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बालकाण्ड · सर्ग 39

सगरपुत्रों द्वारा पृथ्वी-खनन

सर्ग 38सर्ग-सूचीसर्ग 40

श्लोक 1 (bala.39.1)

विश्वामित्रवचः श्रुत्वा कथान्ते रघुनंदन। उवाच परमप्रीतो मुनिं दीप्तमिवानलम् ॥ १-३९-१ ॥

viśvāmitravacaḥ śrutvā kathānte raghunaṃdana| uvāca paramaprīto muniṃ dīptamivānalam || 1-39-1 ||

विश्वामित्र के इस वचन को सुनकर, हे रघुनन्दन! कथा के अन्त में अत्यन्त प्रसन्न हुए राम ने अग्नि के समान तेजस्वी उस मुनि से यह कहा।

श्लोक 2 (bala.39.2)

श्रोतुमिच्छामि भद्रं ते विस्तरेण कथामिमाम्। पूर्वजो मे कथं ब्रह्मन् यज्ञं वै समुपाहरत् ॥ १-३९-२ ॥

śrotumicchāmi bhadraṃ te vistareṇa kathāmimām| pūrvajo me kathaṃ brahman yajñaṃ vai samupāharat || 1-39-2 ||

मैं यह कथा विस्तार से सुनना चाहता हूँ, आपका कल्याण हो; हे ब्रह्मन्! मेरे पूर्वज ने वह यज्ञ किस प्रकार सम्पन्न किया था?

श्लोक 3 (bala.39.3)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितः। विश्वामित्रस्तु काकुत्स्थमुवाच प्रहसन्निव ॥ १-३९-३ ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā kautūhalasamanvitaḥ| viśvāmitrastu kākutsthamuvāca prahasanniva || 1-39-3 ||

उसका यह कौतूहलभरा वचन सुनकर विश्वामित्र मानो हँसते हुए काकुत्स्थ से बोले।

श्लोक 4 (bala.39.4)

श्रूयतां विस्तरो राम सगरस्य महात्मनः। शंकरश्वशुरो नाम हिमवानिति विश्रुतः ॥ १-३९-४ ॥

śrūyatāṃ vistaro rāma sagarasya mahātmanaḥ| śaṃkaraśvaśuro nāma himavāniti viśrutaḥ || 1-39-4 ||

हे राम! महात्मा सगर का यह विस्तृत वृत्तान्त सुनो। शंकर के श्वसुर, हिमवान् नाम से विख्यात एक पर्वत है,

श्लोक 5 (bala.39.5)

विंध्यपर्वतमासाद्य निरीक्षेते परस्परम्। तयोर्मध्ये प्रवृत्तोऽभूद्यज्ञः स पुरुषोत्तम ॥ १-३९-५ ॥

viṃdhyaparvatamāsādya nirīkṣete parasparam| tayormadhye pravṛtto'bhūdyajñaḥ sa puruṣottama || 1-39-5 ||

जो विन्ध्य पर्वत के सम्मुख होकर एक-दूसरे को निहारते हैं। हे पुरुषोत्तम! उन दोनों के मध्य ही वह यज्ञ सम्पन्न हुआ था।

श्लोक 6 (bala.39.6)

स हि देशो नरव्याघ्र प्रशस्तो यज्ञकर्मणि। तस्याश्वचर्यां काकुत्स्थ दृढधन्वा महारथः ॥ १-३९-६ ॥

sa hi deśo naravyāghra praśasto yajñakarmaṇi| tasyāśvacaryāṃ kākutstha dṛḍhadhanvā mahārathaḥ || 1-39-6 ||

क्योंकि हे नरव्याघ्र! वह प्रदेश यज्ञकर्म के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। हे काकुत्स्थ! दृढ़धनुर्धर, महारथी अंशुमान उस यज्ञ के अश्व की रक्षा कर रहे थे,

श्लोक 7 (bala.39.7)

अंशुमानकरोत्तात सगरस्य मते स्थितः। तस्य पर्वणि तं यज्ञं यजमानस्य वासवः ॥ १-३९-७ ॥

aṃśumānakarottāta sagarasya mate sthitaḥ| tasya parvaṇi taṃ yajñaṃ yajamānasya vāsavaḥ || 1-39-7 ||

