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बालकाण्ड · सर्ग 70

इक्ष्वाकु-वंश वर्णन

सर्ग 69सर्ग-सूचीसर्ग 71

श्लोक 1 (bala.70.1)

ततः प्रभाते जनकः कृतकर्मा महर्षिभिः । उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः शतानंदं पुरोहितम् ॥ 70.1 ॥

tataḥ prabhāte janakaḥ kṛtakarmā maharṣibhiḥ | uvāca vākyaṃ vākyajñaḥ śatānandaṃ purohitam ||

तत्पश्चात् प्रातःकाल महर्षियों के साथ नित्यकर्म पूर्ण करके, वाणी में निपुण जनक ने पुरोहित शतानंद से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (bala.70.2)

भ्राता मम महातेजा यवीयानतिधार्मिकः । कुशध्वज इति ख्यातः पुरीमध्यवसच्छुभाम् ॥ 70.2 ॥

bhrātā mama mahātejā yavīyān atidhārmikaḥ | kuśadhvaja iti khyātaḥ purīm adhyavasac chubhām ||

"मेरा महातेजस्वी और अत्यंत धर्मात्मा छोटा भाई, जो कुशध्वज नाम से विख्यात है, एक शुभ नगरी में निवास करता है—"

श्लोक 3 (bala.70.3)

वार्या फलकपर्यन्तां पिबन्निक्षुमतीं नदीम् । सांकाश्यां पुण्यसंकाशां विमानमिव पुष्पकम् ॥ 70.3 ॥

vāryā phalakaparyantāṃ pibann ikṣumatīṃ nadīm | sāṅkāśyāṃ puṇyasaṃkāśāṃ vimānam iva puṣpakam ||

—जो चारों ओर जल-रक्षक मोर्चों से घिरी है, और मानो इक्षुमती नदी के जल का पान करती हुई, पुष्पक विमान के समान पुण्यमयी सांकाश्य नगरी में रहता है।"

श्लोक 4 (bala.70.4)

तमहं द्रष्टुमिच्छामि यज्ञगोप्ता स मे मतः । प्रीतिं सोऽपि महातेजा इमां भोक्ता मया सह ॥ 70.4 ॥

tam ahaṃ draṣṭum icchāmi yajñagoptā sa me mataḥ | prītiṃ so api mahātejā imāṃ bhoktā mayā saha ||

"मैं उसे देखना चाहता हूँ, क्योंकि वह मेरे इस यज्ञ का संरक्षक नियुक्त है; वह महातेजस्वी भी मेरे साथ इस उत्सव के आनंद का भोग करेगा।"

श्लोक 5 (bala.70.5)

एवमुक्ते तु वचने शतानंदस्य संनिधौ । आगताः केचिदव्यग्रा जनकस्तान् समादिशत् ॥ 70.5 ॥

evam ukte tu vacane śatānandasya saṃnidhau | āgatāḥ kecid avyagrā janakas tān samādiśat ||

शतानंद के समक्ष इस प्रकार कहे जाने पर, कुछ चतुर दूत वहाँ उपस्थित हुए, जिन्हें जनक ने आज्ञा दी।

श्लोक 6 (bala.70.6)

शासनात्तु नरेन्द्रस्य प्रययुः शीघ्रवाजिभिः । समानेतुं नरव्याघ्रं विष्णुमिन्द्राज्ञया यथा ॥ 70.6 ॥

śāsanāt tu narendrasya prayayuḥ śīghravājibhiḥ | samānetuṃ naravyāghraṃ viṣṇum indrājñayā yathā ||

राजा की आज्ञा से वे तीव्रगामी घोड़ों पर सवार होकर उस नरव्याघ्र कुशध्वज को लाने चल पड़े, ठीक वैसे ही जैसे इन्द्र की आज्ञा से विष्णु को बुलाने जाया जाता है।

श्लोक 7 (bala.70.7)

सांकाश्यां ते समागम्य ददृशुश्च कुशध्वजम् । न्यवेदयन् यथावृत्तं जनकस्य च चिन्तितम् ॥ 70.7 ॥

sāṅkāśyāṃ te samāgamya dadṛśuś ca kuśadhvajam | nyavedayan yathāvṛttaṃ janakasya ca cintitam ||

सांकाश्य नगरी पहुँचकर उन्होंने कुशध्वज के दर्शन किए, और जो कुछ घटित हुआ था तथा जनक का विचार, वह सब उनसे निवेदन किया।

