बालकाण्ड · सर्ग 63
विश्वामित्र और मेनका
श्लोक 1 (bala.63.1)
पूर्णे वर्षसहस्रे तु व्रतस्नातं महामुनिम्। अभ्यागच्छन् सुराः सर्वे तपःफलचिकीर्षवः ॥ १-६३-१ ॥
pūrṇe varṣasahasre tu vratasnātaṃ mahāmunim| abhyāgacchan surāḥ sarve tapaḥphalacikīrṣavaḥ || 1-63-1 ||
जब एक हजार वर्ष पूर्ण हो गए और उस महामुनि ने व्रत-स्नान कर लिया, तब सभी देवता उन्हें तप का फल देने की इच्छा से उनके पास आए।
श्लोक 2 (bala.63.2)
अब्रवीत् सुमहातेजा ब्रह्मा सुरुचिरं वचः। ऋषिस्त्वमसि भद्रं ते स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः ॥ १-६३-२ ॥
abravīt sumahātejā brahmā suruciraṃ vacaḥ| ṛṣistvamasi bhadraṃ te svārjitaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ || 1-63-2 ||
अत्यंत तेजस्वी ब्रह्मा ने यह मधुर वचन कहा — 'अपने ही शुभ कर्मों से तुम ऋषि बन गए हो; तुम्हारा कल्याण हो।'
श्लोक 3 (bala.63.3)
तमेवमुक्त्वा देवेशस्त्रिदिवं पुनरभ्यगात्। विश्वामित्रो महातेजा भूयस्तेपे महत्तपः ॥ १-६३-३ ॥
tamevamuktvā deveśastridivaṃ punarabhyagāt| viśvāmitro mahātejā bhūyastepe mahattapaḥ || 1-63-3 ||
ऐसा कहकर देवेश्वर ब्रह्मा पुनः स्वर्गलोक को लौट गए, और महातेजस्वी विश्वामित्र ने फिर से महान तपस्या आरम्भ कर दी।
श्लोक 4 (bala.63.4)
ततः कालेन महता मेनका परमाप्सराः। पुष्करेषु नरश्रेष्ठ स्नातुं समुपचक्रमे ॥ १-६३-४ ॥
tataḥ kālena mahatā menakā paramāpsarāḥ| puṣkareṣu naraśreṣṭha snātuṃ samupacakrame || 1-63-4 ||
तत्पश्चात् बहुत समय बीतने पर, हे नरश्रेष्ठ! परम सुन्दरी अप्सरा मेनका पुष्कर तीर्थ में स्नान करने आई।
श्लोक 5 (bala.63.5)
तां ददर्श महातेजा मेनकां कुशिकात्मजः। रूपेणाप्रतिमां तत्र विद्युतं जलदे यथा ॥ १-६३-५ ॥
tāṃ dadarśa mahātejā menakāṃ kuśikātmajaḥ| rūpeṇāpratimāṃ tatra vidyutaṃ jalade yathā || 1-63-5 ||
महातेजस्वी कुशिकनन्दन विश्वामित्र ने वहाँ उस अनुपम रूपवती मेनका को देखा, जैसे बादल में बिजली चमक रही हो।
श्लोक 6 (bala.63.6)
दृष्ट्वा कन्दर्पवशगो मुनिस्तामिदमब्रवीत्। अप्सरः स्वागतं तेऽस्तु वस चेह ममाश्रमे ॥ १-६३-६ ॥
dṛṣṭvā kandarpavaśago munistāmidamabravīt| apsaraḥ svāgataṃ te'stu vasa ceha mamāśrame || 1-63-6 ||
उसे देखते ही कामदेव के वश में हुए मुनि ने उससे यह कहा — 'हे अप्सरे! तुम्हारा स्वागत है; तुम यहीं मेरे आश्रम में निवास करो।'
श्लोक 7 (bala.63.7)
अनुगृह्णीष्व भद्रं ते मदनेन सुमोहितम्। इत्युक्ता सा वरारोहा तत्र वासमथाकरोत् ॥ १-६३-७ ॥
anugṛhṇīṣva bhadraṃ te madanena sumohitam| ityuktā sā varārohā tatra vāsamathākarot || 1-63-7 ||
