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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 51

स्वयंप्रभा और मायावी गुफा

सर्ग 50सर्ग-सूचीसर्ग 52

श्लोक 1 (kishkindha.51.1)

इत्युक्त्वा हनुमांस्तत्र पुनः कृष्णाजिनाम्बराम् । अब्रवीत् तां महाभागां तापसीं धर्मचारिणीम् ॥ 51.1 ॥

ityuktvā hanumāṃstatra punaḥ kṛṣṇājināmbarām | abravīt tāṃ mahābhāgāṃ tāpasīṃ dharmacāriṇīm || 51.1 ||

ऐसा कहकर हनुमान ने वहाँ काले मृगचर्म को वस्त्र के रूप में धारण किए हुए उस परम भाग्यशालिनी, धर्मपरायण तपस्विनी से पुनः कहा।

श्लोक 2 (kishkindha.51.2)

इदं प्रविष्टाः सहसा बिलं तिमिरसंवृतम् । क्षुत्पिपासापरिश्रान्ताः परिखिन्नाश्च सर्वशः ॥ 51.2 ॥

idaṃ praviṣṭāḥ sahasā bilaṃ timirasaṃvṛtam | kṣutpipāsāpariśrāntāḥ parikhinnāśca sarvaśaḥ || 51.2 ||

हम भूख-प्यास से थके और सब प्रकार से क्लांत होकर अचानक अंधकार से घिरी इस गुफा में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 3 (kishkindha.51.3)

महद् धरण्या विवरं प्रविष्टाः स्म पिपासिताः । इमांस्त्वेवंविधान् भावान् विविधानद्भुतोपमान् ॥ 51.3 ॥

mahad dharaṇyā vivaraṃ praviṣṭāḥ sma pipāsitāḥ | imāṃstvevaṃvidhān bhāvān vividhānadbhutopamān || 51.3 ||

प्यास से व्याकुल होकर हम पृथ्वी के इस विशाल विवर में घुसे; और इन नाना प्रकार के विचित्र तथा अद्भुत दृश्यों को—

श्लोक 4 (kishkindha.51.4)

दृष्ट्वा वयं प्रव्यथिताः सम्भ्रान्ता नष्टचेतसः । कस्यैते काञ्चना वृक्षास्तरुणादित्यसंनिभाः ॥ 51.4 ॥

dṛṣṭvā vayaṃ pravyathitāḥ sambhrāntā naṣṭacetasaḥ | kasyaite kāñcanā vṛkṣāstaruṇādityasaṃnibhāḥ || 51.4 ||

—देखकर हम व्याकुल, भ्रमित और चेतनाशून्य हो उठे: उदीयमान सूर्य के समान चमकते हुए ये स्वर्णिम वृक्ष किसके हैं?

श्लोक 5 (kishkindha.51.5)

शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च । काञ्चनानि विमानानि राजतानि गृहाणि च ॥ 51.5 ॥

śucīnyabhyavahārāṇi mūlāni ca phalāni ca | kāñcanāni vimānāni rājatāni gṛhāṇi ca || 51.5 ||

शुद्ध खाने योग्य कंद-मूल और फल, स्वर्णमय विमान और रजतमय भवन,

श्लोक 6 (kishkindha.51.6)

तपनीयगवाक्षाणि मणिजालावृतानि च । पुष्पिताः फलवन्तश्च पुण्याः सुरभिगन्धयः ॥ 51.6 ॥

tapanīyagavākṣāṇi maṇijālāvṛtāni ca | puṣpitāḥ phalavantaśca puṇyāḥ surabhigandhayaḥ || 51.6 ||

तपाए हुए स्वर्ण के गवाक्ष, मणियों के जाल से आच्छादित; फूले-फले हुए, पवित्र और सुगंधित वृक्ष,

श्लोक 7 (kishkindha.51.7)

इमे जाम्बूनदमयाः पादपाः कस्य तेजसा । काञ्चनानि च पद्मानि जातानि विमले जले ॥ 51.7 ॥

ime jāmbūnadamayāḥ pādapāḥ kasya tejasā | kāñcanāni ca padmāni jātāni vimale jale || 51.7 ||

किसके तेज से ये जाम्बूनद स्वर्ण से बने वृक्ष हैं, और किसके प्रभाव से इस निर्मल जल में स्वर्णिम कमल उत्पन्न हुए हैं?

