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बालकाण्ड · सर्ग 66

शिव-धनुष और सीता-जन्म की कथा

सर्ग 65सर्ग-सूचीसर्ग 67

श्लोक 1 (bala.66.1)

ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः । विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम् ॥ 66.1 ॥

tataḥ prabhāte vimale kṛtakarmā narādhipaḥ | viśvāmitraṃ mahātmānam ājuhāva sarāghavam ||

तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में अपने नित्यकर्म पूर्ण करके राजा जनक ने महात्मा विश्वामित्र को राघवों सहित आमंत्रित किया।

श्लोक 2 (bala.66.2)

तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा । राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह ॥ 66.2 ॥

tam arcayitvā dharmātmā śāstradṛṣṭena karmaṇā | rāghavau ca mahātmānau tadā vākyam uvāca ha ||

धर्मात्मा जनक ने शास्त्रोक्त विधि से उनका पूजन करके, उन महात्मा दोनों राघवों से भी यह वचन कहा।

श्लोक 3 (bala.66.3)

भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ । भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवताह्यहम् ॥ 66.3 ॥

bhagavan svāgataṃ te astu kiṃ karomi tava anagha | bhavān ājñāpayatu mām ājñāpyo bhavatā hi aham ||

"हे भगवन्, आपका स्वागत है। हे निष्पाप, मैं आपके लिए क्या करूँ? आप मुझे आज्ञा दीजिए, क्योंकि मैं आपके द्वारा आज्ञा दिए जाने योग्य हूँ।"

श्लोक 4 (bala.66.4)

एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना । प्रत्युवाच मुनिर्वीरं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ 66.4 ॥

evam uktaḥ sa dharmātmā janakena mahātmanā | pratyuvāca munir vīraṃ vākyaṃ vākyaviśāradaḥ ||

महात्मा जनक द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वाणी में निपुण वह धर्मात्मा मुनि विश्वामित्र उस वीर राजा को यह उत्तर देने लगे।

श्लोक 5 (bala.66.5)

पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ । द्रष्टुकामौ धनुः श्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति ॥ 66.5 ॥

putrau daśarathasya imau kṣatriyau lokaviśrutau | draṣṭukāmau dhanuḥ śreṣṭhaṃ yad etat tvayi tiṣṭhati ||

"ये दोनों दशरथ के पुत्र हैं, संसार में विख्यात क्षत्रिय हैं, और जो श्रेष्ठ धनुष आपके पास है, उसे देखने की इच्छा रखते हैं।"

श्लोक 6 (bala.66.6)

एतद्दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ । दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः ॥ 66.6 ॥

etad darśaya bhadraṃ te kṛtakāmau nṛpātmajau | darśanād asya dhanuṣo yatheṣṭaṃ pratiyāsyataḥ ||

"इसे दिखा दीजिए, आपका कल्याण हो; इस धनुष के दर्शन मात्र से ही इन राजकुमारों की इच्छा पूर्ण हो जाएगी और ये यथेच्छ लौट जाएँगे।"

श्लोक 7 (bala.66.7)

एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम् । श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति ॥ 66.7 ॥

evam uktas tu janakaḥ pratyuvāca mahāmunim | śrūyatām asya dhanuṣo yadartham iha tiṣṭhati ||

इस प्रकार कहे जाने पर जनक ने महामुनि को उत्तर दिया, "सुनिए, यह धनुष यहाँ किस कारण से रखा है।"

श्लोक 8 (bala.66.8)

देवरात इति ख्यातो निमेः षष्ठो महीपतिः । न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मना ॥ 66.8 ॥

devarāta iti khyāto nimeḥ ṣaṣṭho mahīpatiḥ | nyāso ayaṃ tasya bhagavan haste datto mahātmanā ||

"हे भगवन्, निमि से छठी पीढ़ी में देवरात नामक विख्यात राजा हुए; यह धनुष उस महात्मा (शिव) द्वारा धरोहर के रूप में उनके हाथ में सौंपा गया था।"

श्लोक 9 (bala.66.9)

दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान् । रुद्रस्तु त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत् ॥ 66.9 ॥

dakṣayajñavadhe pūrvaṃ dhanur āyamya vīryavān | rudras tu tridaśān roṣāt salīlam idam abravīt ||

पूर्वकाल में दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय, बलवान रुद्र ने इस धनुष को खींचकर क्रोधपूर्वक, मानो खेलते हुए, देवताओं से यह कहा।

