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बालकाण्ड · सर्ग 74

मार्ग में परशुराम का आगमन

सर्ग 73सर्ग-सूचीसर्ग 75

श्लोक 1 (bala.74.1)

अथ रात्र्यां व्यतीतायां विश्वामित्रो महामुनिः। आपृच्छ्य तौ च राजानौ जगामोत्तरपर्वतम् ॥ १-७४-१ ॥

atha rātryāṃ vyatītāyāṃ viśvāmitro mahāmuniḥ| āpṛcchya tau ca rājānau jagāmottaraparvatam || 1-74-1 ||

तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होने पर महामुनि विश्वामित्र दोनों राजाओं से आज्ञा लेकर उत्तर दिशा के पर्वत (हिमालय) की ओर चले गए।

श्लोक 2 (bala.74.2)

विश्वामित्रो गते राजा वैदेहं मिथिलाधिपम्। आपृष्ट्वैव जगामाशु राजा दशरथः पुरीम् ॥ १-७४-२ ॥

viśvāmitro gate rājā vaidehaṃ mithilādhipam| āpṛṣṭvaiva jagāmāśu rājā daśarathaḥ purīm || 1-74-2 ||

विश्वामित्र के चले जाने पर राजा दशरथ ने भी विदेहराज मिथिलेश्वर से आज्ञा लेकर शीघ्र ही अपनी नगरी अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 3 (bala.74.3)

अथ राजा विदेहानां ददौ कन्याधनं बहु। गवां शतसहस्राणि बहूनि मिथिलेश्वरः ॥ १-७४-३ ॥

atha rājā videhānāṃ dadau kanyādhanaṃ bahu| gavāṃ śatasahasrāṇi bahūni mithileśvaraḥ || 1-74-3 ||

तत्पश्चात् विदेहनरेश मिथिलेश्वर जनक ने कन्याधन के रूप में प्रचुर सम्पत्ति दी — अनेक लाखों गौएँ।

श्लोक 4 (bala.74.4)

कंबलानां च मुख्यानां क्षौमान् कोट्यंबराणि च। हस्त्यश्वरथपादातं दिव्यरूपं स्वलंकृतम् ॥ १-७४-४ ॥

kaṃbalānāṃ ca mukhyānāṃ kṣaumān koṭyaṃbarāṇi ca| hastyaśvarathapādātaṃ divyarūpaṃ svalaṃkṛtam || 1-74-4 ||

तथा उत्तम कम्बल, करोड़ों रेशमी वस्त्र, और दिव्य रूप वाले सुसज्जित हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिक भी दिए।

श्लोक 5 (bala.74.5)

ददौ कन्याशतं तासां दासीदासमनुत्तमम्। हिरण्यस्य सुवर्णस्य मुक्तानां विद्रुमस्य च ॥ १-७४-५ ॥

dadau kanyāśataṃ tāsāṃ dāsīdāsamanuttamam| hiraṇyasya suvarṇasya muktānāṃ vidrumasya ca || 1-74-5 ||

उन्हें सेवा हेतु सौ उत्तम दासियाँ और दास भी दिए, तथा चाँदी, सोना, मोती और मूँगे भी प्रदान किए।

श्लोक 6 (bala.74.6)

ददौ राजा सुसंहृष्टः कन्याधनमनुत्तमम्। दत्त्वा बहुविधं राजा समनुज्ञाप्य पार्थिवम् ॥ १-७४-६ ॥

dadau rājā susaṃhṛṣṭaḥ kanyādhanamanuttamam| dattvā bahuvidhaṃ rājā samanujñāpya pārthivam || 1-74-6 ||

अत्यन्त हर्षित राजा जनक ने यह अनुपम कन्याधन प्रदान किया। इस प्रकार बहुविध वस्तुएँ देकर तथा राजा दशरथ से विदा लेकर—

श्लोक 7 (bala.74.7)

