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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 18

राम-वालि-संवाद

सर्ग 17सर्ग-सूचीसर्ग 19

श्लोक 1 (kishkindha.18.1)

इत्युक्तः प्रश्रितं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् । परुषं वालिना रामो निहतेन विचेतसा ॥ 18.1 ॥

ityuktaḥ praśritaṃ vākyaṃ dharmārthasahitaṃ hitam | paruṣaṃ vālinā rāmo nihatena vicetasā || 18.1 ||

इस प्रकार आहत और अचेत होते हुए वाली ने राम से विनम्र किन्तु धर्म और अर्थ से युक्त, हितकारी तथा कुछ कठोर वचन कहे।

श्लोक 2 (kishkindha.18.2)

तं निष्प्रभमिवादित्यं मुक्ततोयमिवाम्बुदम् । उक्तवाक्यं हरिश्रेष्ठमुपशान्तमिवानलम् ॥ 18.2 ॥

taṃ niṣprabhamivādityaṃ muktatoyamivāmbudam | uktavākyaṃ hariśreṣṭhamupaśāntamivānalam || 18.2 ||

सूर्य के समान कान्तिहीन, जल बरसा चुके मेघ के समान, और बुझी हुई अग्नि के समान हो चुके उस वानरश्रेष्ठ से,

श्लोक 3 (kishkindha.18.3)

धर्मार्थगुणसम्पन्नं हरीश्वरमनुत्तमम् । अधिक्षिप्तस्तदा रामः पश्चाद् वालिनमब्रवीत् ॥ 18.3 ॥

dharmārthaguṇasampannaṃ harīśvaramanuttamam | adhikṣiptastadā rāmaḥ paścād vālinamabravīt || 18.3 ||

धर्म और अर्थ के गुणों से सम्पन्न, अनुपम उस वानरराज को, जिसने अभी-अभी उसे धिक्कारा था, राम ने उत्तर में यह कहा।

श्लोक 4 (kishkindha.18.4)

धर्ममर्थं च कामं च समयं चापि लौकिकम् । अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ॥ 18.4 ॥

dharmamarthaṃ ca kāmaṃ ca samayaṃ cāpi laukikam | avijñāya kathaṃ bālyānmāmihādya vigarhase || 18.4 ||

"धर्म, अर्थ, काम और लोक-व्यवहार को भी न जानते हुए तुम आज मुझे इस प्रकार बचकानेपन से क्यों धिक्कार रहे हो?

श्लोक 5 (kishkindha.18.5)

अपृष्ट्वा बुद्धिसम्पन्नान् वृद्धानाचार्यसम्मतान् । सौम्य वानरचापल्यात् त्वं मां वक्तुमिहेच्छसि ॥ 18.5 ॥

apṛṣṭvā buddhisampannān vṛddhānācāryasammatān | saumya vānaracāpalyāt tvaṃ māṃ vaktumihecchasi || 18.5 ||

हे सौम्य! बुद्धिमान, आचार्यों द्वारा सम्मानित वृद्धजनों से पूछे बिना ही तुम वानर-सुलभ चपलता से मुझसे इस विषय में वाद-विवाद करना चाहते हो।

श्लोक 6 (kishkindha.18.6)

इक्ष्वाकूणामियं भूमिः सशैलवनकानना । मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि ॥ 18.6 ॥

ikṣvākūṇāmiyaṃ bhūmiḥ saśailavanakānanā | mṛgapakṣimanuṣyāṇāṃ nigrahānugraheṣvapi || 18.6 ||

यह पर्वत, वन और कानन सहित सम्पूर्ण पृथ्वी तथा पशु-पक्षी-मनुष्यों को दण्ड देने या अनुग्रह करने का अधिकार भी इक्ष्वाकु-वंशियों का ही है।

श्लोक 7 (kishkindha.18.7)

तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः । धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः ॥ 18.7 ॥

tāṃ pālayati dharmātmā bharataḥ satyavānṛjuḥ | dharmakāmārthatattvajño nigrahānugrahe rataḥ || 18.7 ||

उस पृथ्वी का शासन धर्मात्मा, सत्यवादी, सरल तथा धर्म-अर्थ-काम के तत्त्व को जानने वाले भरत करते हैं, जो दण्ड और अनुग्रह दोनों में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 8 (kishkindha.18.8)

नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम् । विक्रमश्च यथा दृष्टः स राजा देशकालवित् ॥ 18.8 ॥

nayaśca vinayaścobhau yasmin satyaṃ ca susthitam | vikramaśca yathā dṛṣṭaḥ sa rājā deśakālavit || 18.8 ||

जिनमें नीति और विनय दोनों हैं, जिनमें सत्य सुदृढ़ है, और जिनका पराक्रम शास्त्रोक्त है — वे ही देश-काल के ज्ञाता राजा हैं।

