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बालकाण्ड · सर्ग 64

रम्भा को शाप

सर्ग 63सर्ग-सूचीसर्ग 65

श्लोक 1 (bala.64.1)

सुरकार्यमिदं रंभे कर्तव्यं सुमहत्त्वया। लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम् ॥ १-६४-१ ॥

surakāryamidaṃ raṃbhe kartavyaṃ sumahattvayā| lobhanaṃ kauśikasyeha kāmamohasamanvitam || 1-64-1 ||

'हे रम्भे! तुम्हें देवताओं का यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य करना है — काम और मोह से युक्त प्रलोभन द्वारा कौशिक को यहाँ लुभाना।'

श्लोक 2 (bala.64.2)

तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता। व्रीडिता प्रांजलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम् ॥ १-६४-२ ॥

tathoktā sāpsarā rāma sahasrākṣeṇa dhīmatā| vrīḍitā prāṃjalirvākyaṃ pratyuvāca sureśvaram || 1-64-2 ||

हे राम! बुद्धिमान सहस्राक्ष इंद्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह अप्सरा लज्जित होकर हाथ जोड़कर देवराज से यह बोली।

श्लोक 3 (bala.64.3)

अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः। क्रोधमुत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशयः ॥ १-६४-३ ॥

ayaṃ surapate ghoro viśvāmitro mahāmuniḥ| krodhamutsrakṣyate ghoraṃ mayi deva na saṃśayaḥ || 1-64-3 ||

'हे सुरपते! यह महामुनि विश्वामित्र अत्यंत भयंकर हैं; हे देव! इसमें कोई संदेह नहीं कि वे मुझ पर भयानक क्रोध करेंगे।'

श्लोक 4 (bala.64.4)

ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि। एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा ॥ १-६४-४ ॥

tato hi me bhayaṃ deva prasādaṃ kartumarhasi| evamuktastayā rāma sabhayaṃ bhītayā tadā || 1-64-4 ||

'इसलिए हे देव! मुझे भय है; आपको मुझ पर कृपा करनी चाहिए।' हे राम! भयभीत होकर इस प्रकार कहने वाली उस रम्भा से,

श्लोक 5 (bala.64.5)

तामुवाच सहस्राक्षो वेपमानां कृतांजलिम्। मा भैषि रंभे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम् ॥ १-६४-५ ॥

tāmuvāca sahasrākṣo vepamānāṃ kṛtāṃjalim| mā bhaiṣi raṃbhe bhadraṃ te kuruṣva mama śāsanam || 1-64-5 ||

सहस्राक्ष इंद्र ने, जो काँपती हुई और हाथ जोड़े हुए थी, यह कहा — 'हे रम्भे! डरो मत, तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरी आज्ञा का पालन करो।'

श्लोक 6 (bala.64.6)

कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे। अहं कंदर्पसहितः स्थास्यामि तव पार्श्वतः ॥ १-६४-६ ॥

kokilo hṛdayagrāhī mādhave ruciradrume| ahaṃ kaṃdarpasahitaḥ sthāsyāmi tava pārśvataḥ || 1-64-6 ||

'वसंत ऋतु के सुंदर वृक्षों के बीच हृदय हरने वाली कोयल बनकर, मैं कामदेव के साथ तुम्हारे पास ही रहूँगा।'

श्लोक 7 (bala.64.7)

त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम्। तमृषिं कौशिकं रंभे भेदयस्व तपस्विनम् ॥ १-६४-७ ॥

tvaṃ hi rūpaṃ bahuguṇaṃ kṛtvā paramabhāsvaram| tamṛṣiṃ kauśikaṃ raṃbhe bhedayasva tapasvinam || 1-64-7 ||

'हे रम्भे! तुम अनेक गुणों से युक्त एवं परम तेजस्वी रूप धारण करके उस तपस्वी ऋषि कौशिक को उनकी तपस्या से विचलित कर दो।'

