Skip to main content

बालकाण्ड · सर्ग 50

जनक-यज्ञ में आगमन

सर्ग 49सर्ग-सूचीसर्ग 51

श्लोक 1 (bala.50.1)

ततः प्रागुत्तरां गत्वा रामः सौमित्रिणा सह। विश्वामित्रं पुरस्कृत्य यज्ञवाटमुपागमत् ॥ १-५०-१ ॥

tataḥ prāguttarāṃ gatvā rāmaḥ saumitriṇā saha| viśvāmitraṃ puraskṛtya yajñavāṭamupāgamat || 1-50-1 ||

तदनन्तर ईशान दिशा की ओर चलकर राम ने लक्ष्मण के साथ विश्वामित्र को आगे करके जनक के यज्ञ-मण्डप का दर्शन किया।

श्लोक 2 (bala.50.2)

रामस्तु मुनिशार्दूलमुवाच सहलक्ष्मणः। साध्वी यज्ञसमृद्धिर्हि जनकस्य महात्मनः ॥ १-५०-२ ॥

rāmastu muniśārdūlamuvāca sahalakṣmaṇaḥ| sādhvī yajñasamṛddhirhi janakasya mahātmanaḥ || 1-50-2 ||

तब लक्ष्मण-सहित राम ने उस मुनिश्रेष्ठ से कहा — "महात्मा जनक की यह यज्ञ-समृद्धि सचमुच अत्यन्त उत्तम है।"

श्लोक 3 (bala.50.3)

बहूनीह सहस्राणि नानादेशनिवासिनाम्। ब्राह्मणानां महाभाग वेदाध्ययनशालिनाम् ॥ १-५०-३ ॥

bahūnīha sahasrāṇi nānādeśanivāsinām| brāhmaṇānāṃ mahābhāga vedādhyayanaśālinām || 1-50-3 ||

"हे महाभाग! यहाँ नाना देशों से आए हुए, वेदाध्ययन में निपुण ब्राह्मणों के अनेक सहस्र समूह दिखाई देते हैं,"

श्लोक 4 (bala.50.4)

ऋषि ऋषिवाटाश्च दृश्यन्ते शकटीशतसंकुलाः। देशो विधीयतां ब्रह्मन् यत्र वत्स्यामहे वयम् ॥ १-५०-४ ॥

ṛṣi ṛṣivāṭāśca dṛśyante śakaṭīśatasaṃkulāḥ| deśo vidhīyatāṃ brahman yatra vatsyāmahe vayam || 1-50-4 ||

"तथा सैकड़ों शकटों से भरे हुए ऋषियों के शिविर भी दिखाई देते हैं; हे ब्रह्मन्! अतः कोई ऐसा स्थान निश्चित कीजिए, जहाँ हम निवास कर सकें।"

श्लोक 5 (bala.50.5)

रामस्य वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः। निवेशमकरोद्देशे विविक्ते सलिलायुते ॥ १-५०-५ ॥

rāmasya vacanaṃ śrutvā viśvāmitro mahāmuniḥ| niveśamakaroddeśe vivikte salilāyute || 1-50-5 ||

राम के इस वचन को सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने जल से युक्त, एकान्त स्थान में निवास की व्यवस्था की।

श्लोक 6 (bala.50.6)

विश्वामित्रमनुप्राप्तं श्रुत्वा नृपवरस्तदा। शतानन्दं पुरस्कृत्य पुरोहितमनिन्दितम् ॥ १-५०-६ ॥

viśvāmitramanuprāptaṃ śrutvā nṛpavarastadā| śatānandaṃ puraskṛtya purohitamaninditam || 1-50-6 ||

इधर विश्वामित्र के पधारने का समाचार सुनकर उत्तम नरेश जनक ने अपने निर्दोष पुरोहित शतानन्द को आगे करके,

श्लोक 7 (bala.50.7)

