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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 2

सुग्रीव की आशंका और हनुमान का प्रेषण

सर्ग 1सर्ग-सूचीसर्ग 3

श्लोक 1 (kishkindha.2.1)

तौ तु दृष्ट्वा महात्मानौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । वरायुधधरौ वीरौ सुग्रीवः शङ्कितोऽभवत् ॥ 2.1 ॥

tau tu dṛṣṭvā mahātmānau bhrātarau rāmalakṣmaṇau | varāyudhadharau vīrau sugrīvaḥ śaṅkito'bhavat || 2.1 ||

किन्तु उत्तम अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए उन दोनों महात्मा वीर भाइयों राम और लक्ष्मण को देखकर सुग्रीव भयभीत हो उठे।

श्लोक 2 (kishkindha.2.2)

उद्विग्नहृदयः सर्वा दिशः समवलोकयन् । न व्यतिष्ठत कस्मिंश्चिद् देशे वानरपुंगवः ॥ 2.2 ॥

udvignahṛdayaḥ sarvā diśaḥ samavalokayan | na vyatiṣṭhata kasmiṃścid deśe vānarapuṃgavaḥ || 2.2 ||

व्याकुल हृदयवाले उस वानरश्रेष्ठ ने सब दिशाओं में देखते हुए भी कहीं स्थिर होकर खड़े रहना उचित न समझा।

श्लोक 3 (kishkindha.2.3)

नैव चक्रे मनः स्थातुं वीक्षमाणौ महाबलौ । कपेः परमभीतस्य चित्तं व्यवससाद ह ॥ 2.3 ॥

naiva cakre manaḥ sthātuṃ vīkṣamāṇau mahābalau | kapeḥ paramabhītasya cittaṃ vyavasasāda ha || 2.3 ||

उन दोनों महाबली वीरों को देखते हुए उसका मन वहाँ ठहरने के लिए तैयार ही नहीं हुआ; अत्यंत भयभीत उस वानर का चित्त निराश हो गया।

श्लोक 4 (kishkindha.2.4)

चिन्तयित्वा स धर्मात्मा विमृश्य गुरुलाघवम् । सुग्रीवः परमोद्विग्नः सर्वैस्तैर्वानरैः सह ॥ 2.4 ॥

cintayitvā sa dharmātmā vimṛśya gurulāghavam | sugrīvaḥ paramodvignaḥ sarvaistairvānaraiḥ saha || 2.4 ||

उस धर्मात्मा सुग्रीव ने गंभीरता से विचार कर, कार्य के गुरुत्व-लघुत्व पर विमर्श करते हुए, अत्यंत उद्विग्न होकर उन सब वानरों के साथ...

श्लोक 5 (kishkindha.2.5)

ततः स सचिवेभ्यस्तु सुग्रीवः प्लवगाधिपः । शशंस परमोद्विग्नः पश्यंस्तौ रामलक्ष्मणौ ॥ 2.5 ॥

tataḥ sa sacivebhyastu sugrīvaḥ plavagādhipaḥ | śaśaṃsa paramodvignaḥ paśyaṃstau rāmalakṣmaṇau || 2.5 ||

...तब वानरों के स्वामी सुग्रीव ने राम-लक्ष्मण को देखते हुए अत्यंत उद्विग्न होकर अपने मंत्रियों से यह कहा:

श्लोक 6 (kishkindha.2.6)

एतौ वनमिदं दुर्गं वालिप्रणिहितौ ध्रुवम् । छद्मना चीरवसनौ प्रचरन्ताविहागतौ ॥ 2.6 ॥

etau vanamidaṃ durgaṃ vālipraṇihitau dhruvam | chadmanā cīravasanau pracarantāvihāgatau || 2.6 ||

'ये दोनों छद्मवेश में वल्कल वस्त्र धारण किए हुए, इस दुर्गम वन में विचरण करते हुए निश्चय ही वालि द्वारा भेजे गए हैं।'

श्लोक 7 (kishkindha.2.7)

ततः सुग्रीवसचिवा दृष्ट्वा परमधन्विनौ । जग्मुर्गिरितटात् तस्मादन्यच्छिखरमुत्तमम् ॥ 2.7 ॥

tataḥ sugrīvasacivā dṛṣṭvā paramadhanvinau | jagmurgiritaṭāt tasmādanyacchikharamuttamam || 2.7 ||

तब सुग्रीव के मंत्री उन दोनों महान् धनुर्धरों को देखकर, उस पर्वत की ढलान को छोड़कर दूसरे ऊँचे शिखर पर चले गए।

श्लोक 8 (kishkindha.2.8)

