बालकाण्ड · सर्ग 53
वसिष्ठ का शबला देने से इन्कार
श्लोक 1 (bala.53.1)
एवमुक्ता वसिष्ठेन शबला शत्रुसूदन। विदधे कामधुक्कामान् यस्य यस्येप्सितं यथा ॥ १-५३-१ ॥
evamuktā vasiṣṭhena śabalā śatrusūdana| vidadhe kāmadhukkāmān yasya yasyepsitaṃ yathā || 1-53-1 ||
हे शत्रुसूदन! वसिष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उस कामधेनु शबला ने जिसकी जैसी अभिलाषा थी, उसे वैसी ही वस्तुएँ प्रदान कीं।
श्लोक 2 (bala.53.2)
इक्षून्मधूंस्तथा लाजान् मैरेयांश्च वरासवान्। पानानि च महार्हाणि भक्ष्यांश्चोच्चावचांस्तथा ॥ १-५३-२ ॥
ikṣūnmadhūṃstathā lājān maireyāṃśca varāsavān| pānāni ca mahārhāṇi bhakṣyāṃścoccāvacāṃstathā || 1-53-2 ||
उसने गन्ने के रस, मधु, लाजा (भुने हुए चावल), मैरेय और उत्तम आसव, तथा बहुमूल्य पेय पदार्थ और विविध प्रकार के खाद्य पदार्थ प्रदान किए।
श्लोक 3 (bala.53.3)
उष्णाढ्यस्यौदनस्यापि राशयः पर्वतोपमाः। मृष्टान्नानि च सूपाश्च दधिकुल्यास्तथैव च ॥ १-५३-३ ॥
uṣṇāḍhyasyaudanasyāpi rāśayaḥ parvatopamāḥ| mṛṣṭānnāni ca sūpāśca dadhikulyāstathaiva ca || 1-53-3 ||
गरम भात के पर्वत के समान ढेर लग गए, स्वादिष्ट व्यंजन, दालें और दही की धाराएँ भी वहाँ प्रकट हो गईं।
श्लोक 4 (bala.53.4)
नानास्वादुरसानां च खाण्डवानां तथैव च। भाजनानि सुपूर्णानि गौडानि च सहस्रशः ॥ १-५३-४ ॥
nānāsvādurasānāṃ ca khāṇḍavānāṃ tathaiva ca| bhājanāni supūrṇāni gauḍāni ca sahasraśaḥ || 1-53-4 ||
विभिन्न स्वादिष्ट रसों तथा खांड की मिठाइयों से भरे हुए हजारों पात्र, और गुड़ से बने पदार्थ भी वहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 5 (bala.53.5)
सर्वमासीत् सुसंतुष्टं हृष्टपुष्टजनायुतम्। विश्वामित्रबलं राम वसिष्ठेन सुतर्पितम् ॥ १-५३-५ ॥
sarvamāsīt susaṃtuṣṭaṃ hṛṣṭapuṣṭajanāyutam| viśvāmitrabalaṃ rāma vasiṣṭhena sutarpitam || 1-53-5 ||
हे राम! वसिष्ठ द्वारा भली-भाँति तृप्त की गई विश्वामित्र की सारी सेना अत्यन्त सन्तुष्ट, हर्षित और हृष्ट-पुष्ट जनों से युक्त हो गई।
श्लोक 6 (bala.53.6)
विश्वामित्रोऽपि राजर्षिर्हृष्टपुष्टस्तदाभवत्। सान्तःपुरवरो राजा सब्राह्मणपुरोहितः ॥ १-५३-६ ॥
viśvāmitro'pi rājarṣirhṛṣṭapuṣṭastadābhavat| sāntaḥpuravaro rājā sabrāhmaṇapurohitaḥ || 1-53-6 ||
राजर्षि विश्वामित्र भी अपने अन्तःपुर की श्रेष्ठ स्त्रियों तथा ब्राह्मणों और पुरोहित सहित उस समय हर्षित और हृष्ट-पुष्ट हो गए।
श्लोक 7 (bala.53.7)
सामात्यो मंत्रिसहितः सभृत्यः पूजितस्तदा। युक्तः परमहर्षेण वसिष्ठमिदमब्रवीत् ॥ १-५३-७ ॥
