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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 28

वर्षा-ऋतु का वर्णन

सर्ग 27सर्ग-सूचीसर्ग 29

श्लोक 1 (kishkindha.28.1)

स तदा वालिनं हत्वा सुग्रीवमभिषिच्य च । वसन् माल्यवतः पृष्ठे रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ 28.1 ॥

sa tadā vālinaṃ hatvā sugrīvamabhiṣicya ca | vasan mālyavataḥ pṛṣṭhe rāmo lakṣmaṇamabravīt || 28.1 ||

तब वालि का वध कर तथा सुग्रीव को राज्याभिषिक्त कर, माल्यवान् पर्वत की ढाल पर निवास करते हुए राम ने लक्ष्मण से कहा -

श्लोक 2 (kishkindha.28.2)

अयं स कालः सम्प्राप्तः समयोऽद्य जलागमः । सम्पश्य त्वं नभो मेघैः संवृतं गिरिसंनिभैः ॥ 28.2 ॥

ayaṃ sa kālaḥ samprāptaḥ samayo'dya jalāgamaḥ | sampaśya tvaṃ nabho meghaiḥ saṃvṛtaṃ girisaṃnibhaiḥ || 28.2 ||

"यही वह समय है जिसकी हमें प्रतीक्षा थी; आज जल-आगमन का समय आ गया है। देखो, आकाश पर्वतों के समान मेघों से आच्छादित हो गया है।

श्लोक 3 (kishkindha.28.3)

नवमासधृतं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभिः । पीत्वा रसं समुद्राणां द्यौः प्रसूते रसायनम् ॥ 28.3 ॥

navamāsadhṛtaṃ garbhaṃ bhāskarasya gabhastibhiḥ | pītvā rasaṃ samudrāṇāṃ dyauḥ prasūte rasāyanam || 28.3 ||

सूर्य की किरणों से समुद्रों का रस पीकर तथा नौ मास तक उस गर्भ को धारण कर आकाश अब उस अमृत-तुल्य जल को जन्म दे रहा है।

श्लोक 4 (kishkindha.28.4)

शक्यमम्बरमारुह्य मेघसोपानपंक्तिभिः । कुटजार्जुनमालाभिरलंकर्तुं दिवाकरः ॥ 28.4 ॥

śakyamambaramāruhya meghasopānapaṃktibhiḥ | kuṭajārjunamālābhiralaṃkartuṃ divākaraḥ || 28.4 ||

इन दिनों मेघों की सीढ़ियों पर चढ़कर आकाश में जाकर सूर्य को ही कुटज और अर्जुन के पुष्पों की मालाओं से सजाना सम्भव प्रतीत होता है।

श्लोक 5 (kishkindha.28.5)

संध्यारागोत्थितैस्ताम्रैरन्तेष्वपि च पाण्डुभिः । स्निग्धैरभ्रपटच्छेदैर्बद्धव्रणमिवाम्बरम् ॥ 28.5 ॥

saṃdhyārāgotthitaistāmrairanteṣvapi ca pāṇḍubhiḥ | snigdhairabhrapaṭacchedairbaddhavraṇamivāmbaram || 28.5 ||

संध्या की लालिमा से रँगे किनारों वाले तथा भीतर से शुभ्र, ये कोमल मेघ-खण्ड मानो आकाश के घावों पर बाँधी गई पट्टियाँ प्रतीत होते हैं।

श्लोक 6 (kishkindha.28.6)

मन्दमारुतिनिःश्वासं संध्याचन्दनरञ्जितम् । आपाण्डुजलदं भाति कामातुरमिवाम्बरम् ॥ 28.6 ॥

mandamārutiniḥśvāsaṃ saṃdhyācandanarañjitam | āpāṇḍujaladaṃ bhāti kāmāturamivāmbaram || 28.6 ||

मन्द वायु की साँसें लेता, संध्या के चन्दन-रंग से रंजित, पाण्डुवर्ण मेघों वाला वह आकाश मानो कामातुर-सा दिखाई देता है।

श्लोक 7 (kishkindha.28.7)

एषा घर्मपरिक्लिष्टा नववारिपरिप्लुता । सीतेव शोकसंतप्ता मही बाष्पं विमुञ्चति ॥ 28.7 ॥

eṣā gharmaparikliṣṭā navavāripariplutā | sīteva śokasaṃtaptā mahī bāṣpaṃ vimuñcati || 28.7 ||

यह पृथ्वी, ग्रीष्म से संतप्त होकर अब नवीन जल से आप्लावित हुई, मानो शोक-संतप्त सीता की भाँति आँसू बहा रही है।

श्लोक 8 (kishkindha.28.8)

मेघोदरविनिर्मुक्ताः कर्पूरदलशीतलाः । शक्यमञ्जलिभिः पातुं वाताः केतकगन्धिनः ॥ 28.8 ॥

meghodaravinirmuktāḥ karpūradalaśītalāḥ | śakyamañjalibhiḥ pātuṃ vātāḥ ketakagandhinaḥ || 28.8 ||

मेघों के उदर से मुक्त, कर्पूर के टुकड़ों-सी शीतल तथा केतकी की सुगन्ध से युक्त ये वायुएँ मानो अंजलि से पी लेने योग्य हैं।

श्लोक 9 (kishkindha.28.9)

एष फुल्लार्जुनः शैलः केतकैरभिवासितः । सुग्रीव इव शान्तारिर्धाराभिरभिषिच्यते ॥ 28.9 ॥

eṣa phullārjunaḥ śailaḥ ketakairabhivāsitaḥ | sugrīva iva śāntārirdhārābhirabhiṣicyate || 28.9 ||

अर्जुन-पुष्पों से खिला हुआ तथा केतकी से सुवासित यह पर्वत वर्षा-धाराओं से उसी प्रकार अभिषिक्त हो रहा है, जैसे शत्रु के शान्त हो जाने पर सुग्रीव अभिषिक्त हुए थे।

श्लोक 10 (kishkindha.28.10)

मेघकृष्णाजिनधरा धारायज्ञोपवीतिनः । मारुतापूरितगुहाः प्राधीता इव पर्वताः ॥ 28.10 ॥

meghakṛṣṇājinadharā dhārāyajñopavītinaḥ | mārutāpūritaguhāḥ prādhītā iva parvatāḥ || 28.10 ||

