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बालकाण्ड · सर्ग 60

त्रिशंकु का स्वर्गारोहण और नए नक्षत्रों की सृष्टि

सर्ग 59सर्ग-सूचीसर्ग 61

श्लोक 1 (bala.60.1)

तपोबलहतान् ज्ञात्वा वासिष्ठान् समहोदयान्। ऋषिमध्ये महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १-६०-१ ॥

tapobalahatān jñātvā vāsiṣṭhān samahodayān| ṛṣimadhye mahātejā viśvāmitro'bhyabhāṣata || 1-60-1 ||

अपने तप के बल से यह जानकर कि महोदय सहित वसिष्ठ के पुत्र नष्ट हो चुके हैं, महातेजस्वी विश्वामित्र ने ऋषियों के बीच यह कहा।

श्लोक 2 (bala.60.2)

अयमिक्ष्वाकुदायादस्त्रिशंकुरिति विश्रुतः। धर्मिष्ठश्च वदान्यश्च मां चैव शरणं गतः ॥ १-६०-२ ॥

ayamikṣvākudāyādastriśaṃkuriti viśrutaḥ| dharmiṣṭhaśca vadānyaśca māṃ caiva śaraṇaṃ gataḥ || 1-60-2 ||

"इक्ष्वाकुवंश का यह वंशज त्रिशंकु नाम से विख्यात है, यह धर्मिष्ठ और उदार है, और मेरी ही शरण में आया है।"

श्लोक 3 (bala.60.3)

स्वेनानेन शरीरेण देवलोकजिगीषया। यथायं स्वशरीरेण देवलोकं गमिष्यति ॥ १-६०-३ ॥

svenānena śarīreṇa devalokajigīṣayā| yathāyaṃ svaśarīreṇa devalokaṃ gamiṣyati || 1-60-3 ||

"यह अपने इसी शरीर से देवलोक को जीतने की इच्छा रखता है - जिससे यह अपने ही शरीर के साथ देवलोक को जा सके,"

श्लोक 4 (bala.60.4)

तथा प्रवर्त्यतां यज्ञो भवद्भिश्च मया सह। विश्वामित्रवचः श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः ॥ १-६०-४ ॥

tathā pravartyatāṃ yajño bhavadbhiśca mayā saha| viśvāmitravacaḥ śrutvā sarva eva maharṣayaḥ || 1-60-4 ||

"इसलिए आप सब मेरे साथ मिलकर यज्ञ का आयोजन करें।" विश्वामित्र के इस वचन को सुनकर सभी महर्षिगण,

श्लोक 5 (bala.60.5)

ऊचुः समेताः सहसा धर्मज्ञा धर्मसंहितम्। अयं कुशिकदायादो मुनिः परमकोपनः ॥ १-६०-५ ॥

ūcuḥ sametāḥ sahasā dharmajñā dharmasaṃhitam| ayaṃ kuśikadāyādo muniḥ paramakopanaḥ || 1-60-5 ||

धर्म को जानने वाले वे सब एकत्र होकर शीघ्र ही धर्मानुकूल वचन कहने लगे - "यह कुशिकवंशी मुनि अत्यन्त क्रोधी है;"

श्लोक 6 (bala.60.6)

यदाह वचनं सम्यगेतत् कार्यं न संशयः। अग्निकल्पो हि भगवान् शापं दास्यति रोषितः ॥ १-६०-६ ॥

yadāha vacanaṃ samyagetat kāryaṃ na saṃśayaḥ| agnikalpo hi bhagavān śāpaṃ dāsyati roṣitaḥ || 1-60-6 ||

"यह जो कुछ भी कहे, वह अवश्य पूरा किया जाना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं; क्योंकि यह भगवान् अग्नि के समान है, क्रोधित होने पर शाप दे देगा।"

श्लोक 7 (bala.60.7)

तस्मात् प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवम्। गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा ॥ १-६०-७ ॥

tasmāt pravartyatāṃ yajñaḥ saśarīro yathā divam| gacchedikṣvākudāyādo viśvāmitrasya tejasā || 1-60-7 ||

"अतः यज्ञ का आयोजन किया जाए, जिससे विश्वामित्र के तेज से इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकु अपने शरीर सहित स्वर्ग को जा सके।"

श्लोक 8 (bala.60.8)