हे तात! सगर की इच्छा के अनुरूप उस घोड़े की देखरेख कर रहे थे। उस यज्ञ के अवसर पर उस यजमान सगर के यज्ञ से इन्द्र ने,

श्लोक 8 (bala.39.8)

राक्षसीं तनुमास्थाय यज्ञीयाश्वमपाहरत्। ह्रियमाणे तु काकुत्स्थ तस्मिन्नश्वे महात्मनः ॥ १-३९-८ ॥

rākṣasīṃ tanumāsthāya yajñīyāśvamapāharat| hriyamāṇe tu kākutstha tasminnaśve mahātmanaḥ || 1-39-8 ||

राक्षस का रूप धारण करके उस यज्ञ के घोड़े को हर लिया। हे काकुत्स्थ! उस महात्मा सगर के उस घोड़े के हरे जाने पर,

श्लोक 9 (bala.39.9)

उपाध्यायगणाः सर्वे यजमानमथाब्रुवन्। अयं पर्वणि वेगेन यज्ञियाश्वोऽपनीयते ॥ १-३९-९ ॥

upādhyāyagaṇāḥ sarve yajamānamathābruvan| ayaṃ parvaṇi vegena yajñiyāśvo'panīyate || 1-39-9 ||

सभी आचार्यगण यजमान सगर से यह बोले — यह यज्ञ का घोड़ा इसी शुभ अवसर पर वेग से हर लिया जा रहा है!

श्लोक 10 (bala.39.10)

हर्तारं जहि काकुत्स्थ हयश्चैवोपनीयताम्। यज्ञश्च्छिद्रं भवत्येतत्सर्वेषामशिवाय नः ॥ १-३९-१० ॥

hartāraṃ jahi kākutstha hayaścaivopanīyatām| yajñaścchidraṃ bhavatyetatsarveṣāmaśivāya naḥ || 1-39-10 ||

हे राजन्! उस हरने वाले का वध करके घोड़े को वापस लाया जाए। यह यज्ञ में विघ्न हम सबके लिए अमंगलकारी होगा।

श्लोक 11 (bala.39.11)

तत्तथा क्रियतां राजन् यज्ञोऽच्छिद्रः क्रतुर्भवेत्। सोऽपाध्यायवचः श्रुत्वा तस्मिन्सदसि पार्थिवः ॥ १-३९-११ ॥

tattathā kriyatāṃ rājan yajño'cchidraḥ kraturbhavet| so'pādhyāyavacaḥ śrutvā tasminsadasi pārthivaḥ || 1-39-11 ||

अतः वैसा ही किया जाए, जिससे यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो। आचार्यों के इस वचन को सुनकर उस सभा में राजा सगर ने,

श्लोक 12 (bala.39.12)

षष्टिं पुत्रसहस्राणि वाक्यमेतदुवाच ह। गतिं पुत्रा न पश्यामि रक्षसां पुरुषर्षभाः ॥ १-३९-१२ ॥

ṣaṣṭiṃ putrasahasrāṇi vākyametaduvāca ha| gatiṃ putrā na paśyāmi rakṣasāṃ puruṣarṣabhāḥ || 1-39-12 ||

अपने साठ हजार पुत्रों से यह वचन कहा — हे पुरुषश्रेष्ठ पुत्रो! मुझे यहाँ राक्षसों के प्रवेश का कोई मार्ग नहीं दिखता,

श्लोक 13 (bala.39.13)

मंत्रपूतैर्महाभागैरास्थितो हि महाक्रतुः। तद्गच्छत विचिन्वध्वं पुत्रका भद्रमस्तु वः ॥ १-३९-१३ ॥

maṃtrapūtairmahābhāgairāsthito hi mahākratuḥ| tadgacchata vicinvadhvaṃ putrakā bhadramastu vaḥ || 1-39-13 ||

