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बालकाण्ड · सर्ग 48

अहल्या का शाप

सर्ग 47सर्ग-सूचीसर्ग 49

श्लोक 1 (bala.48.1)

पृष्ट्वा तु कुशलं तत्र परस्परसमागमे। कथान्ते सुमतिर्वाक्यं व्याजहार महामुनिम् ॥ १-४८-१ ॥

pṛṣṭvā tu kuśalaṃ tatra parasparasamāgame| kathānte sumatirvākyaṃ vyājahāra mahāmunim || 1-48-1 ||

इस प्रकार आपस में मिलकर कुशल-प्रश्न करने के बाद, बातचीत के अन्त में सुमति ने उस महामुनि से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (bala.48.2)

इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ। गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ ॥ १-४८-२ ॥

imau kumārau bhadraṃ te devatulyaparākramau| gajasiṃhagatī vīrau śārdūlavṛṣabhopamau || 1-48-2 ||

"आपका कल्याण हो! ये दोनों कुमार देवताओं के समान पराक्रमी हैं, हाथी और सिंह की भाँति गतिवाले वीर हैं, तथा व्याघ्र और वृषभ के समान प्रतीत होते हैं।"

श्लोक 3 (bala.48.3)

पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ। अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ ॥ १-४८-३ ॥

padmapatraviśālākṣau khaḍgatūṇīdhanurdharau| aśvināviva rūpeṇa samupasthitayauvanau || 1-48-3 ||

इनके नेत्र कमलदल के समान विशाल हैं, ये खड्ग, तरकश और धनुष धारण किए हुए हैं, और यौवन के समीप पहुँचे हुए ये अश्विनीकुमारों के समान रूपवान् हैं।

श्लोक 4 (bala.48.4)

यदृच्छयैव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ। कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने ॥ १-४८-४ ॥

yadṛcchayaiva gāṃ prāptau devalokādivāmarau| kathaṃ padbhyāmiha prāptau kimarthaṃ kasya vā mune || 1-48-4 ||

मानो देवलोक से दो देवता अनायास ही पृथ्वी पर उतर आए हों! हे मुनि! ये यहाँ पैदल कैसे और किस प्रयोजन से, तथा किसके पुत्र होकर आए हैं?

श्लोक 5 (bala.48.5)

भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम्। परस्परेण सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः ॥ १-४८-५ ॥

bhūṣayantāvimaṃ deśaṃ candrasūryāvivāmbaram| paraspareṇa sadṛśau pramāṇeṅgitaceṣṭitaiḥ || 1-48-5 ||

ये चन्द्रमा और सूर्य की भाँति इस प्रदेश को सुशोभित कर रहे हैं, तथा शरीर की माप, संकेतों और चेष्टाओं में परस्पर सर्वथा समान हैं।

श्लोक 6 (bala.48.6)

किमर्थं च नरश्रेष्ठौ संप्राप्तौ दुर्गमे पथि। वरायुधधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १-४८-६ ॥

kimarthaṃ ca naraśreṣṭhau saṃprāptau durgame pathi| varāyudhadharau vīrau śrotumicchāmi tattvataḥ || 1-48-6 ||

नरश्रेष्ठ, उत्तम आयुध धारण करने वाले ये दोनों वीर इस दुर्गम मार्ग से किसलिए यहाँ आए हैं — मैं इसे यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।" ऐसा राजा सुमति ने विश्वामित्र से पूछा।

श्लोक 7 (bala.48.7)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा यथावृत्तं न्यवेदयत्। सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा। विश्वामित्रवचः श्रुत्वा राजा परमविस्मितः ॥ १-४८-७ ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā yathāvṛttaṃ nyavedayat| siddhāśramanivāsaṃ ca rākṣasānāṃ vadhaṃ tathā| viśvāmitravacaḥ śrutvā rājā paramavismitaḥ || 1-48-7 ||

