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बालकाण्ड · सर्ग 29

सिद्धाश्रम-वृत्तान्त

सर्ग 28सर्ग-सूचीसर्ग 30

श्लोक 1 (bala.29.1)

अथ तस्याप्रमेयस्य वचनं परिपृच्छतः । विश्वामित्रो महातेजा व्याख्यातुमुपचक्रमे ॥ २९-१ ॥

atha tasyāprameyasya vacanaṃ paripṛcchataḥ | viśvāmitro mahātejā vyākhyātumupacakrame || 29.1 ||

तब जिज्ञासा करते हुए उस अप्रमेय राम को महातेजस्वी विश्वामित्र ने बताना आरंभ किया।

श्लोक 2 (bala.29.2)

इह राम महाबाहो विष्णुर्देवनमस्कृतः । वर्षाणि सुबहूनीह तथा युगशतानि च ॥ २९-२ ॥

iha rāma mahābāho viṣṇurdevanamaskṛtaḥ | varṣāṇi subahūnīha tathā yugaśatāni ca || 29.2 ||

हे महाबाहो राम, यहीं पर देवताओं द्वारा नमस्कृत भगवान् विष्णु अनेक वर्षों तक, यहाँ तक कि सैकड़ों युगों तक निवास करते रहे।

श्लोक 3 (bala.29.3)

तपश्चरणयोगार्थमुवास सुमहातपाः । एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मनः ॥ २९-३ ॥

tapaścaraṇayogārthamuvāsa sumahātapāḥ | eṣa pūrvāśramo rāma vāmanasya mahātmanaḥ || 29.3 ||

तपश्चरण और योग के लिए वे परम तपस्वी यहीं रहे। हे राम, यह महात्मा वामन का प्राचीन आश्रम है।

श्लोक 4 (bala.29.4)

सिद्धाश्रम इति ख्यातः सिद्धो ह्यत्र महातपाः । एतस्मिन्नेव काले तु राजा वैरोचनिर्बलिः ॥ २९-४ ॥

siddhāśrama iti khyātaḥ siddho hyatra mahātapāḥ | etasminneva kāle tu rājā vairocanirbaliḥ || 29.4 ||

यह सिद्धाश्रम के नाम से विख्यात है, क्योंकि यहीं उन महातपस्वी को सिद्धि प्राप्त हुई थी। उसी समय विरोचन-पुत्र राजा बलि ने —

श्लोक 5 (bala.29.5)

निर्जित्य दैवतगणान् सेन्द्रान् समरुद्गणान् । कारयामास तद्राज्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ २९-५ ॥

nirjitya daivatagaṇān sendrān samarudgaṇān | kārayāmāsa tadrājyaṃ triṣu lokeṣu viśrutaḥ || 29.5 ||

— इंद्र और मरुद्गणों सहित देवताओं के समूहों को जीतकर उस राज्य पर शासन करने लगा, और तीनों लोकों में विख्यात हो गया।

श्लोक 6 (bala.29.6)

यज्ञं चकार सुमहानसुरेन्द्रो महाबलः । बलेस्तु यजमानस्य देवाः साग्निपुरोगमाः । समागम्य स्वयं चैव विष्णुमूचुरिहाश्रमे ॥ २९-६ ॥

yajñaṃ cakāra sumahānasurendro mahābalaḥ | balestu yajamānasya devāḥ sāgnipurogamāḥ | samāgamya svayaṃ caiva viṣṇumūcurihāśrame || 29.6 ||

उस महाबली असुरेंद्र ने एक अत्यंत महान यज्ञ किया। बलि के यजमान रहते हुए अग्निदेव को आगे करके देवता स्वयं इसी आश्रम में आकर विष्णु से बोले।

श्लोक 7 (bala.29.7)

बलिर्वैरोचनिर्विष्णो यजते यज्ञमुत्तमम् । असमाप्तव्रते तस्मिन् स्वकार्यमभिपद्यताम् ॥ २९-७ ॥

balirvairocanirviṣṇo yajate yajñamuttamam | asamāptavrate tasmin svakāryamabhipadyatām || 29.7 ||

'हे विष्णु, विरोचन-पुत्र बलि एक उत्तम यज्ञ कर रहा है; उसका व्रत पूर्ण होने से पहले ही हमारा कार्य सिद्ध हो जाना चाहिए।'

श्लोक 8 (bala.29.8)

ये चैनमभिवर्तन्ते याचितार इतस्ततः । यच्च यत्र यथावच्च सर्वं तेभ्यः प्रयच्छति ॥ २९-८ ॥

ye cainamabhivartante yācitāra itastataḥ | yacca yatra yathāvacca sarvaṃ tebhyaḥ prayacchati || 29.8 ||