श्लोक 9 (kishkindha.18.9)

तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवाः । चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छवः ॥ 18.9 ॥

tasya dharmakṛtādeśā vayamanye ca pārthivāḥ | carāmo vasudhāṃ kṛtsnāṃ dharmasaṃtānamicchavaḥ || 18.9 ||

उन्हीं के धर्मपूर्ण आदेश का पालन करते हुए हम तथा अन्य राजा धर्म की परम्परा बनाए रखने की इच्छा से इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

श्लोक 10 (kishkindha.18.10)

तस्मिन् नृपतिशार्दूले भरते धर्मवत्सले । पालयत्यखिलां पृथ्वीं कश्चरेद् धर्मविप्रियम् ॥ 18.10 ॥

tasmin nṛpatiśārdūle bharate dharmavatsale | pālayatyakhilāṃ pṛthvīṃ kaścared dharmavipriyam || 18.10 ||

जब वह राजाओं में श्रेष्ठ, धर्मवत्सल भरत सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन कर रहे हैं, तब कौन धर्म के विरुद्ध आचरण कर सकता है?

श्लोक 11 (kishkindha.18.11)

ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिताः । भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि ॥ 18.11 ॥

te vayaṃ mārgavibhraṣṭaṃ svadharme parame sthitāḥ | bharatājñāṃ puraskṛtya nigṛhṇīmo yathāvidhi || 18.11 ||

अपने परम धर्म में स्थित हम भरत की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए मार्ग से भटके हुए व्यक्ति को विधिपूर्वक दण्डित करते हैं।

श्लोक 12 (kishkindha.18.12)

त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः । कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि ॥ 18.12 ॥

tvaṃ tu saṃkliṣṭadharmaśca karmaṇā ca vigarhitaḥ | kāmatantrapradhānaśca na sthito rājavartmani || 18.12 ||

किन्तु तुमने धर्म को कलुषित कर दिया, अपने कर्मों से निन्दनीय बन गए, कामवासना को ही प्रधान माना और राजोचित मार्ग पर कभी स्थिर नहीं रहे।

श्लोक 13 (kishkindha.18.13)

ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति । त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः ॥ 18.13 ॥

jyeṣṭho bhrātā pitā vāpi yaśca vidyāṃ prayacchati | trayaste pitaro jñeyā dharme ca pathi vartinaḥ || 18.13 ||

धर्म-पथ पर चलने वाले के लिए बड़ा भाई, पिता और विद्या देने वाला गुरु — इन तीनों को पिता के समान जानना चाहिए।

श्लोक 14 (kishkindha.18.14)

यवीयानात्मनः पुत्रः शिष्यश्चापि गुणोदितः । पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम् ॥ 18.14 ॥

yavīyānātmanaḥ putraḥ śiṣyaścāpi guṇoditaḥ | putravatte trayaścintyā dharmaścaivātra kāraṇam || 18.14 ||

छोटा भाई, अपना पुत्र और गुणवान शिष्य — इन तीनों को भी पुत्र के समान मानना चाहिए; इसका आधार धर्म ही है।

श्लोक 15 (kishkindha.18.15)

सूक्ष्मः परमदुर्ज्ञेयः सतां धर्मः प्लवङ्गम । हृदिस्थः सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम् ॥ 18.15 ॥

sūkṣmaḥ paramadurjñeyaḥ satāṃ dharmaḥ plavaṅgama | hṛdisthaḥ sarvabhūtānāmātmā veda śubhāśubham || 18.15 ||

हे वानर! सज्जनों का धर्म अत्यन्त सूक्ष्म और दुर्बोध है; सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा ही शुभ-अशुभ को जानती है।

श्लोक 16 (kishkindha.18.16)

चपलश्चपलैः सार्धं वानरैरकृतात्मभिः । जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम् ॥ 18.16 ॥

capalaścapalaiḥ sārdhaṃ vānarairakṛtātmabhiḥ | jātyandha iva jātyandhairmantrayan prekṣase nu kim || 18.16 ||

स्वयं चंचल तथा चंचल और असंयत मन वाले वानरों के साथ परामर्श करने वाले तुम, जन्मान्ध व्यक्ति के जन्मान्धों से सलाह लेने के समान, भला क्या देख सकते हो?

