बालकाण्ड · सर्ग 61
शुनःशेप का विक्रय
श्लोक 1 (bala.61.1)
विश्वामित्रो महातेजाः प्रस्थितान् वीक्ष्य तानृषीन्। अब्रवीन्नरशार्दूल सर्वांस्तान् वनवासिनः ॥ १-६१-१ ॥
viśvāmitro mahātejāḥ prasthitān vīkṣya tānṛṣīn| abravīnnaraśārdūla sarvāṃstān vanavāsinaḥ || 1-61-1 ||
हे नरश्रेष्ठ! त्रिशंकु का प्रसंग समाप्त हो जाने पर जब वे सभी ऋषि अपने-अपने आश्रमों को लौटने लगे, तब महातेजस्वी विश्वामित्र ने उन वनवासी ऋषियों से, जो अभी उनके साथ थे, यह कहा।
श्लोक 2 (bala.61.2)
महान् विघ्नः प्रवृत्तोऽयं दक्षिणामास्थितो दिशम्। दिशमन्यां प्रपत्स्यामस्तत्र तप्स्यामहे तपः ॥ १-६१-२ ॥
mahān vighnaḥ pravṛtto'yaṃ dakṣiṇāmāsthito diśam| diśamanyāṃ prapatsyāmastatra tapsyāmahe tapaḥ || 1-61-2 ||
'इस दक्षिण दिशा में रहते हुए मेरी तपस्या में यह बड़ा विघ्न उत्पन्न हो गया है। अतः अब हम किसी अन्य दिशा में चलेंगे और वहीं तपस्या करेंगे।'
श्लोक 3 (bala.61.3)
पश्चिमायां विशालायां पुष्करेषु महात्मनः। सुखं तपश्चरिष्यामः परं तद्धि तपोवनम् ॥ १-६१-३ ॥
paścimāyāṃ viśālāyāṃ puṣkareṣu mahātmanaḥ| sukhaṃ tapaścariṣyāmaḥ paraṃ taddhi tapovanam || 1-61-3 ||
'हे महात्माओ! हम पश्चिम दिशा के विशाल पुष्कर तीर्थ में सुखपूर्वक तपस्या करेंगे; वही तो सबसे उत्तम तपोवन है।'
श्लोक 4 (bala.61.4)
एवमुक्त्वा महातेजाः पुष्करेषु महामुनिः। तप उग्रं दुराधर्षं तेपे मूलफलाशनः ॥ १-६१-४ ॥
evamuktvā mahātejāḥ puṣkareṣu mahāmuniḥ| tapa ugraṃ durādharṣaṃ tepe mūlaphalāśanaḥ || 1-61-4 ||
ऐसा कहकर वे महातेजस्वी महामुनि पुष्कर तीर्थ में पहुँचे और केवल कन्द-मूल तथा फल खाकर वहाँ उग्र एवं दुर्धर्ष तपस्या करने लगे।
श्लोक 5 (bala.61.5)
एतस्मिन्नेव काले तु अयोध्याधिपतिर्महान्। अंबरीष इति ख्यातो यष्टुं समुपचक्रमे ॥ १-६१-५ ॥
etasminneva kāle tu ayodhyādhipatirmahān| aṃbarīṣa iti khyāto yaṣṭuṃ samupacakrame || 1-61-5 ||
इसी समय अयोध्या के महान अधिपति, जो अंबरीष नाम से विख्यात थे, यज्ञ करने के लिए प्रवृत्त हुए।
श्लोक 6 (bala.61.6)
तस्य वै यजमानस्य पशुमिन्द्रो जहार ह। प्रणष्टे तु पशौ विप्रो राजानमिदमब्रवीत् ॥ १-६१-६ ॥
tasya vai yajamānasya paśumindro jahāra ha| praṇaṣṭe tu paśau vipro rājānamidamabravīt || 1-61-6 ||
उस यजमान राजा के यज्ञ-पशु का इंद्र ने अपहरण कर लिया। पशु के खो जाने पर पुरोहित ब्राह्मण ने राजा से यह कहा।
