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बालकाण्ड · सर्ग 57

त्रिशंकु की वसिष्ठ-पुत्रों से प्रार्थना

सर्ग 56सर्ग-सूचीसर्ग 58

श्लोक 1 (bala.57.1)

ततः संतप्तहृदयः स्मरन्निग्रहमात्मनः। विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य कृतवैरो महात्मना ॥ १-५७-१ ॥

tataḥ saṃtaptahṛdayaḥ smarannigrahamātmanaḥ| viniḥśvasya viniḥśvasya kṛtavairo mahātmanā || 1-57-1 ||

तत्पश्चात् संतप्त हृदय से अपने पराभव का स्मरण करते हुए, बार-बार दीर्घ निःश्वास लेते हुए, उस महात्मा वसिष्ठ से वैर बाँधकर,

श्लोक 2 (bala.57.2)

सदक्षिणां दिशं गत्वा महिष्या सह राघव। तताप परमं घोरं विश्वामित्रो महातपाः ॥ १-५७-२ ॥

sadakṣiṇāṃ diśaṃ gatvā mahiṣyā saha rāghava| tatāpa paramaṃ ghoraṃ viśvāmitro mahātapāḥ || 1-57-2 ||

हे राघव! अपनी रानी के साथ दक्षिण दिशा में जाकर महातपस्वी विश्वामित्र ने अत्यन्त घोर तप किया।

श्लोक 3 (bala.57.3)

फलमूलाशनो दान्तैश्चचार सुमहत्तपः। अथास्य जज्ञिरे पुत्राः सत्यधर्मपरायणाः ॥ १-५७-३ ॥

phalamūlāśano dāntaiścacāra sumahattapaḥ| athāsya jajñire putrāḥ satyadharmaparāyaṇāḥ || 1-57-3 ||

फल-मूल खाकर, इन्द्रियों को वश में रखकर उसने अत्यन्त महान् तप किया। तब उसके सत्य और धर्म में तत्पर पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 4 (bala.57.4)

हविष्पन्दो मधुष्यन्दो दृढनेत्रो महारथः। पूर्णे वर्षसहस्रे तु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ १-५७-४ ॥

haviṣpando madhuṣyando dṛḍhanetro mahārathaḥ| pūrṇe varṣasahasre tu brahmā lokapitāmahaḥ || 1-57-4 ||

हविष्पन्द, मधुष्यन्द, दृढ़नेत्र और महारथ। जब हज़ार वर्ष पूर्ण हो गए, तब लोकपितामह ब्रह्मा ने,

श्लोक 5 (bala.57.5)

अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्। जिता राजर्षिलोकास्ते तपसा कुशिकात्मज ॥ १-५७-५ ॥

abravīnmadhuraṃ vākyaṃ viśvāmitraṃ tapodhanam| jitā rājarṣilokāste tapasā kuśikātmaja || 1-57-5 ||

तपोधन विश्वामित्र से मधुर वचन कहा - "हे कुशिकात्मज! तुमने अपने तप से राजर्षियों के लोकों को जीत लिया है।"

श्लोक 6 (bala.57.6)

अनेन तपसा त्वां हि राजर्षिरिति विद्महे। एवमुक्त्वा महातेजा जगाम सह दैवतैः ॥ १-५७-६ ॥

anena tapasā tvāṃ hi rājarṣiriti vidmahe| evamuktvā mahātejā jagāma saha daivataiḥ || 1-57-6 ||

"इस तप के कारण हम तुम्हें राजर्षि जानते हैं।" ऐसा कहकर वे महातेजस्वी ब्रह्मा देवताओं के साथ,

श्लोक 7 (bala.57.7)

त्रिविष्टपं ब्रह्मलोकं लोकानां परमेश्वरः। विश्वामित्रोऽपि तच्छ्रुत्वा ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ १-५७-७ ॥

triviṣṭapaṃ brahmalokaṃ lokānāṃ parameśvaraḥ| viśvāmitro'pi tacchrutvā hriyā kiṃcidavāṅmukhaḥ || 1-57-7 ||

उन लोकों के परमेश्वर ब्रह्मलोक अर्थात् स्वर्ग को चले गए। यह सुनकर विश्वामित्र भी लज्जावश कुछ नीचा मुख किए हुए,

श्लोक 8 (bala.57.8)

दुःखेन महताविष्टः समन्युरिदमब्रवीत्। तपश्च सुमहत्तप्तं राजर्षिरिति मां विदुः ॥ १-५७-८ ॥

duḥkhena mahatāviṣṭaḥ samanyuridamabravīt| tapaśca sumahattaptaṃ rājarṣiriti māṃ viduḥ || 1-57-8 ||