'जो भी याचक जहाँ-कहीं से भी उसके पास आते हैं, वे जो कुछ, जहाँ भी और जिस प्रकार भी माँगते हैं, वह उन्हें सब कुछ प्रदान कर देता है।'

श्लोक 9 (bala.29.9)

स त्वं सुरहितार्थाय मायायोगमुपाश्रितः । वामनत्वं गतो विष्णो कुरु कल्याणमुत्तमम् ॥ २९-९ ॥

sa tvaṃ surahitārthāya māyāyogamupāśritaḥ | vāmanatvaṃ gato viṣṇo kuru kalyāṇamuttamam || 29.9 ||

'अतः देवताओं के हित के लिए मायायोग का सहारा लेकर, हे विष्णु, वामन रूप धारण करके यह परम कल्याणकारी कार्य करो।'

श्लोक 10 (bala.29.10)

एतस्मिन्नन्तरे राम काश्यपोऽग्निसमप्रभः । अदित्या सहितो राम दीप्यमान इवौजसा ॥ २९-१० ॥

etasminnantare rāma kāśyapo'gnisamaprabhaḥ | adityā sahito rāma dīpyamāna ivaujasā || 29.10 ||

इसी बीच, हे राम, अग्नि के समान तेजस्वी और मानो अपने ओज से दीप्तिमान कश्यप, अदिति के साथ —

श्लोक 11 (bala.29.11)

देवीसहायो भगवान् दिव्यं वर्षसहस्रकम् । व्रतं समाप्य वरदं तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ २९-११ ॥

devīsahāyo bhagavān divyaṃ varṣasahasrakam | vrataṃ samāpya varadaṃ tuṣṭāva madhusūdanam || 29.11 ||

— उन भगवान् कश्यप ने देवी अदिति के साथ दिव्य सहस्र वर्षों का व्रत पूर्ण करके वरदायक मधुसूदन (विष्णु) की स्तुति की।

श्लोक 12 (bala.29.12)

तपोमयं तपोराशिं तपोमूर्तिं तपात्मकम् । तपसा त्वां सुतप्तेन पश्यामि पुरोषोत्तमम् ॥ २९-१२ ॥

tapomayaṃ taporāśiṃ tapomūrtiṃ tapātmakam | tapasā tvāṃ sutaptena paśyāmi puroṣottamam || 29.12 ||

'तपोमय, तपोराशि, तपोमूर्ति और तपस्वरूप ऐसे हे पुरुषोत्तम, अपनी सुतप्त तपस्या के द्वारा मैं आपका साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ।'

श्लोक 13 (bala.29.13)

शरीरे तव पश्यामि जगत्सर्वमिदं प्रभो । त्वमनादिरनिर्देश्यस्त्वामहं शरणं गतः ॥ २९-१३ ॥

śarīre tava paśyāmi jagatsarvamidaṃ prabho | tvamanādiranirdeśyastvāmahaṃ śaraṇaṃ gataḥ || 29.13 ||

'हे प्रभो, आपके शरीर में मैं यह संपूर्ण जगत् देख रहा हूँ; आप अनादि और अनिर्देश्य हैं; मैं आपकी ही शरण में आया हूँ।'

श्लोक 14 (bala.29.14)

तमुवाच हरिः प्रीतः कश्यपं धूतकल्मषम् । वरं वरय भद्रं ते वरार्होऽसि मतो मम ॥ २९-१४ ॥

tamuvāca hariḥ prītaḥ kaśyapaṃ dhūtakalmaṣam | varaṃ varaya bhadraṃ te varārho'si mato mama || 29.14 ||

प्रसन्न होकर भगवान् हरि ने निष्पाप कश्यप से कहा, 'वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; मैं तुम्हें वर के योग्य मानता हूँ।'

श्लोक 15 (bala.29.15)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य मारीचः कश्यपोऽब्रवीत् । अदित्या देवतानां च मम चैवानुयाचितम् ॥ २९-१५ ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasya mārīcaḥ kaśyapo'bravīt | adityā devatānāṃ ca mama caivānuyācitam || 29.15 ||

यह सुनकर मारीच-पुत्र कश्यप बोले, 'जो वर अदिति ने, देवताओं ने और मैंने भी माँगा है —

श्लोक 16 (bala.29.16)

वरं वरद सुप्रीतो दातुमर्हसि सुव्रत । पुत्रत्वं गच्छ भगवन्नदित्या मम चानघ ॥ २९-१६ ॥

varaṃ varada suprīto dātumarhasi suvrata | putratvaṃ gaccha bhagavannadityā mama cānagha || 29.16 ||

— हे वरदाता सुव्रत, प्रसन्न होकर वही वर दीजिए। हे भगवन् निष्पाप, अदिति और मेरे पुत्र रूप में जन्म लीजिए।'

श्लोक 17 (bala.29.17)