श्लोक 8 (bala.70.8)

तद्वृत्तं नृपतिः श्रुत्वा दूतश्रेष्ठैर्महाजवैः । आज्ञया तु नरेन्द्रस्य आजगाम कुशध्वजः ॥ 70.8 ॥

tad vṛttaṃ nṛpatiḥ śrutvā dūtaśreṣṭhair mahājavaiḥ | ājñayā tu narendrasya ājagāma kuśadhvajaḥ ||

उन महावेगवान् और श्रेष्ठ दूतों से वह वृत्तांत सुनकर, राजा जनक की आज्ञा से कुशध्वज तुरंत आ गए।

श्लोक 9 (bala.70.9)

स ददर्श महात्मानं जनकं धर्मवत्सलम् । सोऽभिवाद्य शतानंदं जनकं चातिधार्मिकम् ॥ 70.9 ॥

sa dadarśa mahātmānaṃ janakaṃ dharmavatsalam | so abhivādya śatānandaṃ janakaṃ ca atidhārmikam ||

उसने धर्मवत्सल महात्मा जनक के दर्शन किए; और शतानंद तथा अत्यंत धर्मात्मा जनक को प्रणाम करके—

श्लोक 10 (bala.70.10)

राजार्हं परमं दिव्यमासनं चाध्यरोहत । उपविष्टावुभौ तौ तु भ्रातरावमितौजसौ ॥ 70.10 ॥

rājārhaṃ paramaṃ divyam āsanaṃ ca adhyarohata | upaviṣṭāv ubhau tau tu bhrātarāv amitaujasau ||

—वह एक अत्यंत दिव्य, राजोचित आसन पर बैठ गया। इस प्रकार अपार तेजवाले वे दोनों भाई आसन पर बैठकर—

श्लोक 11 (bala.70.11)

प्रेषयामासतुर्वीरौ मन्त्रिश्रेष्ठं सुदामनम् । गच्छ मंत्रिपते शीघ्रमैक्ष्वाकममितप्रभम् ॥ 70.11 ॥

preṣayāmāsatur vīrau mantriśreṣṭhaṃ sudāmanam | gaccha mantripate śīghram aikṣvākam amitaprabham ||

उन दोनों वीरों ने श्रेष्ठ मंत्री सुदामन को यह कहकर भेजा, "हे मंत्रिवर, आप शीघ्र जाकर अपार तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी दशरथ को—"

श्लोक 12 (bala.70.12)

आत्मजैः सह दुर्धर्षमानयस्व समंत्रिणम् । औपकार्यां स गत्वा तु रघूणां कुलवर्धनम् ॥ 70.12 ॥

ātmajaiḥ saha durdharṣam ānayasva samantriṇam | aupakāryāṃ sa gatvā tu raghūṇāṃ kulavardhanam ||

—और उस अजेय दशरथ को उनके पुत्रों तथा मंत्रियों सहित यहाँ ले आओ।" वह मंत्री उस अतिथिशाला में जाकर रघुकुल के वर्धक दशरथ के पास पहुँचा—

श्लोक 13 (bala.70.13)

ददर्श शिरसा चैनमभिवाद्येदमब्रवीत् । अयोध्याधिपते वीर वैदेहो मिथिलाधिपः ॥ 70.13 ॥

dadarśa śirasā ca enam abhivādya idam abravīt | ayodhyādhipate vīra vaideho mithilādhipaḥ ||

—और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए उनसे यह कहा, "हे अयोध्याधिपति वीर, विदेहवंशी मिथिलाधिप जनक—"

श्लोक 14 (bala.70.14)

स त्वां द्रष्टुं व्यवसितः सोपाध्यायपुरोहितम् । मंत्रिश्रेष्ठवचः श्रुत्वा राजा सर्षिगणस्तदा ॥ 70.14 ॥

sa tvāṃ draṣṭuṃ vyavasitaḥ sopādhyāyapurohitam | mantriśreṣṭhavacaḥ śrutvā rājā sarṣigaṇas tadā ||

—आपके, आपके गुरुओं तथा पुरोहित के दर्शन के लिए उत्सुक हैं।" उस श्रेष्ठ मंत्री का यह वचन सुनकर, ऋषियों सहित राजा दशरथ तब—

श्लोक 15 (bala.70.15)

