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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 48

ऋषि कण्डु का शापित वन

सर्ग 47सर्ग-सूचीसर्ग 49

श्लोक 1 (kishkindha.48.1)

सह ताराङ्गदाभ्यां तु सहसा हनुमान् कपिः । सुग्रीवेण यथोद्दिष्टं तं देशमुपचक्रमे ॥ 48.1 ॥

saha tārāṅgadābhyāṃ tu sahasā hanumān kapiḥ | sugrīveṇa yathoddiṣṭaṃ taṃ deśamupacakrame || 48.1 ||

तार तथा अंगद के साथ वानर हनुमान तुरन्त सुग्रीव द्वारा बताये गये उसी प्रदेश की ओर चल पड़े।

श्लोक 2 (kishkindha.48.2)

स तु दूरमुपागम्य सर्वैस्तैः कपिसत्तमैः । ततो विचित्य विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च ॥ 48.2 ॥

sa tu dūramupāgamya sarvaistaiḥ kapisattamaiḥ | tato vicitya vindhyasya guhāśca gahanāni ca || 48.2 ||

उन सभी श्रेष्ठ वानरों के साथ दूर तक जाकर, उन्होंने विन्ध्य पर्वत की गुफाओं तथा घने वनों को खोजा,

श्लोक 3 (kishkindha.48.3)

पर्वताग्रनदीदुर्गान् सरांसि विपुलद्रुमान् । वृक्षखण्डांश्च विविधान् पर्वतान् वनपादपान् ॥ 48.3 ॥

parvatāgranadīdurgān sarāṃsi vipuladrumān | vṛkṣakhaṇḍāṃśca vividhān parvatān vanapādapān || 48.3 ||

पर्वत-शिखरों, नदी-दुर्गों, विशाल वृक्षों से घिरे सरोवरों, विविध वृक्ष-समूहों, पर्वतों तथा वन-उपवनों को भी खोजा।

श्लोक 4 (kishkindha.48.4)

अन्वेषमाणास्ते सर्वे वानराः सर्वतो दिशम् । न सीतां ददृशुर्वीरा मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥ 48.4 ॥

anveṣamāṇāste sarve vānarāḥ sarvato diśam | na sītāṃ dadṛśurvīrā maithilīṃ janakātmajām || 48.4 ||

उन सभी वीर वानरों ने चारों दिशाओं में खोजा, फिर भी उन्हें जनक-पुत्री मैथिली सीता कहीं दिखायी नहीं दीं।

श्लोक 5 (kishkindha.48.5)

ते भक्षयन्तो मूलानि फलानि विविधान्यपि । अन्वेषमाणा दुर्धर्षा न्यवसंस्तत्र तत्र ह ॥ 48.5 ॥

te bhakṣayanto mūlāni phalāni vividhānyapi | anveṣamāṇā durdharṣā nyavasaṃstatra tatra ha || 48.5 ||

कन्द-मूल तथा विविध फल खाते हुए, वे अजेय खोजी वानर मार्ग में जहाँ-तहाँ ठहरते रहे।

श्लोक 6 (kishkindha.48.6)

स तु देशो दुरन्वेषो गुहागहनवान् महान् । निर्जलं निर्जनं शून्यं गहनं घोरदर्शनम् ॥ 48.6 ॥

sa tu deśo duranveṣo guhāgahanavān mahān | nirjalaṃ nirjanaṃ śūnyaṃ gahanaṃ ghoradarśanam || 48.6 ||

किन्तु वह विशाल प्रदेश, गुफाओं तथा सघन वनों से युक्त, खोजना अत्यन्त कठिन था — जलहीन, जनहीन, शून्य, घना तथा देखने में भयंकर।

श्लोक 7 (kishkindha.48.7)

तादृशान्यप्यरण्यानि विचित्य भृशपीडिताः । स देशश्च दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान् ॥ 48.7 ॥

tādṛśānyapyaraṇyāni vicitya bhṛśapīḍitāḥ | sa deśaśca duranveṣyo guhāgahanavān mahān || 48.7 ||

उसी प्रकार के अन्य वनों को भी खोजकर, अत्यन्त पीड़ित हो चुके वे उस गुफाओं-वनों वाले विशाल प्रदेश को खोजना भी दुष्कर पा रहे थे।

श्लोक 8 (kishkindha.48.8)

त्यक्त्वा तु तं ततो देशं सर्वे वै हरियूथपाः । देशमन्यं दुराधर्षं विविशुश्चाकुतोभयाः ॥ 48.8 ॥

tyaktvā tu taṃ tato deśaṃ sarve vai hariyūthapāḥ | deśamanyaṃ durādharṣaṃ viviśuścākutobhayāḥ || 48.8 ||

उस प्रदेश को छोड़कर वे सभी वानर-सेनापति, किसी भी ओर से निर्भय होकर, एक अन्य दुर्गम प्रदेश में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 9 (kishkindha.48.9)

