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बालकाण्ड · सर्ग 62

शुनःशेप की रक्षा

सर्ग 61सर्ग-सूचीसर्ग 63

श्लोक 1 (bala.62.1)

शुनःशेपं नरश्रेष्ठ गृहीत्वा तु महायशाः। व्यश्रामत् पुष्करे राजा मध्याह्ने रघुनंदन ॥ १-६२-१ ॥

śunaḥśepaṃ naraśreṣṭha gṛhītvā tu mahāyaśāḥ| vyaśrāmat puṣkare rājā madhyāhne raghunaṃdana || 1-62-1 ||

हे नरश्रेष्ठ! शुनःशेप को साथ लेकर वह महायशस्वी राजा, हे रघुनन्दन! दोपहर के समय पुष्कर तीर्थ में विश्राम करने लगा।

श्लोक 2 (bala.62.2)

तस्य विश्रममाणस्य शुनःशेपो महायशाः। पुष्करं ज्येष्ठमागम्य विश्वामित्रं ददर्श ह ॥ १-६२-२ ॥

tasya viśramamāṇasya śunaḥśepo mahāyaśāḥ| puṣkaraṃ jyeṣṭhamāgamya viśvāmitraṃ dadarśa ha || 1-62-2 ||

राजा के विश्राम करते समय वे परम यशस्वी शुनःशेप उस मुख्य पुष्कर तीर्थ में आकर अपने मामा विश्वामित्र को देखने लगे,

श्लोक 3 (bala.62.3)

तप्यन्तमृषिभिः सार्धं मातुलं परमातुरः। विषण्णवदनो दीनस्तृष्णया च श्रमेण च ॥ १-६२-३ ॥

tapyantamṛṣibhiḥ sārdhaṃ mātulaṃ paramāturaḥ| viṣaṇṇavadano dīnastṛṣṇayā ca śrameṇa ca || 1-62-3 ||

जो अन्य ऋषियों के साथ वहाँ तपस्या कर रहे थे। अत्यंत व्याकुल, उदास मुख वाले तथा प्यास और थकान से दीन होकर,

श्लोक 4 (bala.62.4)

पपाताङ्के मुने राम वाक्यं चेदमुवाच ह। न मेऽस्ति माता न पिता ज्ञातयो बान्धवाः कुतः ॥ १-६२-४ ॥

papātāṅke mune rāma vākyaṃ cedamuvāca ha| na me'sti mātā na pitā jñātayo bāndhavāḥ kutaḥ || 1-62-4 ||

हे राम! वे उस मुनि की गोद में गिर पड़े और यह वचन बोले — 'मेरी न कोई माता है, न पिता; फिर भला मेरे स्वजन और बांधव कहाँ से होंगे?'

श्लोक 5 (bala.62.5)

त्रातुमर्हसि मां सौम्य धर्मेण मुनिपुंगव। त्राता त्वं हि नरश्रेष्ठ सर्वेषां त्वं हि भावनः ॥ १-६२-५ ॥

trātumarhasi māṃ saumya dharmeṇa munipuṃgava| trātā tvaṃ hi naraśreṣṭha sarveṣāṃ tvaṃ hi bhāvanaḥ || 1-62-5 ||

'हे सौम्य! हे मुनिपुंगव! आपको धर्मानुसार मेरी रक्षा करनी चाहिए। हे नरश्रेष्ठ! आप ही सबके त्राता और रक्षक हैं।'

श्लोक 6 (bala.62.6)

राजा च कृतकार्यः स्यादहं दीर्घायुरव्ययः। स्वर्गलोकमुपाश्नीयां तपस्तप्त्वा ह्यनुत्तमम् ॥ १-६२-६ ॥

rājā ca kṛtakāryaḥ syādahaṃ dīrghāyuravyayaḥ| svargalokamupāśnīyāṃ tapastaptvā hyanuttamam || 1-62-6 ||

'राजा का कार्य भी सिद्ध हो जाए और मुझे भी दीर्घ तथा अक्षय आयु प्राप्त हो; और उत्तम तप करके मैं स्वर्गलोक को प्राप्त करूँ।'

श्लोक 7 (bala.62.7)

स मे नाथो ह्यनाथस्य भव भव्येन चेतसा। पितेव पुत्रं धर्मात्मंस्त्रातुमर्हसि किल्बिषात् ॥ १-६२-७ ॥

sa me nātho hyanāthasya bhava bhavyena cetasā| piteva putraṃ dharmātmaṃstrātumarhasi kilbiṣāt || 1-62-7 ||