भ्राता भव यवीयांस्त्वं शक्रस्यासुरसूदन । शोकार्तानां तु देवानां साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ २९-१७ ॥

bhrātā bhava yavīyāṃstvaṃ śakrasyāsurasūdana | śokārtānāṃ tu devānāṃ sāhāyyaṃ kartumarhasi || 29.17 ||

'हे असुरसूदन, आप इंद्र के छोटे भाई बनिए; शोकाकुल देवताओं की सहायता करना आपको ही शोभा देता है।'

श्लोक 18 (bala.29.18)

अयं सिद्धाश्रमो नाम प्रसादात्ते भविष्यति । सिद्धे कर्मणि देवेश उत्तिष्ठ भगवन्नितः ॥ २९-१८ ॥

ayaṃ siddhāśramo nāma prasādātte bhaviṣyati | siddhe karmaṇi deveśa uttiṣṭha bhagavannitaḥ || 29.18 ||

'आपकी कृपा से यह सिद्धाश्रम के नाम से जाना जाएगा; हे देवेश भगवन्, कार्य सिद्ध होने पर यहाँ से उठिए।'

श्लोक 19 (bala.29.19)

अथ विष्णुर्महातेजा अदित्यां समजायत । वामनं रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत् ॥ २९-१९ ॥

atha viṣṇurmahātejā adityāṃ samajāyata | vāmanaṃ rūpamāsthāya vairocanimupāgamat || 29.19 ||

तब महातेजस्वी विष्णु अदिति से उत्पन्न हुए; और वामन रूप धारण करके विरोचन-पुत्र बलि के पास गए।

श्लोक 20 (bala.29.20)

त्रीन्पदानथ भिक्षित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम् । आक्रम्य लोकान् लोकार्थो सर्वलोकहिते रतः ॥ २९-२० ॥

trīnpadānatha bhikṣitvā pratigṛhya ca medinīm | ākramya lokān lokārtho sarvalokahite rataḥ || 29.20 ||

तब तीन पग भूमि माँगकर और वह पृथ्वी प्राप्त करके, सभी लोकों के हित में तत्पर उन्होंने सभी लोकों को अपने पगों से नाप लिया।

श्लोक 21 (bala.29.21)

महेन्द्राय पुनः प्रादात् नियम्य बलिमोजसा । त्रैलोक्यं स महातेजाश्चक्रे शक्रवशं पुनः ॥ २९-२१ ॥

mahendrāya punaḥ prādāt niyamya balimojasā | trailokyaṃ sa mahātejāścakre śakravaśaṃ punaḥ || 29.21 ||

अपने बल से बलि को नियंत्रित करके उन्होंने पुनः वह भूमि महेंद्र को लौटा दी; उस महातेजस्वी ने तीनों लोकों को पुनः इंद्र के अधीन कर दिया।

श्लोक 22 (bala.29.22)

तेनैष पूर्वमाक्रान्त आश्रमः श्रमनाशनः । मयापि भक्त्या तस्यैष वामनस्योपभुज्यते ॥ २९-२२ ॥

tenaiṣa pūrvamākrānta āśramaḥ śramanāśanaḥ | mayāpi bhaktyā tasyaiṣa vāmanasyopabhujyate || 29.22 ||

उन्हीं वामन द्वारा पूर्वकाल में अधिष्ठित यह श्रमनाशक आश्रम, उन्हीं के प्रति भक्ति के कारण मेरे द्वारा भी उपभोग किया जा रहा है।

श्लोक 23 (bala.29.23)

एनमाश्रममायान्ति राक्षसा विघ्नकारिणः । अत्र ते पुरुषव्याघ्र हन्तव्या दुष्टचारिणः ॥ २९-२३ ॥

enamāśramamāyānti rākṣasā vighnakāriṇaḥ | atra te puruṣavyāghra hantavyā duṣṭacāriṇaḥ || 29.23 ||

इसी आश्रम में विघ्न डालने वाले राक्षस आते हैं; हे पुरुषव्याघ्र, यहीं उन दुराचारियों का वध करना है।

श्लोक 24 (bala.29.24)

अद्य गच्छामहे राम सिद्धाश्रममनुत्तमम् । तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद्यथा मम ॥ २९-२४ ॥

adya gacchāmahe rāma siddhāśramamanuttamam | tadāśramapadaṃ tāta tavāpyetadyathā mama || 29.24 ||

हे राम, आज हम उस अनुपम सिद्धाश्रम में पहुँचेंगे; हे तात, वह आश्रम जितना मेरा है, उतना ही तुम्हारा भी है।

श्लोक 25 (bala.29.25)