काले मेघों को मृगचर्म की भाँति धारण किए, जलधाराओं को यज्ञोपवीत की भाँति पहने, वायु से भरी गुफाओं वाले ये पर्वत मानो वेद-पाठ करते हुए विद्यार्थी प्रतीत होते हैं।

श्लोक 11 (kishkindha.28.11)

कशाभिरिव हैमीभिर्विद्युद्भिरभिताडितम् । अन्तःस्तनितनिर्घोषं सवेदनमिवाम्बरम् ॥ 28.11 ॥

kaśābhiriva haimībhirvidyudbhirabhitāḍitam | antaḥstanitanirghoṣaṃ savedanamivāmbaram || 28.11 ||

मानो स्वर्णमयी कोड़ों-सी बिजलियों से आहत होकर तथा भीतर से गर्जन की ध्वनि छोड़ता हुआ आकाश मानो किसी आन्तरिक पीड़ा से पीड़ित प्रतीत होता है।

श्लोक 12 (kishkindha.28.12)

नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे । स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी ॥ 28.12 ॥

nīlameghāśritā vidyut sphurantī pratibhāti me | sphurantī rāvaṇasyāṅke vaidehīva tapasvinī || 28.12 ||

नीले मेघ पर टिकी हुई वह चमकती हुई बिजली मुझे मानो रावण की गोद में काँपती हुई दुःखिनी वैदेही के समान प्रतीत होती है।

श्लोक 13 (kishkindha.28.13)

इमास्ता मन्मथवतां हिताः प्रतिहता दिशः । अनुलिप्ता इव घनैर्नष्टग्रहनिशाकराः ॥ 28.13 ॥

imāstā manmathavatāṃ hitāḥ pratihatā diśaḥ | anuliptā iva ghanairnaṣṭagrahaniśākarāḥ || 28.13 ||

जिनके प्रियजन उनके साथ हैं, उनके लिए ये दिशाएँ शुभ हैं; परन्तु ग्रह और चन्द्रमा से रहित, मेघों से लिपटी हुई इन दिशाओं में वह शुभता कहाँ।

श्लोक 14 (kishkindha.28.14)

क्वचिद् बाष्पाभिसंरुद्धान् वर्षागमसमुत्सुकान् । कुटजान् पश्य सौमित्रे पुष्पितान् गिरिसानुषु । मम शोकाभिभूतस्य कामसंदीपनान् स्थितान् ॥ 28.14 ॥

kvacid bāṣpābhisaṃruddhān varṣāgamasamutsukān | kuṭajān paśya saumitre puṣpitān girisānuṣu | mama śokābhibhūtasya kāmasaṃdīpanān sthitān || 28.14 ||

देखो, हे सौमित्रे! वर्षा-आगमन से हर्षित, पर्वत के कगारों पर खिले हुए तथा बूँदों से आच्छादित ये कुटज-वृक्ष, शोक से अभिभूत मुझ जैसे व्यक्ति में काम को और भी प्रज्वलित कर रहे हैं।

श्लोक 15 (kishkindha.28.15)

रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायुर्निदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः । स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां । प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान् ॥ 28.15 ॥

rajaḥ praśāntaṃ sahimo'dya vāyurnidāghadoṣaprasarāḥ praśāntāḥ | sthitā hi yātrā vasudhādhipānāṃ | pravāsino yānti narāḥ svadeśān || 28.15 ||

अब धूल शान्त हो गई है, वायु में शीतलता आ गई है, ग्रीष्म के दोष शान्त हो गए हैं, राजाओं की यात्राएँ रुक गई हैं, और परदेश गए हुए लोग अपने-अपने देश को लौट रहे हैं।

श्लोक 16 (kishkindha.28.16)

सम्प्रस्थिता मानसवासलुब्धाः । प्रियान्विताः सम्प्रति चक्रवाकाः । अभीक्ष्णवर्षोदकविक्षतेषु । यानानि मार्गेषु न सम्पतन्ति ॥ 28.16 ॥

samprasthitā mānasavāsalubdhāḥ | priyānvitāḥ samprati cakravākāḥ | abhīkṣṇavarṣodakavikṣateṣu | yānāni mārgeṣu na sampatanti || 28.16 ||

मानसरोवर में बसने के लोभी हंस यात्रा पर निकल पड़े हैं; परन्तु अपनी प्रियाओं के साथ रहने वाले चक्रवाक पक्षी नहीं जाते; और निरन्तर वर्षा-जल से क्षत-विक्षत मार्गों पर वाहन भी नहीं चल पाते।

श्लोक 17 (kishkindha.28.17)

क्वचित् प्रकाशं क्वचिदप्रकाशं । नभः प्रकीर्णाम्बुधरं विभाति । क्वचित् क्वचित् पर्वतसंनिरुद्धं । रूपं यथा शान्तमहार्णवस्य ॥ 28.17 ॥

kvacit prakāśaṃ kvacidaprakāśaṃ | nabhaḥ prakīrṇāmbudharaṃ vibhāti | kvacit kvacit parvatasaṃniruddhaṃ | rūpaṃ yathā śāntamahārṇavasya || 28.17 ||

कहीं उजला, कहीं अंधकारमय, बादलों से बिखरा हुआ यह आकाश मानो कहीं-कहीं पर्वतों से अवरुद्ध किसी विशाल, शान्त महासागर के रूप-सा शोभित हो रहा है।

श्लोक 18 (kishkindha.28.18)

व्यामिश्रितं सर्जकदम्बपुष्पैर्नवं जलं पर्वतधातुताम्रम् । मयूरकेकाभिरनुप्रयातं । शैलापगाः शीघ्रतरं वहन्ति ॥ 28.18 ॥

vyāmiśritaṃ sarjakadambapuṣpairnavaṃ jalaṃ parvatadhātutāmram | mayūrakekābhiranuprayātaṃ | śailāpagāḥ śīghrataraṃ vahanti || 28.18 ||

सर्ज और कदम्ब के पुष्पों से मिश्रित, पर्वत की धातुओं से ताम्रवर्ण हुआ तथा मयूरों की केकाओं का पीछा करता हुआ वह नवीन जल पर्वतीय नदियों में शीघ्रतर बह रहा है।