सबन्धुरगमत्तत्र जनको यत्र वर्तते । राजा च मंत्रिसहितः सोपाध्यायः सबांधवः ॥ 70.15 ॥

sabandhur agamat tatra janako yatra vartate | rājā ca mantrisahitaḥ sopādhyāyaḥ sabāndhavaḥ ||

—अपने बंधुओं सहित वहाँ पहुँचे, जहाँ जनक विराजमान थे। मंत्रियों, गुरुओं और बंधुओं सहित उस राजा ने—

श्लोक 16 (bala.70.16)

वाक्यं वाक्यविदां श्रेष्ठो वैदेहमिदमब्रवीत् । विदितं ते महाराज इक्ष्वाकुकुलदैवतम् ॥ 70.16 ॥

vākyaṃ vākyavidāṃ śreṣṭho vaidaham idam abravīt | viditaṃ te mahārāja ikṣvākukuladaivatam ||

—वाणी में निपुण जनों में श्रेष्ठ होने के कारण, विदेहराज से यह वचन कहा, "हे महाराज, आप यह जानते हैं कि इक्ष्वाकु-कुल के देवतुल्य पुरोहित—"

श्लोक 17 (bala.70.17)

वक्ता सर्वेषु कृत्येषु वसिष्ठो भगवानृषिः । विश्वामित्राभ्यनुज्ञातः सह सर्वैर्महर्षिभिः ॥ 70.17 ॥

vaktā sarveṣu kṛtyeṣu vasiṣṭho bhagavān ṛṣiḥ | viśvāmitrābhyanujñātaḥ saha sarvair maharṣibhiḥ ||

—अर्थात् पूज्य ऋषि वसिष्ठ, हमारे सभी कार्यों में प्रवक्ता हैं। विश्वामित्र की अनुमति से, समस्त महर्षियों सहित—

श्लोक 18 (bala.70.18)

एष वक्ष्यति धर्मात्मा वसिष्ठो मे यथाक्रमम् । तूष्णींभूते दशरथे वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ 70.18 ॥

eṣa vakṣyati dharmātmā vasiṣṭho me yathākramam | tūṣṇīṃbhūte daśarathe vasiṣṭho bhagavān ṛṣiḥ ||

—यह धर्मात्मा वसिष्ठ मेरे कुल का यथाक्रम वर्णन करेंगे।" दशरथ के मौन हो जाने पर, पूज्य ऋषि वसिष्ठ ने—

श्लोक 19 (bala.70.19)

उवाच वाक्यं वाक्यज्ञो वैदेहं सपुरोधसाम् । अव्यक्तप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः ॥ 70.19 ॥

uvāca vākyaṃ vākyajño vaidehaṃ sapurodhasām | avyaktaprabhavo brahmā śāśvato nitya avyayaḥ ||

—वाणी में निपुण होकर, पुरोहितों सहित विदेहराज से यह वचन कहा, "अव्यक्त से उत्पन्न, शाश्वत, नित्य और अविनाशी ब्रह्मा हैं—"

श्लोक 20 (bala.70.20)

तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः । विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्मृतः ॥ 70.20 ॥

tasmān marīciḥ saṃjajñe marīceḥ kaśyapaḥ sutaḥ | vivasvān kaśyapāj jajñe manur vaivasvataḥ smṛtaḥ ||

—उनसे मरीचि उत्पन्न हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप हुए; कश्यप से विवस्वान (सूर्य) उत्पन्न हुए, और सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु कहलाए।

श्लोक 21 (bala.70.21)

मनुः प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुश्च मनोः सुतः । तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम् ॥ 70.21 ॥

manuḥ prajāpatiḥ pūrvam ikṣvākuś ca manoḥ sutaḥ | tam ikṣvākum ayodhyāyāṃ rājānaṃ viddhi pūrvakam ||

मनु प्रथम प्रजापति थे, और इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे; उसी इक्ष्वाकु को अयोध्या के प्रथम राजा जानिए।

श्लोक 22 (bala.70.22)

इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः । कुक्षेरथात्मजः श्रीमान् विकुक्षिरुपपद्यत ॥ 70.22 ॥

ikṣvākos tu sutaḥ śrīmān kukṣir iti eva viśrutaḥ | kukṣer atha ātmajaḥ śrīmān vikukṣir upapadyata ||