ते क्षिप्रमभिगम्याथ यूथपा यूथपर्षभम् । हरयो वानरश्रेष्ठं परिवार्योपतस्थिरे ॥ 2.8 ॥

te kṣipramabhigamyātha yūthapā yūthaparṣabham | harayo vānaraśreṣṭhaṃ parivāryopatasthire || 2.8 ||

फिर वे यूथपति वानर शीघ्रता से यूथपतियों के प्रमुख, उस वानरश्रेष्ठ सुग्रीव के पास पहुँचकर उन्हें घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 9 (kishkindha.2.9)

एवमेकायनगताः प्लवमाना गिरेर्गिरिम् । प्रकम्पयन्तो वेगेन गिरीणां शिखराणि च ॥ 2.9 ॥

evamekāyanagatāḥ plavamānā girergirim | prakampayanto vegena girīṇāṃ śikharāṇi ca || 2.9 ||

इस प्रकार एक ही मार्ग से जाते हुए, पर्वत से पर्वत पर कूदते हुए, वे अपने वेग से पर्वतों के शिखरों को कँपा रहे थे।

श्लोक 10 (kishkindha.2.10)

ततः शाखामृगाः सर्वे प्लवमाना महाबलाः । बभञ्जुश्च नगांस्तत्र पुष्पितान् दुर्गमाश्रितान् ॥ 2.10 ॥

tataḥ śākhāmṛgāḥ sarve plavamānā mahābalāḥ | babhañjuśca nagāṃstatra puṣpitān durgamāśritān || 2.10 ||

तब वे सब महाबली वानर उछलते-कूदते हुए वहाँ के दुर्गम स्थानों में स्थित पुष्पित वृक्षों को तोड़ने लगे।

श्लोक 11 (kishkindha.2.11)

आप्लवन्तो हरिवराः सर्वतस्तं महागिरिम् । मृगमार्जारशार्दूलांस्त्रासयन्तो ययुस्तदा ॥ 2.11 ॥

āplavanto harivarāḥ sarvatastaṃ mahāgirim | mṛgamārjāraśārdūlāṃstrāsayanto yayustadā || 2.11 ||

वे श्रेष्ठ वानर उस विशाल पर्वत पर सब ओर कूदते-फाँदते हुए, मृगों, बिलावों और व्याघ्रों को भयभीत करते हुए आगे बढ़ चले।

श्लोक 12 (kishkindha.2.12)

ततः सुग्रीवसचिवाः पर्वतेन्द्रे समाहिताः । संगम्य कपिमुख्येन सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ॥ 2.12 ॥

tataḥ sugrīvasacivāḥ parvatendre samāhitāḥ | saṃgamya kapimukhyena sarve prāñjalayaḥ sthitāḥ || 2.12 ||

तब सुग्रीव के मंत्री उस पर्वतराज पर एकत्र होकर, वानरों के प्रमुख सुग्रीव के पास पहुँचकर सब हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

श्लोक 13 (kishkindha.2.13)

ततस्तु भयसंत्रस्तं वालिकिल्बिषशङ्कितम् । उवाच हनुमान् वाक्यं सुग्रीवं वाक्यकोविदः ॥ 2.13 ॥

tatastu bhayasaṃtrastaṃ vālikilbiṣaśaṅkitam | uvāca hanumān vākyaṃ sugrīvaṃ vākyakovidaḥ || 2.13 ||

तब भय से त्रस्त और वालि के अपराध की आशंका से युक्त सुग्रीव से वाक्य-कुशल हनुमान ने यह कहा:

श्लोक 14 (kishkindha.2.14)

सम्भ्रमस्त्यज्यतामेष सर्वैर्वालिकृते महान् । मलयोऽयं गिरिवरो भयं नेहास्ति वालिनः ॥ 2.14 ॥

sambhramastyajyatāmeṣa sarvairvālikṛte mahān | malayo'yaṃ girivaro bhayaṃ nehāsti vālinaḥ || 2.14 ||

'वालि के भय से उत्पन्न यह महान् भ्रम सबके द्वारा त्याग दिया जाए; यह उत्तम मलय पर्वत है, यहाँ वालि का कोई भय नहीं है।'

श्लोक 15 (kishkindha.2.15)

यस्मादुद्विग्नचेतास्त्वं विद्रुतो हरिपुङ्गव । तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम् ॥ 2.15 ॥

yasmādudvignacetāstvaṃ vidruto haripuṅgava | taṃ krūradarśanaṃ krūraṃ neha paśyāmi vālinam || 2.15 ||

