Skip to main content

बालकाण्ड · सर्ग 67

राम द्वारा शिव-धनुष भंग

सर्ग 66सर्ग-सूचीसर्ग 68

श्लोक 1 (bala.67.1)

जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः । धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम् ॥ 67.1 ॥

janakasya vacaḥ śrutvā viśvāmitro mahāmuniḥ | dhanur darśaya rāmāya iti ha uvāca pārthivam ||

जनक के वचन सुनकर महामुनि विश्वामित्र ने राजा से कहा, "धनुष राम को दिखाइए।"

श्लोक 2 (bala.67.2)

ततः स राजा जनकः सचिवान् व्यादिदेश ह । धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम् ॥ 67.2 ॥

tataḥ sa rājā janakaḥ sacivān vyādideśa ha | dhanur ānīyatāṃ divyaṃ gandhamālyānulepitam ||

तब राजा जनक ने मंत्रियों को आज्ञा दी, "गंध और माल्य से अलंकृत वह दिव्य धनुष लाया जाए।"

श्लोक 3 (bala.67.3)

जनकेन समादिष्ठाः सचिवाः प्राविशन् पुरम् । तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः ॥ 67.3 ॥

janakena samādiṣṭāḥ sacivāḥ prāviśan puram | tad dhanuḥ purataḥ kṛtvā nirjagmur amitaujasaḥ ||

जनक द्वारा आज्ञा दिए जाने पर मंत्री राजभवन में गए, और उस धनुष को आगे रखकर वे अपार तेजस्वी लोग बाहर निकले।

श्लोक 4 (bala.67.4)

नृणां शतानि पंचाशद्व्यायतानां महात्मनाम् । मंजूषामष्टचक्रां तां समूहुस्ते कथंचन ॥ 67.4 ॥

nṛṇāṃ śatāni pañcāśad vyāyatānāṃ mahātmanām | mañjūṣām aṣṭacakrāṃ tāṃ samūhus te kathaṃcana ||

पाँच हजार बलिष्ठ और विशालकाय पुरुष उस आठ पहियों वाले संदूक को किसी प्रकार खींचकर लाए।

श्लोक 5 (bala.67.5)

तामादाय तु मंजूषामायसीं यत्र तद्धनुः । सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः ॥ 67.5 ॥

tām ādāya tu mañjūṣām āyasīṃ yatra tad dhanuḥ | suropamaṃ te janakam ūcur nṛpatimantriṇaḥ ||

उस लौह-संदूक को, जिसमें वह धनुष रखा था, लेकर राजा के मंत्रियों ने देवतुल्य जनक से यह निवेदन किया।

श्लोक 6 (bala.67.6)

इदं धनुर्वरं राजन् पूजितं सर्वराजभिः । मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदिच्छसि ॥ 67.6 ॥

idaṃ dhanur varaṃ rājan pūjitaṃ sarvarājabhiḥ | mithilādhipa rājendra darśanīyaṃ yad icchasi ||

"हे राजन्, हे मिथिलाधिप, हे राजेन्द्र, यह वही श्रेष्ठ धनुष है, समस्त राजाओं द्वारा पूजित, जिसे आप दिखाना चाहते थे।"

श्लोक 7 (bala.67.7)

तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत । विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ 67.7 ॥

teṣāṃ nṛpo vacaḥ śrutvā kṛtāñjalir abhāṣata | viśvāmitraṃ mahātmānaṃ tāv ubhau rāmalakṣmaṇau ||

उनका वचन सुनकर राजा जनक ने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र और उन दोनों राम-लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 8 (bala.67.8)

इदं धनुर्वरं ब्रह्मन् जनकैरभिपूजितम् । राजभिश्च महावीर्यैरशक्तैः पूरितं तदा ॥ 67.8 ॥

idaṃ dhanur varaṃ brahman janakair abhipūjitam | rājabhiś ca mahāvīryair aśaktaiḥ pūritaṃ tadā ||

"हे ब्रह्मन्, यह श्रेष्ठ धनुष जनकवंशियों द्वारा पूजित है, और महापराक्रमी राजा भी पहले इसके सम्मुख असमर्थ सिद्ध हो चुके हैं।"

श्लोक 9 (bala.67.9)

नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः । गंधर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ 67.9 ॥

na etat suragaṇāḥ sarve sāsurā na ca rākṣasāḥ | gandharvayakṣapravarāḥ sakinnaramahoragāḥ ||

"न तो समस्त देवगण, न असुर, न राक्षस, न श्रेष्ठ गंधर्व-यक्ष, और न किन्नर तथा महानाग—"

श्लोक 10 (bala.67.10)