श्लोक 8 (kishkindha.51.8)

कथं मत्स्याश्च सौवर्णा दृश्यन्ते सह कच्छपैः । आत्मनस्त्वनुभावाद् वा कस्य चैतत्तपोबलम् ॥ 51.8 ॥

kathaṃ matsyāśca sauvarṇā dṛśyante saha kacchapaiḥ | ātmanastvanubhāvād vā kasya caitattapobalam || 51.8 ||

स्वर्णमय मछलियाँ कछुओं के साथ कैसे दिखाई देती हैं? क्या यह आपके अपने प्रभाव से है, अथवा यह किसके तपोबल का फल है?

श्लोक 9 (kishkindha.51.9)

अजानतां नः सर्वेषां सर्वमाख्यातुमर्हसि । एवमुक्ता हनुमता तापसी धर्मचारिणी ॥ 51.9 ॥

ajānatāṃ naḥ sarveṣāṃ sarvamākhyātumarhasi | evamuktā hanumatā tāpasī dharmacāriṇī || 51.9 ||

हम कुछ नहीं जानते; आप हमें यह सब बताने योग्य हैं।' हनुमान द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस धर्मपरायण तपस्विनी ने,

श्लोक 10 (kishkindha.51.10)

प्रत्युवाच हनूमन्तं सर्वभूतहिते रता । मयो नाम महातेजा मायावी दानवर्षभः ॥ 51.10 ॥

pratyuvāca hanūmantaṃ sarvabhūtahite ratā | mayo nāma mahātejā māyāvī dānavarṣabhaḥ || 51.10 ||

समस्त प्राणियों के हित में रत उस तपस्विनी ने हनुमान को उत्तर दिया: 'मय नामक एक महातेजस्वी, मायावी और दानवों में श्रेष्ठ था —

श्लोक 11 (kishkindha.51.11)

तेनेदं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम् । पुरा दानवमुख्यानां विश्वकर्मा बभूव ह ॥ 51.11 ॥

tenedaṃ nirmitaṃ sarvaṃ māyayā kāñcanaṃ vanam | purā dānavamukhyānāṃ viśvakarmā babhūva ha || 51.11 ||

उसी ने अपनी माया से यह समस्त स्वर्णिम वन रचा था। वह प्राचीन काल में दानवों के प्रमुखों का विश्वकर्मा (शिल्पकार) बना।

श्लोक 12 (kishkindha.51.12)

येनेदं काञ्चनं दिव्यं निर्मितं भवनोत्तमम् । स तु वर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महद्वने ॥ 51.12 ॥

yenedaṃ kāñcanaṃ divyaṃ nirmitaṃ bhavanottamam | sa tu varṣasahasrāṇi tapastaptvā mahadvane || 51.12 ||

जिसने यह दिव्य स्वर्णमय उत्तम भवन बनाया। उसने इस विशाल वन में हजार वर्षों तक तपस्या करके,

श्लोक 13 (kishkindha.51.13)

पितामहाद् वरं लेभे सर्वमौशनसं धनम् । विधाय सर्वं बलवान् सर्वकामेश्वरस्तदा ॥ 51.13 ॥

pitāmahād varaṃ lebhe sarvamauśanasaṃ dhanam | vidhāya sarvaṃ balavān sarvakāmeśvarastadā || 51.13 ||

ब्रह्माजी से यह वरदान प्राप्त किया कि उसे शुक्राचार्य का समस्त धन (शिल्पविद्या) मिल जाए। यह सब सिद्ध करके वह बलवान, समस्त कामनाओं का स्वामी बन गया —