इक्ष्वाकु के पुत्र श्रीमान् कुक्षि नाम से विख्यात हुए; कुक्षि से श्रीमान् विकुक्षि उत्पन्न हुए।

श्लोक 23 (bala.70.23)

विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान् । बाणस्य तु महातेजा अनरण्यः प्रतापवान् ॥ 70.23 ॥

vikukṣes tu mahātejā bāṇaḥ putraḥ pratāpavān | bāṇasya tu mahātejā anaraṇyaḥ pratāpavān ||

विकुक्षि से महातेजस्वी और प्रतापी पुत्र बाण उत्पन्न हुए; बाण से महातेजस्वी और प्रतापी अनरण्य उत्पन्न हुए।

श्लोक 24 (bala.70.24)

अनरण्यात्पृथुर्जज्ञे त्रिशंकुस्तु पृथोः सुतः । त्रिशंकोरभवत्पुत्रो धुन्धुमारो महायशाः ॥ 70.24 ॥

anaraṇyāt pṛthur jajñe triśaṅkus tu pṛthoḥ sutaḥ | triśaṅkor abhavat putro dhundhumāro mahāyaśāḥ ||

अनरण्य से पृथु उत्पन्न हुए, त्रिशंकु पृथु के पुत्र थे; त्रिशंकु से महायशस्वी धुन्धुमार पुत्र हुए।

श्लोक 25 (bala.70.25)

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो महारथः । युवनाश्वसुतस्त्वासीन्मान्धाता पृथिवीपतिः ॥ 70.25 ॥

dhundhumārān mahātejā yuvanāśvo mahārathaḥ | yuvanāśvasutas tv āsīn māndhātā pṛthivīpatiḥ ||

धुन्धुमार से महातेजस्वी महारथी युवनाश्व उत्पन्न हुए; युवनाश्व के पुत्र भूपति मान्धाता हुए।

श्लोक 26 (bala.70.26)

मान्धातुस्तु सुतः श्रीमान् सुसन्धिरुदपद्यत । सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित् ॥ 70.26 ॥

māndhātus tu sutaḥ śrīmān susandhir udapadyata | susandher api putrau dvau dhruvasandhiḥ prasenajit ||

मान्धाता के पुत्र श्रीमान् सुसंधि उत्पन्न हुए; सुसंधि के दो पुत्र हुए, ध्रुवसंधि और प्रसेनजित्।

श्लोक 27 (bala.70.27)

यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो नाम नामतः । भरतात्तु महातेजा असितो नाम जायत ॥ 70.27 ॥

yaśasvī dhruvasandhes tu bharato nāma nāmataḥ | bharatāt tu mahātejā asito nāma jāyata ||

ध्रुवसंधि से यशस्वी भरत नामक पुत्र हुआ; भरत से महातेजस्वी असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 28 (bala.70.28)

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शात्रवः । हैहयास्तालजंघाश्च शूराश्च शशबिंदवः ॥ 70.28 ॥

yasya ete pratirājāna udapadyanta śātravaḥ | haihayās tālajaṅghāś ca śūrāś ca śaśabindavaḥ ||

उस असित के विरुद्ध शत्रु राजाओं के रूप में हैहय, तालजंघ, तथा शूरवीर शशबिंदु आदि उठ खड़े हुए।

श्लोक 29 (bala.70.29)

तांस्तु स प्रतियुद्ध्यन् वै युद्धे राजा प्रवासितः । हिमवन्तमुपागम्य भार्याभ्यां सहितस्तदा ॥ 70.29 ॥

tāṃs tu sa pratiyudhyan vai yuddhe rājā pravāsitaḥ | himavantam upāgamya bhāryābhyāṃ sahitas tadā ||

उनसे युद्ध करते हुए राजा असित युद्ध में पराजित होकर निर्वासित हुए, और तब वे अपनी दोनों रानियों सहित हिमालय पर्वत पर जा पहुँचे।

श्लोक 30 (bala.70.30)

असितोऽल्पबलो राजा कालधर्ममुपेयिवान् । द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतम् ॥ 70.30 ॥

asito alpabalo rājā kāladharmam upeyivān | dve ca asya bhārye garbhiṇyau babhūvatur iti śrutam ||

अल्पबल हो चुके राजा असित वहीं काल-धर्म को प्राप्त हो गए; उस समय उनकी दोनों रानियाँ गर्भवती थीं, ऐसा सुना जाता है।