श्लोक 19 (kishkindha.28.19)

रसाकुलं षट्पदसंनिकाशं । प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम् । अनेकवर्णं पवनावधूतं । भूमौ पतत्याम्रफलं विपक्वम् ॥ 28.19 ॥

rasākulaṃ ṣaṭpadasaṃnikāśaṃ | prabhujyate jambuphalaṃ prakāmam | anekavarṇaṃ pavanāvadhūtaṃ | bhūmau patatyāmraphalaṃ vipakvam || 28.19 ||

रसपूर्ण तथा भ्रमरों-से दिखने वाले जामुन के फल बड़े चाव से खाए जाते हैं; और वायु से झकझोरे गए अनेक रंगों वाले अधिक पके आम के फल भूमि पर गिर रहे हैं।

श्लोक 20 (kishkindha.28.20)

विद्युत्पताकाः सबलाकमालाः । शैलेन्द्रकूटाकृतिसंनिकाशाः । गर्जन्ति मेघाः समुदीर्णनादा । मत्ता गजेन्द्रा इव संयुगस्थाः ॥ 28.20 ॥

vidyutpatākāḥ sabalākamālāḥ | śailendrakūṭākṛtisaṃnikāśāḥ | garjanti meghāḥ samudīrṇanādā | mattā gajendrā iva saṃyugasthāḥ || 28.20 ||

बिजली की पताकाओं से सज्जित, बगुलों की पंक्तियों से मालाकृत, पर्वतराज के शिखरों-सी आकृति वाले ये मेघ ऊँची गर्जना के साथ इस प्रकार गरजते हैं मानो युद्धोन्मत्त गजराज हों।

श्लोक 21 (kishkindha.28.21)

वर्षोदकाप्यायितशाद्वलानि । प्रवृत्तनृत्तोत्सवबर्हिणानि । वनानि निर्वृष्टबलाहकानि । पश्यापराह्णेष्वधिकं विभान्ति ॥ 28.21 ॥

varṣodakāpyāyitaśādvalāni | pravṛttanṛttotsavabarhiṇāni | vanāni nirvṛṣṭabalāhakāni | paśyāparāhṇeṣvadhikaṃ vibhānti || 28.21 ||

देखो, वर्षा-जल से तृप्त हुई घास-भूमियों वाले, नृत्य-उत्सव में तल्लीन मयूरों वाले तथा मेघों द्वारा भलीभाँति सिंचित हुए ये वन, दोपहर के समय और भी अधिक शोभायमान होते हैं।

श्लोक 22 (kishkindha.28.22)

समुद्वहन्तः सलिलातिभारं । बलाकिनो वारिधरा नदन्तः । महत्सु शृङ्गेषु महीधराणां । विश्रम्य विश्रम्य पुनः प्रयान्ति ॥ 28.22 ॥

samudvahantaḥ salilātibhāraṃ | balākino vāridharā nadantaḥ | mahatsu śṛṅgeṣu mahīdharāṇāṃ | viśramya viśramya punaḥ prayānti || 28.22 ||

जल के अत्यधिक भार को ढोते हुए, बगुलों के समूह से युक्त, गर्जना करते हुए ये मेघ पर्वतों के ऊँचे शिखरों पर बार-बार विश्राम करते हुए पुनः आगे बढ़ते हैं, मानो गर्भवती स्त्रियाँ हों।

श्लोक 23 (kishkindha.28.23)

मेघाभिकामा परिसम्पतन्ती । सम्मोदिता भाति बलाकपंक्तिः । वातावधूता वरपौण्डरीकी । लम्बेव माला रुचिराम्बरस्य ॥ 28.23 ॥

meghābhikāmā parisampatantī | sammoditā bhāti balākapaṃktiḥ | vātāvadhūtā varapauṇḍarīkī | lambeva mālā rucirāmbarasya || 28.23 ||

मेघों के प्रति अनुराग से भरी, चारों ओर उड़ती हुई यह प्रसन्न बगुला-पंक्ति मानो वायु द्वारा हिलाई गई श्वेत कमलों की सुन्दर लटकती हुई माला के समान शोभित है।

श्लोक 24 (kishkindha.28.24)

बालेन्द्रगोपान्तरचित्रितेन । विभाति भूमिर्नवशाद्वलेन । गात्रानुपृक्तेन शुकप्रभेण । नारीव लाक्षोक्षितकम्बलेन ॥ 28.24 ॥

bālendragopāntaracitritena | vibhāti bhūmirnavaśādvalena | gātrānupṛktena śukaprabheṇa | nārīva lākṣokṣitakambalena || 28.24 ||

कहीं-कहीं छोटे-छोटे इन्द्रगोप कीटों से चित्रित, नई हरी घास से युक्त यह पृथ्वी मानो किसी स्त्री के शरीर से लिपटे हुए तोते के रंग के, लाख के छींटों से युक्त वस्त्र-सी शोभित हो रही है।

श्लोक 25 (kishkindha.28.25)

निद्रा शनैः केशवमभ्युपैति । द्रुतं नदी सागरमभ्युपैति । हृष्टा बलाका घनमभ्युपैति । कान्ता सकामा प्रियमभ्युपैति ॥ 28.25 ॥

nidrā śanaiḥ keśavamabhyupaiti | drutaṃ nadī sāgaramabhyupaiti | hṛṣṭā balākā ghanamabhyupaiti | kāntā sakāmā priyamabhyupaiti || 28.25 ||

निद्रा धीरे-धीरे केशव के निकट पहुँच रही है; नदियाँ शीघ्रता से समुद्र के निकट जा रही हैं; हर्षित बगुले मेघों के निकट पहुँच रहे हैं; और प्रेम-विह्वल स्त्रियाँ अपने प्रियतम के निकट जा रही हैं।

श्लोक 26 (kishkindha.28.26)

जाता वनान्ताः शिखिसुप्रनृत्ता । जाताः कदम्बाः सकदम्बशाखाः । जाता वृषा गोषु समानकामा । जाता मही सस्यवनाभिरामा ॥ 28.26 ॥

jātā vanāntāḥ śikhisupranṛttā | jātāḥ kadambāḥ sakadambaśākhāḥ | jātā vṛṣā goṣu samānakāmā | jātā mahī sasyavanābhirāmā || 28.26 ||