क्योंकि यह महायज्ञ मन्त्रों से पवित्र किए हुए महाभाग आचार्यों द्वारा ही सम्पन्न हो रहा है। इसलिए, हे पुत्रो! तुम जाकर घोड़े की खोज करो; तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 14 (bala.39.14)

समुद्रमालिनीं सर्वां पृथिवीमनुगच्छत। एकैकं योजनं पुत्रा विस्तारमभिगच्छत ॥ १-३९-१४ ॥

samudramālinīṃ sarvāṃ pṛthivīmanugacchata| ekaikaṃ yojanaṃ putrā vistāramabhigacchata || 1-39-14 ||

समुद्र से घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वी को छान डालो। हे पुत्रो! तुम में से हर एक एक-एक योजन भूमि को अपने अधिकार में लेकर खोजो,

श्लोक 15 (bala.39.15)

यावत्तुरगसंदर्शस्तावत्खनत मेदिनीम्। तमेव हयहर्तारं मार्गमाणा ममाज्ञया ॥ १-३९-१५ ॥

yāvatturagasaṃdarśastāvatkhanata medinīm| tameva hayahartāraṃ mārgamāṇā mamājñayā || 1-39-15 ||

और जब तक घोड़ा दिखाई न दे, तब तक मेरी आज्ञा से उस अश्व-अपहर्ता की खोज करते हुए पृथ्वी को खोदते जाओ।

श्लोक 16 (bala.39.16)

दीक्षितः पौत्रसहितः सोपाध्यायगणस्त्वहम्। इह स्थास्यामि भद्रं वो यावत्तुरगदर्शनम् ॥ १-३९-१६ ॥

dīkṣitaḥ pautrasahitaḥ sopādhyāyagaṇastvaham| iha sthāsyāmi bhadraṃ vo yāvatturagadarśanam || 1-39-16 ||

यज्ञ में दीक्षित मैं स्वयं अपने पौत्र और आचार्यगण के साथ यहीं ठहरूँगा, जब तक कि घोड़ा फिर से दिखाई न दे। तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 17 (bala.39.17)

ते सर्वे हृष्टमनसो राजपुत्रा महाबलाः। जग्मुर्महीतलं राम पितुर्वचनयंत्रिताः ॥ १-३९-१७ ॥

te sarve hṛṣṭamanaso rājaputrā mahābalāḥ| jagmurmahītalaṃ rāma piturvacanayaṃtritāḥ || 1-39-17 ||

हे राम! अपने पिता के वचन से प्रेरित होकर वे सभी महाबली राजकुमार प्रसन्न मन से पृथ्वीतल पर चल पड़े।

श्लोक 18 (bala.39.18)

गत्वा तु पृथिवीं सर्वमदृष्टा तं महबलाः। योजनायामविस्तारमेकैको धरणीतलम्। बिभिदुः पुरुषव्याघ्र वज्रस्पर्शसमैर्भुजैः ॥ १-३९-१८ ॥

gatvā tu pṛthivīṃ sarvamadṛṣṭā taṃ mahabalāḥ| yojanāyāmavistāramekaiko dharaṇītalam| bibhiduḥ puruṣavyāghra vajrasparśasamairbhujaiḥ || 1-39-18 ||

किन्तु सम्पूर्ण पृथ्वी पर घूमकर भी वह घोड़ा उन्हें न मिला। हे पुरुषव्याघ्र! तब उन महाबलियों ने एक-एक योजन भूमि लेकर वज्र-स्पर्श के समान अपनी भुजाओं से धरतीतल को विदीर्ण करना आरम्भ किया।

श्लोक 19 (bala.39.19)

शूलैरशनिकल्पैश्च हलैश्चापि सुदारुणैः। भिद्यमाना वसुमती ननाद रघुनंदन ॥ १-३९-१९ ॥

śūlairaśanikalpaiśca halaiścāpi sudāruṇaiḥ| bhidyamānā vasumatī nanāda raghunaṃdana || 1-39-19 ||

बिजली के समान शूलों से तथा भयंकर हलों से भी। हे रघुनन्दन! उस प्रकार विदीर्ण होती हुई पृथ्वी गर्जन करने लगी।

श्लोक 20 (bala.39.20)