श्लोक 17 (kishkindha.18.17)

अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते । नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥ 18.17 ॥

ahaṃ tu vyaktatāmasya vacanasya bravīmi te | nahi māṃ kevalaṃ roṣāt tvaṃ vigarhitumarhasi || 18.17 ||

मैं तुम्हें अपने इस कार्य का स्पष्ट कारण बताता हूँ — केवल क्रोधवश तुम्हें मुझे धिक्कारना उचित नहीं है।

श्लोक 18 (kishkindha.18.18)

तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः । भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ 18.18 ॥

tadetat kāraṇaṃ paśya yadarthaṃ tvaṃ mayā hataḥ | bhrāturvartasi bhāryāyāṃ tyaktvā dharmaṃ sanātanam || 18.18 ||

देखो, किस कारण से तुम मेरे द्वारा मारे गए — तुमने सनातन धर्म को त्यागकर अपने भाई की पत्नी को अपना लिया।

श्लोक 19 (kishkindha.18.19)

अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः । रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ॥ 18.19 ॥

asya tvaṃ dharamāṇasya sugrīvasya mahātmanaḥ | rumāyāṃ vartase kāmāt snuṣāyāṃ pāpakarmakṛt || 18.19 ||

महात्मा सुग्रीव के जीवित रहते हुए भी, हे पापकर्मी, तुमने वासनावश रुमा को, जो तुम्हारे लिए पुत्रवधू के समान थी, अपना लिया।

श्लोक 20 (kishkindha.18.20)

तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर । भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः ॥ 18.20 ॥

tad vyatītasya te dharmāt kāmavṛttasya vānara | bhrātṛbhāryābhimarśe'smin daṇḍo'yaṃ pratipāditaḥ || 18.20 ||

इसीलिए, हे वानर, धर्म से भटककर कामवश हो जाने और भाई की पत्नी को छूने के इस अपराध के लिए तुम्हें यह दण्ड दिया गया है।

श्लोक 21 (kishkindha.18.21)

नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः । दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप ॥ 18.21 ॥

nahi lokaviruddhasya lokavṛttādapeyuṣaḥ | daṇḍādanyatra paśyāmi nigrahaṃ hariyūthapa || 18.21 ||

हे वानरयूथपति! जो लोक-विरुद्ध आचरण करता है और लोक-मर्यादा से विचलित होता है, उसके लिए दण्ड के अतिरिक्त और कोई नियंत्रण मुझे दिखाई नहीं देता।

श्लोक 22 (kishkindha.18.22)

न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद्गतः । औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः ॥ 18.22 ॥

na ca te marṣaye pāpaṃ kṣatriyo'haṃ kulodgataḥ | aurasīṃ bhaginīṃ vāpi bhāryāṃ vāpyanujasya yaḥ || 18.22 ||

श्रेष्ठ क्षत्रिय-कुल में उत्पन्न मैं तुम्हारे इस पाप को क्षमा नहीं कर सकता। जो कोई अपनी पुत्री, बहन अथवा छोटे भाई की पत्नी के साथ

श्लोक 23 (kishkindha.18.23)

प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः । भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः ॥ 18.23 ॥

pracareta naraḥ kāmāt tasya daṇḍo vadhaḥ smṛtaḥ | bharatastu mahīpālo vayaṃ tvādeśavartinaḥ || 18.23 ||

कामवश ऐसा आचरण करता है, उसके लिए शास्त्रों में मृत्युदण्ड ही कहा गया है। भरत इस पृथ्वी के स्वामी हैं और हम उन्हीं के आदेश का पालन करने वाले हैं;

श्लोक 24 (kishkindha.18.24)

त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम् । गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन् ॥ 18.24 ॥

tvaṃ ca dharmādatikrāntaḥ kathaṃ śakyamupekṣitum | gurudharmavyatikrāntaṃ prājño dharmeṇa pālayan || 18.24 ||

और तुमने धर्म का उल्लंघन किया है, तो इसकी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी? धर्मपूर्वक शासन करने वाला बुद्धिमान शासक गुरुतर धर्म का उल्लंघन करने वाले पर,

श्लोक 25 (kishkindha.18.25)

भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः । वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर । त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिताः ॥ 18.25 ॥

bharataḥ kāmayuktānāṃ nigrahe paryavasthitaḥ | vayaṃ tu bharatādeśāvadhiṃ kṛtvā harīśvara | tvadvidhān bhinnamaryādān nigrahītuṃ vyavasthitāḥ || 18.25 ||

भरत काम के वशीभूत लोगों को दण्डित करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। और हम, हे वानरेश्वर, भरत की आज्ञा को ही सीमा मानकर, तुम्हारे जैसे मर्यादा तोड़ने वालों को दण्डित करने के लिए तत्पर हैं।

श्लोक 26 (kishkindha.18.26)

सुग्रीवेण च मे सख्यं लक्ष्मणेन यथा तथा । दारराज्यनिमित्तं च निःश्रेयस्करः स मे ॥ 18.26 ॥

sugrīveṇa ca me sakhyaṃ lakṣmaṇena yathā tathā | dārarājyanimittaṃ ca niḥśreyaskaraḥ sa me || 18.26 ||