यत्र वन्ध्यफला वृक्षा विपुष्पाः पर्णवर्जिताः । निस्तोयाः सरितो यत्र मूलं यत्र सुदुर्लभम् ॥ 48.9 ॥

yatra vandhyaphalā vṛkṣā vipuṣpāḥ parṇavarjitāḥ | nistoyāḥ sarito yatra mūlaṃ yatra sudurlabham || 48.9 ||

जहाँ वृक्ष फलरहित थे, पुष्पहीन तथा पत्तों से रहित थे; जहाँ नदियाँ जलरहित थीं, और कन्द-मूल भी अत्यन्त दुर्लभ थे।

श्लोक 10 (kishkindha.48.10)

न सन्ति महिषा यत्र न मृगा न च हस्तिनः । शार्दूलाः पक्षिणो वापि ये चान्ये वनगोचराः ॥ 48.10 ॥

na santi mahiṣā yatra na mṛgā na ca hastinaḥ | śārdūlāḥ pakṣiṇo vāpi ye cānye vanagocarāḥ || 48.10 ||

वहाँ न भैंसे थे, न मृग, न हाथी, न व्याघ्र, न पक्षी, और न ही वन में विचरण करने वाला कोई अन्य प्राणी।

श्लोक 11 (kishkindha.48.11)

न चात्र वृक्षा नौषध्यो न वल्ल्यो नापि वीरुधः । स्निग्धपत्राः स्थले यत्र पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः ॥ 48.11 ॥

na cātra vṛkṣā nauṣadhyo na vallyo nāpi vīrudhaḥ | snigdhapatrāḥ sthale yatra padminyaḥ phullapaṅkajāḥ || 48.11 ||

वहाँ न वृक्ष थे, न औषधियाँ, न लताएँ, और न ही बेलें; न वहाँ चिकनी पत्तियों तथा खिले हुए कमलों वाले सरोवर थे,

श्लोक 12 (kishkindha.48.12)

प्रेक्षणीयाः सुगन्धाश्च भ्रमरैश्च विवर्जिताः । कण्डुर्नाम महाभागः सत्यवादी तपोधनः ॥ 48.12 ॥

prekṣaṇīyāḥ sugandhāśca bhramaraiśca vivarjitāḥ | kaṇḍurnāma mahābhāgaḥ satyavādī tapodhanaḥ || 48.12 ||

सुन्दर एवं सुगन्धित, भौंरों से भरे हुए। उस प्रदेश में कण्डु नामक एक अत्यन्त तेजस्वी, सत्यवादी तथा तपोधन ऋषि निवास करते थे,

श्लोक 13 (kishkindha.48.13)

महर्षिः परमामर्षी नियमैर्दुष्प्रधर्षणः । तस्य तस्मिन् वने पुत्रो बालको दशवार्षिकः ॥ 48.13 ॥

maharṣiḥ paramāmarṣī niyamairduṣpradharṣaṇaḥ | tasya tasmin vane putro bālako daśavārṣikaḥ || 48.13 ||

वे महर्षि अत्यन्त क्रोधी स्वभाव के थे और अपने नियमों के बल पर अजेय थे। उस वन में उनका दस वर्ष का एक बालक पुत्र था;

श्लोक 14 (kishkindha.48.14)

प्रणष्टो जीवितान्ताय क्रुद्धस्तेन महामुनिः । तेन धर्मात्मना शप्तं कृत्स्नं तत्र महद्वनम् ॥ 48.14 ॥

praṇaṣṭo jīvitāntāya kruddhastena mahāmuniḥ | tena dharmātmanā śaptaṃ kṛtsnaṃ tatra mahadvanam || 48.14 ||

जब उस बालक की मृत्यु हो गयी, तब वे महामुनि अत्यन्त क्रुद्ध हुए, और उन धर्मात्मा मुनि ने उस सम्पूर्ण महावन को शाप दे दिया,

श्लोक 15 (kishkindha.48.15)

अशरण्यं दुराधर्षं मृगपक्षिविवर्जितम् । तस्य ते काननान्तांस्तु गिरीणां कन्दराणि च ॥ 48.15 ॥

aśaraṇyaṃ durādharṣaṃ mṛgapakṣivivarjitam | tasya te kānanāntāṃstu girīṇāṃ kandarāṇi ca || 48.15 ||

कि वह आश्रयहीन, दुर्गम तथा पशु-पक्षियों से रहित हो जाये। फिर भी वे वानर उस वन की सीमाओं, पर्वत-गुफाओं,

श्लोक 16 (kishkindha.48.16)

प्रभवाणि नदीनां च विचिन्वन्ति समाहिताः । तत्र चापि महात्मानो नापश्यञ्जनकात्मजाम् ॥ 48.16 ॥

prabhavāṇi nadīnāṃ ca vicinvanti samāhitāḥ | tatra cāpi mahātmāno nāpaśyañjanakātmajām || 48.16 ||

तथा नदियों के उद्गम-स्थानों को भी सावधानी से खोजते रहे, किन्तु वहाँ भी उन महात्मा वानरों को जनकपुत्री सीता

श्लोक 17 (kishkindha.48.17)

