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बालकाण्ड · सर्ग 34

विश्वामित्र का वंश और कौशिकी नदी

सर्ग 33सर्ग-सूचीसर्ग 35

श्लोक 1 (bala.34.1)

कृतोद्वाहे गते तस्मिन् ब्रह्मदत्ते च राघव । अपुत्रः पुत्रलाभाय पौत्रीमिष्टिमकल्पयत् ।। ३४.१ ।।

kṛtodvāhe gate tasmin brahmadatte ca rāghava | aputraḥ putralābhāya pautrīmiṣṭimakalpayat || 34.1 ||

हे राघव, जब विवाहित ब्रह्मदत्त वहाँ से चले गए, तब पुत्रहीन कुशनाभ ने पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ का आयोजन किया।

श्लोक 2 (bala.34.2)

इष्ट्यां तु वर्तमानायां कुशनाभं महीपतिम् । उवाच परमोदारः कुशो ब्रह्मसुतस्तदा ।। ३४.२ ।।

iṣṭyāṃ tu vartamānāyāṃ kuśanābhaṃ mahīpatim | uvāca paramodāraḥ kuśo brahmasutastadā || 34.2 ||

उस यज्ञ के चलते समय, ब्रह्मा के पुत्र परम उदार कुश ने राजा कुशनाभ से कहा।

श्लोक 3 (bala.34.3)

पुत्र ते सदृशः पुत्रो भविष्यति सुधार्मिकः । गाधिं प्राप्स्यसि तेन त्वं कीर्तिं लोके च शाश्वतीम् ।। ३४.३ ।।

putra te sadṛśaḥ putro bhaviṣyati sudhārmikaḥ | gādhiṃ prāpsyasi tena tvaṃ kīrtiṃ loke ca śāśvatīm || 34.3 ||

"हे पुत्र, तुम्हें अपने समान एक धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा, जिसका नाम गाधि होगा; उसके द्वारा तुम्हें संसार में शाश्वत कीर्ति प्राप्त होगी।"

श्लोक 4 (bala.34.4)

एवमुक्त्वा कुशो राम कुशनाभं महीपतिम् । जगामाकाशमाविश्य ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। ३४.४ ।।

evamuktvā kuśo rāma kuśanābhaṃ mahīpatim | jagāmākāśamāviśya brahmalokaṃ sanātanam || 34.4 ||

हे राम, राजा कुशनाभ से ऐसा कहकर कुश आकाश में प्रवेश करके सनातन ब्रह्मलोक को चले गए।

श्लोक 5 (bala.34.5)

कस्यचित्त्वथ कालस्य कुशनाभस्य धीमतः । जज्ञे परमधर्मिष्ठो गाधिरित्येव नामतः ।। ३४.५ ।।

kasyacittvatha kālasya kuśanābhasya dhīmataḥ | jajñe paramadharmiṣṭho gādhirityeva nāmataḥ || 34.5 ||

कुछ समय पश्चात बुद्धिमान कुशनाभ को गाधि नामक एक परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हुआ।

श्लोक 6 (bala.34.6)

स पिता मम काकुत्स्थ गाधिः परमधार्मिकः । कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनंदन ।। ३४.६ ।।

sa pitā mama kākutstha gādhiḥ paramadhārmikaḥ | kuśavaṃśaprasūto'smi kauśiko raghunaṃdana || 34.6 ||

"हे काकुत्स्थ, वही परम धर्मात्मा गाधि मेरे पिता हैं; और हे रघुनंदन, कुश के वंश में उत्पन्न होने के कारण मैं कौशिक कहलाता हूँ।"

श्लोक 7 (bala.34.7)

पूर्वजा भगिनी चापि मम राघव सुव्रता । नाम्ना सत्यवती नाम ऋचीके प्रतिपादिता ।। ३४.७ ।।

pūrvajā bhaginī cāpi mama rāghava suvratā | nāmnā satyavatī nāma ṛcīke pratipāditā || 34.7 ||

"हे राघव, मेरी एक बड़ी बहन भी है, जो व्रतशील है और सत्यवती नाम से जानी जाती है; उसका विवाह ऋषि ऋचीक से हुआ था।"

श्लोक 8 (bala.34.8)

सशरीरा गता स्वर्गं भर्तारमनुवर्तिनी । कौशिकी परमोदारा सा प्रवृत्ता महानदी ।। ३४.८ ।।

saśarīrā gatā svargaṃ bhartāramanuvartinī | kauśikī paramodārā sā pravṛttā mahānadī || 34.8 ||

"अपने पति का अनुसरण करते हुए वह अपने शरीर सहित स्वर्ग को चली गई; वह परम उदार महिला कौशिकी नामक महानदी के रूप में प्रकट हुई।"