'तुम्हारा कल्याण हो; काम से अत्यंत मोहित मुझ पर कृपा करो।' ऐसा कहे जाने पर उस सुन्दरी ने वहीं निवास कर लिया।
श्लोक 8 (bala.63.8)
तपसो हि महाविघ्नो विश्वामित्रमुपागतम्। तस्यां वसन्त्यां वर्षाणि पंच पंच च राघव ॥ १-६३-८ ॥
tapaso hi mahāvighno viśvāmitramupāgatam| tasyāṃ vasantyāṃ varṣāṇi paṃca paṃca ca rāghava || 1-63-8 ||
इस प्रकार विश्वामित्र की तपस्या में बड़ा विघ्न आ गया; और उसके वहाँ रहते हुए, हे राघव! दस वर्ष
श्लोक 9 (bala.63.9)
विश्वामित्राश्रमे सौम्य सुखेन व्यतिचक्रमुः। अथ काले गते तस्मिन् विश्वामित्रो महामुनिः ॥ १-६३-९ ॥
viśvāmitrāśrame saumya sukhena vyaticakramuḥ| atha kāle gate tasmin viśvāmitro mahāmuniḥ || 1-63-9 ||
हे सौम्य! विश्वामित्र के आश्रम में सुखपूर्वक बीत गए। तत्पश्चात् वह समय बीत जाने पर महामुनि विश्वामित्र
श्लोक 10 (bala.63.10)
सव्रीड इव संवृत्तश्चिन्ताशोकपरायणः। बुद्धिर्मुनेः समुत्पन्ना सामर्षा रघुनंदन ॥ १-६३-१० ॥
savrīḍa iva saṃvṛttaścintāśokaparāyaṇaḥ| buddhirmuneḥ samutpannā sāmarṣā raghunaṃdana || 1-63-10 ||
मानो लज्जा से भर उठे और चिन्ता तथा शोक में डूब गए; और हे रघुनन्दन! उस मुनि के मन में यह क्षोभयुक्त विचार उत्पन्न हुआ।
श्लोक 11 (bala.63.11)
सर्वं सुराणां कर्मैतत्तपोऽपहरणं महत्। अहो रात्रापदेशेन गताः संवत्सरा दश ॥ १-६३-११ ॥
sarvaṃ surāṇāṃ karmaitattapo'paharaṇaṃ mahat| aho rātrāpadeśena gatāḥ saṃvatsarā daśa || 1-63-11 ||
'यह सब देवताओं का ही षड्यंत्र है, मेरी बड़ी तपस्या को हरने के लिए। अहो! ये दस वर्ष तो मानो एक दिन-रात के बहाने ही बीत गए!'
श्लोक 12 (bala.63.12)
काममोहाभिभूतस्य विघ्नोऽयं प्रत्युपस्थितः। विनिःश्वसन् मुनिवरः पश्चात्तापेन दुःखितः ॥ १-६३-१२ ॥
kāmamohābhibhūtasya vighno'yaṃ pratyupasthitaḥ| viniḥśvasan munivaraḥ paścāttāpena duḥkhitaḥ || 1-63-12 ||
'यह विघ्न मुझ पर उस समय आया जब मैं काम और मोह से अभिभूत था।' गहरी साँस लेते हुए, पश्चात्ताप से दुखी होकर वे श्रेष्ठ मुनि,
श्लोक 13 (bala.63.13)
भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपन्तीं प्रांजलिं स्थिताम्। मेनकां मधुरैर्वाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मजः ॥ १-६३-१३ ॥
bhītāmapsarasaṃ dṛṣṭvā vepantīṃ prāṃjaliṃ sthitām| menakāṃ madhurairvākyairvisṛjya kuśikātmajaḥ || 1-63-13 ||
अप्सरा मेनका को भयभीत, काँपती हुई तथा हाथ जोड़े खड़ी देखकर, कुशिकनन्दन ने उसे मधुर वचनों से विदा किया,
श्लोक 14 (bala.63.14)
उत्तरं पर्वतं राम विश्वामित्रो जगाम ह। स कृत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं जेतुकामो महायशाः ॥ १-६३-१४ ॥