सुग्रीव से मेरी मित्रता वैसी ही है जैसी लक्ष्मण से — यद्यपि यह मित्रता उसकी पत्नी और राज्य के निमित्त से हुई, फिर भी वह मेरे लिए कल्याणकारी है।

श्लोक 27 (kishkindha.18.27)

प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसंनिधौ । प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥ 18.27 ॥

pratijñā ca mayā dattā tadā vānarasaṃnidhau | pratijñā ca kathaṃ śakyā madvidhenānavekṣitum || 18.27 ||

मैंने उस समय वानरों की उपस्थिति में यह प्रतिज्ञा की थी — और मुझ जैसे व्यक्ति के लिए दी गई प्रतिज्ञा का उल्लंघन कैसे सम्भव हो सकता है?

श्लोक 28 (kishkindha.18.28)

तदेभिः कारणैः सर्वैर्महद्भिर्धर्मसंश्रितैः । शासनं तव यद् युक्तं तद् भवाननुमन्यताम् ॥ 18.28 ॥

tadebhiḥ kāraṇaiḥ sarvairmahadbhirdharmasaṃśritaiḥ | śāsanaṃ tava yad yuktaṃ tad bhavānanumanyatām || 18.28 ||

अतः इन सब महत्त्वपूर्ण और धर्मसंगत कारणों से तुम्हें दिया गया यह दण्ड उचित है, ऐसा तुम स्वीकार करो।

श्लोक 29 (kishkindha.18.29)

सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रहः । वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ॥ 18.29 ॥

sarvathā dharma ityeva draṣṭavyastava nigrahaḥ | vayasyasyopakartavyaṃ dharmamevānupaśyatā || 18.29 ||

हर प्रकार से तुम्हारे इस दण्ड को धर्मसंगत ही समझना चाहिए, क्योंकि धर्म का ही अनुसरण करते हुए मित्र की सहायता करना अनिवार्य होता है।

श्लोक 30 (kishkindha.18.30)

शक्यं त्वयापि तत्कार्यं धर्ममेवानुवर्तता । श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ । गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ 18.30 ॥

śakyaṃ tvayāpi tatkāryaṃ dharmamevānuvartatā | śrūyate manunā gītau ślokau cāritravatsalau | gṛhītau dharmakuśalaistathā taccaritaṃ mayā || 18.30 ||

यदि तुम भी धर्म का ही अनुसरण करते तो तुम भी ऐसा ही करते। सुना जाता है कि मनु द्वारा सदाचार को प्रिय मानने वाले दो श्लोक कहे गए हैं, जिन्हें धर्मकुशल पुरुषों ने भी स्वीकार किया है; मैंने भी उन्हीं के अनुसार आचरण किया है।

श्लोक 31 (kishkindha.18.31)

राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ 18.31 ॥

rājabhirdhṛtadaṇḍāśca kṛtvā pāpāni mānavāḥ | nirmalāḥ svargamāyānti santaḥ sukṛtino yathā || 18.31 ||

'पाप करने वाले मनुष्य जब राजाओं द्वारा उचित दण्ड पाते हैं, तो वे निर्मल होकर सुकृती सज्जनों के समान स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।'

श्लोक 32 (kishkindha.18.32)

शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥ 18.32 ॥

śāsanād vāpi mokṣād vā stenaḥ pāpāt pramucyate | rājā tvaśāsan pāpasya tadavāpnoti kilbiṣam || 18.32 ||

'चोर दण्ड पाकर अथवा क्षमा पाकर भी पाप से मुक्त हो जाता है, किन्तु जो राजा दण्ड नहीं देता, वह स्वयं उस पाप का भागी बनता है।'

श्लोक 33 (kishkindha.18.33)

आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम् । श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया ॥ 18.33 ॥

āryeṇa mama māndhātrā vyasanaṃ ghoramīpsitam | śramaṇena kṛte pāpe yathā pāpaṃ kṛtaṃ tvayā || 18.33 ||

तुमने जैसा पाप किया है, वैसा ही पाप जब किसी श्रमण ने किया था, तब मेरे पूज्य पूर्वज मान्धाता ने उसे वही भयंकर दण्ड दिया था जो उन्हें उचित लगा।

श्लोक 34 (kishkindha.18.34)

अन्यैरपि कृतं पापं प्रमत्तैर्वसुधाधिपैः । प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रजः ॥ 18.34 ॥

anyairapi kṛtaṃ pāpaṃ pramattairvasudhādhipaiḥ | prāyaścittaṃ ca kurvanti tena tacchāmyate rajaḥ || 18.34 ||

पृथ्वी के अन्य प्रमादी राजाओं ने भी ऐसा पाप किया है, और वे प्रायश्चित करके उस पाप-रज को शान्त करते हैं।

श्लोक 35 (kishkindha.18.35)

