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बालकाण्ड · सर्ग 37

कार्तिकेय-जन्म

सर्ग 36सर्ग-सूचीसर्ग 38

श्लोक 1 (bala.37.1)

तप्यमाने तदा देवे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः। सेनापतिमभीप्सन्तः पितामहमुपागमन् ॥ १-३७-१ ॥

tapyamāne tadā deve sendrāḥ sāgnipurogamāḥ| senāpatimabhīpsantaḥ pitāmahamupāgaman || 1-37-1 ||

उस समय जब शिव इस प्रकार तपस्या में लीन थे, तब इन्द्र सहित तथा अग्नि को आगे करके सभी देवता अपनी सेना के लिए एक सेनापति की कामना से पितामह ब्रह्मा के पास पहुँचे।

श्लोक 2 (bala.37.2)

ततोऽब्रुवन् सुराः सर्वे भगवन्तं पितामहम्। प्रणिपत्य सुराः राम सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ १-३७-२ ॥

tato'bruvan surāḥ sarve bhagavantaṃ pitāmaham| praṇipatya surāḥ rāma sendrāḥ sāgnipurogamāḥ || 1-37-2 ||

हे राम! तब इन्द्र सहित और अग्नि को आगे किए हुए वे सभी देवता भगवान् पितामह को प्रणाम करके यह बोले।

श्लोक 3 (bala.37.3)

येन सेनापतिर्देव दत्तो भगवता पुरा। स तपः परमास्थाय तप्यते स्म सहोमया ॥ १-३७-३ ॥

yena senāpatirdeva datto bhagavatā purā| sa tapaḥ paramāsthāya tapyate sma sahomayā || 1-37-3 ||

हे देव! जिस भगवान् शिव ने पहले हमें सेनापति देने का वचन दिया था, वे ही अब उमा के साथ परम तपस्या में लीन हैं।

श्लोक 4 (bala.37.4)

यदत्रानंतरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया। संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः ॥ १-३७-४ ॥

yadatrānaṃtaraṃ kāryaṃ lokānāṃ hitakāmyayā| saṃvidhatsva vidhānajña tvaṃ hi naḥ paramā gatiḥ || 1-37-4 ||

हे विधि के ज्ञाता! लोकों के हित की कामना से इसके बाद जो कार्य करना उचित हो, वह आप हमें बताइए; क्योंकि आप ही हमारी सर्वोच्च गति हैं।

श्लोक 5 (bala.37.5)

देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः। सान्त्वयन् मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत् ॥ १-३७-५ ॥

devatānāṃ vacaḥ śrutvā sarvalokapitāmahaḥ| sāntvayan madhurairvākyaistridaśānidamabravīt || 1-37-5 ||

देवताओं के इन वचनों को सुनकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्मा ने मधुर वचनों से उन्हें सान्त्वना देते हुए यह कहा।

श्लोक 6 (bala.37.6)

शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजाः स्वासु पत्निषु। तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव न संशयः ॥ १-३७-६ ॥

śailaputryā yaduktaṃ tanna prajāḥ svāsu patniṣu| tasyā vacanamakliṣṭaṃ satyameva na saṃśayaḥ || 1-37-6 ||

पर्वतपुत्री उमा ने जो यह कहा था कि तुम अपनी पत्नियों में सन्तान उत्पन्न नहीं कर पाओगे, उसका वह वचन निर्दोष और सत्य ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 7 (bala.37.7)

इयमाकाशगंगा यस्यां पुत्रं हुताशनः। जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमम् ॥ १-३७-७ ॥

iyamākāśagaṃgā yasyāṃ putraṃ hutāśanaḥ| janayiṣyati devānāṃ senāpatimariṃdamam || 1-37-7 ||

यह आकाशगंगा है, जिसमें अग्निदेव देवताओं के लिए एक शत्रुदमन सेनापति पुत्र को जन्म देंगे।

श्लोक 8 (bala.37.8)

ज्येष्ठा शैलेन्द्रदुहिता मानयिष्यति तं सुतम्। उमायास्तद्बहुमतं भविष्यति न संशयः ॥ १-३७-८ ॥

jyeṣṭhā śailendraduhitā mānayiṣyati taṃ sutam| umāyāstadbahumataṃ bhaviṣyati na saṃśayaḥ || 1-37-8 ||

पर्वतराज की ज्येष्ठा पुत्री गंगा उस पुत्र को सादर स्वीकार करेगी, और यह उमा को भी अत्यन्त प्रिय होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 9 (bala.37.9)