उसके इस वचन को सुनकर विश्वामित्र ने घटी हुई सारी बात यथावत् कह सुनाई — सिद्धाश्रम में उनका निवास तथा राक्षसों का वध। विश्वामित्र के इस वचन को सुनकर राजा अत्यन्त विस्मित हुआ।

श्लोक 8 (bala.48.8)

अतिथी परमौ प्राप्तं पुत्रौ दशरथस्य तौ। पूजयामास विधिवत् सत्कारार्हौ महाबलौ ॥ १-४८-८ ॥

atithī paramau prāptaṃ putrau daśarathasya tau| pūjayāmāsa vidhivat satkārārhau mahābalau || 1-48-8 ||

दशरथ के उन दोनों महाबली पुत्रों को उत्तम अतिथि तथा सत्कार के योग्य जानकर उसने विधिपूर्वक उनका सम्मान किया।

श्लोक 9 (bala.48.9)

ततः परमसत्कारं सुमतेः प्राप्य राघवौ। उष्य तत्र निशामेकां जग्मतुर्मिथिलां ततः ॥ १-४८-९ ॥

tataḥ paramasatkāraṃ sumateḥ prāpya rāghavau| uṣya tatra niśāmekāṃ jagmaturmithilāṃ tataḥ || 1-48-9 ||

उसके बाद सुमति से परम सत्कार पाकर दोनों राघव वहाँ एक रात्रि बिताकर मिथिला की ओर चल दिए।

श्लोक 10 (bala.48.10)

तां दृष्ट्वा मुनयः सर्वे जनकस्य पुरीं शुभाम्। साधु साध्विति शंसन्तो मिथिलां समपूजयन् ॥ १-४८-१० ॥

tāṃ dṛṣṭvā munayaḥ sarve janakasya purīṃ śubhām| sādhu sādhviti śaṃsanto mithilāṃ samapūjayan || 1-48-10 ||

जनक की उस शुभ नगरी को देखकर सभी मुनि 'साधु, साधु' कहते हुए मिथिला की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 11 (bala.48.11)

मिथिलोपवने तत्र आश्रमं दृश्य राघवः। पुराणं निर्जनं रम्यं पप्रच्छ मुनिपुंगवम् ॥ १-४८-११ ॥

mithilopavane tatra āśramaṃ dṛśya rāghavaḥ| purāṇaṃ nirjanaṃ ramyaṃ papraccha munipuṃgavam || 1-48-11 ||

मिथिला के उस उपवन में एक पुराना, जनहीन किन्तु रमणीय आश्रम देखकर राघव ने उस मुनिश्रेष्ठ से पूछा।

श्लोक 12 (bala.48.12)

इदमाश्रमसंकाशं किं न्विदं मुनिवर्जितम्। श्रोतुमिच्छामि भगवन् कस्यायं पूर्व आश्रमः ॥ १-४८-१२ ॥

idamāśramasaṃkāśaṃ kiṃ nvidaṃ munivarjitam| śrotumicchāmi bhagavan kasyāyaṃ pūrva āśramaḥ || 1-48-12 ||

"हे भगवन्! यह आश्रम जैसा तो प्रतीत होता है, किन्तु मुनियों से रहित है — यह पहले किसका आश्रम था, यह मैं सुनना चाहता हूँ।"

श्लोक 13 (bala.48.13)

तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं वाक्यं वाक्यविशारदः। प्रत्युवाच महातेजा विश्वमित्रो महामुनिः ॥ १-४८-१३ ॥

tacchrutvā rāghaveṇoktaṃ vākyaṃ vākyaviśāradaḥ| pratyuvāca mahātejā viśvamitro mahāmuniḥ || 1-48-13 ||

राघव के इस वचन को सुनकर वाणी में निपुण, महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र ने उत्तर दिया।

श्लोक 14 (bala.48.14)

हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वेन राघव। यस्यैतदाश्रमपदं शप्तं कोपान्महात्मना ॥ १-४८-१४ ॥

hanta te kathayiṣyāmi śṛṇu tattvena rāghava| yasyaitadāśramapadaṃ śaptaṃ kopānmahātmanā || 1-48-14 ||