'हे वानरश्रेष्ठ! जिस क्रूर-दर्शन और क्रूर वालि के भय से तुम्हारा चित्त व्याकुल है और तुम भाग खड़े हुए हो, वह मुझे यहाँ कहीं दिखाई नहीं देता।'

श्लोक 16 (kishkindha.2.16)

यस्मात् तव भयं सौम्य पूर्वजात् पापकर्मणः । स नेह वाली दुष्टात्मा न ते पश्याम्यहं भयम् ॥ 2.16 ॥

yasmāt tava bhayaṃ saumya pūrvajāt pāpakarmaṇaḥ | sa neha vālī duṣṭātmā na te paśyāmyahaṃ bhayam || 2.16 ||

'हे सौम्य! जिस पापकर्मा बड़े भाई से तुम्हें भय है, वह दुष्टात्मा वालि यहाँ नहीं है; मुझे तुम्हारे भय का कोई कारण नहीं दिखता।'

श्लोक 17 (kishkindha.2.17)

अहो शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम । लघुचित्ततयाऽऽत्मानं न स्थापयसि यो मतौ ॥ 2.17 ॥

aho śākhāmṛgatvaṃ te vyaktameva plavaṅgama | laghucittatayā''tmānaṃ na sthāpayasi yo matau || 2.17 ||

'अरे वानर! तुम्हारा वानर-स्वभाव स्पष्ट ही प्रकट है, क्योंकि चंचल-चित्तता के कारण तुम अपने आपको स्थिर बुद्धि में नहीं रख पा रहे हो।'

श्लोक 18 (kishkindha.2.18)

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर । नह्यबुद्धिं गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि ॥ 2.18 ॥

buddhivijñānasampanna iṅgitaiḥ sarvamācara | nahyabuddhiṃ gato rājā sarvabhūtāni śāsti hi || 2.18 ||

'बुद्धि और विवेक से सम्पन्न होकर संकेतों के आधार पर सब कार्य करो। क्योंकि बुद्धिहीन राजा समस्त प्राणियों पर शासन नहीं कर सकता।'

श्लोक 19 (kishkindha.2.19)

सुग्रीवस्तु शुभं वाक्यं श्रुत्वा सर्वं हनूमतः । ततः शुभतरं वाक्यं हनूमन्तमुवाच ह ॥ 2.19 ॥

sugrīvastu śubhaṃ vākyaṃ śrutvā sarvaṃ hanūmataḥ | tataḥ śubhataraṃ vākyaṃ hanūmantamuvāca ha || 2.19 ||

सुग्रीव ने हनुमान के सारे शुभ वचन सुनकर, फिर हनुमान से और भी उत्तम वचन कहा:

श्लोक 20 (kishkindha.2.20)

दीर्घबाहू विशालाक्षौ शरचापासिधारिणौ । कस्य न स्याद् भयं दृष्ट्वा ह्येतौ सुरसुतोपमौ ॥ 2.20 ॥

dīrghabāhū viśālākṣau śaracāpāsidhāriṇau | kasya na syād bhayaṃ dṛṣṭvā hyetau surasutopamau || 2.20 ||

'दीर्घ भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले, बाण-धनुष-खड्ग धारण किए हुए, देवपुत्रों के समान इन दोनों को देखकर भला किसे भय न होगा?'

श्लोक 21 (kishkindha.2.21)

वालिप्रणिहितावेव शङ्केऽहं पुरुषोत्तमौ । राजानो बहुमित्राश्च विश्वासो नात्र हि क्षमः ॥ 2.21 ॥

vālipraṇihitāveva śaṅke'haṃ puruṣottamau | rājāno bahumitrāśca viśvāso nātra hi kṣamaḥ || 2.21 ||

'मुझे शंका है कि ये दोनों पुरुषश्रेष्ठ वालि द्वारा ही भेजे गए हैं; राजाओं के अनेक मित्र होते हैं, अतः यहाँ विश्वास करना उचित नहीं है।'

श्लोक 22 (kishkindha.2.22)

अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छद्मचारिणः । विश्वस्तानामविश्वस्ताश्छिद्रेषु प्रहरन्त्यपि ॥ 2.22 ॥

arayaśca manuṣyeṇa vijñeyāśchadmacāriṇaḥ | viśvastānāmaviśvastāśchidreṣu praharantyapi || 2.22 ||

'मनुष्य को छद्मवेशी शत्रुओं को पहचान लेना चाहिए; अविश्वसनीय शत्रु विश्वास करनेवालों पर भी अवसर पाकर वार कर देते हैं।'

श्लोक 23 (kishkindha.2.23)