तदलं परितापेन धर्मतः परिकल्पितः । वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ 18.35 ॥

tadalaṃ paritāpena dharmataḥ parikalpitaḥ | vadho vānaraśārdūla na vayaṃ svavaśe sthitāḥ || 18.35 ||

अतः हे वानरशार्दूल! अब पश्चाताप छोड़ो — तुम्हारा यह वध धर्मानुसार ही निश्चित किया गया है, हम स्वयं अपने वश में नहीं हैं।

श्लोक 36 (kishkindha.18.36)

शृणु चाप्यपरं भूयः कारणं हरिपुंगव । तच्छ्रुत्वा हि महद् वीर न मन्युं कर्तुमर्हसि ॥ 18.36 ॥

śṛṇu cāpyaparaṃ bhūyaḥ kāraṇaṃ haripuṃgava | tacchrutvā hi mahad vīra na manyuṃ kartumarhasi || 18.36 ||

हे वानरश्रेष्ठ! एक और कारण भी सुनो; हे वीर! इस महत्त्वपूर्ण बात को सुनकर तुम्हें फिर क्रोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 37 (kishkindha.18.37)

न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव । वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नराः ॥ 18.37 ॥

na me tatra manastāpo na manyurharipuṃgava | vāgurābhiśca pāśaiśca kūṭaiśca vividhairnarāḥ || 18.37 ||

हे वानरश्रेष्ठ! इस विषय में मुझे न तो मानसिक कष्ट है और न ही क्रोध। मनुष्य जाल, फंदों और नाना प्रकार के उपायों से,

श्लोक 38 (kishkindha.18.38)

प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान् । प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्रब्धानतिविष्ठितान् ॥ 18.38 ॥

praticchannāśca dṛśyāśca gṛhṇanti subahūn mṛgān | pradhāvitān vā vitrastān visrabdhānativiṣṭhitān || 18.38 ||

छिपकर या खुले रूप में बहुत से पशुओं को पकड़ते हैं — चाहे वे भाग रहे हों, भयभीत हों, या निश्चिंत होकर स्थिर खड़े हों,

श्लोक 39 (kishkindha.18.39)

प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम् । विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते ॥ 18.39 ॥

pramattānapramattān vā narā māṃsāśino bhṛśam | vidhyanti vimukhāṃścāpi na ca doṣo'tra vidyate || 18.39 ||

चाहे वे सावधान हों या असावधान। मांसाहारी मनुष्य उन्हें पीछे से भी बींध डालते हैं, और इसमें कोई दोष नहीं माना जाता।

श्लोक 40 (kishkindha.18.40)

यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदाः । तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर । अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि ॥ 18.40 ॥

yānti rājarṣayaścātra mṛgayāṃ dharmakovidāḥ | tasmāt tvaṃ nihato yuddhe mayā bāṇena vānara | ayudhyan pratiyudhyan vā yasmācchākhāmṛgo hyasi || 18.40 ||

धर्म के जानकार राजर्षि भी इसी प्रकार आखेट करते हैं। इसीलिए, हे वानर! चाहे तुम युद्धरत रहे हो या न रहे हो, चूँकि तुम शाखामृग (वृक्षवासी पशु) हो, इसलिए मैंने तुम्हें बाण से युद्ध में मार डाला।

श्लोक 41 (kishkindha.18.41)

दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च । राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशयः ॥ 18.41 ॥

durlabhasya ca dharmasya jīvitasya śubhasya ca | rājāno vānaraśreṣṭha pradātāro na saṃśayaḥ || 18.41 ||

हे वानरश्रेष्ठ! राजा ही दुर्लभ धर्म तथा शुभ जीवन के दाता होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 42 (kishkindha.18.42)

तान् न हिंस्यान्न चाक्रोशेन्नाक्षिपेन्नाप्रियं वदेत् । देवा मानुषरूपेण चरन्त्येते महीतले ॥ 18.42 ॥

tān na hiṃsyānna cākrośennākṣipennāpriyaṃ vadet | devā mānuṣarūpeṇa carantyete mahītale || 18.42 ||

उन्हें न तो चोट पहुँचानी चाहिए, न कोसना चाहिए, न लांछित करना चाहिए और न ही उनसे अप्रिय वचन कहना चाहिए, क्योंकि ये राजा मनुष्य-रूप में विचरण करने वाले देवता ही हैं।

श्लोक 43 (kishkindha.18.43)

त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थितः । विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम् ॥ 18.43 ॥

tvaṃ tu dharmamavijñāya kevalaṃ roṣamāsthitaḥ | vidūṣayasi māṃ dharme pitṛpaitāmahe sthitam || 18.43 ||

किन्तु तुम धर्म को समझे बिना केवल क्रोध का ही आश्रय लेकर, पितृ-पितामह की परम्परा में स्थित मुझे दोष देते हो।" ऐसा राम ने मरणासन्न वाली से कहा।

