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बालकाण्ड · सर्ग 69

दशरथ का मिथिला आगमन

सर्ग 68सर्ग-सूचीसर्ग 70

श्लोक 1 (bala.69.1)

ततो रात्र्यां व्यतीतायां सोपाध्यायः सबान्धवः । राजा दशरथो हृष्टः सुमंत्रमिदमब्रवीत् ॥ 69.1 ॥

tato rātryāṃ vyatītāyāṃ sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ | rājā daśaratho hṛṣṭaḥ sumantram idam abravīt ||

तत्पश्चात् रात्रि बीत जाने पर, अपने गुरुओं और बंधुओं सहित प्रसन्न राजा दशरथ ने सुमंत्र से यह कहा।

श्लोक 2 (bala.69.2)

अद्य सर्वे धनाध्यक्षा धनमादाय पुष्कलम् । व्रजंत्वग्रे सुविहिता नानारत्नसमन्विताः ॥ 69.2 ॥

adya sarve dhanādhyakṣā dhanam ādāya puṣkalam | vrajantv agre suvihitā nānāratnasamanvitāḥ ||

"आज सभी कोषाध्यक्ष प्रचुर धन और नाना प्रकार के रत्न लेकर सुसज्जित होकर आगे प्रस्थान करें।"

श्लोक 3 (bala.69.3)

चतुरंगबलं चापि शीघ्रं निर्यातु सर्वशः । ममाज्ञा समकालं च यानं युग्ममनुत्तमम् ॥ 69.3 ॥

caturaṅgabalaṃ ca api śīghraṃ niryātu sarvaśaḥ | mama ājñā samakālaṃ ca yānaṃ yugmam anuttamam ||

"मेरी आज्ञा से चतुरंगिणी सेना भी शीघ्र चारों ओर से प्रस्थान करे, और उसी समय उत्तम, घोड़ों से युक्त वाहन भी चलें।"

श्लोक 4 (bala.69.4)

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः । मार्कण्डेयश्च दीर्घायुर्ऋषिः कात्यायनस्तथा ॥ 69.4 ॥

vasiṣṭho vāmadevaś ca jābālir atha kāśyapaḥ | mārkaṇḍeyaś ca dīrghāyur ṛṣiḥ kātyāyanas tathā ||

"वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, दीर्घायु मार्कण्डेय और ऋषि कात्यायन—"

श्लोक 5 (bala.69.5)

एते द्विजाः प्रयान्त्वग्रे स्यंदनं योजयस्व मे । यथा कालात्ययो न स्याद्दूता हि त्वरयन्ति माम् ॥ 69.5 ॥

ete dvijāḥ prayāntv agre syandanaṃ yojayasva me | yathā kālātyayo na syād dūtā hi tvarayanti mām ||

—ये सभी ब्राह्मण आगे चलें; मेरे रथ को भी जोत दो, जिससे समय का अतिक्रमण न हो, क्योंकि दूत मुझे शीघ्रता के लिए प्रेरित कर रहे हैं।"

श्लोक 6 (bala.69.6)

वचनाच्च नरेन्द्रस्य सेना च चतुरंगिणी । राजानमृषिभिः सार्धं व्रजंतं पृष्ठतोऽन्वगात् ॥ 69.6 ॥

vacanāc ca narendrasya senā ca caturaṅgiṇī | rājānam ṛṣibhiḥ sārdhaṃ vrajantaṃ pṛṣṭhato anvagāt ||

राजा के आदेश से चतुरंगिणी सेना ने भी ऋषियों सहित जा रहे राजा का पीछे-पीछे अनुसरण किया।

श्लोक 7 (bala.69.7)

गत्वा चतुरहं मार्गं विदेहानभ्युपेयिवान् । राजा तु जनकः श्रीमान् श्रुत्वा पूजामकल्पयत् ॥ 69.7 ॥

gatvā caturahaṃ mārgaṃ videhān abhyupeyivān | rājā tu janakaḥ śrīmān śrutvā pūjām akalpayat ||