अत्यन्त दुःख से भरकर, क्रोधयुक्त होकर उसने यह कहा - "मैंने इतना बड़ा तप किया, फिर भी मुझे राजर्षि ही जाना गया।"

श्लोक 9 (bala.57.9)

देवाः सर्षिगणाः सर्वे नास्ति मन्ये तपःफलम्। एवं निश्चित्य मनसा भूय एव महातपाः ॥ १-५७-९ ॥

devāḥ sarṣigaṇāḥ sarve nāsti manye tapaḥphalam| evaṃ niścitya manasā bhūya eva mahātapāḥ || 1-57-9 ||

"देवगण और समस्त ऋषिगण - मुझे लगता है कि मेरे तप का कोई फल ही नहीं हुआ।" मन में ऐसा निश्चय करके वह महातपस्वी पुनः,

श्लोक 10 (bala.57.10)

तपश्चचार काकुत्स्थ परमं परमात्मवान्। एतस्मिन्नेव काले तु सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥ १-५७-१० ॥

tapaścacāra kākutstha paramaṃ paramātmavān| etasminneva kāle tu satyavādī jitendriyaḥ || 1-57-10 ||

हे काकुत्स्थ! उस दृढ़-संकल्प विश्वामित्र ने पुनः परम तप किया। इसी समय एक सत्यवादी और जितेन्द्रिय राजा था,

श्लोक 11 (bala.57.11)

त्रिशंकुरिति विख्यात इक्ष्वाकुकुलवर्धनः। तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना यजेयमिति राघव ॥ १-५७-११ ॥

triśaṃkuriti vikhyāta ikṣvākukulavardhanaḥ| tasya buddhiḥ samutpannā yajeyamiti rāghava || 1-57-11 ||

त्रिशंकु नाम से विख्यात, इक्ष्वाकु कुल को बढ़ाने वाला। हे राघव! उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि "मैं यज्ञ करूँ,"

श्लोक 12 (bala.57.12)

गच्छेयं स्वशरीरेण देवानां परमां गतिम्। वसिष्ठं स समाहूय कथयामास चिन्तितम् ॥ १-५७-१२ ॥

gaccheyaṃ svaśarīreṇa devānāṃ paramāṃ gatim| vasiṣṭhaṃ sa samāhūya kathayāmāsa cintitam || 1-57-12 ||

"जिससे मैं अपने इसी शरीर के साथ देवताओं की परम गति को प्राप्त हो सकूँ।" उसने वसिष्ठ को बुलाकर अपना यह विचार बताया।

श्लोक 13 (bala.57.13)

अशक्यमिति चाप्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना। प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन स ययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १-५७-१३ ॥

aśakyamiti cāpyukto vasiṣṭhena mahātmanā| pratyākhyāto vasiṣṭhena sa yayau dakṣiṇāṃ diśam || 1-57-13 ||

महात्मा वसिष्ठ ने उससे कहा कि यह असम्भव है। वसिष्ठ द्वारा अस्वीकृत होकर वह दक्षिण दिशा की ओर चला गया।

श्लोक 14 (bala.57.14)

ततस्तत्कर्मसिद्ध्यर्थं पुत्रांस्तस्य गतो नृपः। वासिष्ठा दीर्घतपसस्तपो यत्र हि तेपिरे ॥ १-५७-१४ ॥

tatastatkarmasiddhyarthaṃ putrāṃstasya gato nṛpaḥ| vāsiṣṭhā dīrghatapasastapo yatra hi tepire || 1-57-14 ||

तब उस कार्य की सिद्धि के लिए राजा वसिष्ठ के पुत्रों के पास गया, जहाँ वसिष्ठ के पुत्र दीर्घकाल से तप कर रहे थे।

श्लोक 15 (bala.57.15)

त्रिशंकुः सुमहातेजाः शतं परमभास्वरम्। वसिष्ठपुत्रान् ददृशे तप्यमानान् यशस्विनः ॥ १-५७-१५ ॥

triśaṃkuḥ sumahātejāḥ śataṃ paramabhāsvaram| vasiṣṭhaputrān dadṛśe tapyamānān yaśasvinaḥ || 1-57-15 ||

महातेजस्वी त्रिशंकु ने तप करते हुए वसिष्ठ के सौ अत्यन्त तेजस्वी और यशस्वी पुत्रों को देखा।

