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बालकाण्ड · सर्ग 40

सगरपुत्रों का भस्म होना

सर्ग 39सर्ग-सूचीसर्ग 41

श्लोक 1 (bala.40.1)

देवतानां वचः श्रुत्वा भगवान्वै पितामहः। प्रत्युवाच सुसंत्रस्तान् कृतान्तबलमोहितान् ॥ १-४०-१ ॥

devatānāṃ vacaḥ śrutvā bhagavānvai pitāmahaḥ| pratyuvāca susaṃtrastān kṛtāntabalamohitān || 1-40-1 ||

देवताओं के इस वचन को सुनकर भगवान् पितामह ब्रह्मा ने, काल की उस शक्ति से भयभीत और मोहित हुए उन देवताओं को उत्तर दिया।

श्लोक 2 (bala.40.2)

यस्येयं वसुधा कृत्स्ना वासुदेवस्य धीमतः। महिषी माधवस्यैषा स एव भगवान् प्रभुः ॥ १-४०-२ ॥

yasyeyaṃ vasudhā kṛtsnā vāsudevasya dhīmataḥ| mahiṣī mādhavasyaiṣā sa eva bhagavān prabhuḥ || 1-40-2 ||

यह सम्पूर्ण पृथ्वी जिस बुद्धिमान् वासुदेव की है, और जो माधव की ही पटरानी है, वे भगवान् प्रभु ही हैं।

श्लोक 3 (bala.40.3)

कापिलं रूपमास्थाय धारयत्यनिशं धराम्। तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः ॥ १-४०-३ ॥

kāpilaṃ rūpamāsthāya dhārayatyaniśaṃ dharām| tasya kopāgninā dagdhā bhaviṣyanti nṛpātmajāḥ || 1-40-3 ||

कपिल का रूप धारण करके निरन्तर पृथ्वी को धारण करते हैं। उन्हीं के क्रोधाग्नि से राजा के ये पुत्र भस्म हो जाएँगे।

श्लोक 4 (bala.40.4)

पृथिव्याश्चापि निर्भेदो दृष्ट एव सनातनः। सगरस्य च पुत्राणां विनाशो दीर्घदर्शिनाम् ॥ १-४०-४ ॥

pṛthivyāścāpi nirbhedo dṛṣṭa eva sanātanaḥ| sagarasya ca putrāṇāṃ vināśo dīrghadarśinām || 1-40-4 ||

पृथ्वी का यह विदारण और सगर के पुत्रों का यह विनाश तो सनातन काल से दूरदर्शी ऋषियों द्वारा पहले ही देख लिया गया था।

श्लोक 5 (bala.40.5)

पितामह वचः श्रुत्वा त्रयस्त्रिंशदरिन्दम। देवाः परमसंहृष्टाः पुनर्जग्मुर्यथागतम् ॥ १-४०-५ ॥

pitāmaha vacaḥ śrutvā trayastriṃśadarindama| devāḥ paramasaṃhṛṣṭāḥ punarjagmuryathāgatam || 1-40-5 ||

हे शत्रुदमन! पितामह के इस वचन को सुनकर वे तैंतीस देवता अत्यन्त प्रसन्न होकर जिस मार्ग से आए थे, उसी मार्ग से लौट गए।

श्लोक 6 (bala.40.6)

सगरस्य च पुत्राणां प्रादुरासीन्महास्वनः। पृथिव्यां भिद्यमानायां निर्घातसमनिःस्वनः ॥ १-४०-६ ॥

sagarasya ca putrāṇāṃ prādurāsīnmahāsvanaḥ| pṛthivyāṃ bhidyamānāyāṃ nirghātasamaniḥsvanaḥ || 1-40-6 ||

इधर सगर के पुत्रों द्वारा पृथ्वी के विदीर्ण किए जाने पर वज्रपात के समान भयंकर महाध्वनि उत्पन्न हुई।

श्लोक 7 (bala.40.7)

ततो भित्त्वा महीं सर्वां कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। सहिताः सगराः सर्वे पितरं वाक्यमब्रुवन् ॥ १-४०-७ ॥

tato bhittvā mahīṃ sarvāṃ kṛtvā cāpi pradakṣiṇam| sahitāḥ sagarāḥ sarve pitaraṃ vākyamabruvan || 1-40-7 ||

तब सम्पूर्ण पृथ्वी को विदीर्ण करके और उसकी परिक्रमा भी करके, सगर के वे सभी पुत्र एकत्र होकर अपने पिता से यह बोले।

श्लोक 8 (bala.40.8)