श्लोक 44 (kishkindha.18.44)

एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ॥ 18.44 ॥

evamuktastu rāmeṇa vālī pravyathito bhṛśam | na doṣaṃ rāghave dadhyau dharme'dhigataniścayaḥ || 18.44 ||

राम के इस प्रकार कहने पर वाली अत्यन्त द्रवित हो उठा; धर्म के विषय में निश्चय प्राप्त कर उसने राघव में कोई दोष नहीं पाया।

श्लोक 45 (kishkindha.18.45)

प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः । यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशयः ॥ 18.45 ॥

pratyuvāca tato rāmaṃ prāñjalirvānareśvaraḥ | yat tvamāttha naraśreṣṭha tat tathaiva na saṃśayaḥ || 18.45 ||

तब उस वानरराज ने हाथ जोड़कर राम को उत्तर दिया, "हे नरश्रेष्ठ! तुमने जो कहा है, वह ठीक वैसा ही है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 46 (kishkindha.18.46)

प्रतिवक्तुं प्रकृष्टे हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात् । यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम् ॥ 18.46 ॥

prativaktuṃ prakṛṣṭe hi nāpakṛṣṭastu śaknuyāt | yadayuktaṃ mayā pūrvaṃ pramādād vākyamapriyam || 18.46 ||

निश्चय ही, हीन व्यक्ति श्रेष्ठ को उत्तर देने में समर्थ नहीं होता। पहले मैंने भ्रमवश जो अनुचित और अप्रिय वचन कहे थे,

श्लोक 47 (kishkindha.18.47)

तत्रापि खलु मे दोषं कर्तुं नार्हसि राघव । त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञः प्रजानां च हिते रतः । कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया ॥ 18.47 ॥

tatrāpi khalu me doṣaṃ kartuṃ nārhasi rāghava | tvaṃ hi dṛṣṭārthatattvajñaḥ prajānāṃ ca hite rataḥ | kāryakāraṇasiddhau ca prasannā buddhiravyayā || 18.47 ||

हे राघव! उनके लिए भी तुम्हें मुझे दोषी नहीं मानना चाहिए — क्योंकि तुम्हीं समस्त प्रयोजनों के मर्म को जानने वाले, प्रजा के हित में रत तथा कार्य-कारण के निर्णय में सदा निर्मल बुद्धिवाले हो।

श्लोक 48 (kishkindha.18.48)

मामप्यवगतं धर्माद् व्यतिक्रान्तपुरस्कृतम् । धर्मसंहितया वाचा धर्मज्ञ परिपालय ॥ 18.48 ॥

māmapyavagataṃ dharmād vyatikrāntapuraskṛtam | dharmasaṃhitayā vācā dharmajña paripālaya || 18.48 ||

मैं भी धर्म से भटककर अपराधियों में अग्रगण्य बन गया हूँ; हे धर्मज्ञ! धर्मयुक्त वचनों से मेरी रक्षा करो।"

श्लोक 49 (kishkindha.18.49)

बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली सार्तरवः शनैः । उवाच रामं सम्प्रेक्ष्य पङ्कलग्न इव द्विपः ॥ 18.49 ॥

bāṣpasaṃruddhakaṇṭhastu vālī sārtaravaḥ śanaiḥ | uvāca rāmaṃ samprekṣya paṅkalagna iva dvipaḥ || 18.49 ||

फिर आँसुओं से अवरुद्ध कण्ठवाला और पीड़ा से कराहता हुआ वाली, कीचड़ में फँसे हुए गजराज के समान, राम की ओर देखकर धीरे-धीरे बोला।

श्लोक 50 (kishkindha.18.50)

न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान् । यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम् ॥ 18.50 ॥

na cātmānamahaṃ śoce na tārāṃ nāpi bāndhavān | yathā putraṃ guṇajyeṣṭhamaṅgadaṃ kanakāṅgadam || 18.50 ||

"मुझे न तो अपनी, न तारा की और न ही अपने बन्धु-बान्धवों की उतनी चिन्ता है, जितनी अपने गुणों में श्रेष्ठ, स्वर्ण-भूषित पुत्र अंगद की है।

श्लोक 51 (kishkindha.18.51)

स ममादर्शनाद् दीनो बाल्यात् प्रभृति लालितः । तटाक इव पीताम्बुरुपशोषं गमिष्यति ॥ 18.51 ॥

sa mamādarśanād dīno bālyāt prabhṛti lālitaḥ | taṭāka iva pītāmburupaśoṣaṃ gamiṣyati || 18.51 ||

बचपन से लाड़-प्यार से पाला गया वह मुझे न देखकर व्याकुल हो उठेगा और जल-रहित सरोवर के समान सूखता चला जाएगा।