ततः प्रवर्त्यतां यज्ञः सर्वे समधितिष्ठत। एवमुक्त्वा महर्षयः संजह्रुस्ताः क्रियास्तदा ॥ १-६०-८ ॥

tataḥ pravartyatāṃ yajñaḥ sarve samadhitiṣṭhata| evamuktvā maharṣayaḥ saṃjahrustāḥ kriyāstadā || 1-60-8 ||

"अतः यज्ञ आरम्भ किया जाए; आप सब मिलकर इसका अनुष्ठान करें।" ऐसा कहकर महर्षिगण ने तब उन कार्यों को सम्पन्न करना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 9 (bala.60.9)

याजकश्च महातेजा विश्वामित्रोऽभवत् क्रतौ। ऋत्विजश्चानुपूर्व्येण मंत्रवन्मंत्रकोविदाः ॥ १-६०-९ ॥

yājakaśca mahātejā viśvāmitro'bhavat kratau| ṛtvijaścānupūrvyeṇa maṃtravanmaṃtrakovidāḥ || 1-60-9 ||

और महातेजस्वी विश्वामित्र स्वयं उस यज्ञ के याजक बने, तथा मंत्रों में निपुण ऋत्विजों ने क्रमशः,

श्लोक 10 (bala.60.10)

चक्रुः सर्वाणि कर्माणि यथाकल्पं यथाविधि। ततः कालेन महता विश्वामित्रो महातपाः ॥ १-६०-१० ॥

cakruḥ sarvāṇi karmāṇi yathākalpaṃ yathāvidhi| tataḥ kālena mahatā viśvāmitro mahātapāḥ || 1-60-10 ||

मंत्रोच्चारण सहित विधिपूर्वक और कल्प के अनुसार सभी कर्मों को सम्पन्न किया। तब बहुत समय बीतने के बाद महातपस्वी विश्वामित्र ने,

श्लोक 11 (bala.60.11)

चकारावाहनं तत्र भागार्थं सर्वदेवताः। नाभ्यागमंस्तदा भागार्थं सर्वदेवताः ॥ १-६०-११ ॥

cakārāvāhanaṃ tatra bhāgārthaṃ sarvadevatāḥ| nābhyāgamaṃstadā bhāgārthaṃ sarvadevatāḥ || 1-60-11 ||

वहाँ अपना-अपना भाग ग्रहण करने के लिए सभी देवताओं का आवाहन किया। किन्तु उस समय सभी देवता अपना भाग लेने के लिए नहीं आए।

श्लोक 12 (bala.60.12)

ततः कोपसमाविष्टो विश्वमित्रो महामुनिः। स्रुवमुद्यम्य सक्रोधस्त्रिशंकुमिदमब्रवीत् ॥ १-६०-१२ ॥

tataḥ kopasamāviṣṭo viśvamitro mahāmuniḥ| sruvamudyamya sakrodhastriśaṃkumidamabravīt || 1-60-12 ||

तब क्रोध से भरे हुए महामुनि विश्वामित्र ने स्रुवा उठाकर क्रोधपूर्वक त्रिशंकु से यह कहा।

श्लोक 13 (bala.60.13)

पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य नरेश्वर। एष त्वां स्वशरीरेण नयामि स्वर्गमोजसा ॥ १-६०-१३ ॥

paśya me tapaso vīryaṃ svārjitasya nareśvara| eṣa tvāṃ svaśarīreṇa nayāmi svargamojasā || 1-60-13 ||

"हे नरेश्वर! मेरी स्वयं अर्जित तपस्या के इस पराक्रम को देखो। मैं स्वयं अपने ओज से तुम्हें तुम्हारे इसी शरीर सहित स्वर्ग ले जाता हूँ।"

श्लोक 14 (bala.60.14)

दुष्प्रापं स्वशरीरेण दिवं गच्छ नराधिप। स्वार्जितं किंचिदप्यस्ति मया हि तपसः फलम् ॥ १-६०-१४ ॥

duṣprāpaṃ svaśarīreṇa divaṃ gaccha narādhipa| svārjitaṃ kiṃcidapyasti mayā hi tapasaḥ phalam || 1-60-14 ||