वन के भीतरी भाग मयूरों के सुन्दर नृत्य के योग्य हो गए हैं; कदम्ब वृक्ष अपनी सघन शाखाओं सहित पुष्पित हो उठे हैं; बैल गौओं के प्रति समान काम-भाव से युक्त हो गए हैं; और यह पृथ्वी अपनी फसलों तथा वनों से रमणीय हो उठी है।

श्लोक 27 (kishkindha.28.27)

वहन्ति वर्षन्ति नदन्ति भान्ति । ध्यायन्ति नृत्यन्ति समाश्वसन्ति । नद्यो घना मत्तगजा वनान्ताः । प्रियाविहीनाः शिखिनः प्लवंगमाः ॥ 28.27 ॥

vahanti varṣanti nadanti bhānti | dhyāyanti nṛtyanti samāśvasanti | nadyo ghanā mattagajā vanāntāḥ | priyāvihīnāḥ śikhinaḥ plavaṃgamāḥ || 28.27 ||

नदियाँ प्रवाहित हो रही हैं, मेघ वर्षा कर रहे हैं, मत्त हाथी गरज रहे हैं, वन के भीतरी भाग चमक रहे हैं; प्रियाविहीन जन चिन्तामग्न हैं, मयूर नृत्य कर रहे हैं, और वानर पुनः धैर्य धारण कर रहे हैं।

श्लोक 28 (kishkindha.28.28)

प्रहर्षिताः केतकिपुष्पगन्धमाघ्राय मत्ता वननिर्झरेषु । प्रपातशब्दाकुलिता गजेन्द्राः । सार्धं मयूरैः समदा नदन्ति ॥ 28.28 ॥

praharṣitāḥ ketakipuṣpagandhamāghrāya mattā vananirjhareṣu | prapātaśabdākulitā gajendrāḥ | sārdhaṃ mayūraiḥ samadā nadanti || 28.28 ||

केतकी-पुष्पों की सुगन्ध पाकर आनन्दित तथा वन की जलधाराओं के गिरने के शब्द से व्याकुल हुए मदमत्त गजराज मयूरों के साथ मिलकर ऊँचे स्वर में गरज रहे हैं।

श्लोक 29 (kishkindha.28.29)

धारानिपातैरभिहन्यमानाः । कदम्बशाखासु विलम्बमानाः । क्षणार्जितं पुष्परसावगाढं । शनैर्मदं षट्चरणास्त्यजन्ति ॥ 28.29 ॥

dhārānipātairabhihanyamānāḥ | kadambaśākhāsu vilambamānāḥ | kṣaṇārjitaṃ puṣparasāvagāḍhaṃ | śanairmadaṃ ṣaṭcaraṇāstyajanti || 28.29 ||

वर्षा की धाराओं की मार से पीड़ित तथा कदम्ब की शाखाओं से लटके हुए भ्रमर, क्षणभर में पुष्प-रस में डूबकर प्राप्त किए गए अपने मद को धीरे-धीरे त्याग रहे हैं।

श्लोक 30 (kishkindha.28.30)

अङ्गारचूर्णोत्करसंनिकाशैः । फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धैः । जम्बूद्रुमाणां प्रविभान्ति शाखा । निपीयमाना इव षट्पदौघैः ॥ 28.30 ॥

aṅgāracūrṇotkarasaṃnikāśaiḥ | phalaiḥ suparyāptarasaiḥ samṛddhaiḥ | jambūdrumāṇāṃ pravibhānti śākhā | nipīyamānā iva ṣaṭpadaughaiḥ || 28.30 ||

रस से भरपूर तथा कोयले के चूर्ण के ढेर के समान दिखने वाले फलों से समृद्ध जामुन के वृक्षों की शाखाएँ मानो भ्रमर-समूहों द्वारा चूसी जाती हुई-सी शोभित हो रही हैं।

श्लोक 31 (kishkindha.28.31)

तडित्पताकाभिरलंकृतानामुदीर्णगम्भीरमहारवाणाम् । विभान्ति रूपाणि बलाहकानां । रणोत्सुकानामिव वारणानाम् ॥ 28.31 ॥

taḍitpatākābhiralaṃkṛtānāmudīrṇagambhīramahāravāṇām | vibhānti rūpāṇi balāhakānāṃ | raṇotsukānāmiva vāraṇānām || 28.31 ||

बिजली की पताकाओं से अलंकृत तथा गम्भीर एवं महान् गर्जना करते हुए इन मेघों के रूप युद्धोत्सुक गजराजों के समान शोभित हो रहे हैं।

श्लोक 32 (kishkindha.28.32)

मार्गानुगः शैलवनानुसारी । सम्प्रस्थितो मेघरवं निशम्य । युद्धाभिकामः प्रतिनादशङ्की । मत्तो गजेन्द्रः प्रतिसंनिवृत्तः ॥ 28.32 ॥

mārgānugaḥ śailavanānusārī | samprasthito megharavaṃ niśamya | yuddhābhikāmaḥ pratinādaśaṅkī | matto gajendraḥ pratisaṃnivṛttaḥ || 28.32 ||

पर्वत के मार्ग का अनुसरण करता हुआ, वन की ओर बढ़ता हुआ मदमत्त गजराज, मेघ की गर्जना सुनकर उसे किसी अन्य हाथी की ललकार समझकर, युद्ध की इच्छा से वापस लौट पड़ा।

श्लोक 33 (kishkindha.28.33)

क्वचित् प्रगीता इव षट्पदौघैः । क्वचित् प्रनृत्ता इव नीलकण्ठैः । क्वचित् प्रमत्ता इव वारणेन्द्रैर्विभान्त्यनेकाश्रयिणो वनान्ताः ॥ 28.33 ॥

kvacit pragītā iva ṣaṭpadaughaiḥ | kvacit pranṛttā iva nīlakaṇṭhaiḥ | kvacit pramattā iva vāraṇendrairvibhāntyanekāśrayiṇo vanāntāḥ || 28.33 ||