श्लोक 9 (bala.34.9)

दिव्या पुण्योदका रम्या हिमवन्तमुपाश्रिता । लोकस्य हितकार्यार्थं प्रवृत्ता भगिनी मम ।। ३४.९ ।।

divyā puṇyodakā ramyā himavantamupāśritā | lokasya hitakāryārthaṃ pravṛttā bhaginī mama || 34.9 ||

"मेरी वह बहन दिव्य, पवित्र जल वाली और मनोहर है; वह हिमालय की शरण लेकर संसार के कल्याण हेतु प्रवाहित होती है।"

श्लोक 10 (bala.34.10)

ततोऽहं हिमवत्पार्श्वे वसामि नियतः सुखम् । भगिन्यां स्नेहसंयुक्तः कौशिक्यां रघुनंदन ।। ३४.१० ।।

tato'haṃ himavatpārśve vasāmi niyataḥ sukham | bhaginyāṃ snehasaṃyuktaḥ kauśikyāṃ raghunaṃdana || 34.10 ||

"हे रघुनंदन, इसीलिए अपनी बहन कौशिकी के प्रति स्नेह के कारण मैं हिमालय की तराई में सुखपूर्वक और नियमपूर्वक निवास करता हूँ।"

श्लोक 11 (bala.34.11)

सा तु सत्यवती पुण्या सत्ये धर्मे प्रतिष्ठिता । पतिव्रता महाभागा कौशिकी सरितां वरा ।। ३४.११ ।।

sā tu satyavatī puṇyā satye dharme pratiṣṭhitā | pativratā mahābhāgā kauśikī saritāṃ varā || 34.11 ||

"सत्य और धर्म में प्रतिष्ठित, पतिव्रता और परम सौभाग्यशालिनी वह पुण्यात्मा सत्यवती ही नदियों में श्रेष्ठ कौशिकी बनी।"

श्लोक 12 (bala.34.12)

अहं हि नियमाद्राम हित्वा तां समुपागतः । सिद्धाश्रममनुप्राप्तः सिद्धोऽस्मि तव तेजसा ।। ३४.१२ ।।

ahaṃ hi niyamādrāma hitvā tāṃ samupāgataḥ | siddhāśramamanuprāptaḥ siddho'smi tava tejasā || 34.12 ||

"हे राम, अपने व्रत के कारण मैं उसे कुछ समय के लिए छोड़कर यहाँ आया; सिद्धाश्रम पहुँचकर तुम्हारे तेज से मेरा कार्य सिद्ध हुआ है।"

श्लोक 13 (bala.34.13)

एषा राम ममोत्पत्तिः स्वस्य वंशस्य कीर्तिता । देशस्य च महाबाहो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ३४.१३ ।।

eṣā rāma mamotpattiḥ svasya vaṃśasya kīrtitā | deśasya ca mahābāho yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi || 34.13 ||

"हे महाबाहु राम, तुमने मुझसे जो पूछा था, वह मेरे जन्म, अपने वंश और इस प्रदेश का यह संपूर्ण वृत्तांत है।"

श्लोक 14 (bala.34.14)

गतोऽर्धरात्रः काकुत्स्थ कथाः कथयतो मम । निद्रामभ्येहि भद्रं ते मा भूद्विघ्नोऽध्वनीह नः ।। ३४.१४ ।।

gato'rdharātraḥ kākutstha kathāḥ kathayato mama | nidrāmabhyehi bhadraṃ te mā bhūdvighno'dhvanīha naḥ || 34.14 ||

"हे काकुत्स्थ, यह कथा कहते-कहते आधी रात बीत गई; अब तुम विश्राम करो, तुम्हारा कल्याण हो — कहीं हमारे मार्ग में कोई विघ्न न आ जाए।"

श्लोक 15 (bala.34.15)

निष्पन्दास्तरवः सर्वे निलीना मृगपक्षिणः । नैशेन तमसा व्याप्ता दिशश्च रघुनंदन ।। ३४.१५ ।।

niṣpandāstaravaḥ sarve nilīnā mṛgapakṣiṇaḥ | naiśena tamasā vyāptā diśaśca raghunaṃdana || 34.15 ||

"हे रघुनंदन, समस्त वृक्ष स्थिर हो गए हैं, मृग और पक्षी शांत हो गए हैं, और सभी दिशाएँ रात्रि के अंधकार से व्याप्त हो गई हैं।"

श्लोक 16 (bala.34.16)

शनैर्विसृज्यते संध्या नभो नेत्रैरिवावृतम् । नक्षत्रतारागहनं ज्योतिर्भिरवभासते ।। ३४.१६ ।।