प्रत्युज्जगाम सहसा विनयेन समन्वितः। ऋत्विजोऽपि महात्मानस्त्वर्घ्यमादाय सत्वरम् ॥ १-५०-७ ॥

pratyujjagāma sahasā vinayena samanvitaḥ| ṛtvijo'pi mahātmānastvarghyamādāya satvaram || 1-50-7 ||

विनयपूर्वक तुरंत उनकी अगवानी को चल पड़े; और उन महात्मा ऋत्विजों ने भी शीघ्रता से अर्घ्य लेकर आकर,

श्लोक 8 (bala.50.8)

विश्वामित्राय धर्मेण ददौ धर्मपुरस्कृतम्। प्रतिगृह्य तु तां पूजां जनकस्य महात्मनः ॥ १-५०-८ ॥

viśvāmitrāya dharmeṇa dadau dharmapuraskṛtam| pratigṛhya tu tāṃ pūjāṃ janakasya mahātmanaḥ || 1-50-8 ||

उसे विधिपूर्वक, धर्म को आगे रखते हुए विश्वामित्र को अर्पित किया। महात्मा जनक की उस पूजा को स्वीकार करके,

श्लोक 9 (bala.50.9)

पप्रच्छ कुशलं राज्ञो यज्ञस्य च निरामयम्। स तांश्चाथ मुनीन् पृष्ट्वा सोपाध्यायपुरोधसः ॥ १-५०-९ ॥

papraccha kuśalaṃ rājño yajñasya ca nirāmayam| sa tāṃścātha munīn pṛṣṭvā sopādhyāyapurodhasaḥ || 1-50-9 ||

विश्वामित्र ने राजा का कुशल-क्षेम तथा यज्ञ के निर्विघ्न सम्पन्न होने का समाचार पूछा; फिर उन्होंने गुरुजनों और पुरोहितों सहित उन सब मुनियों से भी कुशल पूछी।

श्लोक 10 (bala.50.10)

यथार्हमृषिभिः सर्वैः समागच्छत् प्रहृष्टवत्। अथ राजा मुनिश्रेष्ठं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १-५०-१० ॥

yathārhamṛṣibhiḥ sarvaiḥ samāgacchat prahṛṣṭavat| atha rājā muniśreṣṭhaṃ kṛtāñjalirabhāṣata || 1-50-10 ||

और सब ऋषियों से यथोचित रूप से हर्षपूर्वक मिले। तब राजा जनक ने हाथ जोड़कर उस मुनिश्रेष्ठ से कहा।

श्लोक 11 (bala.50.11)

आसने भगवानास्तां सहैभिर्मुनिसत्तमैः। जनकस्य वचः श्रुत्वा निषसाद महामुनिः ॥ १-५०-११ ॥

āsane bhagavānāstāṃ sahaibhirmunisattamaiḥ| janakasya vacaḥ śrutvā niṣasāda mahāmuniḥ || 1-50-11 ||

"हे भगवन्! इन उत्तम मुनियों के साथ आप इस आसन पर विराजिए।" जनक के इस वचन को सुनकर महामुनि विश्वामित्र आसन पर बैठ गए।

श्लोक 12 (bala.50.12)

पुरोधा ऋत्विजश्चैव राजा च सह मंत्रिभिः। आसनेषु यथान्यायमुपविष्टान् समन्ततः ॥ १-५०-१२ ॥

purodhā ṛtvijaścaiva rājā ca saha maṃtribhiḥ| āsaneṣu yathānyāyamupaviṣṭān samantataḥ || 1-50-12 ||

पुरोहित, ऋत्विज्, राजा तथा मन्त्रियों सहित सभी लोग विधिपूर्वक अपने-अपने आसनों पर चारों ओर बैठ गए।

श्लोक 13 (bala.50.13)

दृष्ट्वा स नृपतिस्तत्र विश्वामित्रमथाब्रवीत्। अद्य यज्ञसमृद्धिर्मे सफला दैवतैः कृता ॥ १-५०-१३ ॥

dṛṣṭvā sa nṛpatistatra viśvāmitramathābravīt| adya yajñasamṛddhirme saphalā daivataiḥ kṛtā || 1-50-13 ||