प्रविवेश स्वनिलयं मिथिलां मिथिलेश्वरः। राजाप्ययोध्याधिपतिः सह पुत्रैर्महात्मभिः ॥ १-७४-७ ॥

praviveśa svanilayaṃ mithilāṃ mithileśvaraḥ| rājāpyayodhyādhipatiḥ saha putrairmahātmabhiḥ || 1-74-7 ||

—मिथिलेश्वर जनक अपने निवास मिथिला में लौट गए। और अयोध्यापति राजा दशरथ भी अपने महात्मा पुत्रों सहित—

श्लोक 8 (bala.74.8)

ऋषीन् सर्वान् पुरस्कृत्य जगाम सबलानुगः। गच्छन्तं तु नरव्याघ्रं सर्षिसंघं सराघवम् ॥ १-७४-८ ॥

ṛṣīn sarvān puraskṛtya jagāma sabalānugaḥ| gacchantaṃ tu naravyāghraṃ sarṣisaṃghaṃ sarāghavam || 1-74-8 ||

—समस्त ऋषियों को आगे करके सेना सहित चल पड़े। इस प्रकार जाते हुए उस नरव्याघ्र राजा दशरथ को, ऋषिसमूह तथा राघवों सहित—

श्लोक 9 (bala.74.9)

घोरास्तु पक्षिणो वाचो व्याहरन्ति समंततः। भौमाश्चैव मृगाः सर्वे गच्छन्ति स्म प्रदक्षिणम् ॥ १-७४-९ ॥

ghorāstu pakṣiṇo vāco vyāharanti samaṃtataḥ| bhaumāścaiva mṛgāḥ sarve gacchanti sma pradakṣiṇam || 1-74-9 ||

उस समय पक्षी चारों ओर से भयंकर बोलियाँ बोलने लगे, जबकि पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी मृग दाहिनी ओर से होकर चलने लगे।

श्लोक 10 (bala.74.10)

तान् दृष्ट्वा राजशार्दूलो वसिष्ठं पर्यपृच्छत। असौम्याः पक्षिणो घोरा मृगाश्चापि प्रदक्षिणाः ॥ १-७४-१० ॥

tān dṛṣṭvā rājaśārdūlo vasiṣṭhaṃ paryapṛcchata| asaumyāḥ pakṣiṇo ghorā mṛgāścāpi pradakṣiṇāḥ || 1-74-10 ||

यह देखकर राजशार्दूल दशरथ ने वसिष्ठजी से पूछा — 'ये पक्षी अशुभ और भयंकर बोल रहे हैं, जबकि मृग दाहिनी ओर से जा रहे हैं—

श्लोक 11 (bala.74.11)

किमिदं हृदयोत्कंपि मनो मम विषीदति। राज्ञो दशरथस्यैतत् श्रुत्वा वाक्यं महानृषिः ॥ १-७४-११ ॥

kimidaṃ hṛdayotkaṃpi mano mama viṣīdati| rājño daśarathasyaitat śrutvā vākyaṃ mahānṛṣiḥ || 1-74-11 ||

—यह क्या है? मेरा हृदय काँप रहा है, मेरा मन उदास हो रहा है।' राजा दशरथ के इस वचन को सुनकर महर्षि वसिष्ठ ने—

श्लोक 12 (bala.74.12)

उवाच मधुरां वाणीं श्रूयतामस्य यत्फलम्। उपस्थितं भयं घोरं दिव्यं पक्षिमुखाच्च्युतम् ॥ १-७४-१२ ॥

uvāca madhurāṃ vāṇīṃ śrūyatāmasya yatphalam| upasthitaṃ bhayaṃ ghoraṃ divyaṃ pakṣimukhāccyutam || 1-74-12 ||

—मधुर वाणी में कहा — 'इसका जो फल होगा वह सुनिए। पक्षियों के मुख से प्रकट हुआ यह घोर दैवी भय उपस्थित तो है—

श्लोक 13 (bala.74.13)