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनन्दन। प्रणिपत्य सुराः सर्वे पितामहमपूजयन् ॥ १-३७-९ ॥

tacchrutvā vacanaṃ tasya kṛtārthā raghunandana| praṇipatya surāḥ sarve pitāmahamapūjayan || 1-37-9 ||

हे रघुनन्दन! ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर अपने उद्देश्य को सफल जानकर सभी देवताओं ने पितामह को प्रणाम करके उनकी पूजा की।

श्लोक 10 (bala.37.10)

ते गत्वा परमं राम कैलासं धातुमण्डितम्। अग्निं नियोजयामासुः पुत्रार्थं सर्वदेवताः ॥ १-३७-१० ॥

te gatvā paramaṃ rāma kailāsaṃ dhātumaṇḍitam| agniṃ niyojayāmāsuḥ putrārthaṃ sarvadevatāḥ || 1-37-10 ||

हे राम! तब समस्त देवता, अनेक धातुओं से सुशोभित उस सर्वोत्तम कैलास पर्वत पर जाकर, पुत्र-प्राप्ति के प्रयोजन से अग्निदेव को नियुक्त किया।

श्लोक 11 (bala.37.11)

देवकार्यमिदं देव समाधत्स्व हुताशन। शैलपुत्र्यां महातेजो गंगायां तेज उत्सृज ॥ १-३७-११ ॥

devakāryamidaṃ deva samādhatsva hutāśana| śailaputryāṃ mahātejo gaṃgāyāṃ teja utsṛja || 1-37-11 ||

हे देव अग्नि! आप हमारे इस देवकार्य को सिद्ध करें; हे महातेजस्वी! पर्वतपुत्री गंगा में उस तेज को स्थापित करें।

श्लोक 12 (bala.37.12)

देवतानां प्रतिज्ञाय गंगामभ्येत्य पावकः। गर्भं धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियम् ॥ १-३७-१२ ॥

devatānāṃ pratijñāya gaṃgāmabhyetya pāvakaḥ| garbhaṃ dhāraya vai devi devatānāmidaṃ priyam || 1-37-12 ||

देवताओं को वचन देकर अग्निदेव गंगा के पास गए और बोले — हे देवी! यह गर्भ धारण करो, यह देवताओं को अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 13 (bala.37.13)

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत्। स तस्या महिमां दृष्ट्वा समंतादवकीर्यत ॥ १-३७-१३ ॥

ityetadvacanaṃ śrutvā divyaṃ rūpamadhārayat| sa tasyā mahimāṃ dṛṣṭvā samaṃtādavakīryata || 1-37-13 ||

यह वचन सुनकर गंगा ने दिव्य रूप धारण कर लिया; और उसकी उस महिमा को देखकर अग्नि उसके सम्पूर्ण अंगों में व्याप्त हो गए।

श्लोक 14 (bala.37.14)

समंततस्तदा देवीमभ्यषिंचत पावकः। सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गंगाया रघुनन्दन ॥ १-३७-१४ ॥

samaṃtatastadā devīmabhyaṣiṃcata pāvakaḥ| sarvasrotāṃsi pūrṇāni gaṃgāyā raghunandana || 1-37-14 ||

हे रघुनन्दन! तब अग्निदेव ने उस देवी को सब ओर से भिगो दिया, जिससे गंगा की सभी धाराएँ उस तेज से परिपूर्ण हो गईं।

श्लोक 15 (bala.37.15)

तमुवाच ततो गंगा सर्वदेवपुरोगमम्। अशक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम् ॥ १-३७-१५ ॥

tamuvāca tato gaṃgā sarvadevapurogamam| aśaktā dhāraṇe deva tejastava samuddhatam || 1-37-15 ||

तब गंगा ने देवताओं में अग्रणी उन अग्निदेव से कहा — हे देव! मैं आपके इस प्रबल तेज को धारण करने में असमर्थ हूँ।

श्लोक 16 (bala.37.16)

दह्यमानाग्निना तेन संप्रव्यथितचेतना। अथाब्रवीदिदं गङ्गां सर्वदेवहुताशनः ॥ १-३७-१६ ॥

dahyamānāgninā tena saṃpravyathitacetanā| athābravīdidaṃ gaṅgāṃ sarvadevahutāśanaḥ || 1-37-16 ||

उस अग्नि से जलती हुई गंगा का चित्त अत्यन्त व्यथित हो गया। तब सब देवताओं के अग्निदेव ने गंगा से यह कहा।

श्लोक 17 (bala.37.17)

इह हैमवते पार्श्वे गर्भोऽयं संनिवेश्यताम्। श्रुत्वा त्वग्निवचो गंगा तं गर्भमतिभास्वरम् ॥ १-३७-१७ ॥

iha haimavate pārśve garbho'yaṃ saṃniveśyatām| śrutvā tvagnivaco gaṃgā taṃ garbhamatibhāsvaram || 1-37-17 ||

यह गर्भ यहाँ हिमालय की तराई में रख दो। अग्निदेव के इस वचन को सुनकर गंगा ने उस अत्यन्त तेजस्वी गर्भ को...

