई। तत्पश्चात् ताटका-वध से संतुष्ट प्रसन्न मुनिश्रेष्ठ ने —

श्लोक 33 (bala.26.33)

मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत् । इहाद्य रजनीं राम वसेम शुभदर्शन ॥ २६-३३ ॥

mūrdhni rāmamupāghrāya idaṃ vacanamabravīt | ihādya rajanīṃ rāma vasema śubhadarśana || 26.33 ||

राम के मस्तक को सूँघकर (चूमकर) यह वचन कहा, 'हे शुभदर्शन राम, आज की रात्रि हम यहीं व्यतीत करें —

श्लोक 34 (bala.26.34)

श्वः प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम । विश्वामित्रवचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मजः ॥ २६-३४ ॥

śvaḥ prabhāte gamiṣyāmastadāśramapadaṃ mama | viśvāmitravacaḥ śrutvā hṛṣṭo daśarathātmajaḥ || 26.34 ||

और कल प्रातःकाल मेरे आश्रम की ओर चलेंगे।' विश्वामित्र के इन वचनों को सुनकर हर्षित दशरथ-पुत्र राम ने —

श्लोक 35 (bala.26.35)

उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम् । मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि । रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम् ॥ २६-३५ ॥

uvāsa rajanīṃ tatra tāṭakāyā vane sukham | muktaśāpaṃ vanaṃ tacca tasminneva tadāhani | ramaṇīyaṃ vibabhrāja yathā caitrarathaṃ vanam || 26.35 ||

उस रात्रि को ताटका के उसी वन में सुखपूर्वक बिताया। और उसी दिन शाप से मुक्त हुआ वह वन चैत्ररथ वन के समान रमणीय होकर शोभायमान हो उठा।

श्लोक 36 (bala.26.36)

निहत्य तां यक्षसुतां स रामः प्रशस्यमानः सुरसिद्धसङ्घैः । उवास तस्मिन्मुनिना सहैव प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमानः ॥ २६-३६ ॥

nihatya tāṃ yakṣasutāṃ sa rāmaḥ praśasyamānaḥ surasiddhasaṅghaiḥ | uvāsa tasminmuninā sahaiva prabhātavelāṃ pratibodhyamānaḥ || 26.36 ||

उस यक्ष-कन्या का वध करके देवताओं और सिद्धों के समूहों द्वारा प्रशंसित राम मुनि के साथ ही वहाँ ठहरे रहे, प्रातःकाल जागृत होने के लिए।

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