मृगाः प्रशमयन्त्येते संतापः त्यज्यतामयम्। तेषां संवदतां तत्र वायुः प्रादुर्बभूव ह ॥ १-७४-१३ ॥

mṛgāḥ praśamayantyete saṃtāpaḥ tyajyatāmayam| teṣāṃ saṃvadatāṃ tatra vāyuḥ prādurbabhūva ha || 1-74-13 ||

—परन्तु ये मृग उसे शान्त कर रहे हैं; अतः यह संताप त्याग दीजिए।' वे इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि वहाँ एक आँधी उठी—

श्लोक 14 (bala.74.14)

कंपयन् मेदिनीं सर्वां पातयंश्च महाद्रुमान्। तमसा संवृतः सूर्यः सर्वे न वेदिषुर्दिशः ॥ १-७४-१४ ॥

kaṃpayan medinīṃ sarvāṃ pātayaṃśca mahādrumān| tamasā saṃvṛtaḥ sūryaḥ sarve na vediṣurdiśaḥ || 1-74-14 ||

—जो सम्पूर्ण पृथ्वी को कँपाती हुई और बड़े-बड़े वृक्षों को गिराती हुई चली। सूर्य अन्धकार से आच्छादित हो गया, जिससे किसी को भी दिशाओं का ज्ञान न रहा।

श्लोक 15 (bala.74.15)

भस्मना चावृतं सर्वं सम्मूढमिव तद्बलम्। वसिष्ठ ऋषयचान्ये राजा च ससुतस्तदा ॥ १-७४-१५ ॥

bhasmanā cāvṛtaṃ sarvaṃ sammūḍhamiva tadbalam| vasiṣṭha ṛṣayacānye rājā ca sasutastadā || 1-74-15 ||

सब कुछ राख के समान धूल से आच्छादित हो गया और वह सेना मानो मोहग्रस्त हो गई। उस समय वसिष्ठ, अन्य ऋषि तथा पुत्रों सहित राजा दशरथ—

श्लोक 16 (bala.74.16)

ससंज्ञा इव तत्रासन् सर्वमन्यद्विचेतनम्। तस्मिंस्तमसि घोरे तु भस्मच्छन्नेव सा चमूः ॥ १-७४-१६ ॥

sasaṃjñā iva tatrāsan sarvamanyadvicetanam| tasmiṃstamasi ghore tu bhasmacchanneva sā camūḥ || 1-74-16 ||

—ही वहाँ सचेत रहे, जबकि अन्य सभी मानो अचेत हो गए। उस घोर अन्धकार में राख से ढकी हुई-सी वह सेना ने—

श्लोक 17 (bala.74.17)

ददर्श भीमसंकाशं जटामण्डलधारिणम्। भार्गवं जामदग्न्यं तं राजा राजविमर्दनम् ॥ १-७४-१७ ॥

dadarśa bhīmasaṃkāśaṃ jaṭāmaṇḍaladhāriṇam| bhārgavaṃ jāmadagnyaṃ taṃ rājā rājavimardanam || 1-74-17 ||

—भयानक रूप वाले, जटाओं के मण्डल को धारण किए हुए, राजाओं का विनाश करने वाले उन जमदग्निनन्दन भार्गव को देखा।

श्लोक 18 (bala.74.18)

कैलासमिव दुर्धर्षं कालाग्निमिव दुःसहम्। ज्वलंतमिव तेजोभिः दुर्निरीक्ष्यं पृथग्जनैः ॥ १-७४-१८ ॥

kailāsamiva durdharṣaṃ kālāgnimiva duḥsaham| jvalaṃtamiva tejobhiḥ durnirīkṣyaṃ pṛthagjanaiḥ || 1-74-18 ||

कैलास के समान दुर्धर्ष, प्रलयाग्नि के समान असह्य, अपने तेज से मानो जलते हुए-से, सामान्य जनों के लिए दुर्निरीक्ष्य—