उन सबको इस प्रकार बैठा देखकर राजा जनक ने विश्वामित्र से कहा — "आज मेरी यह यज्ञ-समृद्धि देवताओं के द्वारा ही सफल की गई है,"

श्लोक 14 (bala.50.14)

अद्य यज्ञफलं प्राप्तं भगवद्दर्शनान्मया। धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुङ्गव ॥ १-५०-१४ ॥

adya yajñaphalaṃ prāptaṃ bhagavaddarśanānmayā| dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me munipuṅgava || 1-50-14 ||

"आज मैंने आपके दर्शन से ही यज्ञ का फल पा लिया है। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ,"

श्लोक 15 (bala.50.15)

यज्ञोपसदनं ब्रह्मन् प्राप्तोऽसि मुनिभिः सह। द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिणः ॥ १-५०-१५ ॥

yajñopasadanaṃ brahman prāpto'si munibhiḥ saha| dvādaśāhaṃ tu brahmarṣe dīkṣāmāhurmanīṣiṇaḥ || 1-50-15 ||

"हे ब्रह्मन्! कि आप मुनियों सहित मेरे यज्ञ-मण्डप में पधारे हैं। हे ब्रह्मर्षे! विद्वानों ने इस दीक्षा की अवधि बारह दिन बताई है,"

श्लोक 16 (bala.50.16)

ततो भागार्थिनो देवान् द्रष्टुमर्हसि कौशिक। इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलं प्रहृष्टवदनस्तदा ॥ १-५०-१६ ॥

tato bhāgārthino devān draṣṭumarhasi kauśika| ityuktvā muniśārdūlaṃ prahṛṣṭavadanastadā || 1-50-16 ||

"अतः हे कौशिक! उसके पूरा होने पर आप अपने भाग की अभिलाषा रखने वाले देवताओं का दर्शन कर सकेंगे।" ऐसा कहकर वे प्रसन्नमुख होकर उस मुनिश्रेष्ठ से,

श्लोक 17 (bala.50.17)

पुनस्तं परिपप्रच्छ प्रांजलिः प्रयतो नृपः। इमौ कुमारौ भद्रं ते देवतुल्यपराक्रमौ ॥ १-५०-१७ ॥

punastaṃ paripapraccha prāṃjaliḥ prayato nṛpaḥ| imau kumārau bhadraṃ te devatulyaparākramau || 1-50-17 ||

राजा ने हाथ जोड़कर, संयमपूर्वक, फिर उनसे यह पूछा — "आपका कल्याण हो! ये दोनों कुमार देवताओं के समान पराक्रमी हैं,"

श्लोक 18 (bala.50.18)

गजसिंहगती वीरौ शार्दूलवृषभोपमौ। पद्मपत्रविशालाक्षौ खड्गतूणीधनुर्धरौ। अश्विनाविव रूपेण समुपस्थितयौवनौ ॥ १-५०-१८ ॥

gajasiṃhagatī vīrau śārdūlavṛṣabhopamau| padmapatraviśālākṣau khaḍgatūṇīdhanurdharau| aśvināviva rūpeṇa samupasthitayauvanau || 1-50-18 ||

"हाथी और सिंह की भाँति गतिवाले, व्याघ्र और वृषभ के समान वीर, कमलदल के समान विशाल नेत्रोंवाले, खड्ग-तरकश-धनुष धारण किए हुए, यौवन के समीप पहुँचे हुए तथा अश्विनीकुमारों के समान रूपवान् हैं।"

श्लोक 19 (bala.50.19)

यदृच्छयैव गां प्राप्तौ देवलोकादिवामरौ। कथं पद्भ्यामिह प्राप्तौ किमर्थं कस्य वा मुने ॥ १-५०-१९ ॥

yadṛcchayaiva gāṃ prāptau devalokādivāmarau| kathaṃ padbhyāmiha prāptau kimarthaṃ kasya vā mune || 1-50-19 ||

"मानो देवलोक से अनायास ही दो देवता पृथ्वी पर उतर आए हों! हे मुनि! ये यहाँ पैदल किस कारण और किस प्रयोजन से, तथा किसके पुत्र होकर आए हैं?"