sāmātyo maṃtrisahitaḥ sabhṛtyaḥ pūjitastadā| yuktaḥ paramaharṣeṇa vasiṣṭhamidamabravīt || 1-53-7 ||
अपने मंत्रियों, अमात्यों और सेवकों सहित सम्मानित होकर, अत्यन्त हर्ष से युक्त होकर उसने वसिष्ठ से यह कहा।
श्लोक 8 (bala.53.8)
पूजितोऽहं त्वया ब्रह्मन् पूजार्हेण सुसत्कृतः। श्रूयतामभिधास्यामि वाक्यं वाक्यविशारद ॥ १-५३-८ ॥
pūjito'haṃ tvayā brahman pūjārheṇa susatkṛtaḥ| śrūyatāmabhidhāsyāmi vākyaṃ vākyaviśārada || 1-53-8 ||
हे ब्रह्मन्! आप पूज्य हैं और आपने मेरा भली-भाँति सत्कार किया है। हे वाक्यविशारद! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह सुनिए।
श्लोक 9 (bala.53.9)
गवां शतसहस्रेण दीयतां शबला मम। रत्नं हि भगवन्नेतद्रत्नहारी च पार्थिवः ॥ १-५३-९ ॥
gavāṃ śatasahasreṇa dīyatāṃ śabalā mama| ratnaṃ hi bhagavannetadratnahārī ca pārthivaḥ || 1-53-9 ||
एक लाख गौओं के बदले शबला मुझे दे दीजिए, क्योंकि हे भगवन्! यह गौ तो एक रत्न है, और राजा ही रत्नों का उचित ग्रहणकर्ता होता है।
श्लोक 10 (bala.53.10)
तस्मान्मे शबलां देहि ममैषा धर्मतो द्विज। एवमुक्तस्तु भगवान् वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ १-५३-१० ॥
tasmānme śabalāṃ dehi mamaiṣā dharmato dvija| evamuktastu bhagavān vasiṣṭho munisattamaḥ || 1-53-10 ||
इसलिए, हे द्विज! मुझे शबला दे दीजिए, यह धर्मतः मेरी ही है। विश्वामित्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर भगवान् वसिष्ठ, मुनियों में श्रेष्ठ,
श्लोक 11 (bala.53.11)
विश्वामित्रेण धर्मात्मा प्रत्युवाच महीपतिम्। नाहं शतसहस्रेण नापि कोटिशतैर्गवाम् ॥ १-५३-११ ॥
viśvāmitreṇa dharmātmā pratyuvāca mahīpatim| nāhaṃ śatasahasreṇa nāpi koṭiśatairgavām || 1-53-11 ||
उस धर्मात्मा ने राजा को उत्तर दिया -- "मैं न तो एक लाख गौओं के बदले, न अरबों गौओं के बदले,
श्लोक 12 (bala.53.12)
राजन् दास्यामि शबलां राशिभी रजतस्य वा। न परित्यागमर्हेयं मत्सकाशादरिन्दम ॥ १-५३-१२ ॥
rājan dāsyāmi śabalāṃ rāśibhī rajatasya vā| na parityāgamarheyaṃ matsakāśādarindama || 1-53-12 ||
और न चाँदी के ढेरों के बदले भी, हे राजन्! मैं शबला को दूँगा। हे अरिन्दम! यह मेरे पास से त्यागी जाने योग्य नहीं है।
श्लोक 13 (bala.53.13)
शाश्वती शबला मह्यं कीर्तिरात्मवतो यथा। अस्यां हव्यं च कव्यं च प्राणयात्रा तथैव च ॥ १-५३-१३ ॥
śāśvatī śabalā mahyaṃ kīrtirātmavato yathā| asyāṃ havyaṃ ca kavyaṃ ca prāṇayātrā tathaiva ca || 1-53-13 ||