क्व गतिर्मानुषाणां च धनुषोऽस्य प्रपूरणे । आरोपणे समायोगे वेपने तोलनेऽपि वा ॥ 67.10 ॥

kva gatir mānuṣāṇāṃ ca dhanuṣo asya prapūraṇe | āropaṇe samāyoge vepane tolane api vā ||

—इनमें से कोई भी इस धनुष को पूरा खींचने, इसकी प्रत्यंचा चढ़ाने, बाण जोड़ने, हिलाने अथवा तौलने में समर्थ नहीं है; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।"

श्लोक 11 (bala.67.11)

तदेतद्धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुंगव । दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः ॥ 67.11 ॥

tad etad dhanuṣāṃ śreṣṭham ānītaṃ munipuṃgava | darśaya etan mahābhāga anayo rājaputrayoḥ ||

हे मुनिश्रेष्ठ, यही वह श्रेष्ठतम धनुष लाया गया है; हे महाभाग, इसे इन दोनों राजकुमारों को दिखाइए।

श्लोक 12 (bala.67.12)

विश्वामित्रः सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम् । वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत् ॥ 67.12 ॥

viśvāmitraḥ sarāmas tu śrutvā janakabhāṣitam | vatsa rāma dhanuḥ paśya iti rāghavam abravīt ||

जनक के वचन सुनकर विश्वामित्र ने, राम के साथ रहते हुए, राघव से कहा, "वत्स राम, धनुष को देखो।"

श्लोक 13 (bala.67.13)

महर्षेर्वचनाद्रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः । मंजूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत् ॥ 67.13 ॥

maharṣer vacanād rāmo yatra tiṣṭhati tad dhanuḥ | mañjūṣāṃ tām apāvṛtya dṛṣṭvā dhanur atha abravīt ||

महर्षि के वचन से राम ने उस संदूक को, जिसमें वह धनुष रखा था, खोलकर धनुष को देखा और फिर यह कहा।

श्लोक 14 (bala.67.14)

इदं धनुर्वरं ब्रह्मन् संस्पृशामीह पाणिना । यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा ॥ 67.14 ॥

idaṃ dhanur varaṃ brahman saṃspṛśāmi iha pāṇinā | yatnavāṃś ca bhaviṣyāmi tolane pūraṇe api vā ||

"हे ब्रह्मन्, अब मैं इस श्रेष्ठ धनुष को हाथ से स्पर्श करता हूँ, और इसे तौलने तथा इस पर बाण चढ़ाने का भी प्रयत्न करूँगा।"

श्लोक 15 (bala.67.15)

बाढमित्येव तं राजा मुनिश्च समभाषत । लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः ॥ 67.15 ॥

bāḍham iti eva taṃ rājā muniś ca samabhāṣata | līlayā sa dhanur madhye jagrāha vacanān muneḥ ||

राजा और मुनि दोनों ने एक स्वर में कहा, "अवश्य"; तब मुनि के वचन पर राम ने खेल-खेल में ही उस धनुष को उसके मध्य भाग से पकड़ लिया।

श्लोक 16 (bala.67.16)

पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनंदनः । आरोपयत्स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः ॥ 67.16 ॥

paśyatāṃ nṛsahasrāṇāṃ bahūnāṃ raghunandanaḥ | āropayat sa dharmātmā salīlam iva tad dhanuḥ ||

हजारों लोगों के देखते-देखते, उस धर्मात्मा रघुनंदन ने मानो खेल-खेल में ही उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी।

श्लोक 17 (bala.67.17)

आरोपयित्वा मौर्वीं च पूरयामास वीर्यवान् । तद्बभंज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः ॥ 67.17 ॥

āropayitvā maurvīṃ ca pūrayāmāsa vīryavān | tad babhaṃja dhanur madhye naraśreṣṭho mahāyaśāḥ ||

प्रत्यंचा चढ़ाकर उस पराक्रमी राम ने उसे खींचना आरंभ किया, और उस नरश्रेष्ठ महायशस्वी ने उस धनुष को मध्य से तोड़ दिया।

श्लोक 18 (bala.67.18)

तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनिःस्वनः । भूमिकंपश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ 67.18 ॥

tasya śabdo mahān āsīn nirghātasamaniḥsvanaḥ | bhūmikampaś ca sumahān parvatasya iva dīryataḥ ||

उसकी ध्वनि वज्रपात के समान भयंकर थी, और मानो कोई पर्वत फट रहा हो, उसी प्रकार पृथ्वी में भी भारी कंपन हुआ।

श्लोक 19 (bala.67.19)

निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः । व्रजयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघवौ ॥ 67.19 ॥

nipetuś ca narāḥ sarve tena śabdena mohitāḥ | vrajayitvā munivaraṃ rājānaṃ tau ca rāghavau ||