"हे नराधिप! जो स्वयं शरीर से पाना अत्यन्त दुर्लभ है, उस स्वर्ग को जाओ। मेरे तप का जो थोड़ा भी फल स्वयं अर्जित है, वह अवश्य है।"

श्लोक 15 (bala.60.15)

राजन् त्वं तेजसा तस्य सशरीरो दिवं व्रज। उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् सशरीरो नरेश्वरः ॥ १-६०-१५ ॥

rājan tvaṃ tejasā tasya saśarīro divaṃ vraja| uktavākye munau tasmin saśarīro nareśvaraḥ || 1-60-15 ||

"हे राजन्! उसी तेज के प्रभाव से तुम शरीर सहित स्वर्ग को जाओ।" उस मुनि के ऐसा कहने पर वह नरेश्वर अपने शरीर सहित,

श्लोक 16 (bala.60.16)

दिवं जगाम काकुत्स्थ मुनीनां पश्यतां तदा। स्वर्गलोकं गतं दृष्ट्वा त्रिशंकुं पाकशासनः ॥ १-६०-१६ ॥

divaṃ jagāma kākutstha munīnāṃ paśyatāṃ tadā| svargalokaṃ gataṃ dṛṣṭvā triśaṃkuṃ pākaśāsanaḥ || 1-60-16 ||

हे काकुत्स्थ! मुनियों के देखते-देखते स्वर्ग को चला गया। स्वर्गलोक को प्राप्त हुए त्रिशंकु को देखकर पाकशासन इन्द्र ने,

श्लोक 17 (bala.60.17)

सह सर्वैः सुरगणैरिदं वचनमब्रवीत्। त्रिशंको गच्छ भूयस्त्वं नासि स्वर्गकृतालयः ॥ १-६०-१७ ॥

saha sarvaiḥ suragaṇairidaṃ vacanamabravīt| triśaṃko gaccha bhūyastvaṃ nāsi svargakṛtālayaḥ || 1-60-17 ||

समस्त देवगणों के साथ यह वचन कहा - "हे त्रिशंकु! लौट जाओ; तुम स्वर्ग में निवास करने के अधिकारी नहीं हो।"

श्लोक 18 (bala.60.18)

गुरुशापहतो मूढ पतभूमिमवाग् शिराः। एवमुक्तो महेन्द्रेण त्रिशंकुरपतत् पुनः ॥ १-६०-१८ ॥

guruśāpahato mūḍha patabhūmimavāg śirāḥ| evamukto mahendreṇa triśaṃkurapatat punaḥ || 1-60-18 ||

"हे मूढ! गुरु के शाप से आहत होकर, सिर के बल नीचे पृथ्वी पर गिरो।" महेन्द्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर त्रिशंकु पुनः गिरने लगा,

श्लोक 19 (bala.60.19)

विक्रोशमानस्त्राहीति विश्वामित्रं तपोधनम्। तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य क्रोशमानस्य कौशिकः ॥ १-६०-१९ ॥

vikrośamānastrāhīti viśvāmitraṃ tapodhanam| tacchrutvā vacanaṃ tasya krośamānasya kauśikaḥ || 1-60-19 ||

"बचाओ, बचाओ!" ऐसा पुकारते हुए तपोधन विश्वामित्र को। उसकी उस पुकार को सुनकर कौशिक विश्वामित्र ने,

श्लोक 20 (bala.60.20)

रोषमाहारयत्तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्। ऋषिमध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः ॥ १-६०-२० ॥

roṣamāhārayattīvraṃ tiṣṭha tiṣṭheti cābravīt| ṛṣimadhye sa tejasvī prajāpatirivāparaḥ || 1-60-20 ||

अत्यन्त तीव्र क्रोध धारण करके कहा - "ठहरो, ठहरो!" वे तेजस्वी विश्वामित्र ऋषियों के बीच मानो दूसरे प्रजापति के समान,

श्लोक 21 (bala.60.21)

सृजन् दक्षिणमार्गस्थान् सप्तर्षीनपरान् पुनः। नक्षत्रवंशमपरमसृजत् क्रोधमूर्च्छितः ॥ १-६०-२१ ॥

sṛjan dakṣiṇamārgasthān saptarṣīnaparān punaḥ| nakṣatravaṃśamaparamasṛjat krodhamūrcchitaḥ || 1-60-21 ||