'मैं अनाथ हूँ, आप कल्याणकारी हृदय से मेरे नाथ बनिए। हे धर्मात्मन्! जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही आप मुझे इस विपत्ति से बचाइए।'

श्लोक 8 (bala.62.8)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विश्वामित्रो महातपाः। सान्त्वयित्वा बहुविधं पुत्रानिदमुवाच ह ॥ १-६२-८ ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā viśvāmitro mahātapāḥ| sāntvayitvā bahuvidhaṃ putrānidamuvāca ha || 1-62-8 ||

उसका यह वचन सुनकर महातपस्वी विश्वामित्र ने उसे अनेक प्रकार से सांत्वना देकर अपने पुत्रों से यह कहा।

श्लोक 9 (bala.62.9)

यत्कृते पितरः पुत्रान् जनयन्ति शुभार्थिनः। परलोकहितार्थाय तस्य कालोऽयमागतः ॥ १-६२-९ ॥

yatkṛte pitaraḥ putrān janayanti śubhārthinaḥ| paralokahitārthāya tasya kālo'yamāgataḥ || 1-62-9 ||

'जिस प्रयोजन के लिए माता-पिता कल्याण की कामना से पुत्रों को जन्म देते हैं — अर्थात् परलोक में हित के लिए — उस प्रयोजन को सिद्ध करने का समय अब आ गया है।'

श्लोक 10 (bala.62.10)

अयं मुनिसुतो बालो मत्तः शरणमिच्छति। अस्य जीवितमात्रेण प्रियं कुरुत पुत्रकाः ॥ १-६२-१० ॥

ayaṃ munisuto bālo mattaḥ śaraṇamicchati| asya jīvitamātreṇa priyaṃ kuruta putrakāḥ || 1-62-10 ||

'यह मुनि-पुत्र बालक मुझसे शरण चाहता है। हे पुत्रो! केवल एक जीवन देकर ही तुम इसका प्रिय कर सकते हो।'

श्लोक 11 (bala.62.11)

सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे धर्मपरायणाः। पशुभूता नरेन्द्रस्य तृप्तिमग्नेः प्रयच्छत ॥ १-६२-११ ॥

sarve sukṛtakarmāṇaḥ sarve dharmaparāyaṇāḥ| paśubhūtā narendrasya tṛptimagneḥ prayacchata || 1-62-11 ||

'तुम सब पुण्यकर्मा हो, सब धर्मपरायण हो; इस राजा के यज्ञ-पशु बनकर अग्निदेव को तृप्त कर दो।'

श्लोक 12 (bala.62.12)

नाथनान् च शुनःशेपो यज्ञश्चाविघ्नतो भवेत्। देवतास्तर्पिताश्च स्युर्मम चापि कृतं वचः ॥ १-६२-१२ ॥

nāthanān ca śunaḥśepo yajñaścāvighnato bhavet| devatāstarpitāśca syurmama cāpi kṛtaṃ vacaḥ || 1-62-12 ||

'इस प्रकार शुनःशेप को रक्षक मिल जाएँगे, यज्ञ भी निर्विघ्न सम्पन्न होगा, देवता तृप्त होंगे और मेरा वचन भी पूर्ण हो जाएगा।'

श्लोक 13 (bala.62.13)

मुनेस्तु वचनं श्रुत्वा मधुष्यन्दादयः सुताः। साभिमानं नरश्रेष्ठ सलीलमिदमब्रुवन् ॥ १-६२-१३ ॥

munestu vacanaṃ śrutvā madhuṣyandādayaḥ sutāḥ| sābhimānaṃ naraśreṣṭha salīlamidamabruvan || 1-62-13 ||

किन्तु मुनि का यह वचन सुनकर मधुष्यन्द आदि पुत्रों ने, हे नरश्रेष्ठ! अभिमानपूर्वक और उपहासपूर्वक यह कहा।

श्लोक 14 (bala.62.14)

कथमात्मसुतान् हित्वा त्रायसेऽन्यसुतं विभो। अकार्यमिव पश्यामः श्वमांसमिव भोजने ॥ १-६२-१४ ॥

kathamātmasutān hitvā trāyase'nyasutaṃ vibho| akāryamiva paśyāmaḥ śvamāṃsamiva bhojane || 1-62-14 ||

'हे प्रभो! आप अपने ही पुत्रों को त्यागकर दूसरे के पुत्र की रक्षा कैसे कर सकते हैं? हमें तो यह भोजन में कुत्ते का मांस खाने के समान अनुचित कर्म प्रतीत होता है।'

