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बालकाण्ड · सर्ग 43

गंगावतरण

सर्ग 42सर्ग-सूचीसर्ग 44

श्लोक 1 (bala.43.1)

देवदेवे गते तस्मिन् सोंऽगुष्ठाग्रनिपीडिताम्। कृत्वा वसुमतीं राम वत्सरं समुपासत ॥ १-४३-१ ॥

devadeve gate tasmin soṃ'guṣṭhāgranipīḍitām| kṛtvā vasumatīṃ rāma vatsaraṃ samupāsata || 1-43-1 ||

हे राम! जब वे देवाधिदेव ब्रह्मा वहाँ से चले गए, तब भगीरथ ने अपने पैर के अँगूठे के अग्रभाग से पृथ्वी को दबाते हुए, एक वर्ष तक इसी प्रकार आराधना की।

श्लोक 2 (bala.43.2)

अथ संवत्सरे पूर्णे सर्वलोकनमस्कृतः। उमापतिः पशुपती राजानमिदमब्रवीत् ॥ १-४३-२ ॥

atha saṃvatsare pūrṇe sarvalokanamaskṛtaḥ| umāpatiḥ paśupatī rājānamidamabravīt || 1-43-2 ||

तत्पश्चात् वर्ष पूर्ण होने पर, सम्पूर्ण लोकों द्वारा वन्दित उमापति पशुपति ने राजा भगीरथ से यह कहा।

श्लोक 3 (bala.43.3)

प्रीतस्तेऽहं नरश्रेष्ठ करिष्यामि तव प्रियम्। शिरसा धारयिष्यामि शैलराजसुतामहम् ॥ १-४३-३ ॥

prītaste'haṃ naraśreṣṭha kariṣyāmi tava priyam| śirasā dhārayiṣyāmi śailarājasutāmaham || 1-43-3 ||

"हे नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ और तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करूँगा। मैं स्वयं पर्वतराज की उस पुत्री गंगा को अपने मस्तक पर धारण करूँगा।"

श्लोक 4 (bala.43.4)

ततो हैमवती ज्येष्ठा सर्वलोकनमस्कृता। तदा सातिमहद्रूपं कृत्वा वेगं च दुःसहम् ॥ १-४३-४ ॥

tato haimavatī jyeṣṭhā sarvalokanamaskṛtā| tadā sātimahadrūpaṃ kṛtvā vegaṃ ca duḥsaham || 1-43-4 ||

तत्पश्चात् हिमालय की वह ज्येष्ठ पुत्री, जो सम्पूर्ण लोकों द्वारा वन्दित है, अत्यन्त विशाल रूप और दुःसह वेग धारण करके —

श्लोक 5 (bala.43.5)

आकाशादपतद्राम शिवे शिवशिरस्युत। अचिन्तयच्च सा देवी गङ्गा परमदुर्धरा ॥ १-४३-५ ॥

ākāśādapatadrāma śive śivaśirasyuta| acintayacca sā devī gaṅgā paramadurdharā || 1-43-5 ||

— और हे राम! आकाश से शिव के उस पावन मस्तक पर आ गिरी; और अत्यन्त दुर्धर वह देवी गंगा मन ही मन सोचने लगी —

श्लोक 6 (bala.43.6)

विशाम्यहं हि पातालं स्त्रोतसा गृह्य शंकरम्। तस्या वलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धस्तु भगवान् हरः ॥ १-४३-६ ॥

viśāmyahaṃ hi pātālaṃ strotasā gṛhya śaṃkaram| tasyā valepanaṃ jñātvā kruddhastu bhagavān haraḥ || 1-43-6 ||

"मैं शंकर को भी अपने प्रवाह में समेटकर सीधे पाताल में प्रवेश कर जाऊँगी।" उसका यह अहंकार जानकर भगवान् हर क्रुद्ध हो उठे, और —

श्लोक 7 (bala.43.7)

तिरोभावयितुं बुद्धिं चक्रे त्रिनयनस्तदा। सा तस्मिन् पतिता पुण्या पुण्ये रुद्रस्य मूर्धनि ॥ १-४३-७ ॥

tirobhāvayituṃ buddhiṃ cakre trinayanastadā| sā tasmin patitā puṇyā puṇye rudrasya mūrdhani || 1-43-7 ||