कहीं भ्रमर-समूहों द्वारा गाए जाते हुए-से, कहीं मयूरों द्वारा नृत्य किए जाते हुए-से, कहीं गजराजों द्वारा उन्मत्त हुए-से, अनेक प्राणियों के आश्रयस्थल ये वन-प्रान्त सर्वत्र शोभायमान हो रहे हैं।

श्लोक 34 (kishkindha.28.34)

कदम्बसर्जार्जुनकन्दलाढ्या । वनान्तभूमिर्मधुवारिपूर्णा । मयूरमत्ताभिरुतप्रनृत्तैरापानभूमिप्रतिमा विभाति ॥ 28.34 ॥

kadambasarjārjunakandalāḍhyā | vanāntabhūmirmadhuvāripūrṇā | mayūramattābhirutapranṛttairāpānabhūmipratimā vibhāti || 28.34 ||

कदम्ब, सर्ज, अर्जुन तथा कन्दल वृक्षों से समृद्ध, मधु-जल से परिपूर्ण तथा मदमत्त मयूरों की केका और नृत्य से युक्त वन-भूमि मानो किसी मद्यशाला के समान शोभित हो रही है।

श्लोक 35 (kishkindha.28.35)

मुक्तासमाभं सलिलं पतद् वै । सुनिर्मलं पत्रपुटेषु लग्नम् । हृष्टा विवर्णच्छदना विहंगाः । सुरेन्द्रदत्तं तृषिताः पिबन्ति ॥ 28.35 ॥

muktāsamābhaṃ salilaṃ patad vai | sunirmalaṃ patrapuṭeṣu lagnam | hṛṣṭā vivarṇacchadanā vihaṃgāḥ | surendradattaṃ tṛṣitāḥ pibanti || 28.35 ||

मोतियों के समान शुभ्र, पत्तों के दोनों में ठहरा हुआ यह जल, मानो इन्द्र का दिया हुआ उपहार हो, जिसे प्यासे पक्षी हर्षपूर्वक पी रहे हैं, यद्यपि उसी जल से उनके पंख विवर्ण हो गए हैं।

श्लोक 36 (kishkindha.28.36)

षट्पादतन्त्रीमधुराभिधानं । प्लवंगमोदीरितकण्ठतालम् । आविष्कृतं मेघमृदङ्गनादैर्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम् ॥ 28.36 ॥

ṣaṭpādatantrīmadhurābhidhānaṃ | plavaṃgamodīritakaṇṭhatālam | āviṣkṛtaṃ meghamṛdaṅganādairvaneṣu saṃgītamiva pravṛttam || 28.36 ||

भ्रमरों की मधुर झंकार को वीणा-सी, मेंढकों के टर्राने को ताल-सी तथा मेघों की गर्जना को मृदंग-ध्वनि-सी बनाकर मानो वनों में संगीत आरम्भ हो गया है।

श्लोक 37 (kishkindha.28.37)

क्वचित् प्रनृत्तैः क्वचिदुन्नदद्भिः । क्वचिच्च वृक्षाग्रनिषण्णकायैः । व्यालम्बबर्हाभरणैर्मयूरैर्वनेषु संगीतमिव प्रवृत्तम् ॥ 28.37 ॥

kvacit pranṛttaiḥ kvacidunnadadbhiḥ | kvacicca vṛkṣāgraniṣaṇṇakāyaiḥ | vyālambabarhābharaṇairmayūrairvaneṣu saṃgītamiva pravṛttam || 28.37 ||

कहीं नाचते हुए, कहीं ऊँचे स्वर में बोलते हुए, कहीं वृक्षों की चोटियों पर बैठे हुए, अपने लटकते हुए पंख-आभूषणों वाले मयूरों के कारण मानो वनों में संगीत और नृत्य आरम्भ हो गया है।

श्लोक 38 (kishkindha.28.38)

स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा । विहाय निद्रां चिरसंनिरुद्धाम् । अनेकरूपाकृतिवर्णनादा । नवाम्बुधाराभिहता नदन्ति ॥ 28.38 ॥

svanairghanānāṃ plavagāḥ prabuddhā | vihāya nidrāṃ cirasaṃniruddhām | anekarūpākṛtivarṇanādā | navāmbudhārābhihatā nadanti || 28.38 ||

मेघों की गर्जना से जागृत होकर, दीर्घकाल से रुकी हुई निद्रा को त्यागकर, अनेक रूपों, आकृतियों और वर्णों वाले मेढक नए जल की धाराओं से आहत होकर टर्रा रहे हैं।

श्लोक 39 (kishkindha.28.39)

नद्यः समुद्वाहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा । दृप्ता नवप्रावृतपूर्णभोगादृतं स्वभर्तारमुपोपयान्ति ॥ 28.39 ॥

nadyaḥ samudvāhitacakravākāstaṭāni śīrṇānyapavāhayitvā | dṛptā navaprāvṛtapūrṇabhogādṛtaṃ svabhartāramupopayānti || 28.39 ||

चक्रवाक पक्षियों को अपने प्रवाह में बहाती हुई तथा अपने ढहते हुए तटों को साथ बहाती हुई नदियाँ, नए जल से परिपूर्ण, गर्वित होकर शीघ्रता से अपने स्वामी की ओर बढ़ रही हैं।

श्लोक 40 (kishkindha.28.40)

नीलेषु नीला नववारिपूर्णा । मेघेषु मेघाः प्रतिभान्ति सक्ताः । दवाग्निदग्धेषु दवाग्निदग्धाः । शैलेषु शैला इव बद्धमूलाः ॥ 28.40 ॥

nīleṣu nīlā navavāripūrṇā | megheṣu meghāḥ pratibhānti saktāḥ | davāgnidagdheṣu davāgnidagdhāḥ | śaileṣu śailā iva baddhamūlāḥ || 28.40 ||

नीले मेघों में नए जल से भरे नीले मेघ परस्पर सटे हुए शोभित होते हैं; और दावाग्नि से जले हुए पर्वतों में दावाग्नि से जले हुए पर्वत ही जड़ जमाए खड़े दिखाई देते हैं।

श्लोक 41 (kishkindha.28.41)