परिक्रांता मही सर्वा सत्त्ववन्तश्च सूदिताः। देवदानवरक्षांसि पिशाचोरगपन्नगाः ॥ १-४०-८ ॥

parikrāṃtā mahī sarvā sattvavantaśca sūditāḥ| devadānavarakṣāṃsi piśācoragapannagāḥ || 1-40-8 ||

समस्त पृथ्वी घूम ली गई है, और देव, दानव, राक्षस, पिशाच, उरग तथा सर्प — इन सभी बलशाली प्राणियों का संहार भी कर दिया गया है,

श्लोक 9 (bala.40.9)

न च पश्यामहेऽश्वं तमश्वहर्तारमेव च। किं करिष्याम भद्रं ते बुद्धिरत्र विचार्यताम् ॥ १-४०-९ ॥

na ca paśyāmahe'śvaṃ tamaśvahartārameva ca| kiṃ kariṣyāma bhadraṃ te buddhiratra vicāryatām || 1-40-9 ||

फिर भी न हमें घोड़ा दिखा और न ही उसका हरण करने वाला। अब हम क्या करें? आपका कल्याण हो; इस विषय में विचार कीजिए।

श्लोक 10 (bala.40.10)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा पुत्राणां राजसत्तमः। समन्युरब्रवीद्वाक्यं सगरो रघुनंदन ॥ १-४०-१० ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā putrāṇāṃ rājasattamaḥ| samanyurabravīdvākyaṃ sagaro raghunaṃdana || 1-40-10 ||

हे रघुनन्दन! अपने पुत्रों के इस वचन को सुनकर राजाओं में श्रेष्ठ सगर ने क्रोधित होकर यह वचन कहा।

श्लोक 11 (bala.40.11)

भूयः खनत भद्रं वो विभेद्य वसुधातलम्। अश्वहर्तारमासाद्य कृतार्थाश्च निवर्तत ॥ १-४०-११ ॥

bhūyaḥ khanata bhadraṃ vo vibhedya vasudhātalam| aśvahartāramāsādya kṛtārthāśca nivartata || 1-40-11 ||

पुनः पृथ्वीतल को विदीर्ण करके खोदो, तुम्हारा कल्याण हो; घोड़े के हरणकर्ता को पाकर ही अपना कार्य सिद्ध करके लौटना।

श्लोक 12 (bala.40.12)

पितुर्वचनमासाद्य सगरस्य महात्मनः। षष्टिः पुत्रसहस्राणि रसातलमभिद्रवन् ॥ १-४०-१२ ॥

piturvacanamāsādya sagarasya mahātmanaḥ| ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi rasātalamabhidravan || 1-40-12 ||

महात्मा सगर के इस वचन को पाकर वे साठ हजार पुत्र रसातल की ओर तेजी से दौड़ पड़े।

श्लोक 13 (bala.40.13)

खन्यमाने ततस्तस्मिन् ददृशुः पर्वतोपमम्। दिशागजं विरूपाक्षं धारयन्तं महीतलम् ॥ १-४०-१३ ॥

khanyamāne tatastasmin dadṛśuḥ parvatopamam| diśāgajaṃ virūpākṣaṃ dhārayantaṃ mahītalam || 1-40-13 ||

वहाँ खोदते समय उन्होंने पर्वत के समान विशाल, दिशा के हाथी विरूपाक्ष को देखा, जो पृथ्वीतल को धारण किए हुए था।

श्लोक 14 (bala.40.14)

सपर्वतवनां कृत्स्नां पृथिवीं रघुनंदन। धारयामास शिरसा विरूपाक्षो महागजः ॥ १-४०-१४ ॥

saparvatavanāṃ kṛtsnāṃ pṛthivīṃ raghunaṃdana| dhārayāmāsa śirasā virūpākṣo mahāgajaḥ || 1-40-14 ||

हे रघुनन्दन! वह महागज विरूपाक्ष पर्वतों और वनों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने सिर पर धारण किए हुए था।

श्लोक 15 (bala.40.15)

यदा पर्वणि काकुत्स्थ विश्रमार्थं महागजः। खेदाच्चालयते शीर्षं भूमिकंपस्तदा भवेत् ॥ १-४०-१५ ॥

yadā parvaṇi kākutstha viśramārthaṃ mahāgajaḥ| khedāccālayate śīrṣaṃ bhūmikaṃpastadā bhavet || 1-40-15 ||

हे काकुत्स्थ! जब-जब वह महागज थककर विश्राम के लिए अपना सिर हिलाता है, तभी पृथ्वी पर भूकम्प होता है।

श्लोक 16 (bala.40.16)