जैसे आत्मसम्पन्न पुरुष की कीर्ति सदा उसके साथ रहती है, वैसे ही शबला सदा मेरे साथ रहने वाली है। उसी पर मेरे हव्य और कव्य निर्भर हैं, और वही मेरे जीवन-यापन का आधार है।
श्लोक 14 (bala.53.14)
आयत्तमग्निहोत्रं च बलिर्होमस्तथैव च। स्वाहाकारवषट्कारौ विद्याश्च विविधास्तथा ॥ १-५३-१४ ॥
āyattamagnihotraṃ ca balirhomastathaiva ca| svāhākāravaṣaṭkārau vidyāśca vividhāstathā || 1-53-14 ||
मेरा अग्निहोत्र, बलि और होम भी उसी पर निर्भर हैं। स्वाहाकार, वषट्कार तथा नाना प्रकार की विद्याएँ भी इसी पर निर्भर हैं।
श्लोक 15 (bala.53.15)
आयत्तमत्र राजर्षे सर्वमेतन्न संशयः। सर्वस्वमेतत्सत्येन मम तुष्टिकरी तथा ॥ १-५३-१५ ॥
āyattamatra rājarṣe sarvametanna saṃśayaḥ| sarvasvametatsatyena mama tuṣṭikarī tathā || 1-53-15 ||
हे राजर्षे! इसमें कोई संशय नहीं कि यह सब कुछ इसी पर आश्रित है। यह सत्य है कि यही मेरा सर्वस्व है और सदा मेरी सन्तुष्टि करने वाली है।
श्लोक 16 (bala.53.16)
कारणैर्बहुभी राजन्न दास्ये शबलां तव। वसिष्ठेनैवमुक्तस्तु विश्वामित्रोऽब्रवीत्तदा ॥ १-५३-१६ ॥
kāraṇairbahubhī rājanna dāsye śabalāṃ tava| vasiṣṭhenaivamuktastu viśvāmitro'bravīttadā || 1-53-16 ||
इसलिए, हे राजन्! अनेक कारणों से मैं शबला तुम्हें नहीं दूँगा।" वसिष्ठ द्वारा ऐसा कहे जाने पर विश्वामित्र ने तब यह कहा --
श्लोक 17 (bala.53.17)
संरब्धतरमत्यर्थं वाक्यं वाक्यविशारदः। हैरण्यकक्ष्याग्रैवेयान् सुवर्णांकुशभूषितान् ॥ १-५३-१७ ॥
saṃrabdhataramatyarthaṃ vākyaṃ vākyaviśāradaḥ| hairaṇyakakṣyāgraiveyān suvarṇāṃkuśabhūṣitān || 1-53-17 ||
-- वह वाक्यविशारद विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक और उग्रता से बोला -- "मैं तुम्हें सोने की करधनी और गले के आभूषणों से सुसज्जित, स्वर्ण-अंकुशों से विभूषित
श्लोक 18 (bala.53.18)
ददामि कुंजराणां ते सहस्राणि चतुर्दश। हैरण्यानां रथानां च श्वेताश्वानां चतुर्युजाम् ॥ १-५३-१८ ॥
dadāmi kuṃjarāṇāṃ te sahasrāṇi caturdaśa| hairaṇyānāṃ rathānāṃ ca śvetāśvānāṃ caturyujām || 1-53-18 ||
-- चौदह हजार हाथी दूँगा; तथा आठ सौ सुनहरे रथ भी दूँगा, जो घंटियों से सुशोभित हैं और जिन्हें चार-चार श्वेत घोड़े जोते जा सकते हैं।
श्लोक 19 (bala.53.19)
ददामि ते शतान्यष्टौ किङ्किणीकविभूषितान्। हयानां देशजातानां कुलजानां महौजसाम्। सहस्रमेकं दश च ददामि तव सुव्रत ॥ १-५३-१९ ॥