श्लोक 15 (bala.62.15)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा पुत्राणां मुनिपुंगवः। क्रोधसंरक्तनयनो व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १-६२-१५ ॥

teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā putrāṇāṃ munipuṃgavaḥ| krodhasaṃraktanayano vyāhartumupacakrame || 1-62-15 ||

अपने पुत्रों का यह वचन सुनकर उन मुनिश्रेष्ठ के नेत्र क्रोध से लाल हो गए और वे शाप देने के लिए उद्यत हुए।

श्लोक 16 (bala.62.16)

निःसाध्वसमिदं प्रोक्तं धर्मादपि विगर्हितम्। अतिक्रम्य तु मद्वाक्यं दारुणं रोमहर्षणम् ॥ १-६२-१६ ॥

niḥsādhvasamidaṃ proktaṃ dharmādapi vigarhitam| atikramya tu madvākyaṃ dāruṇaṃ romaharṣaṇam || 1-62-16 ||

'तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन करके यह निर्लज्ज, क्रूर और रोंगटे खड़े कर देने वाला वचन कहा है, जो धर्म की दृष्टि से भी निन्दनीय है।'

श्लोक 17 (bala.62.17)

श्वमांसभोजिनः सर्वे वासिष्ठा इव जातिषु। पूर्णं वर्षसहस्रं तु पृथिव्यामनुवत्स्यथ ॥ १-६२-१७ ॥

śvamāṃsabhojinaḥ sarve vāsiṣṭhā iva jātiṣu| pūrṇaṃ varṣasahasraṃ tu pṛthivyāmanuvatsyatha || 1-62-17 ||

'तुम सब पूरे एक हजार वर्षों तक इस पृथ्वी पर वसिष्ठ के पुत्रों के समान कुत्ते का मांस खाने वाली जातियों में जन्म लेकर भटकोगे।'

श्लोक 18 (bala.62.18)

कृत्वा शापसमायुक्तान् पुत्रान् मुनिवरस्तदा। शुनःशेपमुवाचार्थं कृत्वा रक्षां निरामयाम् ॥ १-६२-१८ ॥

kṛtvā śāpasamāyuktān putrān munivarastadā| śunaḥśepamuvācārthaṃ kṛtvā rakṣāṃ nirāmayām || 1-62-18 ||

अपने पुत्रों को इस प्रकार शाप देकर उन श्रेष्ठ मुनि ने दुखी शुनःशेप की अभेद्य रक्षा का उपाय बताते हुए उससे यह कहा।

श्लोक 19 (bala.62.19)

पवित्रपाशैर्बद्धो रक्तमाल्यानुलेपनः। वैष्णवं यूपमासाद्य वाग्भिरग्निमुदाहर ॥ १-६२-१९ ॥

pavitrapāśairbaddho raktamālyānulepanaḥ| vaiṣṇavaṃ yūpamāsādya vāgbhiragnimudāhara || 1-62-19 ||

'जब तुम्हें विष्णु के यूप पर पवित्र रस्सियों से बाँधा जाए और लाल चन्दन तथा लाल माला से सुसज्जित किया जाए, तब मेरे बताए इन मंत्रों से अग्निदेव का आवाहन करना।'

श्लोक 20 (bala.62.20)

इमे च गाथे द्वे दिव्ये गायेथा मुनिपुत्रक। अंबरीषस्य यज्ञेऽस्मिंस्ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १-६२-२० ॥

ime ca gāthe dve divye gāyethā muniputraka| aṃbarīṣasya yajñe'smiṃstataḥ siddhimavāpsyasi || 1-62-20 ||

'हे मुनिपुत्र! अंबरीष के इस यज्ञ में इन दोनों दिव्य गाथाओं का गायन करना; इससे तुम्हें अपना अभीष्ट सिद्ध हो जाएगा।'

श्लोक 21 (bala.62.21)

शुनःशेपो गृहीत्वा ते द्वे गाथे सुसमाहितः। त्वरया राजसिंहं तमंबरीषमुवाच ह ॥ १-६२-२१ ॥

śunaḥśepo gṛhītvā te dve gāthe susamāhitaḥ| tvarayā rājasiṃhaṃ tamaṃbarīṣamuvāca ha || 1-62-21 ||

शुनःशेप उन दोनों गाथाओं को पूरी एकाग्रता से ग्रहण करके शीघ्रता से उस राजसिंह अंबरीष के पास गए और उनसे यह बोले।

