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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 47

खोजी दलों की वापसी

सर्ग 46सर्ग-सूचीसर्ग 48

श्लोक 1 (kishkindha.47.1)

दर्शनार्थं तु वैदेह्याः सर्वतः कपिकुञ्जराः । व्यादिष्टाः कपिराजेन यथोक्तं जग्मुरञ्जसा ॥ 47.1 ॥

darśanārthaṃ tu vaidehyāḥ sarvataḥ kapikuñjarāḥ | vyādiṣṭāḥ kapirājena yathoktaṃ jagmurañjasā || 47.1 ||

वानरराज की आज्ञा से वे गजतुल्य वानर उनके कहे अनुसार वैदेही का पता लगाने के लिए तुरन्त सब दिशाओं में निकल पड़े।

श्लोक 2 (kishkindha.47.2)

ते सरांसि सरित्कक्षानाकाशं नगराणि च । नदीदुर्गांस्तथा शैलान् विचिन्वन्ति समन्ततः ॥ 47.2 ॥

te sarāṃsi saritkakṣānākāśaṃ nagarāṇi ca | nadīdurgāṃstathā śailān vicinvanti samantataḥ || 47.2 ||

वे सरोवरों, नदी-तटों की झाड़ियों, आकाश, नगरों, नदी-दुर्गों तथा पर्वतों को — हर ओर से खोजते रहे।

श्लोक 3 (kishkindha.47.3)

सुग्रीवेण समाख्याताः सर्वे वानरयूथपाः । तत्र देशान् प्रविचिन्वन्ति सशैलवनकाननान् ॥ 47.3 ॥

sugrīveṇa samākhyātāḥ sarve vānarayūthapāḥ | tatra deśān pravicinvanti saśailavanakānanān || 47.3 ||

सुग्रीव द्वारा नियुक्त सभी वानर-सेनापति उन देशों को उनके पर्वतों, उपवनों तथा वनों सहित भलीभाँति खोजते रहे।

श्लोक 4 (kishkindha.47.4)

विचित्य दिवसं सर्वे सीताधिगमने धृताः । समायान्ति स्म मेदिन्यां निशाकालेषु वानराः ॥ 47.4 ॥

vicitya divasaṃ sarve sītādhigamane dhṛtāḥ | samāyānti sma medinyāṃ niśākāleṣu vānarāḥ || 47.4 ||

सीता को पाने के लिए दृढ़ संकल्प वे सभी वानर दिन-भर खोज करते और रात्रि के समय पुनः धरती पर एकत्र हो जाते थे।

श्लोक 5 (kishkindha.47.5)

सर्वर्तुकांश्च देशेषु वानराः सफलद्रुमान् । आसाद्य रजनीं शय्यां चक्रुः सर्वेष्वहःसु ते ॥ 47.5 ॥

sarvartukāṃśca deśeṣu vānarāḥ saphaladrumān | āsādya rajanīṃ śayyāṃ cakruḥ sarveṣvahaḥsu te || 47.5 ||

प्रत्येक रात्रि उन प्रदेशों में वानर सब ऋतुओं में फल देने वाले वृक्षों पर अपनी शय्या बनाते थे।

श्लोक 6 (kishkindha.47.6)

तदहः प्रथमं कृत्वा मासे प्रस्रवणं गताः । कपिराजेन संगम्य निराशाः कपिकुञ्जराः ॥ 47.6 ॥

tadahaḥ prathamaṃ kṛtvā māse prasravaṇaṃ gatāḥ | kapirājena saṃgamya nirāśāḥ kapikuñjarāḥ || 47.6 ||

उस पहले दिन से गिनती करते हुए, जब एक मास पूर्ण हो गया, तब निराश हो चुके वे गजतुल्य वानर प्रस्रवण पर्वत पर लौटकर वानरराज से मिले।

श्लोक 7 (kishkindha.47.7)

विचित्य तु दिशं पूर्वां यथोक्तां सचिवैः सह । अदृष्ट्वा विनतः सीतामाजगाम महाबलः ॥ 47.7 ॥

vicitya tu diśaṃ pūrvāṃ yathoktāṃ sacivaiḥ saha | adṛṣṭvā vinataḥ sītāmājagāma mahābalaḥ || 47.7 ||

महाबली विनत ने अपने सहचरों के साथ आदेशानुसार पूर्व दिशा को खोजकर, सीता को न पाकर लौट आये।

श्लोक 8 (kishkindha.47.8)