श्लोक 31 (bala.70.31)

एका गर्भविनाशार्थं सपत्न्यै सगरं ददौ । ततः शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥ 70.31 ॥

ekā garbhavināśārthaṃ sapatnyai sagaraṃ dadau | tataḥ śailavare ramye babhūva abhirato muniḥ ||

उनमें से एक रानी ने दूसरी के गर्भ को नष्ट करने के लिए उसे विष दे दिया। उसी समय, एक सुरम्य श्रेष्ठ पर्वत पर, उस स्थान से विशेष अनुराग रखने वाले एक मुनि निवास करते थे—

श्लोक 32 (bala.70.32)

भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवंतमुपाश्रितः । तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम् ॥ 70.32 ॥

bhārgavaś cyavano nāma himavantam upāśritaḥ | tatra ca ekā mahābhāgā bhārgavaṃ devavarcasam ||

—भृगुवंशी च्यवन नामक वह मुनि हिमालय की शरण में रहते थे। वहीं उन दोनों में से एक अत्यंत भाग्यशाली रानी ने देवतुल्य तेजस्वी उस भार्गव मुनि को—

श्लोक 33 (bala.70.33)

ववन्दे पद्मपत्राक्षी कांक्षन्ती सुतमुत्तमम् । तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी चाभ्यवादयत् ॥ 70.33 ॥

vavande padmapatrākṣī kāṅkṣantī sutam uttamam | tam ṛṣiṃ sā abhyupāgamya kālindī ca abhyavādayat ||

—लोटकर उस भार्गव मुनि को प्रणाम किया, क्योंकि वह एक उत्तम पुत्र की कामना रखती थी। उस ऋषि के समीप जाकर कालिंदी (दूसरी रानी) ने भी उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 34 (bala.70.34)

स तामभ्यवदद्विप्रः पुत्रेप्सुं पुत्रजन्मनि । तव कुक्षौ महाभागे सुपुत्रः सुमहाबलः ॥ 70.34 ॥

sa tām abhyavadad vipraḥ putrepsuṃ putrajanmani | tava kukṣau mahābhāge suputraḥ sumahābalaḥ ||

उस ब्राह्मण ऋषि ने पुत्र की इच्छुक उस रानी से पुत्र-जन्म के विषय में कहा, "हे महाभागे, तुम्हारे गर्भ में एक उत्तम और अत्यंत बलशाली पुत्र है—"

श्लोक 35 (bala.70.35)

महावीर्यो महातेजा अचिरात् संजनिष्यति । गरेण सहितः श्रीमान् मा शुचः कमलेक्षणे ॥ 70.35 ॥

mahāvīryo mahātejā acirāt saṃjaniṣyati | gareṇa sahitaḥ śrīmān mā śucaḥ kamalekṣaṇe ||

—अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी वह पुत्र शीघ्र ही जन्म लेगा; विष के साथ ही उत्पन्न होकर भी वह श्रीमान् होगा, हे कमललोचना, शोक मत करो।"

श्लोक 36 (bala.70.36)

च्यवनं च नमस्कृत्य राजपुत्री पतिव्रता । पत्या विरहिता तस्मात् पुत्रं देवी व्यजायत ॥ 70.36 ॥

cyavanaṃ ca namaskṛtya rājaputrī pativratā | patyā virahitā tasmāt putraṃ devī vyajāyata ||

च्यवन को प्रणाम करके, अपने पति से वंचित हो चुकी वह पतिव्रता राजकुमारी उसी वरदान से एक पुत्र को जन्म देने में समर्थ हुई।

श्लोक 37 (bala.70.37)

सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया । सह तेन गरेणैव संजातः सगरोऽभवत् ॥ 70.37 ॥

sapatnyā tu garas tasyai datto garbhajighāṃsayā | saha tena gareṇa eva saṃjātaḥ sagaro abhavat ||

उसके गर्भ को नष्ट करने की इच्छा से सौत ने जो विष उसे दिया था, उसी विष के साथ जन्म लेने के कारण वह बालक 'सगर' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 38 (bala.70.38)

सगरस्यासमंजस्तु असमंजादथांशुमान् । दिलीपोंऽशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः ॥ 70.38 ॥

sagarasya asamañjas tu asamañjād atha aṃśumān | dilīpo aṃśumataḥ putro dilīpasya bhagīrathaḥ ||