श्लोक 52 (kishkindha.18.52)

बालश्चाकृतबुद्धिश्च एकपुत्रश्च मे प्रियः । तारेयो राम भवता रक्षणीयो महाबलः ॥ 18.52 ॥

bālaścākṛtabuddhiśca ekaputraśca me priyaḥ | tāreyo rāma bhavatā rakṣaṇīyo mahābalaḥ || 18.52 ||

वह अभी बालक है, अपरिपक्व बुद्धिवाला है और मेरा एकमात्र प्रिय पुत्र है; हे राम! तारा के उस महाबली पुत्र की रक्षा तुम्हें करनी चाहिए।

श्लोक 53 (kishkindha.18.53)

सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम् । त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थितः ॥ 18.53 ॥

sugrīve cāṅgade caiva vidhatsva matimuttamām | tvaṃ hi goptā ca śāstā ca kāryākāryavidhau sthitaḥ || 18.53 ||

सुग्रीव और अंगद दोनों के प्रति उत्तम भाव रखना; क्योंकि तुम ही रक्षक और शासक हो, तथा कर्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में सदा स्थिर रहते हो।

श्लोक 54 (kishkindha.18.54)

या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या । सुग्रीवे चाङ्गदे राजंस्तां चिन्तयितुमर्हसि ॥ 18.54 ॥

yā te narapate vṛttirbharate lakṣmaṇe ca yā | sugrīve cāṅgade rājaṃstāṃ cintayitumarhasi || 18.54 ||

हे नरपते! भरत और लक्ष्मण के प्रति तुम्हारा जो भाव है, हे राजन्! वही भाव सुग्रीव और अंगद के प्रति भी रखना उचित होगा।

श्लोक 55 (kishkindha.18.55)

मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम् । सुग्रीवो नावमन्येत तथावस्थातुमर्हसि ॥ 18.55 ॥

maddoṣakṛtadoṣāṃ tāṃ yathā tārāṃ tapasvinīm | sugrīvo nāvamanyeta tathāvasthātumarhasi || 18.55 ||

मेरे ही दोष के कारण दोषी ठहरी हुई उस दुखियारी तारा का सुग्रीव अनादर न करे, इसका ध्यान तुम्हें रखना चाहिए।

श्लोक 56 (kishkindha.18.56)

त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम् । त्वद्वशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना ॥ 18.56 ॥

tvayā hyanugṛhītena śakyaṃ rājyamupāsitum | tvadvaśe vartamānena tava cittānuvartinā || 18.56 ||

जिस पर तुम्हारी कृपा हो और जो तुम्हारे अधीन रहकर तुम्हारे मन के अनुसार चले, वह राज्य का पालन सहज ही कर सकता है —

श्लोक 57 (kishkindha.18.57)

शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम् । त्वत्तोऽहं वधमाकांक्षन् वार्यमाणोऽपि तारया ॥ 18.57 ॥

śakyaṃ divaṃ cārjayituṃ vasudhāṃ cāpi śāsitum | tvatto'haṃ vadhamākāṃkṣan vāryamāṇo'pi tārayā || 18.57 ||

वह स्वर्ग भी प्राप्त कर सकता है और सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन भी कर सकता है। मैं तो, तारा के रोकने पर भी, मानो तुम्हारे हाथों मृत्यु चाहता हुआ ही,

श्लोक 58 (kishkindha.18.58)

सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागतः । इत्युक्त्वा वानरो रामं विरराम हरीश्वरः ॥ 18.58 ॥

sugrīveṇa saha bhrātrā dvandvayuddhamupāgataḥ | ityuktvā vānaro rāmaṃ virarāma harīśvaraḥ || 18.58 ||

अपने भाई सुग्रीव के साथ द्वन्द्व-युद्ध करने चला आया।" यह कहकर वह वानरराज राम से बोलते-बोलते रुक गया।

श्लोक 59 (kishkindha.18.59)

स तमाश्वासयद् रामो वालिनं व्यक्तदर्शनम् । साधुसम्मतया वाचा धर्मतत्त्वार्थयुक्तया ॥ 18.59 ॥

sa tamāśvāsayad rāmo vālinaṃ vyaktadarśanam | sādhusammatayā vācā dharmatattvārthayuktayā || 18.59 ||

तब राम ने साधु-पुरुषों द्वारा सम्मत तथा धर्म के तत्त्व और अर्थ से युक्त वाणी से, अब स्पष्ट दृष्टिवाले वाली को सान्त्वना दी।

श्लोक 60 (kishkindha.18.60)