चार दिनों तक मार्ग तय करके राजा दशरथ विदेह देश की सीमा पर पहुँचे, और यह सुनकर श्रीमान् राजा जनक ने स्वागत की तैयारी की।

श्लोक 8 (bala.69.8)

ततो राजानमासाद्य वृद्धं दशरथं नृपम् । जनको मुदितो राजा हर्षं च परमं ययौ ॥ 69.8 ॥

tato rājānam āsādya vṛddhaṃ daśarathaṃ nṛpam | janako mudito rājā harṣaṃ ca paramaṃ yayau ||

तत्पश्चात् वृद्ध राजा दशरथ से मिलकर हर्षित राजा जनक अत्यंत आनंद को प्राप्त हुए।

श्लोक 9 (bala.69.9)

उवाच वचनं श्रेष्ठो नरश्रेष्ठं मुदान्वितम् । स्वागतं ते नरश्रेष्ठः दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥ 69.9 ॥

uvāca vacanaṃ śreṣṭho naraśreṣṭhaṃ mudānvitam | svāgataṃ te naraśreṣṭhaḥ diṣṭyā prāpto asi rāghava ||

उस श्रेष्ठ पुरुष जनक ने आनंदपूर्वक नरश्रेष्ठ दशरथ से कहा, "हे नरश्रेष्ठ, आपका स्वागत है; हे राघव, सौभाग्य से आप यहाँ पधारे हैं।"

श्लोक 10 (bala.69.10)

पुत्रयोरुभयोः प्रीतिं लप्स्यसे वीर्यनिर्जिताम् । दिष्ट्या प्राप्तो महातेजा वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ 69.10 ॥

putrayor ubhayoḥ prītiṃ lapsyase vīryanirjitām | diṣṭyā prāpto mahātejā vasiṣṭho bhagavān ṛṣiḥ ||

"आप अपने दोनों पुत्रों के पराक्रम से अर्जित आनंद को प्राप्त करेंगे। सौभाग्य से यहाँ महातेजस्वी और पूज्य ऋषि वसिष्ठ भी पधारे हैं—"

श्लोक 11 (bala.69.11)

सह सर्वैर्द्विजश्रेष्ठैर्देवैरिव शतक्रतुः । दिष्ट्या मे निर्जिता विघ्ना दिष्ट्या मे पूजितं कुलम् ॥ 69.11 ॥

saha sarvair dvijaśreṣṭhair devair iva śatakratuḥ | diṣṭyā me nirjitā vighnā diṣṭyā me pūjitaṃ kulam ||

—समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों सहित, मानो देवताओं सहित इन्द्र ही आ गए हों। सौभाग्य से मेरी सारी बाधाएँ दूर हो गईं, सौभाग्य से मेरा कुल भी सम्मानित हुआ—

श्लोक 12 (bala.69.12)

राघवैः सह संबंधाद्वीर्यश्रेष्ठैर्महात्मभिः । श्वः प्रभाते नरेन्द्र त्वम् सम्वर्तयितुमर्हसि ॥ 69.12 ॥

rāghavaiḥ saha saṃbandhād vīryaśreṣṭhair mahātmabhiḥ | śvaḥ prabhāte narendra tvam samvartayitum arhasi ||

—पराक्रम में श्रेष्ठ उन महात्मा राघवों के साथ इस संबंध से। हे नरेन्द्र, कल प्रातःकाल आप विवाह-कार्य आरंभ करने योग्य हैं—

श्लोक 13 (bala.69.13)

यज्ञस्यान्ते नरश्रेष्ठ विवाहमृषिसत्तमैः । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ऋषिमध्ये नराधिपः ॥ 69.13 ॥

yajñasya ante naraśreṣṭha vivāham ṛṣisattamaiḥ | tasya tad vacanaṃ śrutvā ṛṣimadhye narādhipaḥ ||