श्लोक 19 (bala.74.19)

स्कन्धे चासज्य परशुं धनुर्विद्युद्गणोपमम्। प्रगृह्य शरमुग्रं च त्रिपुरघ्नं यथा शिवम् ॥ १-७४-१९ ॥

skandhe cāsajya paraśuṃ dhanurvidyudgaṇopamam| pragṛhya śaramugraṃ ca tripuraghnaṃ yathā śivam || 1-74-19 ||

—कन्धे पर फरसा रखे हुए, बिजली के समान धनुष तथा उग्र बाण को हाथ में लिए हुए, वे त्रिपुरनाशक शिवजी के समान प्रतीत हो रहे थे।

श्लोक 20 (bala.74.20)

तं दृष्ट्वा भीमसंकाशं ज्वलंतमिव पावकम्। वसिष्ठप्रमुखा विप्रा जपहोमपरायणाः ॥ १-७४-२० ॥

taṃ dṛṣṭvā bhīmasaṃkāśaṃ jvalaṃtamiva pāvakam| vasiṣṭhapramukhā viprā japahomaparāyaṇāḥ || 1-74-20 ||

अग्नि के समान प्रज्वलित उस भयंकर परशुराम को देखकर, जप-होम में निरत वसिष्ठ आदि ब्राह्मण—

श्लोक 21 (bala.74.21)

संगता मुनयः सर्वे संजजल्पुरथो मिथः। कच्चित् पितृवधामर्षी क्षत्र ं नोत्सादयिष्यति ॥ १-७४-२१ ॥

saṃgatā munayaḥ sarve saṃjajalpuratho mithaḥ| kaccit pitṛvadhāmarṣī kṣatra ṃ notsādayiṣyati || 1-74-21 ||

—सब मुनि एक साथ आकर आपस में कहने लगे — 'कहीं पिता की हत्या से क्रुद्ध होकर यह पुनः क्षत्रियों का विनाश तो नहीं करेगा?'

श्लोक 22 (bala.74.22)

पूर्वं क्षत्रवधं कृत्वा गतमन्युर्गतज्वरः। क्षत्रस्योत्सादनं भूयो न खल्वस्य चिकीर्षितम् ॥ १-७४-२२ ॥

pūrvaṃ kṣatravadhaṃ kṛtvā gatamanyurgatajvaraḥ| kṣatrasyotsādanaṃ bhūyo na khalvasya cikīrṣitam || 1-74-22 ||

'पहले क्षत्रियों का वध करके उनका क्रोध और संताप तो शान्त हो चुका है; निश्चय ही वे अब पुनः क्षत्रियों के नाश की इच्छा नहीं रखते।'

श्लोक 23 (bala.74.23)

एवमुक्त्वार्घ्यमादाय भार्गवं भीमदर्शनम्। ऋषयो राम रामेति मधुरं वाक्यमब्रुवन् ॥ १-७४-२३ ॥

evamuktvārghyamādāya bhārgavaṃ bhīmadarśanam| ṛṣayo rāma rāmeti madhuraṃ vākyamabruvan || 1-74-23 ||

ऐसा कहकर ऋषिगण अर्घ्य लेकर उन भयंकर दिखने वाले भार्गव के पास गए और 'हे राम! हे राम!' कहकर मधुर वचन कहे।

श्लोक 24 (bala.74.24)

प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिदत्तां प्रतापवान्। रामं दाशरथिं रामो जामदग्न्योऽभ्यभाषत ॥ १-७४-२४ ॥

pratigṛhya tu tāṃ pūjāmṛṣidattāṃ pratāpavān| rāmaṃ dāśarathiṃ rāmo jāmadagnyo'bhyabhāṣata || 1-74-24 ||

ऋषियों द्वारा दी गई उस पूजा को ग्रहण करके, प्रतापी जामदग्न्य परशुराम ने दशरथनन्दन श्रीराम से कहा।

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