— उस त्रिनेत्रधारी शिव ने उसे अन्तर्हित (अदृश्य) कर देने का विचार किया। वह पुण्यमयी नदी रुद्र के उसी पावन मस्तक पर जा गिरी —

श्लोक 8 (bala.43.8)

हिमवत्प्रतिमे राम जटामण्डलगह्वरे। सा कथञ्चिन्महीं गन्तुं नाशक्नोद्यत्नमास्थिता ॥ १-४३-८ ॥

himavatpratime rāma jaṭāmaṇḍalagahvare| sā kathañcinmahīṃ gantuṃ nāśaknodyatnamāsthitā || 1-43-8 ||

— हिमालय के समान विशाल उनकी जटाओं के उस गह्वर में, हे राम! और वह चाहे जितना प्रयत्न करती, किसी भी प्रकार पृथ्वी तक नहीं पहुँच सकी।

श्लोक 9 (bala.43.9)

नैव सा निर्गमं लेभे जटामण्डलमन्ततः। तत्रैवाबंभ्रमद्देवी संवत्सरगणान्बहून् ॥ १-४३-९ ॥

naiva sā nirgamaṃ lebhe jaṭāmaṇḍalamantataḥ| tatraivābaṃbhramaddevī saṃvatsaragaṇānbahūn || 1-43-9 ||

उस जटाजूट से उसे कहीं भी निकलने का मार्ग नहीं मिला; वह देवी उन्हीं जटाओं में वर्षों-वर्ष तक इधर-उधर भटकती रही।

श्लोक 10 (bala.43.10)

तामपश्यन् पुनस्तत्र तपः परममास्थितः। स तेन तोषितश्चासीदत्यन्तं रघुनंदन ॥ १-४३-१० ॥

tāmapaśyan punastatra tapaḥ paramamāsthitaḥ| sa tena toṣitaścāsīdatyantaṃ raghunaṃdana || 1-43-10 ||

उसे इस प्रकार बाहर न आते देखकर भगीरथ ने पुनः वहीं परम कठोर तपस्या आरम्भ कर दी; और हे रघुनन्दन! उससे शिव अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 11 (bala.43.11)

विससर्ज ततो गङ्गां हरो बिन्दुसरः प्रति। तस्यां विसृज्यमानायां सप्त स्रोतंसि जज्ञिरे ॥ १-४३-११ ॥

visasarja tato gaṅgāṃ haro bindusaraḥ prati| tasyāṃ visṛjyamānāyāṃ sapta srotaṃsi jajñire || 1-43-11 ||

तब हर ने गंगा को बिन्दुसरोवर की ओर छोड़ दिया; और इस प्रकार मुक्त होते ही उससे सात धाराएँ उत्पन्न हुईं।

श्लोक 12 (bala.43.12)

ह्लादिनी पावनी चैव नलिनी च तथैव च। तिस्रः प्राचीं दिशं जग्मुर्गंगाः शिवजलाः शुभाः ॥ १-४३-१२ ॥

hlādinī pāvanī caiva nalinī ca tathaiva ca| tisraḥ prācīṃ diśaṃ jagmurgaṃgāḥ śivajalāḥ śubhāḥ || 1-43-12 ||

ह्लादिनी, पावनी और नलिनी — ये तीन शुभ गंगाएँ, शिव के जल से पवित्र होकर पूर्व दिशा की ओर बह चलीं।

श्लोक 13 (bala.43.13)

सुचक्षुश्चैव सीता च सिन्धुश्चैव महानदी। तिस्रस्त्वेता दिशं जग्मुः प्रतीचीं तु शुभोदकाः ॥ १-४३-१३ ॥

sucakṣuścaiva sītā ca sindhuścaiva mahānadī| tisrastvetā diśaṃ jagmuḥ pratīcīṃ tu śubhodakāḥ || 1-43-13 ||

सुचक्षु, सीता और महानदी सिन्धु — ये तीन पवित्र जलवाली नदियाँ पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुईं।

श्लोक 14 (bala.43.14)

सप्तमी चान्वगात्तासां भगीरथरथं तदा। भगीरथोऽपि रजर्षिर्दिव्यं स्यंदनमास्थितः ॥ १-४३-१४ ॥

saptamī cānvagāttāsāṃ bhagīratharathaṃ tadā| bhagīratho'pi rajarṣirdivyaṃ syaṃdanamāsthitaḥ || 1-43-14 ||

और उन धाराओं में से सातवीं धारा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली; उधर राजर्षि भगीरथ भी अपने दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर —

श्लोक 15 (bala.43.15)

प्रायादग्रे महातेजा गङ्गा तं चाप्यनुव्रजत्। गगनाच्छङ्करशिरस्ततो धरणिमागता ॥ १-४३-१५ ॥

prāyādagre mahātejā gaṅgā taṃ cāpyanuvrajat| gaganācchaṅkaraśirastato dharaṇimāgatā || 1-43-15 ||

— अत्यन्त तेजस्वी होकर आगे-आगे चलने लगे, और गंगा भी उनके पीछे-पीछे चली। इस प्रकार आकाश से शंकर के मस्तक पर, और वहाँ से पृथ्वी पर गंगा का अवतरण हुआ।

श्लोक 16 (bala.43.16)

व्यसर्पत जलं तत्र तीव्रशब्दपुरस्कृतम्। मत्स्यकच्छपसंघैश्च शिंशुमारगणैस्तथा ॥ १-४३-१६ ॥

vyasarpata jalaṃ tatra tīvraśabdapuraskṛtam| matsyakacchapasaṃghaiśca śiṃśumāragaṇaistathā || 1-43-16 ||

वहाँ वह जल भीषण गर्जना के साथ फैलने लगा, और उसके साथ मछलियों तथा कछुओं के झुंड एवं शिशुमारों (सूँस) के समूह भी —

श्लोक 17 (bala.43.17)

पतद्भिः पतितैश्चैव व्यरोचत वसुंधरा। ततो देवर्षिगंधर्वा यक्षा सिद्धगणास्तथा ॥ १-४३-१७ ॥

patadbhiḥ patitaiścaiva vyarocata vasuṃdharā| tato devarṣigaṃdharvā yakṣā siddhagaṇāstathā || 1-43-17 ||

— कभी गिरते हुए और कभी गिर चुके, इन सबसे पृथ्वी दैदीप्यमान हो उठी। तब देवर्षि, गन्धर्व, यक्ष तथा सिद्धगण भी —

श्लोक 18 (bala.43.18)

व्यलोकयन्त ते तत्र गगनाद्गां गतां तदा। विमानैर्नगराकारैर्हयैर्गजवरैस्तथा ॥ १-४३-१८ ॥

vyalokayanta te tatra gaganādgāṃ gatāṃ tadā| vimānairnagarākārairhayairgajavaraistathā || 1-43-18 ||

— आकाश से पृथ्वी पर उतरती हुई गंगा को वहाँ खड़े होकर देखने लगे — कुछ नगर के समान विशाल विमानों में, कुछ घोड़ों पर, तो कुछ श्रेष्ठ हाथियों पर सवार होकर।

श्लोक 19 (bala.43.19)

पारिप्लवगताश्चापि देवतास्तत्र विष्ठिताः। तदद्भुततमं लोके गंगापतनमुत्तमम् ॥ १-४३-१९ ॥

pāriplavagatāścāpi devatāstatra viṣṭhitāḥ| tadadbhutatamaṃ loke gaṃgāpatanamuttamam || 1-43-19 ||

और देवतागण भी व्याकुल होकर इधर-उधर उड़ते हुए वहाँ खड़े हो गए, गंगा के उस अत्यन्त अद्भुत और परम अवतरण को देखने के लिए —

श्लोक 20 (bala.43.20)

दिदृक्षवो देवगणाः समीयुरमितौजसः। संपतद्भिः सुरगणैस्तेषां चाभरणौजसा ॥ १-४३-२० ॥

didṛkṣavo devagaṇāḥ samīyuramitaujasaḥ| saṃpatadbhiḥ suragaṇaisteṣāṃ cābharaṇaujasā || 1-43-20 ||

— उसे देखने की उत्कंठा से अपार तेजस्वी देवगण एकत्र हो गए; और वेगपूर्वक झपटते हुए उन देवताओं के आभूषणों की आभा से —

श्लोक 21 (bala.43.21)

शतादित्यमिवाभाति गगनं गततोयदम्। शिंशुमारोरगगणैर्मीनैरपि च चंचलैः ॥ १-४३-२१ ॥

śatādityamivābhāti gaganaṃ gatatoyadam| śiṃśumāroragagaṇairmīnairapi ca caṃcalaiḥ || 1-43-21 ||

— बादलरहित आकाश मानो सौ सूर्यों के समान चमक उठा। और शिशुमारों, जलसर्पों तथा चंचल मीनों के —