प्रमत्तसंनादितबर्हिणानि । सशक्रगोपाकुलशाद्वलानि । चरन्ति नीपार्जुनवासितानि । गजाः सुरम्याणि वनान्तराणि ॥ 28.41 ॥

pramattasaṃnāditabarhiṇāni | saśakragopākulaśādvalāni | caranti nīpārjunavāsitāni | gajāḥ suramyāṇi vanāntarāṇi || 28.41 ||

जहाँ मयूर उन्मत्त होकर बोल रहे हैं, जहाँ घास के मैदान इन्द्रगोप कीटों से भरे हैं, तथा जो नीप और अर्जुन के पुष्पों से सुवासित हैं, ऐसे अत्यन्त रमणीय वन-प्रान्तों में गजराज विचरण कर रहे हैं।

श्लोक 42 (kishkindha.28.42)

नवाम्बुधाराहतकेसराणि । द्रुतं परित्यज्य सरोरुहाणि । कदम्बपुष्पाणि सकेसराणि । नवानि हृष्टा भ्रमराः पिबन्ति ॥ 28.42 ॥

navāmbudhārāhatakesarāṇi | drutaṃ parityajya saroruhāṇi | kadambapuṣpāṇi sakesarāṇi | navāni hṛṣṭā bhramarāḥ pibanti || 28.42 ||

नए जल की धाराओं से आहत केसरों वाले कमलों को शीघ्र त्यागकर, हर्षित भ्रमर अब नए केसरयुक्त कदम्ब-पुष्पों का रसपान कर रहे हैं।

श्लोक 43 (kishkindha.28.43)

मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्रा । वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः । रम्या नगेन्द्राः निभृता नरेन्द्राः । प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः ॥ 28.43 ॥

mattā gajendrā muditā gavendrā | vaneṣu vikrāntatarā mṛgendrāḥ | ramyā nagendrāḥ nibhṛtā narendrāḥ | prakrīḍito vāridharaiḥ surendraḥ || 28.43 ||

मदमत्त गजराज, हर्षित बैल, वनों में और भी अधिक विजयी सिंह, रमणीय पर्वत, विश्राम में लीन राजा, तथा जलवाही मेघों के साथ क्रीड़ा करते हुए इन्द्र -

श्लोक 44 (kishkindha.28.44)

मेघाः समुद्भूतसमुद्रनादा । महाजलौघैर्गगनावलम्बाः । नदीस्तटाकानि सरांसि वापीर्महीं च कृत्स्नामपवाहयन्ति ॥ 28.44 ॥

meghāḥ samudbhūtasamudranādā | mahājalaughairgaganāvalambāḥ | nadīstaṭākāni sarāṃsi vāpīrmahīṃ ca kṛtsnāmapavāhayanti || 28.44 ||

समुद्र की गर्जना के समान ध्वनि करते हुए, आकाश में जल के विशाल प्रवाहों से लटके हुए ये मेघ नदियों, तालाबों, सरोवरों, बावड़ियों तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को भी बहाए दे रहे हैं।

श्लोक 45 (kishkindha.28.45)

वर्षप्रवेगा विपुलाः पतन्ति । प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः । प्रणष्टकूलाः प्रवहन्ति शीघ्रं । नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः ॥ 28.45 ॥

varṣapravegā vipulāḥ patanti | pravānti vātāḥ samudīrṇavegāḥ | praṇaṣṭakūlāḥ pravahanti śīghraṃ | nadyo jalaṃ vipratipannamārgāḥ || 28.45 ||

भारी वर्षा-धाराएँ प्रचुरता से गिर रही हैं; तीव्र वेगवाली आँधियाँ चल रही हैं; और अपने तटों के बह जाने से नदियाँ अपने सामान्य मार्ग को छोड़कर शीघ्रता से बह रही हैं।

श्लोक 46 (kishkindha.28.46)

नरैर्नरेन्द्रा इव पर्वतेन्द्राः । सुरेन्द्रदत्तैः पवनोपनीतैः । घनाम्बुकुम्भैरभिषिच्यमाना । रूपं श्रियं स्वामिव दर्शयन्ति ॥ 28.46 ॥

narairnarendrā iva parvatendrāḥ | surendradattaiḥ pavanopanītaiḥ | ghanāmbukumbhairabhiṣicyamānā | rūpaṃ śriyaṃ svāmiva darśayanti || 28.46 ||

जैसे राजाओं का लोगों द्वारा लाए गए जल से अभिषेक होने पर वे अपना राजसी वैभव प्रकट करते हैं, वैसे ही इन्द्र द्वारा भेजे गए तथा वायु द्वारा लाए गए मेघ-जल के कलशों से अभिषिक्त होकर ये पर्वतराज भी अपना स्वाभाविक ऐश्वर्य प्रकट कर रहे हैं।

श्लोक 47 (kishkindha.28.47)

घनोपगूढं गगनं न तारा । न भास्करो दर्शनमभ्युपैति । नवैर्जलौघैर्धरणी वितृप्ता । तमोविलिप्ता न दिशः प्रकाशाः ॥ 28.47 ॥

ghanopagūḍhaṃ gaganaṃ na tārā | na bhāskaro darśanamabhyupaiti | navairjalaughairdharaṇī vitṛptā | tamoviliptā na diśaḥ prakāśāḥ || 28.47 ||

घने मेघों से आच्छादित आकाश में न तो तारे दिखाई देते हैं और न सूर्य; पृथ्वी नए जल-प्रवाहों से तृप्त हो चुकी है, और अंधकार से लिपटी हुई दिशाएँ प्रकाशरहित हो गई हैं...