श्लोक 18 (bala.37.18)

उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ। यदस्या निर्गतं तस्मात्तप्तजांबूनदप्रभम् ॥ १-३७-१८ ॥

utsasarja mahātejāḥ srotobhyo hi tadānagha| yadasyā nirgataṃ tasmāttaptajāṃbūnadaprabham || 1-37-18 ||

...अपनी सभी धाराओं से बाहर निकाल दिया, हे निष्पाप राम! उससे जो निकला, वह तपाए हुए सोने के समान कान्तिवाला था।

श्लोक 19 (bala.37.19)

कांचनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम्। ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ॥ १-३७-१९ ॥

kāṃcanaṃ dharaṇīṃ prāptaṃ hiraṇyamatulaprabham| tāmraṃ kārṣṇāyasaṃ caiva taikṣṇyādevābhijāyata || 1-37-19 ||

पृथ्वी पर पहुँचकर वह अनुपम कान्तिवाला सोना और चाँदी बन गया; और उसकी तीक्ष्णता से ही ताँबा और लोहा भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 20 (bala.37.20)

मलं तस्याभवत्तत्र त्रपु सीसकमेव च। तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ॥ १-३७-२० ॥

malaṃ tasyābhavattatra trapu sīsakameva ca| tadetaddharaṇīṃ prāpya nānādhāturavardhata || 1-37-20 ||

और उसके मैल से वहाँ राँगा तथा सीसा उत्पन्न हुए। इस प्रकार पृथ्वी पर पहुँचकर वह गर्भ नाना प्रकार की धातुओं के रूप में विकसित हुआ।

श्लोक 21 (bala.37.21)

निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरंजितम्। सर्वं पर्वतसंनद्धं सौवर्णमभवद्वनम् ॥ १-३७-२१ ॥

nikṣiptamātre garbhe tu tejobhirabhiraṃjitam| sarvaṃ parvatasaṃnaddhaṃ sauvarṇamabhavadvanam || 1-37-21 ||

उस गर्भ के रखे जाते ही, उसके तेज से रंजित होकर, पर्वत पर उगा हुआ वह सम्पूर्ण वन सोने का बन गया।

श्लोक 22 (bala.37.22)

जातरूपमिति ख्यातं तदा प्रभृति राघव। सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम्। तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति कांचनम् ॥ १-३७-२२ ॥

jātarūpamiti khyātaṃ tadā prabhṛti rāghava| suvarṇaṃ puruṣavyāghra hutāśanasamaprabham| tṛṇavṛkṣalatāgulmaṃ sarvaṃ bhavati kāṃcanam || 1-37-22 ||

हे राघव! तभी से अग्नि के समान तेजस्वी वह सोना 'जातरूप' नाम से प्रसिद्ध हुआ। हे पुरुषश्रेष्ठ! वहाँ की समस्त घास, वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ भी सोने की हो गईं।

श्लोक 23 (bala.37.23)

तं कुमारं ततो जातं सेन्द्राः सहमरुद्गणाः। क्षीरसंभावनार्थाय कृत्तिकाः समयोजयन् ॥ १-३७-२३ ॥

taṃ kumāraṃ tato jātaṃ sendrāḥ sahamarudgaṇāḥ| kṣīrasaṃbhāvanārthāya kṛttikāḥ samayojayan || 1-37-23 ||

तब उस उत्पन्न हुए कुमार को दूध पिलाने के लिए इन्द्र सहित मरुद्गणों ने कृत्तिकाओं को नियुक्त किया।

श्लोक 24 (bala.37.24)

ताः क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमम्। ददुः पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिताः ॥ १-३७-२४ ॥

tāḥ kṣīraṃ jātamātrasya kṛtvā samayamuttamam| daduḥ putro'yamasmākaṃ sarvāsāmiti niścitāḥ || 1-37-24 ||

उन्होंने आपस में यह उत्तम निश्चय करके कि 'यह बालक हम सबका पुत्र होगा', उस नवजात शिशु को दूध पिलाया।