श्लोक 7 (bala.61.7)
पशुरभ्याहृतो राजन् प्रणष्टस्तव दुर्नयात्। अरक्षितारं राजानं घ्नन्ति दोषा नरेश्वर ॥ १-६१-७ ॥
paśurabhyāhṛto rājan praṇaṣṭastava durnayāt| arakṣitāraṃ rājānaṃ ghnanti doṣā nareśvara || 1-61-7 ||
'हे राजन्! जो पशु यहाँ लाया गया था, वह आपकी असावधानी से खो गया है। हे नरेश्वर! जो राजा यज्ञ की रक्षा नहीं करता, उसे दोष ही नष्ट कर डालते हैं।'
श्लोक 8 (bala.61.8)
प्रायश्चित्तं महद्ध्येतन्नरं वा पुरुषर्षभ। आनयस्व पशुं शीघ्रं यावत् कर्म प्रवर्तते ॥ १-६१-८ ॥
prāyaścittaṃ mahaddhyetannaraṃ vā puruṣarṣabha| ānayasva paśuṃ śīghraṃ yāvat karma pravartate || 1-61-8 ||
'हे पुरुषश्रेष्ठ! इसका प्रायश्चित्त बहुत बड़ा है। आप शीघ्र ही वही पशु अथवा उसके स्थान पर कोई मनुष्य ले आइए, जिससे यज्ञ-कर्म आगे बढ़ सके।'
श्लोक 9 (bala.61.9)
उपाध्यायवचः श्रुत्वा स राजा पुरुषर्षभ। अन्वियेष महाबुद्धिः पशुं गोभिः सहस्रशः ॥ १-६१-९ ॥
upādhyāyavacaḥ śrutvā sa rājā puruṣarṣabha| anviyeṣa mahābuddhiḥ paśuṃ gobhiḥ sahasraśaḥ || 1-61-9 ||
हे पुरुषश्रेष्ठ! अपने गुरु का यह वचन सुनकर उस अत्यंत बुद्धिमान राजा ने हजारों गौओं के बदले में एक मनुष्य-पशु की खोज आरम्भ की।
श्लोक 10 (bala.61.10)
देशान् जनपदांस्तांस्तान्नगराणि वनानि च। आश्रमाणि च पुण्यानि मार्गमाणो महीपतिः ॥ १-६१-१० ॥
deśān janapadāṃstāṃstānnagarāṇi vanāni ca| āśramāṇi ca puṇyāni mārgamāṇo mahīpatiḥ || 1-61-10 ||
वह राजा उन-उन देशों, जनपदों, नगरों और वनों में, तथा पवित्र आश्रमों में भी उस मनुष्य-पशु को खोजते हुए घूमने लगा।
श्लोक 11 (bala.61.11)
स पुत्रसहितं तात सभार्यं रघुनंदन। भृगुतुंगे समासीनमृचीकं संददर्श ह ॥ १-६१-११ ॥
sa putrasahitaṃ tāta sabhāryaṃ raghunaṃdana| bhṛgutuṃge samāsīnamṛcīkaṃ saṃdadarśa ha || 1-61-11 ||
हे तात! हे रघुनन्दन! घूमते-घूमते उसने भृगुतुंग पर्वत पर अपनी पत्नी और पुत्रों सहित बैठे हुए महर्षि ऋचीक को देखा।
श्लोक 12 (bala.61.12)
तमुवाच महातेजाः प्रणम्याभिप्रसाद्य च। महर्षिं तपसा दीप्तं राजर्षिरमितप्रभः ॥ १-६१-१२ ॥
tamuvāca mahātejāḥ praṇamyābhiprasādya ca| maharṣiṃ tapasā dīptaṃ rājarṣiramitaprabhaḥ || 1-61-12 ||
अपार तेजस्वी उस राजर्षि ने तपस्या से देदीप्यमान उस महर्षि को प्रणाम करके तथा उन्हें प्रसन्न करके,
श्लोक 13 (bala.61.13)