श्लोक 8 (bala.64.8)

सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम्। लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता ॥ १-६४-८ ॥

sā śrutvā vacanaṃ tasya kṛtvā rūpamanuttamam| lobhayāmāsa lalitā viśvāmitraṃ śucismitā || 1-64-8 ||

उसका यह वचन सुनकर उस अप्सरा ने परम सुन्दर रूप धारण किया और वह चतुर तथा मधुर मुस्कान वाली नारी विश्वामित्र को लुभाने लगी।

श्लोक 9 (bala.64.9)

कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरतः स्वनम्। संप्रहृष्टेन मनसा स एनामन्वैक्षत ॥ १-६४-९ ॥

kokilasya tu śuśrāva valgu vyāharataḥ svanam| saṃprahṛṣṭena manasā sa enāmanvaikṣata || 1-64-9 ||

उन्होंने कोयल की मधुर बोली सुनी, और प्रसन्न मन से उन्होंने उस अप्सरा की ओर देखा।

श्लोक 10 (bala.64.10)

अथ तस्य च शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च। दर्शनेन च रंभाया मुनिः संदेहमागतः ॥ १-६४-१० ॥

atha tasya ca śabdena gītenāpratimena ca| darśanena ca raṃbhāyā muniḥ saṃdehamāgataḥ || 1-64-10 ||

फिर उस ध्वनि से, उस अनुपम गीत से और रम्भा के दर्शन से, उन मुनि को संदेह उत्पन्न हुआ।

श्लोक 11 (bala.64.11)

सहस्राक्षस्य तत् कर्म विज्ञाय मुनिपुंगवः। रंभां क्रोधसमाविष्टः शशाप कुशिकात्मजः ॥ १-६४-११ ॥

sahasrākṣasya tat karma vijñāya munipuṃgavaḥ| raṃbhāṃ krodhasamāviṣṭaḥ śaśāpa kuśikātmajaḥ || 1-64-11 ||

इसे सहस्राक्ष इंद्र की करतूत जानकर वे मुनिश्रेष्ठ कुशिकनन्दन क्रोध से भर उठे और रम्भा को शाप दे दिया।

श्लोक 12 (bala.64.12)

यन्मां लोभयसे रंभे कामक्रोधजयैषिणम्। दश वर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे ॥ १-६४-१२ ॥

yanmāṃ lobhayase raṃbhe kāmakrodhajayaiṣiṇam| daśa varṣasahasrāṇi śailī sthāsyasi durbhage || 1-64-12 ||

'हे रम्भे! तुमने काम और क्रोध पर विजय पाने का प्रयत्न करने वाले मुझे लुभाने का प्रयास किया है, इसलिए हे अभागिनी! तुम दस हजार वर्षों तक पाषाण-प्रतिमा बनी रहोगी।'

श्लोक 13 (bala.64.13)

ब्राह्मणः सुमहातेजास्तपोबलसमन्वितः। उद्धरिष्यति रंभे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम् ॥ १-६४-१३ ॥

brāhmaṇaḥ sumahātejāstapobalasamanvitaḥ| uddhariṣyati raṃbhe tvāṃ matkrodhakaluṣīkṛtām || 1-64-13 ||

'हे रम्भे! मेरे क्रोध से इस प्रकार कलुषित हुई तुम्हें, तपोबल से सम्पन्न कोई परम तेजस्वी ब्राह्मण ही एक दिन मुक्त करेगा।'

श्लोक 14 (bala.64.14)

एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः। अशक्नुवन् धारयितुं कोपं संतापमागतः ॥ १-६४-१४ ॥

evamuktvā mahātejā viśvāmitro mahāmuniḥ| aśaknuvan dhārayituṃ kopaṃ saṃtāpamāgataḥ || 1-64-14 ||

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र, जो अपने क्रोध को रोक नहीं सके थे, बड़े पश्चात्ताप में पड़ गए।