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा दिशापालं महागजम्। मानयन्तो हि ते राम जग्मुर्भित्त्वा रसातलम् ॥ १-४०-१६ ॥

te taṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā diśāpālaṃ mahāgajam| mānayanto hi te rāma jagmurbhittvā rasātalam || 1-40-16 ||

हे राम! उस दिशापालक महागज की परिक्रमा करके और उसका सम्मान करके वे पुत्र आगे रसातल को विदीर्ण करते हुए बढ़ गए।

श्लोक 17 (bala.40.17)

ततः पूर्वां दिशं भित्त्वा दक्षिणां बिभिदुः पुनः। दक्षिणस्यामपि दिशि ददृशुस्ते महागजम् ॥ १-४०-१७ ॥

tataḥ pūrvāṃ diśaṃ bhittvā dakṣiṇāṃ bibhiduḥ punaḥ| dakṣiṇasyāmapi diśi dadṛśuste mahāgajam || 1-40-17 ||

फिर पूर्व दिशा को विदीर्ण करके उन्होंने दक्षिण दिशा को भी विदीर्ण किया, और दक्षिण दिशा में भी उन्होंने एक महागज को देखा।

श्लोक 18 (bala.40.18)

महापद्मं महात्मानं सुमहत्पर्वतोपमम्। शिरसा धारयन्तं गां विस्मयं जग्मुरुत्तमम् ॥ १-४०-१८ ॥

mahāpadmaṃ mahātmānaṃ sumahatparvatopamam| śirasā dhārayantaṃ gāṃ vismayaṃ jagmuruttamam || 1-40-18 ||

उस महात्मा महापद्म को, जो अत्यन्त विशाल पर्वत के समान था और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण किए हुए था, देखकर वे परम आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 19 (bala.40.19)

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा सगरस्य महात्मनः। षष्टिः पुत्रसहस्राणि पश्चिमां बिभिदुर्दिशम् ॥ १-४०-१९ ॥

te taṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā sagarasya mahātmanaḥ| ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi paścimāṃ bibhidurdiśam || 1-40-19 ||

उसकी परिक्रमा करके, महात्मा सगर के वे साठ हजार पुत्र फिर पश्चिम दिशा को विदीर्ण करने लगे।

श्लोक 20 (bala.40.20)

पश्चिमायामपि दिशि महांतमचलोपमम्। दिशागजं सौमनसं ददृशुस्ते महाबलाः ॥ १-४०-२० ॥

paścimāyāmapi diśi mahāṃtamacalopamam| diśāgajaṃ saumanasaṃ dadṛśuste mahābalāḥ || 1-40-20 ||

और पश्चिम दिशा में भी उन महाबलियों ने पर्वत के समान विशाल, सौमनस नामक दिशागज को देखा।

श्लोक 21 (bala.40.21)

ते तं प्रदक्षिणं कृत्वा पृष्ट्वा चापि निरामयम्। खनंतः समुपक्रांता दिशं सोमवतीं तदा ॥ १-४०-२१ ॥

te taṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā pṛṣṭvā cāpi nirāmayam| khanaṃtaḥ samupakrāṃtā diśaṃ somavatīṃ tadā || 1-40-21 ||

उसकी परिक्रमा करके और उसका कुशल-क्षेम पूछकर, वे खोदते हुए फिर उत्तर दिशा की ओर बढ़ चले।

श्लोक 22 (bala.40.22)

उत्तरस्यां रघुश्रेष्ठ ददृशुर्हिमपाण्डुरम्। भद्रं भद्रेण वपुषा धारयन्तं महीमिमाम् ॥ १-४०-२२ ॥

uttarasyāṃ raghuśreṣṭha dadṛśurhimapāṇḍuram| bhadraṃ bhadreṇa vapuṣā dhārayantaṃ mahīmimām || 1-40-22 ||

हे रघुश्रेष्ठ! उत्तर दिशा में उन्होंने हिम के समान श्वेत, सुन्दर देहवाले भद्र नामक गज को देखा, जो इस पृथ्वी को धारण किए हुए था।

श्लोक 23 (bala.40.23)

समालभ्य ततः सर्वे कृत्वा चैनं प्रदक्षिणम्। षष्टिः पुत्रसहस्राणि बिभिदुर्वसुधातलम् ॥ १-४०-२३ ॥

samālabhya tataḥ sarve kṛtvā cainaṃ pradakṣiṇam| ṣaṣṭiḥ putrasahasrāṇi bibhidurvasudhātalam || 1-40-23 ||