सगर से असमंज उत्पन्न हुए, असमंज से अंशुमान उत्पन्न हुए; अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए, और दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए।

श्लोक 39 (bala.70.39)

भगीरथात्ककुत्स्थश्च ककुत्स्थस्य रघुस्तथा । रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः ॥ 70.39 ॥

bhagīrathāt kakutsthaś ca kakutsthasya raghus tathā | raghos tu putras tejasvī pravṛddhaḥ puruṣādakaḥ ||

भगीरथ से ककुत्स्थ हुए, ककुत्स्थ से रघु उत्पन्न हुए; रघु के पुत्र तेजस्वी प्रवृद्ध हुए, जो नरभक्षी बन गए।

श्लोक 40 (bala.70.40)

कल्माषपादो ह्यभवत्तस्माज्जातस्तु शङ्खणः । सुदर्शनः शंखणस्य अग्निवर्णः सुदर्शनात् ॥ 70.40 ॥

kalmāṣapādo hy abhavat tasmāj jātas tu śaṅkhaṇaḥ | sudarśanaḥ śaṅkhaṇasya agnivarṇaḥ sudarśanāt ||

वही (प्रवृद्ध) कल्माषपाद के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और उससे शंखण उत्पन्न हुआ; शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए, और सुदर्शन से अग्निवर्ण उत्पन्न हुए।

श्लोक 41 (bala.70.41)

शीघ्रगस्त्वग्निवर्णस्य शीघ्रगस्य मरुः सुतः । मरोः प्रशुश्रुकस्त्वासीदंबरीषः प्रशुश्रुकात् ॥ 70.41 ॥

śīghragas tv agnivarṇasya śīghragasya maruḥ sutaḥ | maroḥ praśuśrukas tv āsīd ambarīṣaḥ praśuśrukāt ||

अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए, शीघ्रग के पुत्र मरु हुए; मरु से प्रशुश्रुक उत्पन्न हुए, और प्रशुश्रुक से अंबरीष उत्पन्न हुए।

श्लोक 42 (bala.70.42)

अंबरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषश्च महीपतिः । नहुषस्य ययातिस्तु नाभागस्तु ययातिजः ॥ 70.42 ॥

ambarīṣasya putro abhūn nahuṣaś ca mahīpatiḥ | nahuṣasya yayātis tu nābhāgas tu yayātijaḥ ||

अंबरीष के पुत्र भूपति नहुष हुए; नहुष के पुत्र ययाति हुए, और ययाति से नाभाग उत्पन्न हुए।

श्लोक 43 (bala.70.43)

नाभागस्य बभूवाजः अजाद्दशरथोऽभवत् । अस्माद्दशरथाज्जातौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ 70.43 ॥

nābhāgasya babhūva ajaḥ ajād daśaratho abhavat | asmād daśarathāj jātau bhrātarau rāmalakṣmaṇau ||

नाभाग के पुत्र अज हुए, अज से दशरथ उत्पन्न हुए; और इसी दशरथ से राम-लक्ष्मण नामक दोनों भाई उत्पन्न हुए।

श्लोक 44 (bala.70.44)

आदिवंशविशुद्धानां राज्ञां परमधर्मिणाम् । इक्ष्वाकुकुलजातानां वीराणां सत्यवादिनाम् ॥ 70.44 ॥

ādivaṃśaviśuddhānāṃ rājñāṃ paramadharmiṇām | ikṣvākukulajātānāṃ vīrāṇāṃ satyavādinām ||

"आदिकाल से इस निर्मल वंश में उत्पन्न, परम धर्मात्मा, इक्ष्वाकु-कुल में जन्मे उन वीर और सत्यवादी राजाओं के—"

श्लोक 45 (bala.70.45)

रामलक्ष्मणयोरर्थे त्वत्सुते वरये नृप । सदृशाभ्यां नरश्रेष्ठ सदृशे दातुमर्हसि ॥ 70.45 ॥

rāmalakṣmaṇayor arthe tvat sute varaye nṛpa | sadṛśābhyāṃ naraśreṣṭha sadṛśe dātum arhasi ||

—इसी कुल के राम और लक्ष्मण के लिए, हे राजन्, मैं आपकी दोनों पुत्रियों की याचना करता हूँ; हे नरश्रेष्ठ, इन दोनों योग्य वरों को अपनी योग्य कन्याएँ देना आपको उचित है।"

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