श्लोक 22 (bala.43.22)

विद्युद्भिरिव विक्षिप्तैराकाशमभवत्तदा। पाण्डुरैः सलिलोत्पीडैः कीर्यमाणैः सहस्रधा ॥ १-४३-२२ ॥

vidyudbhiriva vikṣiptairākāśamabhavattadā| pāṇḍuraiḥ salilotpīḍaiḥ kīryamāṇaiḥ sahasradhā || 1-43-22 ||

— उछलने-कूदने से आकाश उस समय मानो बिजलियों से आच्छादित हो उठा। और जल के उछलते हुए हज़ारों श्वेत छींटों से बिखरा हुआ —

श्लोक 23 (bala.43.23)

शारदाभ्रैरिवाकीर्णं गगनं हंससंप्लवैः। क्वचिद् द्रुततरं याति कुटिलं क्वचिदायतम् ॥ १-४३-२३ ॥

śāradābhrairivākīrṇaṃ gaganaṃ haṃsasaṃplavaiḥ| kvacid drutataraṃ yāti kuṭilaṃ kvacidāyatam || 1-43-23 ||

— और हंसों की पंक्तियों से आकाश मानो शरद् ऋतु के बादलों से भर उठा। वह जल कहीं अत्यन्त वेग से, कहीं टेढ़ा-मेढ़ा, तो कहीं सीधा बहता था;

श्लोक 24 (bala.43.24)

विनतं क्वचिदुद्धूतं क्वचिद्याति शनैः शनैः। सलिलेनैव सलिलं क्वचिदभ्याहतं पुनः ॥ १-४३-२४ ॥

vinataṃ kvaciduddhūtaṃ kvacidyāti śanaiḥ śanaiḥ| salilenaiva salilaṃ kvacidabhyāhataṃ punaḥ || 1-43-24 ||

कहीं नीचा बहता, कहीं उमड़ पड़ता, तो कहीं धीरे-धीरे सरकता था; और कहीं जल स्वयं अपने ही जल से पुनः टकराकर —

श्लोक 25 (bala.43.25)

मुहुरूर्ध्वपथं गत्वा पपात वसुधां पुनः। तच्छङ्करशिरोभ्रष्टं भ्रष्टं भूमितले पुनः ॥ १-४३-२५ ॥

muhurūrdhvapathaṃ gatvā papāta vasudhāṃ punaḥ| tacchaṅkaraśirobhraṣṭaṃ bhraṣṭaṃ bhūmitale punaḥ || 1-43-25 ||

— बार-बार ऊपर उठकर फिर पृथ्वी पर गिर पड़ता था। शंकर के मस्तक से उतरकर, फिर भूतल पर आया हुआ वह जल —

श्लोक 26 (bala.43.26)

व्यरोचत तदा तोयं निर्मलं गतकल्मषम्। तत्रर्षिगणगन्धर्वा वसुधातलवासिनः ॥ १-४३-२६ ॥

vyarocata tadā toyaṃ nirmalaṃ gatakalmaṣam| tatrarṣigaṇagandharvā vasudhātalavāsinaḥ || 1-43-26 ||

— निर्मल और निष्कलंक होकर उस समय अत्यन्त सुशोभित हो उठा; वहाँ ऋषिगण, गन्धर्व और पृथ्वीतल के निवासी —

श्लोक 27 (bala.43.27)

भवाङ्गपतितं तोयं पवित्रमिति पस्पृशुः। शापात् प्रपतिता ये च गगनाद्वसुधातलम् ॥ १-४३-२७ ॥

bhavāṅgapatitaṃ toyaṃ pavitramiti paspṛśuḥ| śāpāt prapatitā ye ca gaganādvasudhātalam || 1-43-27 ||

— यह कहते हुए उस जल का स्पर्श करने लगे कि यह भवदेव (शिव) के अंग से गिरा हुआ पवित्र जल है। और जो शाप के कारण आकाश से पृथ्वीतल पर गिर पड़े थे,

श्लोक 28 (bala.43.28)

कृत्वा तत्राभिषेकं ते बभूवुर्गतकल्मषाः। धूतपापाः पुनस्तेन तोयेनाथ शुभान्विता ॥ १-४३-२८ ॥

kṛtvā tatrābhiṣekaṃ te babhūvurgatakalmaṣāḥ| dhūtapāpāḥ punastena toyenātha śubhānvitā || 1-43-28 ||