पृष्ट्वा सर्वत्र कुशलमृचीकं तमिदं वचः। गवां शतसहस्रेण विक्रीणीषे सुतं यदि ॥ १-६१-१३ ॥
pṛṣṭvā sarvatra kuśalamṛcīkaṃ tamidaṃ vacaḥ| gavāṃ śatasahasreṇa vikrīṇīṣe sutaṃ yadi || 1-61-13 ||
और सब प्रकार से उनका कुशल-क्षेम पूछकर ऋचीक से यह वचन कहा — 'यदि आप एक लाख गौओं के बदले अपना कोई पुत्र मुझे बेच दें,'
श्लोक 14 (bala.61.14)
पशोरर्थे महाभाग कृतकृत्योऽस्मि भार्गव। सर्वे परिगता देशा यज्ञियं न लभे पशुम् ॥ १-६१-१४ ॥
paśorarthe mahābhāga kṛtakṛtyo'smi bhārgava| sarve parigatā deśā yajñiyaṃ na labhe paśum || 1-61-14 ||
'—तो हे महाभाग भार्गव! यज्ञ-पशु के लिए मेरा कार्य सिद्ध हो जाएगा। मैंने सभी देशों में घूमकर देख लिया, पर मुझे यज्ञ के योग्य कोई पशु नहीं मिला।'
श्लोक 15 (bala.61.15)
दातुमर्हसि मूल्येन सुतमेकमितो मम। एवमुक्तो महातेजा ऋचीकस्त्वब्रवीद्वचः ॥ १-६१-१५ ॥
dātumarhasi mūlyena sutamekamito mama| evamukto mahātejā ṛcīkastvabravīdvacaḥ || 1-61-15 ||
'अतः आपको मूल्य लेकर अपना एक पुत्र मुझे देना चाहिए।' ऐसा कहे जाने पर महातेजस्वी ऋचीक ने यह उत्तर दिया।
श्लोक 16 (bala.61.16)
नाहं ज्येष्ठं नरश्रेष्ठ विक्रीणीयां कथंचन। ऋचीकस्य वचः श्रुत्वा तेषां माता महात्मनाम् ॥ १-६१-१६ ॥
nāhaṃ jyeṣṭhaṃ naraśreṣṭha vikrīṇīyāṃ kathaṃcana| ṛcīkasya vacaḥ śrutvā teṣāṃ mātā mahātmanām || 1-61-16 ||
'हे नरश्रेष्ठ! मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र को किसी भी प्रकार नहीं बेच सकता।' ऋचीक का यह वचन सुनकर उन महात्मा पुत्रों की माता ने
श्लोक 17 (bala.61.17)
उवाच नरशार्दूलमंबरीषमिदं वचः। अविक्रेयं सुतं ज्येष्ठं भगवानाह भार्गवः ॥ १-६१-१७ ॥
uvāca naraśārdūlamaṃbarīṣamidaṃ vacaḥ| avikreyaṃ sutaṃ jyeṣṭhaṃ bhagavānāha bhārgavaḥ || 1-61-17 ||
उस नरश्रेष्ठ अंबरीष से यह वचन कहा — 'मेरे पूज्य पति भार्गव ने कह दिया है कि ज्येष्ठ पुत्र बेचा नहीं जा सकता।'
श्लोक 18 (bala.61.18)
ममापि दयितं विद्धि कनिष्ठं शुनकं प्रभो। तस्मात् कनीयसं पुत्रं न दास्ये तव पार्थिव ॥ १-६१-१८ ॥
mamāpi dayitaṃ viddhi kaniṣṭhaṃ śunakaṃ prabho| tasmāt kanīyasaṃ putraṃ na dāsye tava pārthiva || 1-61-18 ||
'हे प्रभो! और यह भी जान लीजिए कि मेरा कनिष्ठ पुत्र शुनक भी मुझे प्रिय है। इसलिए हे राजन्! मैं अपना कनिष्ठ पुत्र भी आपको नहीं दूँगी।'
श्लोक 19 (bala.61.19)