नागानां वध्यमानानामसुराणां च राघव। राक्षसानां च दुर्धर्षः सत्त्वानां निनदोऽभवत् ॥ १-३९-२० ॥

nāgānāṃ vadhyamānānāmasurāṇāṃ ca rāghava| rākṣasānāṃ ca durdharṣaḥ sattvānāṃ ninado'bhavat || 1-39-20 ||

हे राघव! नागों, असुरों, राक्षसों और अन्य प्राणियों के मारे जाने से एक भीषण, असह्य कोलाहल उत्पन्न हुआ।

श्लोक 21 (bala.39.21)

योजनानां सहस्राणि षष्टिं तु रघुनंदन। बिभिदुर्धरणीं राम रसातलमनुत्तमम् ॥ १-३९-२१ ॥

yojanānāṃ sahasrāṇi ṣaṣṭiṃ tu raghunaṃdana| bibhidurdharaṇīṃ rāma rasātalamanuttamam || 1-39-21 ||

हे रघुनन्दन! हे राम! इस प्रकार उन्होंने साठ हजार योजन पृथ्वी को विदीर्ण करके सर्वोत्तम रसातल तक पहुँचा दिया।

श्लोक 22 (bala.39.22)

एवं पर्वतसंबाधं जम्बूद्वीपं नृपात्मजाः। खनन्तो नृपशार्दूल सर्वतः परिचक्रमुः ॥ १-३९-२२ ॥

evaṃ parvatasaṃbādhaṃ jambūdvīpaṃ nṛpātmajāḥ| khananto nṛpaśārdūla sarvataḥ paricakramuḥ || 1-39-22 ||

हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार पर्वतों से भरे हुए जम्बूद्वीप को खोदते हुए वे राजपुत्र सब ओर घूम गए।

श्लोक 23 (bala.39.23)

ततो देवाः सगंधर्वाः सासुराः सहपन्नगाः। संभ्रांतमनसः सर्वे पितामहमुपागमन् ॥ १-३९-२३ ॥

tato devāḥ sagaṃdharvāḥ sāsurāḥ sahapannagāḥ| saṃbhrāṃtamanasaḥ sarve pitāmahamupāgaman || 1-39-23 ||

तब गन्धर्वों, असुरों और नागों सहित सभी देवता व्याकुल मन से पितामह ब्रह्मा के पास गए।

श्लोक 24 (bala.39.24)

ते प्रसाद्य महात्मानं विषण्णवदनास्तदा। ऊचुः परमसंत्रस्ताः पितामहमिदं वचः ॥ १-३९-२४ ॥

te prasādya mahātmānaṃ viṣaṇṇavadanāstadā| ūcuḥ paramasaṃtrastāḥ pitāmahamidaṃ vacaḥ || 1-39-24 ||

उस महात्मा को प्रसन्न करके, उदास मुख वाले और अत्यन्त भयभीत वे तब पितामह से यह वचन बोले।

श्लोक 25 (bala.39.25)

भगवन् पृथिवी सर्वा खन्यते सगरात्मजैः। बहवश्च महात्मानो वध्यन्ते जलचारिणः ॥ १-३९-२५ ॥

bhagavan pṛthivī sarvā khanyate sagarātmajaiḥ| bahavaśca mahātmāno vadhyante jalacāriṇaḥ || 1-39-25 ||

हे भगवन्! सगर के पुत्रों द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी खोदी जा रही है, और जल में विचरने वाले बहुत-से महान् प्राणी मारे जा रहे हैं।

श्लोक 26 (bala.39.26)

अयं यज्ञ हरोऽस्माकमनेनाश्वोऽपनीयते। इति ते सर्वभूतानि हिंसन्ति सगरात्मजाः ॥ १-३९-२६ ॥

ayaṃ yajña haro'smākamanenāśvo'panīyate| iti te sarvabhūtāni hiṃsanti sagarātmajāḥ || 1-39-26 ||

'यही हमारे यज्ञ का विनाशक है, इसी ने हमारा घोड़ा हर लिया है' — ऐसा सोचकर सगर के वे पुत्र सभी प्राणियों को सता रहे हैं।

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