दक्षिण मार्ग में स्थित एक और नए सप्तर्षि-मण्डल की रचना करते हुए, क्रोध से उन्मत्त होकर उन्होंने एक और नए नक्षत्र-समूह की भी रचना कर दी,

श्लोक 22 (bala.60.22)

दक्षिणां दिशमास्थाय मुनिमध्ये महायशाः। सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन कलुषीकृतः ॥ १-६०-२२ ॥

dakṣiṇāṃ diśamāsthāya munimadhye mahāyaśāḥ| sṛṣṭvā nakṣatravaṃśaṃ ca krodhena kaluṣīkṛtaḥ || 1-60-22 ||

दक्षिण दिशा का आश्रय लेकर, ऋषियों के बीच उस महायशस्वी मुनि ने नक्षत्र-समूह की रचना करके, क्रोध से मलिन होकर,

श्लोक 23 (bala.60.23)

अन्यमिन्द्रं करिष्यामि लोको वा स्यादनिंद्रकः। दैवतान्यपि स क्रोधात् स्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १-६०-२३ ॥

anyamindraṃ kariṣyāmi loko vā syādaniṃdrakaḥ| daivatānyapi sa krodhāt sraṣṭuṃ samupacakrame || 1-60-23 ||

यह निश्चय किया - "मैं एक अन्य इन्द्र बनाऊँगा, अथवा यह लोक इन्द्रविहीन ही रहे।" - और क्रोधवश वे देवताओं की भी नई सृष्टि करने को उद्यत हो गए।

श्लोक 24 (bala.60.24)

ततः परमसंभ्रान्ताः सर्षिसंघाः सुरासुराः। विश्वामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः ॥ १-६०-२४ ॥

tataḥ paramasaṃbhrāntāḥ sarṣisaṃghāḥ surāsurāḥ| viśvāmitraṃ mahātmānamūcuḥ sānunayaṃ vacaḥ || 1-60-24 ||

तब अत्यन्त घबराए हुए सुर, असुर तथा ऋषिगण, महात्मा विश्वामित्र से सान्त्वनापूर्ण वचन कहने लगे -

श्लोक 25 (bala.60.25)

अयं राजा महाभाग गुरुशापपरिक्षतः। सशरीरो दिवं यातुं नार्हत्येव तपोधन ॥ १-६०-२५ ॥

ayaṃ rājā mahābhāga guruśāpaparikṣataḥ| saśarīro divaṃ yātuṃ nārhatyeva tapodhana || 1-60-25 ||

"हे महाभाग! यह राजा गुरु के शाप से क्षतिग्रस्त है; हे तपोधन! यह शरीर सहित स्वर्ग जाने के योग्य कदापि नहीं है।"

श्लोक 26 (bala.60.26)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपुंगवः। अब्रवीत् सुमहद्वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः ॥ १-६०-२६ ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā devānāṃ munipuṃgavaḥ| abravīt sumahadvākyaṃ kauśikaḥ sarvadevatāḥ || 1-60-26 ||

उन देवताओं के इस वचन को सुनकर मुनिश्रेष्ठ कौशिक ने समस्त देवताओं से यह अत्यन्त गम्भीर वचन कहा।

श्लोक 27 (bala.60.27)

सशरीरस्य भद्रं वस्त्रिशंकोरस्य भूपतेः। आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुमुत्सहे ॥ १-६०-२७ ॥

saśarīrasya bhadraṃ vastriśaṃkorasya bhūpateḥ| ārohaṇaṃ pratijñātaṃ nānṛtaṃ kartumutsahe || 1-60-27 ||

"आप सबका कल्याण हो - मैंने इस राजा त्रिशंकु का शरीर सहित आरोहण होने की प्रतिज्ञा की है; मैं अपनी उस प्रतिज्ञा को असत्य नहीं करना चाहता।"

श्लोक 28 (bala.60.28)

स्वर्गोऽस्तु सशरीरस्य त्रिशंकोरस्य शाश्वतः। नक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानि ध्रुवाण्यथ ॥ १-६०-२८ ॥

svargo'stu saśarīrasya triśaṃkorasya śāśvataḥ| nakṣatrāṇi ca sarvāṇi māmakāni dhruvāṇyatha || 1-60-28 ||