उस ध्वनि से मोहित होकर सभी लोग गिर पड़े, केवल मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र, राजा जनक और उन दोनों राघवों को छोड़कर।

श्लोक 20 (bala.67.20)

प्रत्याश्वस्तो जने तस्मिन् राजा विगतसाध्वसः । उवाच प्रांजलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुंगवम् ॥ 67.20 ॥

pratyāśvasto jane tasmin rājā vigatasādhvasaḥ | uvāca prāñjalir vākyaṃ vākyajño munipuṃgavam ||

जब लोग पुनः सचेत हो गए, तब भय से मुक्त हुए वाक्यकुशल राजा जनक ने हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ से यह वचन कहा।

श्लोक 21 (bala.67.21)

भगवन् दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः । अत्यद्भुतमचिन्त्यं चातर्कितमिदं मया ॥ 67.21 ॥

bhagavan dṛṣṭavīryo me rāmo daśarathātmajaḥ | atyadbhutam acintyaṃ ca atarkitam idaṃ mayā ||

"हे भगवन्, मैंने दशरथ-पुत्र राम का पराक्रम प्रत्यक्ष देख लिया है; यह मेरे लिए अत्यंत अद्भुत, अचिन्त्य और अकल्पित घटना है।"

श्लोक 22 (bala.67.22)

जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता । सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम् ॥ 67.22 ॥

janakānāṃ kule kīrtim āhariṣyati me sutā | sītā bhartāram āsādya rāmaṃ daśarathātmajam ||

मेरी पुत्री सीता दशरथ-पुत्र राम को पति के रूप में पाकर जनकवंश में कीर्ति लाएगी।

श्लोक 23 (bala.67.23)

मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक । सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता ॥ 67.23 ॥

mama satyā pratijñā sā vīryaśulkā iti kauśika | sītā prāṇair bahumatā deyā rāmāya me sutā ||

हे कौशिक, मेरी वह प्रतिज्ञा सत्य हुई कि उसका मूल्य पराक्रम ही होगा; मेरी वह पुत्री सीता, जो मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है, अब राम को देने योग्य है।

श्लोक 24 (bala.67.24)

भवतोऽनुमते ब्रह्मन् शीघ्रं गच्छंतु मंत्रिणः । मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः ॥ 67.24 ॥

bhavato anumate brahman śīghraṃ gacchantu mantriṇaḥ | mama kauśika bhadraṃ te ayodhyāṃ tvaritā rathaiḥ ||

हे ब्रह्मन्, आपकी सम्मति हो तो मेरे मंत्री रथों द्वारा शीघ्र ही त्वरा से अयोध्या को जाएँ; हे कौशिक, आपका कल्याण हो।

श्लोक 25 (bala.67.25)

राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयंतु पुरं मम । प्रदानं वीर्यशुक्लायाः कथयंतु च सर्वशः ॥ 67.25 ॥

rājānaṃ praśritair vākyair ānayantu puraṃ mama | pradānaṃ vīryaśulkāyāḥ kathayantu ca sarvaśaḥ ||

वे विनम्र वचनों द्वारा राजा दशरथ को मेरे नगर में ले आएँ, और पराक्रम-मूल्य से प्राप्त इस कन्या के प्रदान की बात उन्हें सब प्रकार से बताएँ।

श्लोक 26 (bala.67.26)

मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थौ कथयंतु नृपाय वै । प्रीतियुक्तं तु राजानमानयंतु सुशीघ्रगाः ॥ 67.26 ॥

munigupatau ca kākutsthau kathayantu nṛpāya vai | prītiyuktaṃ tu rājānam ānayantu suśīghragāḥ ||

वे राजा दशरथ को यह बताएँ कि दोनों काकुत्स्थ (राम-लक्ष्मण) मुनि विश्वामित्र के संरक्षण में हैं, और वे शीघ्रगामी दूत प्रसन्नतापूर्वक राजा को यहाँ ले आएँ।

श्लोक 27 (bala.67.27)

कौशिकश्च तथेत्याह राजा चाभाष्य मंत्रिणः । अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान् । यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं च नृपं तथा ॥ 67.27 ॥

kauśikaś ca tathā iti āha rājā ca ābhāṣya mantriṇaḥ | ayodhyāṃ preṣayāmāsa dharmātmā kṛtaśāsanān | yathāvṛttaṃ samākhyātum ānetuṃ ca nṛpaṃ tathā ||

विश्वामित्र ने "तथास्तु" कहा; और धर्मात्मा राजा जनक ने मंत्रियों से परामर्श कर, जो कुछ घटित हुआ था उसे यथावत् कहने तथा राजा दशरथ को ले आने के लिए, आज्ञा प्राप्त उन मंत्रियों को अयोध्या भेजा।

सर्ग 66सर्ग-सूचीसर्ग 68