"हे राघव! सुनो, मैं तुम्हें यथार्थ रूप से बताता हूँ, कि किस महात्मा ने क्रोधवश यह आश्रम-स्थल शापित किया था।"

श्लोक 15 (bala.48.15)

गौतमस्य नरश्रेष्ठ पूर्वमासीन्महात्मनः। आश्रमो दिव्यसंकाशः सुरैरपि सुपूजितः ॥ १-४८-१५ ॥

gautamasya naraśreṣṭha pūrvamāsīnmahātmanaḥ| āśramo divyasaṃkāśaḥ surairapi supūjitaḥ || 1-48-15 ||

हे नरश्रेष्ठ! यह दिव्य कान्ति से युक्त, देवताओं द्वारा भी पूजित आश्रम पूर्वकाल में महात्मा गौतम का था।

श्लोक 16 (bala.48.16)

स चात्र तप आतिष्ठदहल्यासहितः पुरा। वर्षपूगान्यनेकानि राजपुत्र महायशः ॥ १-४८-१६ ॥

sa cātra tapa ātiṣṭhadahalyāsahitaḥ purā| varṣapūgānyanekāni rājaputra mahāyaśaḥ || 1-48-16 ||

हे राजपुत्र! वे महायशस्वी गौतम पूर्वकाल में यहीं अहल्या के साथ अनेक वर्षों तक तपस्या करते रहे।

श्लोक 17 (bala.48.17)

तस्यान्तरं विदित्वा तु सहस्राक्षः शचीपतिः। मुनिवेषधरो भूत्वाऽहल्यामिदमब्रवीत् ॥ १-४८-१७ ॥

tasyāntaraṃ viditvā tu sahasrākṣaḥ śacīpatiḥ| muniveṣadharo bhūtvā'halyāmidamabravīt || 1-48-17 ||

उसकी अनुपस्थिति का अवसर जानकर, शची के पति सहस्राक्ष इन्द्र ने मुनि का रूप धारण करके अहल्या से यह कहा।

श्लोक 18 (bala.48.18)

ऋतुकालं प्रतीक्षन्ते नार्थिनः सुसमाहिते। संगमं त्वहमिच्छामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ १-४८-१८ ॥

ṛtukālaṃ pratīkṣante nārthinaḥ susamāhite| saṃgamaṃ tvahamicchāmi tvayā saha sumadhyame || 1-48-18 ||

"हे सुसमाहिते! कामार्थी पुरुष ऋतुकाल की प्रतीक्षा नहीं करते; हे सुमध्यमे! मैं तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूँ।"

श्लोक 19 (bala.48.19)

मुनिवेषं सहस्राक्षं विज्ञाय रघुनंदन। मतिं चकार दुर्मेधा देवराजकुतूहलात् ॥ १-४८-१९ ॥

muniveṣaṃ sahasrākṣaṃ vijñāya raghunaṃdana| matiṃ cakāra durmedhā devarājakutūhalāt || 1-48-19 ||

हे रघुनन्दन! मुनि के वेष में सहस्राक्ष इन्द्र को पहचानते हुए भी, देवराज के प्रति कुतूहलवश उस दुर्बुद्धि अहल्या ने उनकी बात मान लेने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 20 (bala.48.20)

अथाब्रवीत् सुरश्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना। कृतार्थास्मि सुरश्रेष्ठ गच्छ शीघ्रमितः प्रभो ॥ १-४८-२० ॥

athābravīt suraśreṣṭhaṃ kṛtārthenāntarātmanā| kṛtārthāsmi suraśreṣṭha gaccha śīghramitaḥ prabho || 1-48-20 ||

तब उस अहल्या ने कृतार्थ अन्तःकरण से उस देवश्रेष्ठ से कहा — "हे देवश्रेष्ठ! मैं कृतार्थ हुई; हे प्रभो! अब तुम शीघ्र यहाँ से चले जाओ।"

श्लोक 21 (bala.48.21)