— वे उसमें स्नान करके निष्कलंक हो गए; और उस जल से उनके पाप धुल जाने पर वे पुनः पवित्रता और शुभता को प्राप्त हुए।

श्लोक 29 (bala.43.29)

पुनराकाशमाविश्य स्वान् लोकान् प्रतिपेदिरे। मुमुदे मुदितो लोकस्तेन तोयेन भास्वता ॥ १-४३-२९ ॥

punarākāśamāviśya svān lokān pratipedire| mumude mudito lokastena toyena bhāsvatā || 1-43-29 ||

— वे पुनः आकाश में प्रवेश करके अपने-अपने लोकों को प्राप्त हो गए। और वह प्रकाशमान जल पाकर सम्पूर्ण जगत् आनन्दित हो उठा;

श्लोक 30 (bala.43.30)

कृताभिषेको गंगायां बभूव विगतक्लमः। भगीरथोऽपि राजर्षिर्दिव्यं स्यंदनमास्थितः ॥ १-४३-३० ॥

kṛtābhiṣeko gaṃgāyāṃ babhūva vigataklamaḥ| bhagīratho'pi rājarṣirdivyaṃ syaṃdanamāsthitaḥ || 1-43-30 ||

— गंगा में स्नान करने वाला हर कोई समस्त क्लेशों से मुक्त हो गया। और राजर्षि भगीरथ भी अपने दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर —

श्लोक 31 (bala.43.31)

प्रायादग्रे महातेजास्तं गंगा पृष्ठतोऽन्वगात्। देवाः सर्षिगणाः सर्वे दैत्यदानवराक्षसाः ॥ १-४३-३१ ॥

prāyādagre mahātejāstaṃ gaṃgā pṛṣṭhato'nvagāt| devāḥ sarṣigaṇāḥ sarve daityadānavarākṣasāḥ || 1-43-31 ||

— तेजस्वी होकर आगे-आगे चलने लगे, और गंगा उनके पीछे-पीछे बहती रही। देवगण, ऋषिगण, तथा समस्त दैत्य, दानव और राक्षस,

श्लोक 32 (bala.43.32)

गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिंनरमहोरगाः। सर्पाश्चाप्सरसो राम भगीरथरथानुगाः ॥ १-४३-३२ ॥

gandharvayakṣapravarāḥ sakiṃnaramahoragāḥ| sarpāścāpsaraso rāma bhagīratharathānugāḥ || 1-43-32 ||

गन्धर्वों और यक्षों में श्रेष्ठ, किन्नरों और महानागों सहित, तथा सर्प और अप्सराएँ भी, हे राम! सब भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलने लगे।

श्लोक 33 (bala.43.33)

गंगामन्वगमन् प्रीताः सर्वे जलचराश्च ये। यतो भगीरथो राजा ततो गंगा यशस्विनी ॥ १-४३-३३ ॥

gaṃgāmanvagaman prītāḥ sarve jalacarāśca ye| yato bhagīratho rājā tato gaṃgā yaśasvinī || 1-43-33 ||

और जलचर प्राणी भी प्रसन्न होकर गंगा के पीछे-पीछे चलने लगे। जिधर-जिधर राजा भगीरथ जाते, उधर-उधर ही वह यशस्विनी गंगा भी जाती।

श्लोक 34 (bala.43.34)

जगाम सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी। ततो हि यजमानस्य जह्नोरद्भुतकर्मणः ॥ १-४३-३४ ॥

jagāma saritāṃ śreṣṭhā sarvapāpapraṇāśinī| tato hi yajamānasya jahnoradbhutakarmaṇaḥ || 1-43-34 ||

समस्त पापों का नाश करने वाली वह सरिताओं में श्रेष्ठ गंगा आगे बढ़ती गई — यहाँ तक कि वह अद्भुत-कर्मा और यज्ञकर्ता जह्नु मुनि के —

श्लोक 35 (bala.43.35)

गङ्गा संप्लावयामास यज्ञवाटं महत्मनः। तस्यावलेपनं ज्ञात्वा क्रुद्धो जह्नुश्च राघव ॥ १-४३-३५ ॥

gaṅgā saṃplāvayāmāsa yajñavāṭaṃ mahatmanaḥ| tasyāvalepanaṃ jñātvā kruddho jahnuśca rāghava || 1-43-35 ||