हर्तारं रावणं वापि सुग्रीवप्रियकारिणः । ते प्रविश्य तु तं भीमं लतागुल्मसमावृतम् ॥ 48.17 ॥

hartāraṃ rāvaṇaṃ vāpi sugrīvapriyakāriṇaḥ | te praviśya tu taṃ bhīmaṃ latāgulmasamāvṛtam || 48.17 ||

और न ही उनका हरण करने वाला रावण दिखायी दिया। तब सुग्रीव के प्रिय-कार्य में तत्पर वे वानर लताओं-झाड़ियों से आच्छादित उस भयंकर स्थान में प्रविष्ट हुए,

श्लोक 18 (kishkindha.48.18)

ददृशुर्भीमकर्माणमसुरं सुरनिर्भयम् । तं दृष्ट्वा वानरा घोरं स्थितं शैलमिवासुरम् ॥ 48.18 ॥

dadṛśurbhīmakarmāṇamasuraṃ suranirbhayam | taṃ dṛṣṭvā vānarā ghoraṃ sthitaṃ śailamivāsuram || 48.18 ||

और वहाँ देवताओं से भी न डरने वाले, भयंकर कर्म करने वाले एक असुर को देखा; पर्वत के समान खड़े उस भयानक असुर को देखकर,

श्लोक 19 (kishkindha.48.19)

गाढं परिहिताः सर्वे दृष्ट्वा तं पर्वतोपमम् । सोऽपि तान् वानरान् सर्वान् नष्टाः स्थेत्यब्रवीद् बली ॥ 48.19 ॥

gāḍhaṃ parihitāḥ sarve dṛṣṭvā taṃ parvatopamam | so'pi tān vānarān sarvān naṣṭāḥ sthetyabravīd balī || 48.19 ||

पर्वत के समान उस विशालकाय प्राणी को देखकर सभी वानरों ने अपनी कमर कस ली। उस बलशाली असुर ने भी सब वानरों को ललकारते हुए कहा, "तुम सब मारे गये — वहीं रुको!"

श्लोक 20 (kishkindha.48.20)

अभ्यधावत संक्रुद्धो मुष्टिमुद्यम्य संगतम् । तमापतन्तं सहसा वालिपुत्रोऽङ्गदस्तदा ॥ 48.20 ॥

abhyadhāvata saṃkruddho muṣṭimudyamya saṃgatam | tamāpatantaṃ sahasā vāliputro'ṅgadastadā || 48.20 ||

और अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसने अपनी मुट्ठी तानकर उन पर आक्रमण किया। तब वालि-पुत्र अंगद ने उसे अचानक झपटता देखकर,

श्लोक 21 (kishkindha.48.21)

रावणोऽयमिति ज्ञात्वा तलेनाभिजघान ह । स वालिपुत्राभिहतो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् ॥ 48.21 ॥

rāvaṇo'yamiti jñātvā talenābhijaghāna ha | sa vāliputrābhihato vaktrācchoṇitamudvaman || 48.21 ||

यह सोचकर कि "यह रावण है," उसे अपनी हथेली से एक प्रहार किया। वालि-पुत्र के उस प्रहार से आहत होकर वह असुर मुख से रक्त वमन करता हुआ

श्लोक 22 (kishkindha.48.22)

असुरो न्यपतद् भूमौ पर्यस्त इव पर्वतः । ते तु तस्मिन् निरुच्छ्वासे वानरा जितकाशिनः ॥ 48.22 ॥

asuro nyapatad bhūmau paryasta iva parvataḥ | te tu tasmin nirucchvāse vānarā jitakāśinaḥ || 48.22 ||

पृथ्वी पर उखड़े हुए पर्वत के समान गिर पड़ा। उस असुर के प्राण निकल जाने पर, विजयोल्लास से भरे वानरों ने

श्लोक 23 (kishkindha.48.23)

व्यचिन्वन् प्रायशस्तत्र सर्वं तद्गिरिगह्वरम् । विचितं तु ततः सर्वं सर्वे ते काननौकसः ॥ 48.23 ॥

vyacinvan prāyaśastatra sarvaṃ tadgirigahvaram | vicitaṃ tu tataḥ sarvaṃ sarve te kānanaukasaḥ || 48.23 ||

प्रायः उस सम्पूर्ण पर्वत-गुफा को खोज डाला; और जब उन सभी वनवासी वानरों ने वह सारा स्थान खोज लिया,

श्लोक 24 (kishkindha.48.24)

अन्यदेवापरं घोरं विविशुर्गिरिगह्वरम् । ते विचित्य पुनः खिन्ना विनिष्पत्य समागताः । एकान्ते वृक्षमूले तु निषेदुर्दीनमानसाः ॥ 48.24 ॥

anyadevāparaṃ ghoraṃ viviśurgirigahvaram | te vicitya punaḥ khinnā viniṣpatya samāgatāḥ | ekānte vṛkṣamūle tu niṣedurdīnamānasāḥ || 48.24 ||

वे एक और भयंकर पर्वत-गुफा में प्रविष्ट हुए। उसे भी खोजकर, थके हुए, वे बाहर निकलकर पुनः एकत्र हुए, और उदास मन से एक एकान्त वृक्ष के नीचे बैठ गये।

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