श्लोक 48 (kishkindha.28.48)

महान्ति कूटानि महीधराणां । धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति । महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रपातैर्मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः ॥ 28.48 ॥

mahānti kūṭāni mahīdharāṇāṃ | dhārāvidhautānyadhikaṃ vibhānti | mahāpramāṇairvipulaiḥ prapātairmuktākalāpairiva lambamānaiḥ || 28.48 ||

वर्षा-धाराओं से भलीभाँति धुले हुए पर्वतों के विशाल शिखर और भी अधिक शोभायमान हो रहे हैं, मानो उनसे मोतियों की मालाएँ-सी विशाल जलधाराएँ लटक रही हों।

श्लोक 49 (kishkindha.28.49)

शैलोपलप्रस्खलमानवेगाः । शैलोत्तमानां विपुलाः प्रपाताः । गुहासु संनादितबर्हिणासु । हारा विकीर्यन्त इवावभान्ति ॥ 28.49 ॥

śailopalapraskhalamānavegāḥ | śailottamānāṃ vipulāḥ prapātāḥ | guhāsu saṃnāditabarhiṇāsu | hārā vikīryanta ivāvabhānti || 28.49 ||

पर्वत की शिलाओं से टकराती हुई, वेग से गिरती हुई ये विशाल जलधाराएँ, मयूरों की ध्वनि से गुँजायमान गुफाओं में मानो बिखरे हुए हारों-सी चमक रही हैं।

श्लोक 50 (kishkindha.28.50)

शीघ्रप्रवेगा विपुलाः प्रपाता । निर्धौतशृङ्गोपतला गिरीणाम् । मुक्ताकलापप्रतिमाः पतन्तो । महागुहोत्सङ्गतलैर्ध्रियन्ते ॥ 28.50 ॥

śīghrapravegā vipulāḥ prapātā | nirdhautaśṛṅgopatalā girīṇām | muktākalāpapratimāḥ patanto | mahāguhotsaṅgatalairdhriyante || 28.50 ||

पर्वतों के शिखरों तथा ढालों को धोती हुई ये तीव्र गति से गिरती विशाल जलधाराएँ, मोतियों की मालाओं के समान, विशाल गुफाओं के आँगनों पर मानो टिकी हुई हैं।

श्लोक 51 (kishkindha.28.51)

सुरतामर्दविच्छिन्नाः स्वर्गस्त्रीहारमौक्तिकाः । पतन्ति चातुला दिक्षु तोयधाराः समन्ततः ॥ 28.51 ॥

suratāmardavicchinnāḥ svargastrīhāramauktikāḥ | patanti cātulā dikṣu toyadhārāḥ samantataḥ || 28.51 ||

प्रेम-क्रीड़ा के आवेग में टूटी हुई स्वर्गांगनाओं के मोतियों की मालाओं के समान, ये अनुपम जलधाराएँ चारों ओर सभी दिशाओं में गिर रही हैं।

श्लोक 52 (kishkindha.28.52)

विलीयमानैर्विहगैर्निमीलद्भिश्च पङ्कजैः । विकसन्त्या च मालत्या गतोऽस्तं ज्ञायते रविः ॥ 28.52 ॥

vilīyamānairvihagairnimīladbhiśca paṅkajaiḥ | vikasantyā ca mālatyā gato'staṃ jñāyate raviḥ || 28.52 ||

पक्षियों के अपने घोंसलों में लौट आने से, कमलों के मुँद जाने से तथा मालती के पुष्पों के खिल जाने से यह ज्ञात होता है कि सूर्य अस्त हो गया है।

श्लोक 53 (kishkindha.28.53)

वृत्ता यात्रा नरेन्द्राणां सेना पथ्येव वर्तते । वैराणि चैव मार्गाश्च सलिलेन समीकृताः ॥ 28.53 ॥

vṛttā yātrā narendrāṇāṃ senā pathyeva vartate | vairāṇi caiva mārgāśca salilena samīkṛtāḥ || 28.53 ||

राजाओं की यात्राएँ रुक गई हैं, उनकी सेनाएँ मार्गों पर ही ठहरी हुई हैं; और जल ने शत्रुताओं तथा मार्गों को समान रूप से समतल कर दिया है।

श्लोक 54 (kishkindha.28.54)

मासि प्रौष्ठपदे ब्रह्म ब्राह्मणानां विवक्षताम् । अयमध्यायसमयः सामगानामुपस्थितः ॥ 28.54 ॥

māsi prauṣṭhapade brahma brāhmaṇānāṃ vivakṣatām | ayamadhyāyasamayaḥ sāmagānāmupasthitaḥ || 28.54 ||

भाद्रपद के इस मास में, वेदाध्ययन में तत्पर तथा सामगान करने वाले उन ब्राह्मणों के अध्ययन का यह समय आ पहुँचा है।

श्लोक 55 (kishkindha.28.55)

निवृत्तकर्मायतनो नूनं संचितसंचयः । आषाढीमभ्युपगतो भरतः कोसलाधिपः ॥ 28.55 ॥

nivṛttakarmāyatano nūnaṃ saṃcitasaṃcayaḥ | āṣāḍhīmabhyupagato bharataḥ kosalādhipaḥ || 28.55 ||

निश्चय ही राज-कार्यों का निपटारा कर तथा संचय एकत्र करके भरत, कोसल के अधिपति, ने आषाढ़ी पूर्णिमा को अपना व्रत आरम्भ कर लिया होगा।

श्लोक 56 (kishkindha.28.56)

नूनमापूर्यमाणायाः सरय्वा वर्धते रयः । मां समीक्ष्य समायान्तमयोध्याया इव स्वनः ॥ 28.56 ॥

nūnamāpūryamāṇāyāḥ sarayvā vardhate rayaḥ | māṃ samīkṣya samāyāntamayodhyāyā iva svanaḥ || 28.56 ||

निश्चय ही जल से परिपूर्ण होती हुई सरयू का प्रवाह-वेग बढ़ रहा होगा, मानो मुझे लौटता देख अयोध्या का कोलाहल ही बढ़ गया हो।

श्लोक 57 (kishkindha.28.57)

इमाः स्फीतगुणा वर्षाः सुग्रीवः सुखमश्नुते । विजितारिः सदारश्च राज्ये महति च स्थितः ॥ 28.57 ॥

imāḥ sphītaguṇā varṣāḥ sugrīvaḥ sukhamaśnute | vijitāriḥ sadāraśca rājye mahati ca sthitaḥ || 28.57 ||

इस गुण-सम्पन्न वर्षा-ऋतु में सुग्रीव सुख भोग रहा है, शत्रु को जीतकर, पत्नी सहित तथा एक महान् राज्य में प्रतिष्ठित होकर।

श्लोक 58 (kishkindha.28.58)

अहं तु हृतदारश्च राज्याच्च महतश्च्युतः । नदीकूलमिव क्लिन्नमवसीदामि लक्ष्मण ॥ 28.58 ॥

ahaṃ tu hṛtadāraśca rājyācca mahataścyutaḥ | nadīkūlamiva klinnamavasīdāmi lakṣmaṇa || 28.58 ||