आत्मानं मां च देवेश सर्वदा रक्ष गौतमात्। इन्द्रस्तु प्रहसन् वाक्यमहल्यामिदमब्रवीत् ॥ १-४८-२१ ॥

ātmānaṃ māṃ ca deveśa sarvadā rakṣa gautamāt| indrastu prahasan vākyamahalyāmidamabravīt || 1-48-21 ||

"हे देवेश! अपनी और मेरी सदा गौतम से रक्षा करना।" इस पर इन्द्र ने हँसते हुए अहल्या से यह वचन कहा।

श्लोक 22 (bala.48.22)

सुश्रोणि परितुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथागतम्। एवं संगम्य तु तया निश्चक्रामोटजात्ततः ॥ १-४८-२२ ॥

suśroṇi parituṣṭo'smi gamiṣyāmi yathāgatam| evaṃ saṃgamya tu tayā niścakrāmoṭajāttataḥ || 1-48-22 ||

"हे सुश्रोणि! मैं संतुष्ट हूँ, अब मैं जैसे आया था वैसे ही लौट जाऊँगा।" इस प्रकार उससे समागम करके वह उस कुटी से बाहर निकला।

श्लोक 23 (bala.48.23)

स संभ्रमात्त्वरन् राम शङ्कितो गौतमं प्रति। गौतमं स ददर्शाथ प्रविशन्तं महामुनिम् ॥ १-४८-२३ ॥

sa saṃbhramāttvaran rāma śaṅkito gautamaṃ prati| gautamaṃ sa dadarśātha praviśantaṃ mahāmunim || 1-48-23 ||

हे राम! गौतम की आशंका से घबराया हुआ, शीघ्रता करता हुआ वह इन्द्र, तभी आश्रम में प्रवेश करते हुए महामुनि गौतम को देख बैठा।

श्लोक 24 (bala.48.24)

देवदानवदुर्धर्षं तपोबलसमन्वितम्। तीर्थोदकपरिक्लिन्नं दीप्यमानमिवानलम् ॥ १-४८-२४ ॥

devadānavadurdharṣaṃ tapobalasamanvitam| tīrthodakapariklinnaṃ dīpyamānamivānalam || 1-48-24 ||

वे गौतम देवों और दानवों के लिए भी दुर्धर्ष, तपोबल से सम्पन्न, तीर्थजल से भीगे हुए, तथा प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 25 (bala.48.25)

गृहीतसमिधं तत्र सकुशं मुनिपुंगवम्। दृष्ट्वा सुरपतिस्त्रस्तो विषण्णवदनोऽभवत् ॥ १-४८-२५ ॥

gṛhītasamidhaṃ tatra sakuśaṃ munipuṃgavam| dṛṣṭvā surapatistrasto viṣaṇṇavadano'bhavat || 1-48-25 ||

समिधा और कुश हाथ में लिए हुए उस मुनिश्रेष्ठ को देखकर देवराज इन्द्र भयभीत हो गया और उसका मुख विषाद से भर गया।

श्लोक 26 (bala.48.26)

अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षं मुनिवेषधरं मुनिः। दुर्वृत्तं वृत्तसंपन्नो रोषाद्वचनमब्रवीत् ॥ १-४८-२६ ॥

atha dṛṣṭvā sahasrākṣaṃ muniveṣadharaṃ muniḥ| durvṛttaṃ vṛttasaṃpanno roṣādvacanamabravīt || 1-48-26 ||

उधर, मुनि के वेष में उस दुराचारी सहस्राक्ष को देखकर, सदाचार-सम्पन्न मुनि गौतम ने क्रोधपूर्वक यह वचन कहा।

श्लोक 27 (bala.48.27)

मम रूपं समास्थाय कृतवानसि दुर्मते। अकर्तव्यमिदं यस्मात् विफलस्त्वं भविष्यति ॥ १-४८-२७ ॥

mama rūpaṃ samāsthāya kṛtavānasi durmate| akartavyamidaṃ yasmāt viphalastvaṃ bhaviṣyati || 1-48-27 ||

