Skip to main content

बालकाण्ड · सर्ग 68

जनक के दूतों का अयोध्या में संदेश

सर्ग 67सर्ग-सूचीसर्ग 69

श्लोक 1 (bala.68.1)

जनकेन समादिष्टा दूतास्ते क्लान्तवाहनाः । त्रिरात्रमुषिताः मार्गे तेऽयोध्यां प्राविशन् पुरीम् ॥ 68.1 ॥

janakena samādiṣṭā dūtās te klāntavāhanāḥ | trirātram uṣitāḥ mārge te ayodhyāṃ prāviśan purīm ||

जनक द्वारा भेजे गए वे दूत, जिनके वाहन थक चुके थे, मार्ग में तीन रात्रियाँ बिताकर अयोध्या नगरी में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 2 (bala.68.2)

ते राजवचनाद्गत्वा राजवेश्म प्रवेशिताः । ददृशुर्देवसंकाशं वृद्धं दशरथं नृपम् ॥ 68.2 ॥

te rājavacanād gatvā rājaveśma praveśitāḥ | dadṛśur devasaṃkāśaṃ vṛddhaṃ daśarathaṃ nṛpam ||

राजा की अनुमति से जाकर राजभवन में प्रवेश पाकर उन्होंने देवतुल्य वृद्ध राजा दशरथ के दर्शन किए।

श्लोक 3 (bala.68.3)

बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे दूता विगतसाध्वसाः । राजानं प्रश्रितं वाक्यमब्रुवन्मधुराक्षरम् ॥ 68.3 ॥

baddhāñjaliputāḥ sarve dūtā vigatasādhvasāḥ | rājānaṃ praśritaṃ vākyam abruvan madhurākṣaram ||

भय से मुक्त हुए सभी दूतों ने हाथ जोड़कर राजा से विनम्र और मधुर वचन कहे।

श्लोक 4 (bala.68.4)

मैथिलो जनको राजा साग्निहोत्रपुरस्कृतः । मुहुर्मुहुर्मधुरया स्नेहसंरक्तया गिरा ॥ 68.4 ॥

maithilo janako rājā sāgnihotrapuraskṛtaḥ | muhur muhur madhurayā snehasaṃraktayā girā ||

मिथिला के राजा जनक, जो नित्य अग्निहोत्र में तत्पर रहते हैं, बार-बार मधुर और स्नेहयुक्त वाणी से—

श्लोक 5 (bala.68.5)

कुशलं चाव्ययं चैव सोपाध्यायपुरोहितम् । जनकस्त्वां महाराज पृच्छते सपुरःसरम् ॥ 68.5 ॥

kuśalaṃ ca avyayaṃ ca eva sopādhyāyapurohitam | janakas tvāṃ mahārāja pṛcchate sapuraḥsaram ||

—हे महाराज, राजा जनक आपसे, आपके गुरुओं और पुरोहित सहित, तथा आपकी समस्त प्रजा सहित, आपकी कुशलता और अक्षय समृद्धि के विषय में पूछते हैं।

श्लोक 6 (bala.68.6)

पृष्ट्वा कुशलमव्यग्रं वैदेहो मिथिलाधिपः । कौशिकानुमते वाक्यं भवन्तमिदमब्रवीत् ॥ 68.6 ॥

pṛṣṭvā kuśalam avyagraṃ vaideho mithilādhipaḥ | kauśikānumate vākyaṃ bhavantam idam abravīt ||

कुशल-क्षेम पूछने के पश्चात्, विदेहराज मिथिलाधिप ने कौशिक (विश्वामित्र) की सम्मति से आपसे यह वचन कहलवाया है।

श्लोक 7 (bala.68.7)

पूर्वं प्रतिज्ञा विदिता वीर्यशुल्का ममात्मजा । राजानश्च कृतामर्षा निर्वीर्या विमुखीकृताः ॥ 68.7 ॥

pūrvaṃ pratijñā viditā vīryaśulkā mama ātmajā | rājānaś ca kṛtāmarṣā nirvīryā vimukhīkṛtāḥ ||

"मेरी वह पूर्व प्रतिज्ञा विदित है कि मेरी पुत्री का मूल्य पराक्रम ही होगा; और यह भी विदित है कि जो राजा उसके लिए आए, वे शक्तिहीन सिद्ध होकर रुष्ट हुए और लौटा दिए गए।"

श्लोक 8 (bala.68.8)

सेयं मम सुता राजन् विश्वामित्रपुरस्कृतैः । यदृच्छयागतैर्वीरैर्निर्जिता तव पुत्रकैः ॥ 68.8 ॥

sā iyaṃ mama sutā rājan viśvāmitrapuraskṛtaiḥ | yadṛcchayā āgatair vīraiḥ nirjitā tava putrakaiḥ ||

"हे राजन्, वही मेरी यह पुत्री, संयोगवश विश्वामित्र को आगे रखकर आए हुए आपके वीर पुत्रों द्वारा जीत ली गई है।"

श्लोक 9 (bala.68.9)

तच्च रत्नं धनुर्दिव्यं मध्ये भग्नं महात्मना । रामेण हि महाबाहो महत्यां जनसंसदि ॥ 68.9 ॥

tac ca ratnaṃ dhanur divyaṃ madhye bhagnaṃ mahātmanā | rāmeṇa hi mahābāho mahatyāṃ janasaṃsadi ||

"और हे महाबाहो, वह दिव्य धनुष-रत्न भी विशाल जनसमूह के समक्ष महात्मा राम द्वारा मध्य से तोड़ दिया गया।"

श्लोक 10 (bala.68.10)