परन्तु मैं, हे लक्ष्मण, पत्नी का हरण हो जाने से तथा एक महान् राज्य से च्युत होकर, जल में ढहते हुए नदी-तट के समान डूबता जा रहा हूँ।

श्लोक 59 (kishkindha.28.59)

शोकश्च मम विस्तीर्णो वर्षाश्च भृशदुर्गमाः । रावणश्च महाञ्छत्रुरपारः प्रतिभाति मे ॥ 28.59 ॥

śokaśca mama vistīrṇo varṣāśca bhṛśadurgamāḥ | rāvaṇaśca mahāñchatrurapāraḥ pratibhāti me || 28.59 ||

मेरा शोक असीम है, वर्षा ने सभी मार्गों को दुर्गम बना दिया है, और वह महान् शत्रु रावण मुझे पार न पाने योग्य प्रतीत होता है।

श्लोक 60 (kishkindha.28.60)

अयात्रां चैव दृष्ट्वेमां मार्गांश्च भृशदुर्गमान् । प्रणते चैव सुग्रीवे न मया किंचिदीरितम् ॥ 28.60 ॥

ayātrāṃ caiva dṛṣṭvemāṃ mārgāṃśca bhṛśadurgamān | praṇate caiva sugrīve na mayā kiṃcidīritam || 28.60 ||

इस यात्रा की असम्भवता तथा मार्गों की अत्यन्त दुर्गमता को देखकर, सुग्रीव के अत्यन्त विनम्र होते हुए भी, मैंने उससे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 61 (kishkindha.28.61)

अपि चापि परिक्लिष्टं चिराद् दारैः समागतम् । आत्मकार्यगरीयस्त्वाद् वक्तुं नेच्छामि वानरम् ॥ 28.61 ॥

api cāpi parikliṣṭaṃ cirād dāraiḥ samāgatam | ātmakāryagarīyastvād vaktuṃ necchāmi vānaram || 28.61 ||

इसके अतिरिक्त, जो वानर इतने कष्ट सहकर दीर्घकाल बाद अपनी पत्नी से मिला है, अपने कार्य की गुरुता को देखते हुए मैं उससे अभी कुछ कहना नहीं चाहता।

श्लोक 62 (kishkindha.28.62)

स्वयमेव हि विश्रम्य ज्ञात्वा कालमुपागतम् । उपकारं च सुग्रीवो वेत्स्यते नात्र संशयः ॥ 28.62 ॥

svayameva hi viśramya jñātvā kālamupāgatam | upakāraṃ ca sugrīvo vetsyate nātra saṃśayaḥ || 28.62 ||

सुग्रीव विश्राम कर लेने के पश्चात्, समय के आ पहुँचने को जानकर, स्वयं ही यह जान जाएगा कि उसे प्रत्युपकार करना है; इसमें कोई सन्देह नहीं है।

श्लोक 63 (kishkindha.28.63)

तस्मात् कालप्रतीक्षोऽहं स्थितोऽस्मि शुभलक्षण । सुग्रीवस्य नदीनां च प्रसादमभिकांक्षयन् ॥ 28.63 ॥

tasmāt kālapratīkṣo'haṃ sthito'smi śubhalakṣaṇa | sugrīvasya nadīnāṃ ca prasādamabhikāṃkṣayan || 28.63 ||

इसलिए, हे शुभलक्षण लक्ष्मण, मैं सुग्रीव की तथा नदियों की भी कृपा की प्रतीक्षा करते हुए यहीं ठहरा हुआ हूँ।

श्लोक 64 (kishkindha.28.64)

उपकारेण वीरो हि प्रतीकारेण युज्यते । अकृतज्ञोऽप्रतिकृतो हन्ति सत्त्ववतां मनः ॥ 28.64 ॥

upakāreṇa vīro hi pratīkāreṇa yujyate | akṛtajño'pratikṛto hanti sattvavatāṃ manaḥ || 28.64 ||

उपकार पाकर वीर पुरुष प्रत्युपकार करने के लिए बाध्य होता है; परन्तु जो कृतघ्न होकर प्रत्युपकार नहीं करता, वह सहृदय पुरुषों के मन को आघात पहुँचाता है।"

श्लोक 65 (kishkindha.28.65)

अथैवमुक्तः प्रणिधाय लक्ष्मणः । कृताञ्जलिस्तत् प्रतिपूज्य भाषितम् । उवाच रामं स्वभिरामदर्शनं । प्रदर्शयन् दर्शनमात्मनः शुभम् ॥ 28.65 ॥

athaivamuktaḥ praṇidhāya lakṣmaṇaḥ | kṛtāñjalistat pratipūjya bhāṣitam | uvāca rāmaṃ svabhirāmadarśanaṃ | pradarśayan darśanamātmanaḥ śubham || 28.65 ||

तब उस निश्चय को ही उचित मानकर लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर उस वचन का सम्मान करते हुए, अपने ही मंगलकारी दृष्टिकोण को प्रकट करते हुए, दर्शनमात्र से मनोहर राम से यह कहा -

श्लोक 66 (kishkindha.28.66)

यदुक्तमेतत् तव सर्वमीप्सितं । नरेन्द्र कर्ता नचिराद्धरीश्वरः । शरत्प्रतीक्षः क्षमतामिमं भवान् । जलप्रपातं रिपुनिग्रहे धृतः ॥ 28.66 ॥

yaduktametat tava sarvamīpsitaṃ | narendra kartā nacirāddharīśvaraḥ | śaratpratīkṣaḥ kṣamatāmimaṃ bhavān | jalaprapātaṃ ripunigrahe dhṛtaḥ || 28.66 ||

"यह सब वैसा ही है जैसा आपने कहा है, और जो कुछ आप चाहते हैं, हे नरेन्द्र! वह वानरेश्वर शीघ्र ही पूर्ण करेगा। शत्रु के दमन में दृढ़ रहते हुए, शरत् ऋतु की प्रतीक्षा करते हुए इस जलवृष्टि को सह लीजिए।" लक्ष्मण ने राम से ऐसा कहा।

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