दिशमप्युत्तरां सर्वां विविच्य स महाकपिः । आगतः सह सैन्येन वीरः शतबलिस्तदा ॥ 47.8 ॥

diśamapyuttarāṃ sarvāṃ vivicya sa mahākapiḥ | āgataḥ saha sainyena vīraḥ śatabalistadā || 47.8 ||

उसी प्रकार सम्पूर्ण उत्तर दिशा को खोजकर वह वीर महाकपि शतबलि भी अपनी सेना सहित लौट आये।

श्लोक 9 (kishkindha.47.9)

सुषेणः पश्चिमामाशां विविच्य सह वानरैः । समेत्य मासे पूर्णे तु सुग्रीवमुपचक्रमे ॥ 47.9 ॥

suṣeṇaḥ paścimāmāśāṃ vivicya saha vānaraiḥ | sametya māse pūrṇe tu sugrīvamupacakrame || 47.9 ||

सुषेण भी अपने वानरों के साथ पश्चिम दिशा को खोजकर, मास पूर्ण होने पर, सबके साथ आकर सुग्रीव के समीप पहुँचे।

श्लोक 10 (kishkindha.47.10)

तं प्रस्रवणपृष्ठस्थं समासाद्याभिवाद्य च । आसीनं सह रामेण सुग्रीवमिदमब्रुवन् ॥ 47.10 ॥

taṃ prasravaṇapṛṣṭhasthaṃ samāsādyābhivādya ca | āsīnaṃ saha rāmeṇa sugrīvamidamabruvan || 47.10 ||

प्रस्रवण के शिखर पर राम के साथ बैठे हुए सुग्रीव के पास जाकर तथा उन्हें प्रणाम करके, उन्होंने यह कहा —

श्लोक 11 (kishkindha.47.11)

विचिताः पर्वताः सर्वे वनानि गहनानि च । निम्नगाः सागरान्ताश्च सर्वे जनपदाश्च ये ॥ 47.11 ॥

vicitāḥ parvatāḥ sarve vanāni gahanāni ca | nimnagāḥ sāgarāntāśca sarve janapadāśca ye || 47.11 ||

"समस्त पर्वतों की खोज कर ली गयी है, घने वनों की भी; समुद्र-तट तक की नदियों की, तथा सब बसे हुए प्रदेशों की भी।

श्लोक 12 (kishkindha.47.12)

गुहाश्च विचिताः सर्वा याश्च ते परिकीर्तिताः । विचिताश्च महागुल्मा लताविततसंतताः ॥ 47.12 ॥

guhāśca vicitāḥ sarvā yāśca te parikīrtitāḥ | vicitāśca mahāgulmā latāvitatasaṃtatāḥ || 47.12 ||

आपके द्वारा बताई गयी सभी गुफाओं की खोज कर ली गयी है, तथा लताओं से आच्छादित सघन झाड़ियों की भी खोज हो चुकी है।

श्लोक 13 (kishkindha.47.13)

गहनेषु च देशेषु दुर्गेषु विषमेषु च । सत्त्वान्यतिप्रमाणानि विचितानि हतानि च । ये चैव गहना देशा विचितास्ते पुनः पुनः ॥ 47.13 ॥

gahaneṣu ca deśeṣu durgeṣu viṣameṣu ca | sattvānyatipramāṇāni vicitāni hatāni ca | ye caiva gahanā deśā vicitāste punaḥ punaḥ || 47.13 ||

सघन तथा दुर्गम, विषम प्रदेशों में अत्यन्त विशालकाय प्राणियों को भी खोजा गया है — और आवश्यकता पड़ने पर मारा भी गया है; तथा वे घने-दुर्गम प्रदेश बार-बार खोजे जा चुके हैं।

श्लोक 14 (kishkindha.47.14)

उदारसत्त्वाभिजनो हनूमान् स मैथिलीं ज्ञास्यति वानरेन्द्र । दिशं तु यामेव गता तु सीता तामास्थितो वायुसुतो हनूमान् ॥ 47.14 ॥

udārasattvābhijano hanūmān sa maithilīṃ jñāsyati vānarendra | diśaṃ tu yāmeva gatā tu sītā tāmāsthito vāyusuto hanūmān || 47.14 ||

किन्तु हे वानरेन्द्र! उदार स्वभाव तथा उत्तम कुल वाले हनुमान ही मैथिली का पता लगायेंगे — क्योंकि वायुपुत्र हनुमान उसी दिशा में गये हैं, जिस दिशा में सीता ले जायी गयी थीं।"

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