उसे स्पर्श करके और उसकी परिक्रमा भी करके, उन साठ हजार पुत्रों ने पुनः पृथ्वीतल को विदीर्ण किया।

श्लोक 24 (bala.40.24)

ततः प्रागुत्तरां गत्वा सागराः प्रथितां दिशम्। रोषादभ्यखनन्सर्वे पृथिवीं सगरात्मजाः ॥ १-४०-२४ ॥

tataḥ prāguttarāṃ gatvā sāgarāḥ prathitāṃ diśam| roṣādabhyakhanansarve pṛthivīṃ sagarātmajāḥ || 1-40-24 ||

तत्पश्चात् सगर के वे सभी पुत्र प्रसिद्ध ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में जाकर क्रोधपूर्वक पृथ्वी को खोदने लगे।

श्लोक 25 (bala.40.25)

ते तु सर्वे महत्मानो भीमवेगा महबलाः। ददृशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम् ॥ १-४०-२५ ॥

te tu sarve mahatmāno bhīmavegā mahabalāḥ| dadṛśuḥ kapilaṃ tatra vāsudevaṃ sanātanam || 1-40-25 ||

किन्तु वे सब महाबली, भयंकर वेगवाले महात्मा वहाँ सनातन वासुदेव को कपिल के रूप में देखने लगे,

श्लोक 26 (bala.40.26)

हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः। प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे ते रघुनंदन ॥ १-४०-२६ ॥

hayaṃ ca tasya devasya carantamavidūrataḥ| praharṣamatulaṃ prāptāḥ sarve te raghunaṃdana || 1-40-26 ||

और उस देवता के निकट ही विचरते हुए उस घोड़े को भी। हे रघुनन्दन! तब वे सभी अत्यन्त हर्ष से भर उठे।

श्लोक 27 (bala.40.27)

ते तं हयहरं ज्ञात्वा क्रोधपर्याकुलेक्षणाः। खनित्रलांगलधरा नानावृक्षशिलाधराः ॥ १-४०-२७ ॥

te taṃ hayaharaṃ jñātvā krodhaparyākulekṣaṇāḥ| khanitralāṃgaladharā nānāvṛkṣaśilādharāḥ || 1-40-27 ||

उसे ही अश्व-अपहर्ता समझकर, क्रोध से व्याकुल नेत्रों वाले तथा फावड़े और हल धारण किए हुए, नाना प्रकार के वृक्षों और शिलाओं को लिए हुए वे,

श्लोक 28 (bala.40.28)

अभ्यधावन्त संक्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रुवन्। अस्माकं त्वं हि तुरगं यज्ञियं हृतवानसि ॥ १-४०-२८ ॥

abhyadhāvanta saṃkruddhāstiṣṭha tiṣṭheti cābruvan| asmākaṃ tvaṃ hi turagaṃ yajñiyaṃ hṛtavānasi || 1-40-28 ||

क्रोधित होकर उसकी ओर दौड़ पड़े और बोले — रुको, रुको! तुमने ही हमारे यज्ञ के इस घोड़े को हर लिया है!

श्लोक 29 (bala.40.29)

दुर्मेधस्त्वं हि संप्राप्तान् विद्धि नः सगरात्मजान्। श्रुत्वा तद्वचनं तेषां कपिलो रघुनंदन ॥ १-४०-२९ ॥

durmedhastvaṃ hi saṃprāptān viddhi naḥ sagarātmajān| śrutvā tadvacanaṃ teṣāṃ kapilo raghunaṃdana || 1-40-29 ||

हे दुर्बुद्धि! जान लो कि हम यहाँ आए हुए सगर के पुत्र हैं। हे रघुनन्दन! उनके इस वचन को सुनकर कपिल मुनि,

श्लोक 30 (bala.40.30)

रोषेण महताविष्टो हुं कारमकरोत्तदा। ततस्तेनाप्रमेयेण कपिलेन महात्मना। भस्मराशीकृताः सर्वे काकुत्स्थ सगरात्मजाः ॥ १-४०-३० ॥

roṣeṇa mahatāviṣṭo huṃ kāramakarottadā| tatastenāprameyeṇa kapilena mahātmanā| bhasmarāśīkṛtāḥ sarve kākutstha sagarātmajāḥ || 1-40-30 ||

अत्यन्त क्रोध से भरकर उसी क्षण 'हुँ' शब्द का उच्चारण किया। हे काकुत्स्थ! उसके पश्चात् उस अप्रमेय, महात्मा कपिल के द्वारा सगर के वे सभी पुत्र भस्म के ढेर में परिणत हो गए।

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