"इस शरीरधारी त्रिशंकु के लिए शाश्वत स्वर्ग हो; और मेरे द्वारा बनाए गए ये सभी नक्षत्र भी स्थिर रहें,"

श्लोक 29 (bala.60.29)

यावल्लोका धरिष्यन्ति तिष्ठन्त्येतानि सर्वशः। यत्कृतानि सुराः सर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ १-६०-२९ ॥

yāvallokā dhariṣyanti tiṣṭhantyetāni sarvaśaḥ| yatkṛtāni surāḥ sarve tadanujñātumarhatha || 1-60-29 ||

"जब तक ये लोक टिके रहेंगे, तब तक ये सब भी सर्वत्र स्थिर बने रहें। हे देवताओ! मैंने जो रचा है, उसे स्वीकार करना आप सबको शोभा देता है।"

श्लोक 30 (bala.60.30)

एवमुक्ताः सुराः सर्वे प्रत्यूचुर्मुनिपुंगवम्। एवं भवतु भद्रं ते तिष्ठन्त्वेतानि सर्वशः ॥ १-६०-३० ॥

evamuktāḥ surāḥ sarve pratyūcurmunipuṃgavam| evaṃ bhavatu bhadraṃ te tiṣṭhantvetāni sarvaśaḥ || 1-60-30 ||

ऐसा कहे जाने पर सभी देवताओं ने मुनिश्रेष्ठ को उत्तर दिया - "ऐसा ही हो; तुम्हारा कल्याण हो; ये सब सर्वत्र स्थिर रहें।"

श्लोक 31 (bala.60.31)

गगने तान्यनेकानि वैश्वानरपथाद्बहिः। नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ तेषु ज्योतिषु जाज्वलन् ॥ १-६०-३१ ॥

gagane tānyanekāni vaiśvānarapathādbahiḥ| nakṣatrāṇi muniśreṣṭha teṣu jyotiṣu jājvalan || 1-60-31 ||

"हे मुनिश्रेष्ठ! वे अनेक नक्षत्र सूर्य के मार्ग से बाहर आकाश में उन ज्योतियों के बीच जगमगाते रहेंगे;"

श्लोक 32 (bala.60.32)

अवाग् शिरास्त्रिशंकुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः। अनुयास्यन्ति चैतानि ज्योतींषि नृपसत्तमम् ॥ १-६०-३२ ॥

avāg śirāstriśaṃkuśca tiṣṭhatvamarasaṃnibhaḥ| anuyāsyanti caitāni jyotīṃṣi nṛpasattamam || 1-60-32 ||

"और त्रिशंकु सिर के बल नीचे की ओर, देवता के समान वहीं स्थित रहेगा; और ये ज्योतियाँ उस नृपश्रेष्ठ के पीछे-पीछे चलती रहेंगी,"

श्लोक 33 (bala.60.33)

कृतार्थं कीर्तिमन्तं च स्वर्गलोकगतं यथा। विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥ १-६०-३३ ॥

kṛtārthaṃ kīrtimantaṃ ca svargalokagataṃ yathā| viśvāmitrastu dharmātmā sarvadevairabhiṣṭutaḥ || 1-60-33 ||

"मानो वह अपने उद्देश्य को प्राप्त कर, यशस्वी होकर स्वर्गलोक को ही प्राप्त हो गया हो।" तब धर्मात्मा विश्वामित्र सभी देवताओं द्वारा स्तुति किए जाने पर,

श्लोक 34 (bala.60.34)

ऋषिमध्ये महातेजा बाढमित्याह देवताः। ततो देवा महात्मानो ऋषयश्च तपोधनाः। जग्मुर्यथागतं सर्वे यज्ञस्यान्ते नरोत्तम ॥ १-६०-३४ ॥

ṛṣimadhye mahātejā bāḍhamityāha devatāḥ| tato devā mahātmāno ṛṣayaśca tapodhanāḥ| jagmuryathāgataṃ sarve yajñasyānte narottama || 1-60-34 ||

उस महातेजस्वी ने ऋषियों के बीच देवताओं से कहा - "स्वीकार है।" हे नरोत्तम! तत्पश्चात् यज्ञ की समाप्ति पर महात्मा देवगण और तपोधन ऋषिगण सभी जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार लौट गए।

सर्ग 59सर्ग-सूचीसर्ग 61