dadāmi te śatānyaṣṭau kiṅkiṇīkavibhūṣitān| hayānāṃ deśajātānāṃ kulajānāṃ mahaujasām| sahasramekaṃ daśa ca dadāmi tava suvrata || 1-53-19 ||
हे सुव्रत! मैं तुम्हें प्रसिद्ध देशों में जन्मे, उत्तम वंश के, अत्यन्त वेगवान् ग्यारह हजार घोड़े भी दूँगा।
श्लोक 20 (bala.53.20)
नानावर्णविभक्तानां वयःस्थानां तथैव च। ददाम्येकां गवां कोटिं शबला दीयतां मम ॥ १-५३-२० ॥
nānāvarṇavibhaktānāṃ vayaḥsthānāṃ tathaiva ca| dadāmyekāṃ gavāṃ koṭiṃ śabalā dīyatāṃ mama || 1-53-20 ||
विविध रंगों वाली, विभक्त और उपयुक्त आयु वाली एक करोड़ गौएँ भी मैं दूँगा; बस शबला मुझे दे दी जाए।
श्लोक 21 (bala.53.21)
यावदिच्छसि रत्नानि हिरण्यं वा द्विजोत्तम। तावद्ददामि ते सर्वं दीयतां शबला मम ॥ १-५३-२१ ॥
yāvadicchasi ratnāni hiraṇyaṃ vā dvijottama| tāvaddadāmi te sarvaṃ dīyatāṃ śabalā mama || 1-53-21 ||
हे द्विजोत्तम! तुम जितने रत्न या स्वर्ण चाहो, मैं उतना सब कुछ तुम्हें दूँगा; बस शबला मुझे दे दी जाए।
श्लोक 22 (bala.53.22)
एवमुक्तस्तु भगवान् विश्वामित्रेण धीमता। न दास्यामीति शबलां प्राह राजन् कथंचन ॥ १-५३-२२ ॥
evamuktastu bhagavān viśvāmitreṇa dhīmatā| na dāsyāmīti śabalāṃ prāha rājan kathaṃcana || 1-53-22 ||
बुद्धिमान् विश्वामित्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर भगवान् वसिष्ठ ने स्पष्ट कह दिया -- "हे राजन्! मैं किसी भी प्रकार से शबला को नहीं दूँगा।"
श्लोक 23 (bala.53.23)
एतदेव हि मे रत्नं एतदेव हि मे धनम्। एतदेव हि सर्वस्वमेतदेव हि जीवितम् ॥ १-५३-२३ ॥
etadeva hi me ratnaṃ etadeva hi me dhanam| etadeva hi sarvasvametadeva hi jīvitam || 1-53-23 ||
यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है, और यही मेरा जीवन है।
श्लोक 24 (bala.53.24)
दर्शश्च पौर्णमासश्च यज्ञाश्चैवाप्तदक्षिणाः। एतदेव हि मे राजन् विविधाश्च क्रियास्तथा ॥ १-५३-२४ ॥
darśaśca paurṇamāsaśca yajñāścaivāptadakṣiṇāḥ| etadeva hi me rājan vividhāśca kriyāstathā || 1-53-24 ||
हे राजन्! दर्श और पौर्णमास यज्ञ, तथा उचित दक्षिणा से युक्त सभी यज्ञ, और मेरे विविध कर्मकाण्ड -- ये सब भी इसी पर निर्भर हैं।
श्लोक 25 (bala.53.25)
अतो मूलाः क्रियाः सर्वा मम राजन्न संशयः। बहूना किं प्रलापेन न दास्ये कामदोहिनीम् ॥ १-५३-२५ ॥
ato mūlāḥ kriyāḥ sarvā mama rājanna saṃśayaḥ| bahūnā kiṃ pralāpena na dāsye kāmadohinīm || 1-53-25 ||
हे राजन्! मेरे सभी कर्मकाण्डों का मूल यही है, इसमें कोई संशय नहीं। इतना अधिक कहने से क्या लाभ -- मैं इस इच्छापूर्ति करने वाली गौ को नहीं दूँगा।