śanairvisṛjyate saṃdhyā nabho netrairivāvṛtam | nakṣatratārāgahanaṃ jyotirbhiravabhāsate || 34.16 ||

"संध्या धीरे-धीरे लुप्त हो रही है, और नक्षत्रों तथा तारों से सघन आकाश मानो असंख्य नेत्रों से आच्छादित होकर ज्योतिर्मय दिखाई दे रहा है।"

श्लोक 17 (bala.34.17)

उत्तिष्ठति च शीतांशुः शशी लोकतमोनुदः । ह्लादयन् प्राणिनां लोके मनांसि प्रभया स्वया ।। ३४.१७ ।।

uttiṣṭhati ca śītāṃśuḥ śaśī lokatamonudaḥ | hlādayan prāṇināṃ loke manāṃsi prabhayā svayā || 34.17 ||

"शीतल किरणों वाला चंद्रमा उदय हो रहा है, जो संसार के अंधकार को दूर करते हुए अपनी प्रभा से समस्त प्राणियों के मन को आनंदित कर रहा है।"

श्लोक 18 (bala.34.18)

नैशानि सर्वभूतानि प्रचरंति ततस्ततः । यक्षराक्षससंघाश्च रौद्राश्च पिशिताशनाः ।। ३४.१८ ।।

naiśāni sarvabhūtāni pracaraṃti tatastataḥ | yakṣarākṣasasaṃghāśca raudrāśca piśitāśanāḥ || 34.18 ||

"अब रात्रिचर सभी प्राणी इधर-उधर विचरण करने लगे हैं, साथ ही यक्षों और राक्षसों के समूह तथा भयंकर मांसभक्षी भी।"

श्लोक 19 (bala.34.19)

एवमुक्त्वा महातेजा विरराम महामुनिः । साधु साध्विति ते सर्वे मुनयो ह्यभ्यपूजयन् ।। ३४.१९ ।।

evamuktvā mahātejā virarāma mahāmuniḥ | sādhu sādhviti te sarve munayo hyabhyapūjayan || 34.19 ||

यह कहकर वह महातेजस्वी महामुनि मौन हो गए; और सभी मुनियों ने "साधु, साधु" कहकर उनका सम्मान किया।

श्लोक 20 (bala.34.20)

कुशिकानामयं वंशो महान् धर्मपरः सदा । ब्रह्मोपमा महात्मानः कुशवंश्या नरोत्तम ।। ३४.२० ।।

kuśikānāmayaṃ vaṃśo mahān dharmaparaḥ sadā | brahmopamā mahātmānaḥ kuśavaṃśyā narottama || 34.20 ||

"हे नरश्रेष्ठ, यह कुशिक-वंश महान और सदा धर्मपरायण है; कुश-वंश में उत्पन्न ये महात्मा ब्रह्मा के समान तेजस्वी हैं।"

श्लोक 21 (bala.34.21)

विशेषेण भवानेव विश्वामित्रो महायशाः । कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलोद्योतकरी तव ।। ३४.२१ ।।

viśeṣeṇa bhavāneva viśvāmitro mahāyaśāḥ | kauśikī saritāṃ śreṣṭhā kulodyotakarī tava || 34.21 ||

"हे महायशस्वी विश्वामित्र, विशेष रूप से आप स्वयं इसके उदाहरण हैं; और नदियों में श्रेष्ठ कौशिकी आपके कुल की कीर्ति को उद्भासित करने वाली है।"

श्लोक 22 (bala.34.22)

मुदितैर्मुनिशार्दूलैः प्रशस्तः कुशिकात्मजः । निद्रामुपागमच्छ्रीमानस्तं गत इवांशुमान् ।। ३४.२२ ।।

muditairmuniśārdūlaiḥ praśastaḥ kuśikātmajaḥ | nidrāmupāgamacchrīmānastaṃ gata ivāṃśumān || 34.22 ||

प्रसन्न मुनिश्रेष्ठों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होकर श्रीमान कुशिकपुत्र विश्वामित्र निद्रा में लीन हो गए, मानो अस्ताचल को गया हुआ सूर्य हो।

श्लोक 23 (bala.34.23)

रामोऽपि सहसौमित्रिः किंचिदागतविस्मयः । प्रशस्य मुनिशार्दूलं निद्रां समुपसेवते ।। ३४.२३ ।।

rāmo'pi sahasaumitriḥ kiṃcidāgatavismayaḥ | praśasya muniśārdūlaṃ nidrāṃ samupasevate || 34.23 ||

राम भी लक्ष्मण के साथ कुछ आश्चर्यचकित होकर उस मुनिश्रेष्ठ की प्रशंसा करते हुए निद्रा में चले गए।

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