श्लोक 14 (kishkindha.51.14)

उवास सुखितः कालं कंचिदस्मिन् महावने । तमप्सरसि हेमायां सक्तं दानवपुङ्गवम् ॥ 51.14 ॥

uvāsa sukhitaḥ kālaṃ kaṃcidasmin mahāvane | tamapsarasi hemāyāṃ saktaṃ dānavapuṅgavam || 51.14 ||

कुछ काल तक इस महावन में सुखपूर्वक निवास करता रहा। अप्सरा हेमा में आसक्त हुए उस दानवश्रेष्ठ को,

श्लोक 15 (kishkindha.51.15)

विक्रम्यैवाशनिं गृह्य जघानेशः पुरंदरः । इदं च ब्रह्मणा दत्तं हेमायै वनमुत्तमम् ॥ 51.15 ॥

vikramyaivāśaniṃ gṛhya jaghāneśaḥ puraṃdaraḥ | idaṃ ca brahmaṇā dattaṃ hemāyai vanamuttamam || 51.15 ||

इंद्र ने वज्र उठाकर पराक्रमपूर्वक मार डाला। और यह उत्तम वन ब्रह्माजी ने हेमा को प्रदान किया,

श्लोक 16 (kishkindha.51.16)

शाश्वतः कामभोगश्च गृहं चेदं हिरण्मयम् । दुहिता मेरुसावर्णेरहं तस्याः स्वयंप्रभा ॥ 51.16 ॥

śāśvataḥ kāmabhogaśca gṛhaṃ cedaṃ hiraṇmayam | duhitā merusāvarṇerahaṃ tasyāḥ svayaṃprabhā || 51.16 ||

साथ ही चिरस्थायी भोग और यह स्वर्णमय भवन भी। मैं मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयंप्रभा, उसी हेमा की सखी हूँ।

श्लोक 17 (kishkindha.51.17)

इदं रक्षामि भवनं हेमाया वानरोत्तम । मम प्रियसखी हेमा नृत्तगीतविशारदा ॥ 51.17 ॥

idaṃ rakṣāmi bhavanaṃ hemāyā vānarottama | mama priyasakhī hemā nṛttagītaviśāradā || 51.17 ||

हे वानरश्रेष्ठ! मैं हेमा के इस भवन की रक्षा करती हूँ। नृत्य और गीत में निपुण हेमा मेरी प्रिय सखी है।

श्लोक 18 (kishkindha.51.18)

तयादत्तवरा चास्मि रक्षामि भवनं महत् । किं कार्यं कस्य वा हेतोः कान्ताराणि प्रपद्यथ ॥ 51.18 ॥

tayādattavarā cāsmi rakṣāmi bhavanaṃ mahat | kiṃ kāryaṃ kasya vā hetoḥ kāntārāṇi prapadyatha || 51.18 ||

उसी के द्वारा दिए गए वरदान से मैं इस विशाल भवन की रक्षा करती हूँ। तुम किस कार्य से अथवा किस कारण इन दुर्गम वनों में आ पहुँचे,

श्लोक 19 (kishkindha.51.19)

कथं चेदं वनं दुर्गं युष्माभिरुपलक्षितम् । शुचीन्यभ्यवहाराणि मूलानि च फलानि च । भुक्त्वा पीत्वा च पानीयं सर्वं मे वक्तुमर्हसि ॥ 51.19 ॥

kathaṃ cedaṃ vanaṃ durgaṃ yuṣmābhirupalakṣitam | śucīnyabhyavahārāṇi mūlāni ca phalāni ca | bhuktvā pītvā ca pānīyaṃ sarvaṃ me vaktumarhasi || 51.19 ||

और यह दुर्गम वन तुमने कैसे खोज निकाला? इन शुद्ध खाद्य पदार्थों, कंद-मूल और फलों को खाकर तथा जल पीकर तुम्हें मुझे सब कुछ बताना चाहिए।

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