कृत्येषु वाली मेधावी राजानो बहुदर्शिनः । भवन्त परहन्तारस्ते ज्ञेयाः प्राकृतैर्नरैः ॥ 2.23 ॥

kṛtyeṣu vālī medhāvī rājāno bahudarśinaḥ | bhavanta parahantāraste jñeyāḥ prākṛtairnaraiḥ || 2.23 ||

'वालि इन कार्यों में अत्यंत कुशल है; दूरदर्शी राजा प्रायः इसी प्रकार दूसरों का विनाश करनेवाले होते हैं, परन्तु सामान्य मनुष्य इसे पहचान नहीं पाते।'

श्लोक 24 (kishkindha.2.24)

तौ त्वया प्राकृतेनेव गत्वा ज्ञेयौ प्लवंगम । इङ्गितानां प्रकारैश्च रूपव्याभाषणेन च ॥ 2.24 ॥

tau tvayā prākṛteneva gatvā jñeyau plavaṃgama | iṅgitānāṃ prakāraiśca rūpavyābhāṣaṇena ca || 2.24 ||

'इसलिए हे वानर, तुम एक सामान्य जन के रूप में उनके पास जाकर उनके हाव-भाव, रूप और वार्तालाप के ढंग से उन्हें पहचानो।'

श्लोक 25 (kishkindha.2.25)

लक्षयस्व तयोर्भावं प्रहृष्टमनसौ यदि । विश्वासयन् प्रशंसाभिरिङ्गितैश्च पुनः पुनः ॥ 2.25 ॥

lakṣayasva tayorbhāvaṃ prahṛṣṭamanasau yadi | viśvāsayan praśaṃsābhiriṅgitaiśca punaḥ punaḥ || 2.25 ||

'बार-बार प्रशंसा और संकेतों द्वारा उन्हें विश्वास दिलाते हुए यह जान लो कि उनके मन प्रसन्न हैं या नहीं।'

श्लोक 26 (kishkindha.2.26)

ममैवाभिमुखं स्थित्वा पृच्छ त्वं हरिपुङ्गव । प्रयोजनं प्रवेशस्य वनस्यास्य धनुर्धरौ ॥ 2.26 ॥

mamaivābhimukhaṃ sthitvā pṛccha tvaṃ haripuṅgava | prayojanaṃ praveśasya vanasyāsya dhanurdharau || 2.26 ||

'हे वानरश्रेष्ठ! मेरे सम्मुख खड़े होकर तुम उन दोनों धनुर्धरों से इस वन में प्रवेश करने का प्रयोजन पूछो।'

श्लोक 27 (kishkindha.2.27)

शुद्धात्मानौ यदि त्वेतौ जानीहि त्वं प्लवङ्गम । व्याभाषितैर्वा रूपैर्वा विज्ञेया दुष्टतानयोः ॥ 2.27 ॥

śuddhātmānau yadi tvetau jānīhi tvaṃ plavaṅgama | vyābhāṣitairvā rūpairvā vijñeyā duṣṭatānayoḥ || 2.27 ||

'हे वानर! यदि ये दोनों शुद्ध हृदयवाले हैं तो यह जान लो; इनमें दुष्टता है या नहीं, यह इनकी वाणी और रूप दोनों से पहचानी जानी चाहिए।'

श्लोक 28 (kishkindha.2.28)

इत्येवं कपिराजेन संदिष्टो मारुतात्मजः । चकार गमने बुद्धिं यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ 2.28 ॥

ityevaṃ kapirājena saṃdiṣṭo mārutātmajaḥ | cakāra gamane buddhiṃ yatra tau rāmalakṣmaṇau || 2.28 ||

इस प्रकार वानरराज सुग्रीव द्वारा आदेश दिए जाने पर पवनपुत्र हनुमान ने वहाँ जाने का निश्चय किया जहाँ राम और लक्ष्मण थे।

श्लोक 29 (kishkindha.2.29)

तथेति सम्पूज्य वचस्तु तस्य कपेः सुभीतस्य दुरासदस्य । महानुभावो हनुमान् ययौ तदा स यत्र रामोऽतिबली सलक्ष्मणः ॥ 2.29 ॥

tatheti sampūjya vacastu tasya kapeḥ subhītasya durāsadasya | mahānubhāvo hanumān yayau tadā sa yatra rāmo'tibalī salakṣmaṇaḥ || 2.29 ||

'ऐसा ही होगा' कहकर उस अत्यंत भयभीत किन्तु दुर्जेय वानरराज के वचन का सम्मान करते हुए, महानुभाव हनुमान उस स्थान पर गए जहाँ अतिबलशाली राम लक्ष्मण सहित विराजमान थे।

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