श्लोक 10 (bala.66.10)

यस्माद्भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः । वरांगाणि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः ॥ 66.10 ॥

yasmād bhāgārthino bhāgaṃ na akalpayata me surāḥ | varāṅgāṇi mahārhāṇi dhanuṣā śātayāmi vaḥ ||

"हे देवताओ, चूँकि भाग का अधिकारी होते हुए भी तुमने मेरा भाग नहीं दिया, इसलिए मैं इस धनुष से तुम्हारे पूजनीय उत्तम अंगों (सिरों) को काट डालूँगा।"

श्लोक 11 (bala.66.11)

ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुंगव । प्रसादयन्ति देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद्भवः ॥ 66.11 ॥

tato vimanasaḥ sarve devā vai munipuṃgava | prasādayanti deveśaṃ teṣāṃ prīto abhavad bhavaḥ ||

हे मुनिश्रेष्ठ, तब सभी देवता व्याकुल होकर देवाधिदेव शिव को प्रसन्न करने लगे, और उनसे भव (शिव) प्रसन्न हो गए।

श्लोक 12 (bala.66.12)

प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम् । तदेतद्देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः ॥ 66.12 ॥

prītiyuktas tu sarveṣāṃ dadau teṣāṃ mahātmanām | tad etad devadevasya dhanūratnaṃ mahātmanaḥ ||

प्रसन्नतापूर्वक उन महान् देवगणों को उस महात्मा देवाधिदेव शिव ने यह धनुष-रत्न प्रदान किया।

श्लोक 13 (bala.66.13)

न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभो । अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता मम ॥ 66.13 ॥

nyāsabhūtaṃ tadā nyastam asmākaṃ pūrvaje vibho | atha me kṛṣataḥ kṣetraṃ lāṅgalād utthitā mama ||

हे विभो, वह धनुष तब धरोहर के रूप में हमारे पूर्वज को सौंपा गया। फिर, जब मैं खेत जोत रहा था, तब हल से मेरी एक कन्या प्रकट हुई।

श्लोक 14 (bala.66.14)

क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता । भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥ 66.14 ॥

kṣetraṃ śodhayatā labdhā nāmnā sīteti viśrutā | bhūtalād utthitā sā tu vyavardhata mama ātmajā ||

खेत को शुद्ध करते समय प्राप्त होने के कारण वह 'सीता' नाम से विख्यात हुई। धरती से उत्पन्न वह मेरी पुत्री इस प्रकार बड़ी होती गई।

श्लोक 15 (bala.66.15)

वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा । भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ॥ 66.15 ॥

vīryaśulkā iti me kanyā sthāpitā iyam ayonijā | bhūtalād utthitāṃ tāṃ tu vardhamānāṃ mama ātmajām ||

'इसका मूल्य पराक्रम ही होगा' — ऐसा कहकर मैंने अपनी इस अयोनिजा कन्या के विषय में निश्चय किया। धरती से उत्पन्न और बड़ी होती हुई अपनी उस पुत्री के लिए—

श्लोक 16 (bala.66.16)

वरयामासुरागम्य राजानो मुनिपुंगव । तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् ॥ 66.16 ॥

varayāmāsur āgamya rājāno munipuṃgava | teṣāṃ varayatāṃ kanyāṃ sarveṣāṃ pṛthivīkṣitām ||

हे मुनिश्रेष्ठ, तब पृथ्वी के अनेक राजा आकर मेरी उस कन्या को माँगने लगे।

श्लोक 17 (bala.66.17)

वीर्यशुल्केति भगवन्न ददामि सुतामहम् । ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुंगव ॥ 66.17 ॥

vīryaśulkā iti bhagavan na dadāmi sutām aham | tataḥ sarve nṛpatayaḥ sametya munipuṃgava ||

"इसका मूल्य पराक्रम ही है" — यह कहकर, हे भगवन्, मैंने अपनी कन्या किसी को न दी। हे मुनिश्रेष्ठ, तब वे सभी राजा एकत्र होकर—

श्लोक 18 (bala.66.18)

मिथिलामभ्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा । तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम् ॥ 66.18 ॥

mithilām abhyupāgamya vīryaṃ jijñāsavas tadā | teṣāṃ jijñāsamānānāṃ śaivaṃ dhanur upāhṛtam ||