श्लोक 15 (bala.64.15)

तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत्। वचः श्रुत्वा च कन्दर्पो महर्षेः स च निर्गतः ॥ १-६४-१५ ॥

tasya śāpena mahatā rambhā śailī tadābhavat| vacaḥ śrutvā ca kandarpo maharṣeḥ sa ca nirgataḥ || 1-64-15 ||

उनके उस बड़े शाप से रम्भा तत्काल पाषाण बन गई; और उस महर्षि का यह वचन सुनकर कामदेव तथा इंद्र दोनों वहाँ से भाग गए।

श्लोक 16 (bala.64.16)

कोपेन स महातेजास्तपोऽपहरणे कृते। इन्द्रियैरजितै राम न लेभे शान्तिमात्मनः ॥ १-६४-१६ ॥

kopena sa mahātejāstapo'paharaṇe kṛte| indriyairajitai rāma na lebhe śāntimātmanaḥ || 1-64-16 ||

हे राम! अपने ही क्रोध के कारण, अपनी तपस्या का फल इस प्रकार खो जाने पर, वे महातेजस्वी मुनि अजित इंद्रियों के कारण मन की शांति प्राप्त न कर सके।

श्लोक 17 (bala.64.17)

बभूवास्य मनश्चिंता तपोऽपहरणे कृते। नैव क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन ॥ १-६४-१७ ॥

babhūvāsya manaściṃtā tapo'paharaṇe kṛte| naiva krodhaṃ gamiṣyāmi na ca vakṣye kathaṃcana || 1-64-17 ||

अपनी तपस्या नष्ट हो जाने पर उनके मन में यह चिंता उत्पन्न हुई — 'अब मैं कभी क्रोध के वशीभूत नहीं होऊँगा, और न कभी किसी बात को मुँह से निकालूँगा।'

श्लोक 18 (bala.64.18)

अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि। अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः ॥ १-६४-१८ ॥

athavā nocchvasiṣyāmi saṃvatsaraśatānyapi| ahaṃ hi śoṣayiṣyāmi ātmānaṃ vijitendriyaḥ || 1-64-18 ||

'अथवा मैं सैकड़ों वर्षों तक भी श्वास नहीं लूँगा; इंद्रियों पर पूर्ण विजय पाकर मैं अपने शरीर को सुखा डालूँगा।'

श्लोक 19 (bala.64.19)

तावद्यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम्। अनुच्छ्वसन्नभुंजास्तिष्ठेयं शाश्वतीः समाः ॥ १-६४-१९ ॥

tāvadyāvaddhi me prāptaṃ brāhmaṇyaṃ tapasārjitam| anucchvasannabhuṃjāstiṣṭheyaṃ śāśvatīḥ samāḥ || 1-64-19 ||

'जब तक मुझे तपस्या से अर्जित ब्राह्मणत्व प्राप्त न हो जाए, तब तक मैं अनन्त वर्षों तक भी श्वास और भोजन के बिना रहूँगा; क्योंकि तप में लीन रहते हुए मेरे शरीर की शक्तियाँ कभी क्षीण नहीं होंगी।'

श्लोक 20 (bala.64.20)

न हि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तयः। एवं वर्षसहस्रस्य दीक्षां स मुनिपुंगवः। चकार प्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुन्ंदन ॥ १-६४-२० ॥

na hi me tapyamānasya kṣayaṃ yāsyanti mūrtayaḥ| evaṃ varṣasahasrasya dīkṣāṃ sa munipuṃgavaḥ| cakāra pratimāṃ loke pratijñāṃ raghunṃdana || 1-64-20 ||

इस प्रकार, हे रघुनन्दन! उन श्रेष्ठ मुनि ने एक हजार वर्षों के लिए एक ऐसी दीक्षा और प्रतिज्ञा ली, जो संसार में अद्वितीय थी।

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