अस्मै देया मया सीता वीर्यशुल्का महात्मने । प्रतिज्ञां तर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ 68.10 ॥

asmai deyā mayā sītā vīryaśulkā mahātmane | pratijñāṃ tartum icchāmi tad anujñātum arhasi ||

"सीता, जिसका मूल्य पराक्रम है, अब मुझे उस महात्मा राम को देनी है; मैं अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करना चाहता हूँ, अतः आप इसकी अनुमति दें।"

श्लोक 11 (bala.68.11)

सोपाध्यायो महाराज पुरोहितपुरस्कृतः । शीघ्रमागच्छ भद्रं ते द्रष्टुमर्हसि राघवौ ॥ 68.11 ॥

sopādhyāyo mahārāja purohitapuraskṛtaḥ | śīghram āgaccha bhadraṃ te draṣṭum arhasi rāghavau ||

"हे महाराज, अपने गुरुओं सहित, पुरोहित को आगे रखकर आप शीघ्र आइए; आपका कल्याण हो, आपको दोनों राघवों को देखना चाहिए।"

श्लोक 12 (bala.68.12)

प्रतिज्ञां मम राजेन्द्र निर्वर्तयितुमर्हसि । पुत्रयोरुभयोरेव प्रीतिं त्वमपि लप्स्यसे ॥ 68.12 ॥

pratijñāṃ mama rājendra nirvartayitum arhasi | putrayor ubhayor eva prītiṃ tvam api lapsyase ||

"हे राजेन्द्र, मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण कराने योग्य आप ही हैं; आप भी अपने दोनों पुत्रों को देखकर आनंद प्राप्त करेंगे।"

श्लोक 13 (bala.68.13)

एवं विदेहाधिपतिर्मधुरं वाक्यमब्रवीत् । विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः शतानन्दमते स्थितः ॥ 68.13 ॥

evaṃ videhādhipatir madhuraṃ vākyam abravīt | viśvāmitrābhyanujñātaḥ śatānandamate sthitaḥ ||

इस प्रकार विश्वामित्र की अनुमति से और शतानंद के परामर्श पर स्थित विदेहाधिपति जनक ने यह मधुर वचन कहा।

श्लोक 14 (bala.68.14)

दूतवाक्यं तु तच्छ्रुत्वा राजा परमहर्षितः । वसिष्ठं वामदेवं च मंत्रिणश्चैवमब्रवीत् ॥ 68.14 ॥

dūtavākyaṃ tu tac chrutvā rājā paramaharṣitaḥ | vasiṣṭhaṃ vāmadevaṃ ca mantriṇaś ca evam abravīt ||

उन दूतों का वह वचन सुनकर अत्यंत हर्षित हुए राजा दशरथ ने वसिष्ठ, वामदेव और अन्य मंत्रियों से इस प्रकार कहा।

श्लोक 15 (bala.68.15)

गुप्तः कुशिकपुत्रेण कौसल्यानन्दवर्धनः । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विदेहेषु वसत्यसौ ॥ 68.15 ॥

guptaḥ kuśikaputreṇa kausalyānandavardhanaḥ | lakṣmaṇena saha bhrātrā videheṣu vasati asau ||

"कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाला वह राम, कुशिक-पुत्र विश्वामित्र के संरक्षण में, भाई लक्ष्मण सहित विदेह में निवास कर रहा है।"

श्लोक 16 (bala.68.16)

दृष्टवीर्यस्तु काकुत्स्थो जनकेन महात्मना । संप्रदानं सुतायास्तु राघवे कर्तुमिच्छति ॥ 68.16 ॥

dṛṣṭavīryas tu kākutstho janakena mahātmanā | saṃpradānaṃ sutāyās tu rāghave kartum icchati ||

"काकुत्स्थ राम का पराक्रम देखकर महात्मा जनक अपनी पुत्री को राघव को देना चाहते हैं।"

श्लोक 17 (bala.68.17)

यदि वो रोचते वृत्तं जनकस्य महात्मनः । पुरीं गच्छामहे शीघ्रं मा भूत्कालस्य पर्ययः ॥ 68.17 ॥

yadi vo rocate vṛttaṃ janakasya mahātmanaḥ | purīṃ gacchāmahe śīghraṃ mā bhūt kālasya paryayaḥ ||

"यदि महात्मा जनक की यह बात आप सबको रुचिकर लगे तो हम शीघ्र ही उस नगरी को चलें, समय व्यर्थ न जाए।"

श्लोक 18 (bala.68.18)

मंत्रिणो बाढमित्याहुः सह सर्वैर्महर्षिभिः । सुप्रीतश्चाब्रवीद्राजा श्वो यात्रेति च मंत्रिणः ॥ 68.18 ॥

mantriṇo bāḍham ity āhuḥ saha sarvair maharṣibhiḥ | suprītaś ca abravīd rājā śvo yātreti ca mantriṇaḥ ||

समस्त महर्षियों सहित मंत्रियों ने कहा, "अवश्य"; और अत्यंत प्रसन्न राजा ने मंत्रियों से कहा, "कल ही प्रस्थान करेंगे।"

श्लोक 19 (bala.68.19)

मंत्रिणस्तु नरेन्द्रस्य रात्रिं परमसत्कृताः । ऊषुः प्रमुदिताः सर्वे गुणैः सर्वैः समन्विताः ॥ 68.19 ॥

mantriṇas tu narendrasya rātriṃ paramasatkṛtāḥ | ūṣuḥ pramuditāḥ sarve guṇaiḥ sarvaiḥ samanvitāḥ ||

समस्त गुणों से संपन्न जनक के वे मंत्री, राजा दशरथ द्वारा भलीभाँति सत्कारित होकर, अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक वह रात्रि वहीं व्यतीत करने लगे।

सर्ग 67सर्ग-सूचीसर्ग 69