—मिथिला में आ गए, अपने पराक्रम को परखने की इच्छा से। उन परीक्षार्थी राजाओं के सम्मुख शिव का वह धनुष प्रस्तुत किया गया।

श्लोक 19 (bala.66.19)

न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा । तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने ॥ 66.19 ॥

na śekur grahaṇe tasya dhanuṣas tolane api vā | teṣāṃ vīryavatāṃ vīryam alpaṃ jñātvā mahāmune ||

वे उस धनुष को पकड़ भी न सके, उठाना तो दूर की बात थी। हे महामुने, उन बलशाली मानी जाने वाली राजाओं का पराक्रम इस प्रकार तुच्छ जानकर—

श्लोक 20 (bala.66.20)

प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन । ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुंगव ॥ 66.20 ॥

pratyākhyātā nṛpatayas tan nibodha tapodhana | tataḥ paramakopena rājāno munipuṃgava ||

—मैंने उन राजाओं को अस्वीकार कर दिया; हे तपोधन, यह जान लीजिए। तब हे मुनिश्रेष्ठ, वे राजा अत्यंत क्रोधित होकर—

श्लोक 21 (bala.66.21)

अरुन्धन् मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः । आत्मानमवधूतं ते विज्ञाय मुनिपुंगव ॥ 66.21 ॥

arundhan mithilāṃ sarve vīryasandeham āgatāḥ | ātmānam avadhūtaṃ te vijñāya munipuṃgava ||

—अपने पराक्रम पर संदेह होने के कारण सबने मिथिला को घेर लिया। हे मुनिश्रेष्ठ, स्वयं को तिरस्कृत जानकर वे—

श्लोक 22 (bala.66.22)

रोषेण महताविष्टाः पीडयन् मिथिलां पुरीम् । ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः ॥ 66.22 ॥

roṣeṇa mahatā āviṣṭāḥ pīḍayan mithilāṃ purīm | tataḥ saṃvatsare pūrṇe kṣayaṃ yātāni sarvaśaḥ ||

—अत्यंत क्रोध से भरकर मिथिला नगरी को पीड़ित करने लगे। इस प्रकार एक वर्ष बीत जाने पर हमारे साधन सर्वथा क्षीण हो गए—

श्लोक 23 (bala.66.23)

साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः । ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम् ॥ 66.23 ॥

sādhanāni muniśreṣṭha tato ahaṃ bhṛśaduḥkhitaḥ | tato devagaṇān sarvāṃs tapasā ahaṃ prasādayam ||

—हे मुनिश्रेष्ठ, हमारे साधन क्षीण हो गए, जिससे मैं अत्यंत दुःखी हुआ। तब मैंने तपस्या द्वारा समस्त देवगणों को प्रसन्न किया—

श्लोक 24 (bala.66.24)

ददुश्च परमप्रीताश्चतुरंगबलं सुराः । ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः ॥ 66.24 ॥

daduś ca paramaprītāś caturaṅgabalaṃ surāḥ | tato bhagnā nṛpatayo hanyamānā diśo yayuḥ ||

—और अत्यंत प्रसन्न होकर देवताओं ने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की। तब वे राजा पराजित होकर, मार खाते हुए दिशाओं में भाग गए—

श्लोक 25 (bala.66.25)

अवीर्या वीर्यसंदिग्धाः सामात्याः पापकारिणः । तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परमभास्वरम् ॥ 66.25 ॥

avīryā vīryasandigdhāḥ sāmātyāḥ pāpakāriṇaḥ | tad etan muniśārdūla dhanuḥ paramabhāsvaram ||

—वे दुराचारी राजा अपने मंत्रियों सहित शक्तिहीन हो गए, उनका पराक्रम संदिग्ध सिद्ध हुआ। हे मुनिशार्दूल, यही वह परम तेजस्वी धनुष है—

श्लोक 26 (bala.66.26)

रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत । यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने । सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम् ॥ 66.26 ॥

rāmalakṣmaṇayoś ca api darśayiṣyāmi suvrata | yady asya dhanuṣo rāmaḥ kuryād āropaṇaṃ mune | sutām ayonijāṃ sītāṃ dadyāṃ dāśaratheḥ aham ||

—इसे मैं राम और लक्ष्मण को भी दिखाऊँगा, हे सुव्रत। हे मुनि, यदि राम इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा दें, तो मैं अपनी अयोनिजा पुत्री सीता को दशरथ-पुत्र राम को दे दूँगा।

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