uttaraṃ parvataṃ rāma viśvāmitro jagāma ha| sa kṛtvā naiṣṭhikīṃ buddhiṃ jetukāmo mahāyaśāḥ || 1-63-14 ||
और हे राम! विश्वामित्र उत्तर दिशा के पर्वत की ओर चले गए। दृढ़ निश्चय करके, इन्द्रियों पर विजय पाने की इच्छा से वे महायशस्वी मुनि,
श्लोक 15 (bala.63.15)
कौशिकीतीरमासाद्य तपस्तेपे दुरासदम्। तस्य वर्षसहस्राणि घोरं तप उपासतः ॥ १-६३-१५ ॥
kauśikītīramāsādya tapastepe durāsadam| tasya varṣasahasrāṇi ghoraṃ tapa upāsataḥ || 1-63-15 ||
कौशिकी नदी के तट पर पहुँचकर अत्यंत दुष्कर तपस्या करने लगे। इस प्रकार उनके एक हजार वर्ष तक घोर तप करते रहने पर,
श्लोक 16 (bala.63.16)
उत्तरे पर्वते राम देवतानामभूद्भयम्। आमंत्रयन् समागम्य सर्वे सर्षिगणाः सुराः ॥ १-६३-१६ ॥
uttare parvate rāma devatānāmabhūdbhayam| āmaṃtrayan samāgamya sarve sarṣigaṇāḥ surāḥ || 1-63-16 ||
हे राम! उस उत्तर पर्वत पर देवताओं में भय उत्पन्न हो गया। तब सभी देवता ऋषिगणों के साथ मिलकर परस्पर विचार-विमर्श करने लगे,
श्लोक 17 (bala.63.17)
महर्षिशब्दं लभतां साध्वयं कुशिकात्मजः। देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः ॥ १-६३-१७ ॥
maharṣiśabdaṃ labhatāṃ sādhvayaṃ kuśikātmajaḥ| devatānāṃ vacaḥ śrutvā sarvalokapitāmahaḥ || 1-63-17 ||
और कहने लगे — 'यह सुयोग्य कुशिकनन्दन विधिवत् महर्षि की उपाधि प्राप्त करे।' देवताओं का यह वचन सुनकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह ब्रह्मा ने
श्लोक 18 (bala.63.18)
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विश्वामित्रं तपोधनम्। महर्षे स्वागतं वत्स तपसोग्रेण तोषितः ॥ १-६३-१८ ॥
abravīnmadhuraṃ vākyaṃ viśvāmitraṃ tapodhanam| maharṣe svāgataṃ vatsa tapasogreṇa toṣitaḥ || 1-63-18 ||
तपोधन विश्वामित्र से यह मधुर वचन कहा — 'हे महर्षे! वत्स, तुम्हारा स्वागत है; मैं तुम्हारी उग्र तपस्या से संतुष्ट हूँ।'
श्लोक 19 (bala.63.19)
महत्त्वमृषिमुख्यत्वं ददामि तव कौशिक। ब्रह्मणः स वचः श्रुत्वा विश्वामित्रस्तपोधनः ॥ १-६३-१९ ॥
mahattvamṛṣimukhyatvaṃ dadāmi tava kauśika| brahmaṇaḥ sa vacaḥ śrutvā viśvāmitrastapodhanaḥ || 1-63-19 ||
'हे कौशिक! मैं तुम्हें महत्ता और ऋषियों में मुख्यता प्रदान करता हूँ।' ब्रह्मा का यह वचन सुनकर तपोधन विश्वामित्र ने
श्लोक 20 (bala.63.20)
प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा प्रत्युवाच पितामहम्। ब्रह्मर्षिशब्दमतुलं स्वार्जितैः कर्मभिः शुभैः ॥ १-६३-२० ॥
prāṃjaliḥ praṇato bhūtvā pratyuvāca pitāmaham| brahmarṣiśabdamatulaṃ svārjitaiḥ karmabhiḥ śubhaiḥ || 1-63-20 ||
हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए पितामह से यह उत्तर दिया — 'यदि भगवान् यह कहें कि मैंने अपने ही शुभ कर्मों से अनुपम ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त कर ली है,'
श्लोक 21 (bala.63.21)
यदि मे भगवानाह ततोऽहं विजितेन्द्रियः। तमुवाच ततो ब्रह्मा न तावत्त्वं जितेन्द्रियः ॥ १-६३-२१ ॥
yadi me bhagavānāha tato'haṃ vijitendriyaḥ| tamuvāca tato brahmā na tāvattvaṃ jitendriyaḥ || 1-63-21 ||
'—तो ही मैं सचमुच जितेन्द्रिय कहलाऊँगा।' तब ब्रह्मा ने उनसे कहा — 'तुमने अभी तक इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त नहीं की है।'
श्लोक 22 (bala.63.22)
यतस्व मुनिशार्दूल इत्युक्त्वा त्रिदिवं गतः। विप्रस्थितेषु देवेषु विश्वामित्रो महामुनिः ॥ १-६३-२२ ॥
yatasva muniśārdūla ityuktvā tridivaṃ gataḥ| viprasthiteṣu deveṣu viśvāmitro mahāmuniḥ || 1-63-22 ||
'हे मुनिश्रेष्ठ! और प्रयत्न करो।' ऐसा कहकर ब्रह्मा स्वर्गलोक चले गए। देवताओं के चले जाने पर महामुनि विश्वामित्र
श्लोक 23 (bala.63.23)
ऊर्ध्वबाहुर्निरालंबो वायुभक्षस्तपश्चरन्। धर्मे पंचतपा भूत्वा वर्षास्वाकाशसंश्रयः ॥ १-६३-२३ ॥
ūrdhvabāhurnirālaṃbo vāyubhakṣastapaścaran| dharme paṃcatapā bhūtvā varṣāsvākāśasaṃśrayaḥ || 1-63-23 ||
भुजाएँ ऊपर उठाए, बिना किसी सहारे के, केवल वायु पर निर्वाह करते हुए तपस्या करने लगे। ग्रीष्म में वे पंचाग्नि तप करने वाले बने, वर्षा में आकाश ही उनका आश्रय था,
श्लोक 24 (bala.63.24)
शिशिरे सलिले शायी रात्र्यहानि तपोधनः। एवं वर्षसहस्रं हि तपो घोरमुपागमत् ॥ १-६३-२४ ॥
śiśire salile śāyī rātryahāni tapodhanaḥ| evaṃ varṣasahasraṃ hi tapo ghoramupāgamat || 1-63-24 ||
और शीत ऋतु में वे तपोधन दिन-रात जल में लेटे रहते थे। इस प्रकार उन्होंने पुनः एक हजार वर्षों तक यह घोर तप किया।
श्लोक 25 (bala.63.25)
तस्मिन् संतप्यमाने तु विश्वामित्रे महामुनौ। संतापः सुमहानासीत् सुराणां वासवस्य च ॥ १-६३-२५ ॥
tasmin saṃtapyamāne tu viśvāmitre mahāmunau| saṃtāpaḥ sumahānāsīt surāṇāṃ vāsavasya ca || 1-63-25 ||
उस महामुनि विश्वामित्र के इस प्रकार तप करते रहने पर देवताओं को और स्वयं इंद्र को भी बड़ा संताप हुआ।
श्लोक 26 (bala.63.26)
रंभामप्सरसं शक्रः सह सर्वैर्मरुद्गणैः। उवाचात्महितं वाक्यमहितं कौशिकस्य च ॥ १-६३-२६ ॥
raṃbhāmapsarasaṃ śakraḥ saha sarvairmarudgaṇaiḥ| uvācātmahitaṃ vākyamahitaṃ kauśikasya ca || 1-63-26 ||
तब इंद्र ने समस्त मरुद्गणों के साथ अप्सरा रम्भा से ऐसा वचन कहा, जो उनके अपने हित का था, परन्तु कौशिक विश्वामित्र के लिए अहितकर था।