श्लोक 25 (bala.37.25)

ततस्तु देवताः सर्वाः कार्तिकेय इति ब्रुवन्। पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति न संशयः ॥ १-३७-२५ ॥

tatastu devatāḥ sarvāḥ kārtikeya iti bruvan| putrastrailokyavikhyāto bhaviṣyati na saṃśayaḥ || 1-37-25 ||

तब सभी देवताओं ने कहा — यह पुत्र 'कार्तिकेय' कहलाएगा और निःसन्देह तीनों लोकों में विख्यात होगा।

श्लोक 26 (bala.37.26)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे। स्नापयन् परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम् ॥ १-३७-२६ ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā skannaṃ garbhaparisrave| snāpayan parayā lakṣmyā dīpyamānaṃ yathānalam || 1-37-26 ||

उनके इस वचन को सुनकर, गर्भ के स्रवण से स्खलित होकर अग्नि के समान परम शोभा से देदीप्यमान उस बालक को उन्होंने स्नान कराया।

श्लोक 27 (bala.37.27)

स्कंद इत्यब्रुवन् देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवात्। कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम् ॥ १-३७-२७ ॥

skaṃda ityabruvan devāḥ skannaṃ garbhaparisravāt| kārtikeyaṃ mahābāhuṃ kākutstha jvalanopamam || 1-37-27 ||

हे काकुत्स्थ! गर्भ के स्रवण से स्खलित होने के कारण देवताओं ने उस अग्नितुल्य महाबाहु कार्तिकेय को 'स्कन्द' कहा।

श्लोक 28 (bala.37.28)

प्रादुर्भूतं ततः क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमम्। षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पयः ॥ १-३७-२८ ॥

prādurbhūtaṃ tataḥ kṣīraṃ kṛttikānāmanuttamam| ṣaṇṇāṃ ṣaḍānano bhūtvā jagrāha stanajaṃ payaḥ || 1-37-28 ||

तब छहों कृत्तिकाओं के स्तनों से उत्तम दूध प्रकट हुआ, और वह बालक छह मुखों वाला होकर उन छहों के स्तनों का दूध एक साथ पीने लगा।

श्लोक 29 (bala.37.29)

गृहीत्वा क्षीरमेकाह्ना सुकुमारवपुस्तदा। अजयत् स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान्विभुः ॥ १-३७-२९ ॥

gṛhītvā kṣīramekāhnā sukumāravapustadā| ajayat svena vīryeṇa daityasainyagaṇānvibhuḥ || 1-37-29 ||

उस दूध को केवल एक ही दिन ग्रहण करके, कोमल शरीर होते हुए भी, उस समर्थ बालक ने अपने ही पराक्रम से दैत्यों की सेनाओं को उसी दिन जीत लिया।

श्लोक 30 (bala.37.30)

सुरसेनागणपतिमभ्यषिंचन्महाद्युतिम्। ततस्तममराः सर्वे समेत्याग्निपुरोगमाः ॥ १-३७-३० ॥

surasenāgaṇapatimabhyaṣiṃcanmahādyutim| tatastamamarāḥ sarve sametyāgnipurogamāḥ || 1-37-30 ||

तब अग्निदेव को आगे करके सभी देवताओं ने एकत्र होकर उस महातेजस्वी बालक का देवसेना के अधिपति के रूप में अभिषेक किया।

श्लोक 31 (bala.37.31)

एष ते राम गंगाया विस्तरोऽभिहितो मया। कुमारसंभवश्चैव धन्यः पुण्यस्तथैव च ॥ १-३७-३१ ॥

eṣa te rāma gaṃgāyā vistaro'bhihito mayā| kumārasaṃbhavaścaiva dhanyaḥ puṇyastathaiva ca || 1-37-31 ||

हे राम! इस प्रकार मैंने तुम्हें गंगा का यह विस्तृत वृत्तान्त तथा कुमार [स्कन्द] के इस पुण्य एवं मंगलमय जन्म को भी बता दिया है।

श्लोक 32 (bala.37.32)

भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः। आयुष्मान् पुत्र पौत्रश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत् ॥ १-३७-३२ ॥

bhaktaśca yaḥ kārtikeye kākutstha bhuvi mānavaḥ| āyuṣmān putra pautraśca skandasālokyatāṃ vrajet || 1-37-32 ||

हे काकुत्स्थ! इस पृथ्वी पर जो भी मनुष्य कार्तिकेय का भक्त होगा, वह दीर्घायु, पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न होकर अन्त में स्कन्द के ही लोक को प्राप्त होगा।

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