"हे दुर्बुद्धे! मेरा रूप धारण करके तूने यह अकरणीय कार्य किया है; इसलिए तू निष्फल (नपुंसक) हो जाएगा।"

श्लोक 28 (bala.48.28)

गौतमेनैवमुक्तस्य स रोषेण महात्मना। पेततुर्वृषणौ भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात् ॥ १-४८-२८ ॥

gautamenaivamuktasya sa roṣeṇa mahātmanā| petaturvṛṣaṇau bhūmau sahasrākṣasya tatkṣaṇāt || 1-48-28 ||

महात्मा गौतम के क्रोधपूर्वक ऐसा कहते ही उसी क्षण सहस्राक्ष के दोनों वृषण भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 29 (bala.48.29)

तथा शप्त्वा च वै शक्रं भार्यामपि च शप्तवान्। इह वर्षसहस्राणि बहूनि निवसिष्यसि ॥ १-४८-२९ ॥

tathā śaptvā ca vai śakraṃ bhāryāmapi ca śaptavān| iha varṣasahasrāṇi bahūni nivasiṣyasi || 1-48-29 ||

इस प्रकार इन्द्र को शाप देकर उन्होंने अपनी पत्नी को भी शाप दिया — "तू यहीं अनेक सहस्र वर्षों तक निवास करेगी,"

श्लोक 30 (bala.48.30)

वायुभक्षा निराहारा तप्यन्ती भस्मशायिनी। अदृश्या सर्वभूतानामाश्रमेऽस्मिन् निवत्स्यसि ॥ १-४८-३० ॥

vāyubhakṣā nirāhārā tapyantī bhasmaśāyinī| adṛśyā sarvabhūtānāmāśrame'smin nivatsyasi || 1-48-30 ||

"केवल वायु पीकर, बिना अन्न के, तपती हुई, भस्म पर सोती हुई, सब प्राणियों को अदृश्य होकर इसी आश्रम में रहेगी।"

श्लोक 31 (bala.48.31)

यदा त्वेतद्वनं घोरं रामो दशरथात्मजः। आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा पूता भविष्यसि ॥ १-४८-३१ ॥

yadā tvetadvanaṃ ghoraṃ rāmo daśarathātmajaḥ| āgamiṣyati durdharṣastadā pūtā bhaviṣyasi || 1-48-31 ||

"जब दशरथ का दुर्धर्ष पुत्र राम इस घोर वन में आएगा, तभी तू पवित्र होगी।"

श्लोक 32 (bala.48.32)

तस्यातिथ्येन दुर्वृत्ते लोभमोहविवर्जिता। मत्सकाशे मुदा युक्ता स्वं वपुर्धारयिष्यसि ॥ १-४८-३२ ॥

tasyātithyena durvṛtte lobhamohavivarjitā| matsakāśe mudā yuktā svaṃ vapurdhārayiṣyasi || 1-48-32 ||

"हे दुराचारिणी! उसका अतिथि-सत्कार करके, लोभ और मोह से मुक्त हुई तू प्रसन्नतापूर्वक फिर मेरे समीप अपना वास्तविक रूप धारण करेगी।"

श्लोक 33 (bala.48.33)

एवमुक्त्वा महातेजा गौतमो दुष्टचारिणीम्। इममाश्रममुत्सृज्य सिद्धचारणसेविते। हिमवच्छिखरे रम्ये तपस्तेपे महातपाः ॥ १-४८-३३ ॥

evamuktvā mahātejā gautamo duṣṭacāriṇīm| imamāśramamutsṛjya siddhacāraṇasevite| himavacchikhare ramye tapastepe mahātapāḥ || 1-48-33 ||

इस प्रकार उस दुराचारिणी को शाप देकर महातेजस्वी गौतम ने इस आश्रम को त्याग दिया, और सिद्धों तथा चारणों से सेवित हिमालय के रमणीय शिखर पर जाकर वे महातपस्वी तप करने लगे। इस प्रकार विश्वामित्र ने अहल्या की यह कथा सुनाई।

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