प्रायेण हि नरश्रेष्ठ ज्येष्ठाः पितृषु वल्लभाः। मातॄणां च कनीयांसस्तस्माद्रक्षे कनीयसम् ॥ १-६१-१९ ॥
prāyeṇa hi naraśreṣṭha jyeṣṭhāḥ pitṛṣu vallabhāḥ| mātṝṇāṃ ca kanīyāṃsastasmādrakṣe kanīyasam || 1-61-19 ||
'हे नरश्रेष्ठ! प्रायः पिताओं को ज्येष्ठ पुत्र प्रिय होते हैं और माताओं को कनिष्ठ पुत्र; इसलिए मैं अपने कनिष्ठ पुत्र की रक्षा करूँगी।'
श्लोक 20 (bala.61.20)
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन् मुनिपत्न्यां तथैव च। शुनःशेपः स्वयं राम मध्यमो वाक्यमब्रवीत् ॥ १-६१-२० ॥
uktavākye munau tasmin munipatnyāṃ tathaiva ca| śunaḥśepaḥ svayaṃ rāma madhyamo vākyamabravīt || 1-61-20 ||
हे राम! जब मुनि ने और उसी प्रकार मुनि-पत्नी ने भी यह वचन कह दिया, तब उनके मध्यम पुत्र शुनःशेप ने स्वयं यह वचन कहा।
श्लोक 21 (bala.61.21)
पिता ज्येष्ठमविक्रेयं माता चाह कनीयसम्। विक्रेतं मध्यमं मन्ये राजपुत्र नयस्व माम् ॥ १-६१-२१ ॥
pitā jyeṣṭhamavikreyaṃ mātā cāha kanīyasam| vikretaṃ madhyamaṃ manye rājaputra nayasva mām || 1-61-21 ||
'पिताजी ज्येष्ठ को अविक्रेय कहते हैं और माताजी कनिष्ठ को; अतः मैं समझता हूँ कि मध्यम पुत्र ही बेचा जा सकता है। हे राजकुमार! मुझे ही ले चलिए।'
श्लोक 22 (bala.61.22)
अथ राजा महाबाहो वाक्यान्ते ब्रह्मवादिनः। हिरण्यस्य सुवर्णस्य कोटिभी रत्नराशिभिः ॥ १-६१-२२ ॥
atha rājā mahābāho vākyānte brahmavādinaḥ| hiraṇyasya suvarṇasya koṭibhī ratnarāśibhiḥ || 1-61-22 ||
हे महाबाहो! उस वेदवादी के वचन समाप्त होने पर राजा ने करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओं, चाँदी और रत्नों की राशियों के साथ,
श्लोक 23 (bala.61.23)
गवां शतसहस्रेण शुनःशेपं नरेश्वरः। गृहीत्वा परमप्रीतो जगाम रघुनंदन ॥ १-६१-२३ ॥
gavāṃ śatasahasreṇa śunaḥśepaṃ nareśvaraḥ| gṛhītvā paramaprīto jagāma raghunaṃdana || 1-61-23 ||
और एक लाख गौओं के साथ, हे रघुनन्दन! शुनःशेप को लेकर अत्यंत प्रसन्न होकर वह नरेश्वर वहाँ से चल पड़ा।
श्लोक 24 (bala.61.24)
अंबरीषस्तु राजर्षी रथमारोप्य सत्वरः। शुनःशेपं महातेजा जगामाशु महायशाः ॥ १-६१-२४ ॥
aṃbarīṣastu rājarṣī rathamāropya satvaraḥ| śunaḥśepaṃ mahātejā jagāmāśu mahāyaśāḥ || 1-61-24 ||
वे महातेजस्वी और महायशस्वी राजर्षि अंबरीष शुनःशेप को शीघ्रता से रथ पर बिठाकर तुरन्त आगे बढ़ गए।