श्लोक 20 (bala.50.20)

वरायुधधरौ वीरौ कस्य पुत्रौ महामुने। भूषयन्ताविमं देशं चन्द्रसूर्याविवाम्बरम् ॥ १-५०-२० ॥

varāyudhadharau vīrau kasya putrau mahāmune| bhūṣayantāvimaṃ deśaṃ candrasūryāvivāmbaram || 1-50-20 ||

"हे महामुने! उत्तम आयुध धारण करने वाले ये दोनों वीर किसके पुत्र हैं? ये चन्द्रमा और सूर्य की भाँति इस प्रदेश को सुशोभित कर रहे हैं,"

श्लोक 21 (bala.50.21)

परस्परस्य सदृशौ प्रमाणेङ्गितचेष्टितैः। काकपक्षधरौ वीरौ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १-५०-२१ ॥

parasparasya sadṛśau pramāṇeṅgitaceṣṭitaiḥ| kākapakṣadharau vīrau śrotumicchāmi tattvataḥ || 1-50-21 ||

"तथा शरीर की माप, संकेत और चेष्टाओं में परस्पर एक समान हैं। ये वीर अभी काकपक्ष (बालोचित केशविन्यास) धारण किए हुए हैं — मैं इनके विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।"

श्लोक 22 (bala.50.22)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा जनकस्य महात्मनः। न्यवेदयदमेयात्मा पुत्रौ दशरथस्य तौ ॥ १-५०-२२ ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā janakasya mahātmanaḥ| nyavedayadameyātmā putrau daśarathasya tau || 1-50-22 ||

महात्मा जनक के इस वचन को सुनकर, अपरिमेय आत्मबलवाले विश्वामित्र ने उन दोनों को दशरथ के पुत्र बताया।

श्लोक 23 (bala.50.23)

सिद्धाश्रमनिवासं च राक्षसानां वधं तथा। तत्रागमनमव्यग्रं विशालायाश्च दर्शनम् ॥ १-५०-२३ ॥

siddhāśramanivāsaṃ ca rākṣasānāṃ vadhaṃ tathā| tatrāgamanamavyagraṃ viśālāyāśca darśanam || 1-50-23 ||

उन्होंने सिद्धाश्रम में उनके निवास, राक्षसों के वध, वहाँ शान्तिपूर्वक आगमन, तथा विशाला नगरी के दर्शन का वृत्तान्त भी सुनाया,

श्लोक 24 (bala.50.24)

अहल्यादर्शनं चैव गौतमेन समागमम्। महाधनुषि जिज्ञासां कर्तुमागमनं तथा ॥ १-५०-२४ ॥

ahalyādarśanaṃ caiva gautamena samāgamam| mahādhanuṣi jijñāsāṃ kartumāgamanaṃ tathā || 1-50-24 ||

साथ ही अहल्या के दर्शन तथा गौतम से उसके पुनर्मिलन का वृत्तान्त, और यह भी कि वे शिव के महाधनुष को देखने की इच्छा से यहाँ आए हैं।

श्लोक 25 (bala.50.25)

एतत्सर्वं महातेजा जनकाय महात्मने। निवेद्य विररामाथ विश्वामित्रो महामुनिः ॥ १-५०-२५ ॥

etatsarvaṃ mahātejā janakāya mahātmane| nivedya virarāmātha viśvāmitro mahāmuniḥ || 1-50-25 ||

यह सब वृत्तान्त महात्मा जनक तथा शतानन्द को सुनाकर वे महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र मौन हो गए।

सर्ग 49सर्ग-सूचीसर्ग 51