— यज्ञ के, उस यज्ञमण्डप को गंगा ने जलमग्न कर दिया। हे राघव! उसका यह अहंकार जानकर जह्नु मुनि क्रुद्ध हो उठे,

श्लोक 36 (bala.43.36)

अपिबत्तु जलं सर्वं गङ्गायाः परमाद्भुतम्। ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयश्च सुविस्मिताः ॥ १-४३-३६ ॥

apibattu jalaṃ sarvaṃ gaṅgāyāḥ paramādbhutam| tato devāḥ sagandharvā ṛṣayaśca suvismitāḥ || 1-43-36 ||

— और अत्यन्त आश्चर्यजनक ढंग से गंगा के सम्पूर्ण जल को पी लिया। तब देवता, गन्धर्व और ऋषिगण अत्यन्त विस्मित होकर —

श्लोक 37 (bala.43.37)

पूजयन्ति महात्मानं जह्नुं पुरुषसत्तमम्। गङ्गां चापि नयन्ति स्म दुहितृत्वे महात्मनः ॥ १-४३-३७ ॥

pūjayanti mahātmānaṃ jahnuṃ puruṣasattamam| gaṅgāṃ cāpi nayanti sma duhitṛtve mahātmanaḥ || 1-43-37 ||

— महात्मा और पुरुषों में श्रेष्ठ जह्नु मुनि की पूजा करने लगे; और गंगा को भी उस महात्मा की पुत्री मानने लगे।

श्लोक 38 (bala.43.38)

ततस्तुष्टो महातेजाः श्रोत्राभ्यामसृजत् प्रभुः। तस्माज्जह्नुसुता गङ्गा प्रोच्यते जाह्नवीति च ॥ १-४३-३८ ॥

tatastuṣṭo mahātejāḥ śrotrābhyāmasṛjat prabhuḥ| tasmājjahnusutā gaṅgā procyate jāhnavīti ca || 1-43-38 ||

तत्पश्चात् संतुष्ट होकर उस महातेजस्वी प्रभु जह्नु ने अपने दोनों कानों से उसे पुनः निकाल दिया; इसीलिए गंगा जह्नु की पुत्री होने के कारण जाह्नवी भी कहलाती है।

श्लोक 39 (bala.43.39)

जगाम च पुनर्गङ्गा भगीरथरथानुगा। सागरं चापि संप्राप्ता सा सरित्प्रवरा तदा ॥ १-४३-३९ ॥

jagāma ca punargaṅgā bhagīratharathānugā| sāgaraṃ cāpi saṃprāptā sā saritpravarā tadā || 1-43-39 ||

और गंगा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे पुनः आगे बढ़ चली; और वह सरिताओं में श्रेष्ठ नदी तब समुद्र तक भी जा पहुँची।

श्लोक 40 (bala.43.40)

रसातलमुपागच्छत् सिद्ध्यर्थं तस्य कर्मणः। भगीरथोऽपि रजार्षिर्गङ्गामादाय यत्नतः ॥ १-४३-४० ॥

rasātalamupāgacchat siddhyarthaṃ tasya karmaṇaḥ| bhagīratho'pi rajārṣirgaṅgāmādāya yatnataḥ || 1-43-40 ||

उसके कार्य की सिद्धि के लिए वह रसातल की ओर चली गई; और राजर्षि भगीरथ भी बड़े प्रयत्न से गंगा को वहाँ ले जाकर —

श्लोक 41 (bala.43.41)

पितामहान् भस्मकृतानपश्यद्गतचेतनः। अथ तद्भस्मनां राशिं गङ्गासलिलमुत्तमम्। प्लावयत् पूतपाप्मानः स्वर्गं प्रप्ता रघूत्तम ॥ १-४३-४१ ॥

pitāmahān bhasmakṛtānapaśyadgatacetanaḥ| atha tadbhasmanāṃ rāśiṃ gaṅgāsalilamuttamam| plāvayat pūtapāpmānaḥ svargaṃ praptā raghūttama || 1-43-41 ||

— अपने उन पितामहों को भस्मीभूत देखकर शोक-विह्वल हो गए। तत्पश्चात् गंगा के उस उत्तम जल ने उस भस्मराशि को आप्लावित कर दिया, और हे रघूत्तम! पापों से मुक्त होकर वे सभी स्वर्ग को प्राप्त हुए।

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