श्लोक 16 (bala.57.16)

सोऽभिगम्य महात्मानः सर्वानेव गुरोः सुतान्। अभिवाद्यानुपूर्व्येण ह्रिया किंचिदवाङ्मुखः ॥ १-५७-१६ ॥

so'bhigamya mahātmānaḥ sarvāneva guroḥ sutān| abhivādyānupūrvyeṇa hriyā kiṃcidavāṅmukhaḥ || 1-57-16 ||

उन गुरुपुत्र महात्माओं के पास जाकर, आयु-क्रम के अनुसार उन सबको प्रणाम करके, कुछ लज्जावश नीचा मुख किए हुए,

श्लोक 17 (bala.57.17)

अब्रवीत् स महात्मनः सर्वानेव कृतांजलिः। शरणं वः प्रपद्येऽहं शरण्यान् शरणागतः ॥ १-५७-१७ ॥

abravīt sa mahātmanaḥ sarvāneva kṛtāṃjaliḥ| śaraṇaṃ vaḥ prapadye'haṃ śaraṇyān śaraṇāgataḥ || 1-57-17 ||

उसने हाथ जोड़कर उन सभी महात्माओं से कहा - "मैं शरणागत होकर आपकी, हे शरण देने योग्य महानुभावो, शरण ग्रहण करता हूँ।"

श्लोक 18 (bala.57.18)

प्रत्याख्यातोऽस्मि भद्रं वो वसिष्ठेन महात्मना। यष्टुकामो महायज्ञं तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ १-५७-१८ ॥

pratyākhyāto'smi bhadraṃ vo vasiṣṭhena mahātmanā| yaṣṭukāmo mahāyajñaṃ tadanujñātumarhatha || 1-57-18 ||

"महात्मा वसिष्ठ द्वारा मैं अस्वीकृत कर दिया गया हूँ - आप सबका कल्याण हो। मैं एक महान् यज्ञ करना चाहता हूँ; उसकी अनुमति देना आप ही को शोभा देता है।"

श्लोक 19 (bala.57.19)

गुरुपुत्रानहं सर्वान्नमस्कृत्य प्रसादये। शिरसा प्रणतो याचे ब्राह्मणान् तपसि स्थितान् ॥ १-५७-१९ ॥

guruputrānahaṃ sarvānnamaskṛtya prasādaye| śirasā praṇato yāce brāhmaṇān tapasi sthitān || 1-57-19 ||

"गुरु के समस्त पुत्रों को नमस्कार करके मैं आपकी कृपा चाहता हूँ। हे तपस्या में स्थित ब्राह्मणो! मैं सिर झुकाकर आपसे याचना करता हूँ।"

श्लोक 20 (bala.57.20)

ते मां भवन्तः सिद्ध्यर्थं याजयंतु समाहिताः। सशरीरो यथाहं वै देवलोकमवाप्नुयाम् ॥ १-५७-२० ॥

te māṃ bhavantaḥ siddhyarthaṃ yājayaṃtu samāhitāḥ| saśarīro yathāhaṃ vai devalokamavāpnuyām || 1-57-20 ||

"आप लोग एकाग्रचित्त होकर मेरे लिए यज्ञ का सम्पादन कराएँ, जिससे मैं इस शरीर सहित ही देवलोक को प्राप्त कर सकूँ।"

श्लोक 21 (bala.57.21)

प्रत्याख्यातो वसिष्ठेन गतिमन्यां तपोधनाः। गुरुपुत्रानृते सर्वान्नाहं पश्यामि कांचन ॥ १-५७-२१ ॥

pratyākhyāto vasiṣṭhena gatimanyāṃ tapodhanāḥ| guruputrānṛte sarvānnāhaṃ paśyāmi kāṃcana || 1-57-21 ||

"हे तपोधनो! वसिष्ठ द्वारा अस्वीकृत होकर मुझे गुरुपुत्रों को छोड़कर और कोई भी अन्य आश्रय दिखाई नहीं देता।"

श्लोक 22 (bala.57.22)

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां पुरोधाः परमा गतिः। तस्मादनंतरं सर्वे भवन्तो दैवतं मम ॥ १-५७-२२ ॥

ikṣvākūṇāṃ hi sarveṣāṃ purodhāḥ paramā gatiḥ| tasmādanaṃtaraṃ sarve bhavanto daivataṃ mama || 1-57-22 ||

"क्योंकि समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिए पुरोहित ही परम गति है; अतः उसके पश्चात् आप सब ही मेरे लिए देवता के समान हैं।"

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