न संतापस्त्वया कार्य एतदर्थं प्लवङ्गम । न वयं भवता चिन्त्या नाप्यात्मा हरिसत्तम । वयं भवद्विशेषेण धर्मतः कृतनिश्चयाः ॥ 18.60 ॥

na saṃtāpastvayā kārya etadarthaṃ plavaṅgama | na vayaṃ bhavatā cintyā nāpyātmā harisattama | vayaṃ bhavadviśeṣeṇa dharmataḥ kṛtaniścayāḥ || 18.60 ||

"हे वानर! इसके लिए तुम्हें दुखी नहीं होना चाहिए। न तो तुम्हें हमारी चिन्ता करनी चाहिए, न अपनी ही, हे वानरश्रेष्ठ; हमने तुम्हारे प्रति विशेष विचार करते हुए ही धर्मानुसार यह निर्णय लिया है।

श्लोक 61 (kishkindha.18.61)

दण्ड्ये यः पातयेद् दण्डं दण्ड्यो यश्चापि दण्ड्यते । कार्यकारणसिद्धार्थावुभौ तौ नावसीदतः ॥ 18.61 ॥

daṇḍye yaḥ pātayed daṇḍaṃ daṇḍyo yaścāpi daṇḍyate | kāryakāraṇasiddhārthāvubhau tau nāvasīdataḥ || 18.61 ||

जो दण्डनीय पर उचित दण्ड डालता है और जो दण्डनीय होकर दण्ड पाता है — वे दोनों ही कार्य-कारण से सिद्ध अर्थ को प्राप्त करते हैं, दोनों में से किसी का पतन नहीं होता।

श्लोक 62 (kishkindha.18.62)

तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद् विगतकल्मषः । गतः स्वां प्रकृतिं धर्म्यां दण्डदिष्टेन वर्त्मना ॥ 18.62 ॥

tad bhavān daṇḍasaṃyogādasmād vigatakalmaṣaḥ | gataḥ svāṃ prakṛtiṃ dharmyāṃ daṇḍadiṣṭena vartmanā || 18.62 ||

अतः इस दण्ड के संयोग से ही तुम कलंकरहित हो गए हो और दण्ड द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से अपनी धर्ममय स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गए हो।

श्लोक 63 (kishkindha.18.63)

त्यज शोकं च मोहं च भयं च हृदये स्थितम् । त्वया विधानं हर्यग्र्य न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ 18.63 ॥

tyaja śokaṃ ca mohaṃ ca bhayaṃ ca hṛdaye sthitam | tvayā vidhānaṃ haryagrya na śakyamativartitum || 18.63 ||

हे वानरश्रेष्ठ! अपने हृदय में स्थित शोक, मोह और भय को त्याग दो — विधि का विधान तुम्हारे द्वारा भी टाला नहीं जा सकता।

श्लोक 64 (kishkindha.18.64)

यथा त्वय्यङ्गदो नित्यं वर्तते वानरेश्वर । तथा वर्तेत सुग्रीवे मयि चापि न संशयः ॥ 18.64 ॥

yathā tvayyaṅgado nityaṃ vartate vānareśvara | tathā varteta sugrīve mayi cāpi na saṃśayaḥ || 18.64 ||

हे वानरेश्वर! जैसे अंगद सदा तुम्हारे प्रति आचरण करता रहा है, वैसे ही वह सुग्रीव के तथा मेरे प्रति भी आचरण करेगा, इसमें कोई संशय नहीं।"

श्लोक 65 (kishkindha.18.65)

स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मनः समाहितं धर्मपथानुवर्तितम् । निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो वचः सुयुक्तं निजगाद वानरः ॥ 18.65 ॥

sa tasya vākyaṃ madhuraṃ mahātmanaḥ samāhitaṃ dharmapathānuvartitam | niśamya rāmasya raṇāvamardino vacaḥ suyuktaṃ nijagāda vānaraḥ || 18.65 ||

युद्ध में शत्रुओं को कुचलने वाले, सदा धर्म-पथ पर चलने वाले महात्मा राम के इन मधुर और सुविचारित वचनों को सुनकर वानर वाली ने ये सुसंगत वचन कहे।

श्लोक 66 (kishkindha.18.66)

शराभितप्तेन विचेतसा मया प्रभाषितस्त्वं यदजानता विभो । इदं महेन्द्रोपमभीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे नरेश्वर ॥ 18.66 ॥

śarābhitaptena vicetasā mayā prabhāṣitastvaṃ yadajānatā vibho | idaṃ mahendropamabhīmavikrama prasāditastvaṃ kṣama me nareśvara || 18.66 ||

"हे प्रभो! बाण की पीड़ा से जलते हुए और चेतनाशून्य होकर मैंने अनजाने में तुमसे जो कुछ कहा — हे महेन्द्र के समान भीषण पराक्रमी नरेश्वर! उसके लिए मुझे क्षमा करो, मैं तुम्हें प्रसन्न करना चाहता हूँ।"

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