श्लोक 22 (bala.62.22)

राजसिंह महाबुद्धे शीघ्रं गच्छावहे वयम्। निवर्तयस्व राजेन्द्र दीक्षां च समुदाहर ॥ १-६२-२२ ॥

rājasiṃha mahābuddhe śīghraṃ gacchāvahe vayam| nivartayasva rājendra dīkṣāṃ ca samudāhara || 1-62-22 ||

'हे राजसिंह! हे महाबुद्धिमान्! अब हम शीघ्र चलें। हे राजेन्द्र! अपनी तैयारी पूर्ण कर दीक्षा-कर्म सम्पन्न कीजिए।'

श्लोक 23 (bala.62.23)

तद्वाक्यमृषिपुत्रस्य श्रुत्वा हर्षसमन्वितः। जगाम नृपतिः शीघ्रं यज्ञवाटमतन्द्रितः ॥ १-६२-२३ ॥

tadvākyamṛṣiputrasya śrutvā harṣasamanvitaḥ| jagāma nṛpatiḥ śīghraṃ yajñavāṭamatandritaḥ || 1-62-23 ||

ऋषिपुत्र का यह वचन सुनकर वह राजा हर्ष से भरकर तुरन्त, बिना किसी आलस्य के, यज्ञशाला की ओर चल पड़ा।

श्लोक 24 (bala.62.24)

सदस्यानुमते राजा पवित्रकृतलक्षणम्। पशुं रक्ताम्बरं कृत्वा यूपे तं समबन्धयत् ॥ १-६२-२४ ॥

sadasyānumate rājā pavitrakṛtalakṣaṇam| paśuṃ raktāmbaraṃ kṛtvā yūpe taṃ samabandhayat || 1-62-24 ||

सभासदों की सहमति से राजा ने उसे पवित्रता के चिह्नों से युक्त करके तथा लाल वस्त्र पहनाकर यज्ञ-पशु के रूप में यूप से बाँध दिया।

श्लोक 25 (bala.62.25)

स बद्धो वाग्भिरग्र्याभिरभितुष्टाव वै सुरौ। इन्द्रमिन्द्रानुजं चैव यथावन्मुनिपुत्रकः ॥ १-६२-२५ ॥

sa baddho vāgbhiragryābhirabhituṣṭāva vai surau| indramindrānujaṃ caiva yathāvanmuniputrakaḥ || 1-62-25 ||

इस प्रकार बंधे हुए उस मुनिपुत्र ने उत्तम वाणी से विधिपूर्वक इन्द्र और उनके अनुज उपेन्द्र, दोनों देवताओं की स्तुति की।

श्लोक 26 (bala.62.26)

ततः प्रीतः सहस्राक्षो रहस्यस्तुतितोषितः। दीर्घमायुस्तदा प्रादाच्छुनःशेपाय राघव ॥ १-६२-२६ ॥

tataḥ prītaḥ sahasrākṣo rahasyastutitoṣitaḥ| dīrghamāyustadā prādācchunaḥśepāya rāghava || 1-62-26 ||

हे राघव! तब उस गुह्य स्तुति से संतुष्ट और प्रसन्न होकर सहस्राक्ष इन्द्र ने शुनःशेप को दीर्घायु प्रदान की।

श्लोक 27 (bala.62.27)

स च राजा नरश्रेष्ठ यज्ञस्य च समाप्तवान्। फलं बहुगुणं राम सहस्राक्षप्रसादजम् ॥ १-६२-२७ ॥

sa ca rājā naraśreṣṭha yajñasya ca samāptavān| phalaṃ bahuguṇaṃ rāma sahasrākṣaprasādajam || 1-62-27 ||

हे नरश्रेष्ठ! हे राम! उस राजा ने भी सहस्राक्ष इन्द्र की कृपा से उत्पन्न यज्ञ का बहुगुणित फल प्राप्त किया।

श्लोक 28 (bala.62.28)

विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा भूयस्तेपे महातपाः। पुष्करेषु नरश्रेष्ठ दशवर्षशतानि च ॥ १-६२-२८ ॥

viśvāmitro'pi dharmātmā bhūyastepe mahātapāḥ| puṣkareṣu naraśreṣṭha daśavarṣaśatāni ca || 1-62-28 ||

हे नरश्रेष्ठ! धर्मात्मा महातपस्वी विश्वामित्र ने भी पुष्कर तीर्थ में पुनः एक हजार वर्षों तक तपस्या की।

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