—हे नरश्रेष्ठ, यज्ञ की समाप्ति पर, श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा निश्चित समय पर विवाह संपन्न कराएँ।" उनका यह वचन सुनकर ऋषियों के मध्य राजा दशरथ ने—

श्लोक 14 (bala.69.14)

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठः प्रत्युवाच महीपतिम् । प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेतन्मया पुरा ॥ 69.14 ॥

vākyaṃ vākyavidāṃ śreṣṭhaḥ pratyuvāca mahīpatim | pratigraho dātṛvaśaḥ śrutam etan mayā purā ||

—वाणी में निपुण जनों में श्रेष्ठ दशरथ ने राजा जनक को उत्तर दिया, "पहले सुना है कि ग्रहण करना दाता की इच्छा पर निर्भर होता है।"

श्लोक 15 (bala.69.15)

यथा वक्ष्यसि धर्मज्ञ तत् करिष्यामहे वयम् । तद्धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः ॥ 69.15 ॥

yathā vakṣyasi dharmajña tat kariṣyāmahe vayam | tad dharmiṣṭhaṃ yaśasyaṃ ca vacanaṃ satyavādinaḥ ||

"हे धर्मज्ञ, आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।" सत्यवादी दशरथ के उस धर्मयुक्त और यशस्वी वचन को—

श्लोक 16 (bala.69.16)

श्रुत्वा विदेहाधिपतिः परं विस्मयमागतः । ततः सर्वे मुनिगणाः परस्परसमागमे ॥ 69.16 ॥

śrutvā videhādhipatiḥ paraṃ vismayam āgataḥ | tataḥ sarve munigaṇāḥ parasparasamāgame ||

—सुनकर विदेहराज जनक अत्यंत विस्मित हुए। तत्पश्चात् एक-दूसरे से मिलकर समस्त मुनिगण—

श्लोक 17 (bala.69.17)

हर्षेण महता युक्तास्तां निशामवसन् सुखम् । अथ रामो महातेजा लक्ष्मणेन समं ययौ ॥ 69.17 ॥

harṣeṇa mahatā yuktās tāṃ niśām avasan sukham | atha rāmo mahātejā lakṣmaṇena samaṃ yayau ||

—अत्यंत हर्षित होकर उस रात्रि को सुखपूर्वक व्यतीत करने लगे। तत्पश्चात् महातेजस्वी राम लक्ष्मण के साथ—

श्लोक 18 (bala.69.18)

विश्वामित्रं पुरस्कृत्य पितुः पादावुपस्पृशन् । राजा च राघवौ पुत्रौ निशाम्य परिहर्षितः ॥ 69.18 ॥

viśvāmitraṃ puraskṛtya pituḥ pādāv upaspṛśan | rājā ca rāghavau putrau niśāmya pariharṣitaḥ ||

—विश्वामित्र को आगे रखकर अपने पिता के चरण स्पर्श करने गए। और अपने दोनों पुत्रों राघवों को देखकर राजा दशरथ अत्यंत हर्षित हुए—

श्लोक 19 (bala.69.19)

उवास परमप्रीतो जनकेन सुपूजितः । जनकोऽपि महातेजाः क्रियां धर्मेण तत्त्ववित् । यज्ञस्य च सुताभ्यां च कृत्वा रात्रिमुवास ह ॥ 69.19 ॥

uvāsa paramaprīto janakena supūjitaḥ | janako api mahātejāḥ kriyāṃ dharmeṇa tattvavit | yajñasya ca sutābhyāṃ ca kṛtvā rātrim uvāsa ha ||

—और जनक द्वारा भलीभाँति सम्मानित होकर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक वहीं रहने लगे। उधर तत्त्वज्ञ महातेजस्वी जनक ने भी यज्ञ के तथा अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह के धर्मानुसार कृत्य संपन्न करके वह रात्रि व्यतीत की।

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