इत्युक्त्वा परमप्रीतो गृह्य रामं सलक्ष्मणम् । प्रविशन्नाश्रमपदं व्यरोचत महामुनिः । शशीव गतनीहारः पुनर्वसुसमन्वितः ॥ २९-२५ ॥

ityuktvā paramaprīto gṛhya rāmaṃ salakṣmaṇam | praviśannāśramapadaṃ vyarocata mahāmuniḥ | śaśīva gatanīhāraḥ punarvasusamanvitaḥ || 29.25 ||

यह कहकर अत्यंत प्रसन्न होकर राम और लक्ष्मण को साथ लेकर आश्रम में प्रवेश करते हुए वे महामुनि, कोहरे से मुक्त और पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त चंद्रमा के समान शोभायमान हुए।

श्लोक 26 (bala.29.26)

तं दृष्ट्वा मुनयः सर्वे सिद्धाश्रमनिवासिनः । उत्पत्योत्पत्य सहसा विश्वामित्रमपूजयन् ॥ २९-२६ ॥

taṃ dṛṣṭvā munayaḥ sarve siddhāśramanivāsinaḥ | utpatyotpatya sahasā viśvāmitramapūjayan || 29.26 ||

उन्हें देखकर सिद्धाश्रम में निवास करने वाले सभी मुनि तुरंत उठकर विश्वामित्र का सम्मान करने लगे।

श्लोक 27 (bala.29.27)

यथार्हं चक्रिरे पूजां विश्वामित्राय धीमते । तथैव राजपुत्राभ्यामकुर्वन्नतिथिक्रियाम् ॥ २९-२७ ॥

yathārhaṃ cakrire pūjāṃ viśvāmitrāya dhīmate | tathaiva rājaputrābhyāmakurvannatithikriyām || 29.27 ||

उन्होंने बुद्धिमान विश्वामित्र का यथोचित सम्मान किया, और उसी प्रकार दोनों राजकुमारों का आतिथ्य-सत्कार भी किया।

श्लोक 28 (bala.29.28)

मुहूर्तमथ विश्रान्तौ राजपुत्रावरिन्दमौ । प्रांजली मुनिशार्दूलमूचतू रघुनंदनौ ॥ २९-२८ ॥

muhūrtamatha viśrāntau rājaputrāvarindamau | prāṃjalī muniśārdūlamūcatū raghunaṃdanau || 29.28 ||

फिर कुछ क्षण विश्राम करके शत्रुदमन दोनों राजकुमार, रघुनंदन राम-लक्ष्मण, हाथ जोड़कर उन मुनिश्रेष्ठ से बोले।

श्लोक 29 (bala.29.29)

अद्यैव दीक्षां प्रविश भद्रं ते मुनिपुंगव । सिद्धाश्रमोऽयं सिद्धः स्यात् सत्यमस्तु वचस्तव ॥ २९-२९ ॥

adyaiva dīkṣāṃ praviśa bhadraṃ te munipuṃgava | siddhāśramo'yaṃ siddhaḥ syāt satyamastu vacastava || 29.29 ||

'हे मुनिपुंगव, आपका कल्याण हो, आज ही दीक्षा ग्रहण कीजिए; यह सिद्धाश्रम सच में सिद्ध हो और आपका वचन सत्य सिद्ध हो।'

श्लोक 30 (bala.29.30)

एवमुक्तो महातेजा विश्वामित्रो महानृषिः । प्रविवेश तदा दीक्षां नियतो नियतेन्द्रियः ॥ २९-३० ॥

evamukto mahātejā viśvāmitro mahānṛṣiḥ | praviveśa tadā dīkṣāṃ niyato niyatendriyaḥ || 29.30 ||

इस प्रकार कहे जाने पर महातेजस्वी महर्षि विश्वामित्र संयमित और जितेंद्रिय होकर उसी समय दीक्षा में प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 31 (bala.29.31)

कुमारावेव तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ । प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां संध्यामुपास्य च ॥ २९-३१ ॥

kumārāveva tāṃ rātrimuṣitvā susamāhitau | prabhātakāle cotthāya pūrvāṃ saṃdhyāmupāsya ca || 29.31 ||

दोनों राजकुमार उस रात्रि को पूर्ण एकाग्रता से बिताकर प्रातःकाल उठे और प्रातःकालीन संध्या-वंदन करके —

श्लोक 32 (bala.29.32)

प्रशुची परं जप्यं समाप्य नियमेन च । हुताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम् ॥ २९-३२ ॥

praśucī paraṃ japyaṃ samāpya niyamena ca | hutāgnihotramāsīnaṃ viśvāmitramavandatām || 29.32 ||

— पूर्ण पवित्र होकर नियमपूर्वक अपने उत्तम जप को समाप्त करके, अग्निहोत्र कर चुके और आसीन विश्वामित्र को प्रणाम किया।

सर्ग 28सर्ग-सूचीसर्ग 30