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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 54

अंगद के प्रति हनुमान की नीति

सर्ग 53सर्ग-सूचीसर्ग 55

श्लोक 1 (kishkindha.54.1)

तथा ब्रुवति तारे तु ताराधिपतिवर्चसि । अथ मेने हृतं राज्यं हनूमानङ्गदेन तत् ॥ 54.1 ॥

tathā bruvati tāre tu tārādhipativarcasi | atha mene hṛtaṃ rājyaṃ hanūmānaṅgadena tat || 54.1 ||

चन्द्रमा के समान तेजस्वी तार के इस प्रकार कहने पर हनुमान ने यह समझ लिया कि मानो अंगद ने राज्य ही हड़प लिया है।

श्लोक 2 (kishkindha.54.2)

बुद्ध्या ह्यष्टाङ्गया युक्तं चतुर्बलसमन्वितम् । चतुर्दशगुणं मेने हनूमान् वालिनः सुतम् ॥ 54.2 ॥

buda‍dhyā hyaṣṭāṅgayā yuktaṃ caturbalasamanvitam | caturdaśaguṇaṃ mene hanūmān vālinaḥ sutam || 54.2 ||

हनुमान ने वालि-पुत्र अंगद को अष्टांग बुद्धि से युक्त, चतुर्विध बल से संपन्न और चौदह राजोचित गुणों से युक्त माना।

श्लोक 3 (kishkindha.54.3)

आपूर्यमाणं शश्वच्च तेजोबलपराक्रमैः । शशिनं शुक्लपक्षादौ वर्धमानमिव श्रिया ॥ 54.3 ॥

āpūryamāṇaṃ śaśvacca tejobalaparākramaiḥ | śaśinaṃ śuklapakṣādau vardhamānamiva śriyā || 54.3 ||

—जो तेज, बल और पराक्रम से निरंतर बढ़ता जा रहा था, मानो शुक्ल पक्ष में बढ़ता हुआ चन्द्रमा हो।

श्लोक 4 (kishkindha.54.4)

बृहस्पतिसमं बुद्ध्या विक्रमे सदृशं पितुः । शुश्रूषमाणं तारस्य शुक्रस्येव पुरंदरम् ॥ 54.4 ॥

bṛhaspatisamaṃ buddhyā vikrame sadṛśaṃ pituḥ | śuśrūṣamāṇaṃ tārasya śukrasyeva puraṃdaram || 54.4 ||

—बुद्धि में बृहस्पति के समान, पराक्रम में अपने पिता के तुल्य, तथा तार की वैसे ही सेवा करता हुआ जैसे इंद्र शुक्राचार्य की करते हैं।

श्लोक 5 (kishkindha.54.5)

भर्तुरर्थे परिश्रान्तं सर्वशास्त्रविशारदः । अभिसंधातुमारेभे हनूमानङ्गदं ततः ॥ 54.5 ॥

bharturarthe pariśrāntaṃ sarvaśāstraviśāradaḥ | abhisaṃdhātumārebhe hanūmānaṅgadaṃ tataḥ || 54.5 ||

—अपने स्वामी के कार्य में परिश्रम करने वाले उस अंगद को, समस्त शास्त्रों में निपुण हनुमान ने तब अपनी युक्ति से साधने का प्रयत्न आरंभ किया।

श्लोक 6 (kishkindha.54.6)

स चतुर्णामुपायानां तृतीयमुपवर्णयन् । भेदयामास तान् सर्वान् वानरान् वाक्यसम्पदा ॥ 54.6 ॥

sa caturṇāmupāyānāṃ tṛtīyamupavarṇayan | bhedayāmāsa tān sarvān vānarān vākyasampadā || 54.6 ||

चार उपायों में से तीसरे (भेद) का प्रयोग करते हुए उसने अपनी वाणी के प्रभाव से उन सब वानरों में फूट डाल दी।

श्लोक 7 (kishkindha.54.7)

तेषु सर्वेषु भिन्नेषु ततोऽभीषयदङ्गदम् । भीषणैर्विविधैर्वाक्यैः कोपोपायसमन्वितैः ॥ 54.7 ॥

teṣu sarveṣu bhinneṣu tato'bhīṣayadaṅgadam | bhīṣaṇairvividhairvākyaiḥ kopopāyasamanvitaiḥ || 54.7 ||

जब वे सब इस प्रकार विभाजित हो गए, तब उसने भयंकर तथा विविध क्रोधोत्तेजक वचनों से अंगद को डराना आरंभ किया।

श्लोक 8 (kishkindha.54.8)

त्वं समर्थतरः पित्रा युद्धे तारेय वै ध्रुवम् । दृढं धारयितुं शक्तः कपिराज्यं यथा पिता ॥ 54.8 ॥

tvaṃ samarthataraḥ pitrā yuddhe tāreya vai dhruvam | dṛḍhaṃ dhārayituṃ śaktaḥ kapirājyaṃ yathā pitā || 54.8 ||

'हे तारानन्दन! युद्ध में तुम निश्चय ही अपने पिता से भी अधिक समर्थ हो, और अपने पिता के समान वानर-राज्य को दृढ़तापूर्वक धारण करने में सक्षम हो।'

श्लोक 9 (kishkindha.54.9)

नित्यमस्थिरचित्ता हि कपयो हरिपुंगव । नाज्ञाप्यं विषहिष्यन्ति पुत्रदारं विना त्वया ॥ 54.9 ॥

nityamasthiracittā hi kapayo haripuṃgava | nājñāpyaṃ viṣahiṣyanti putradāraṃ vinā tvayā || 54.9 ||

'हे वानरश्रेष्ठ! वानर सदा चंचल-चित्त होते हैं; तुम्हारे बिना वे अपनी संतान और पत्नियों से दूर रहकर आज्ञा-पालन सहन नहीं करेंगे।'

श्लोक 10 (kishkindha.54.10)

त्वां नैते ह्यनुयुञ्जेयुः प्रत्यक्षं प्रवदामि ते । यथायं जाम्बवान् नीलः सुहोत्रश्च महाकपिः ॥ 54.10 ॥

tvāṃ naite hyanuyuñjeyuḥ pratyakṣaṃ pravadāmi te | yathāyaṃ jāmbavān nīlaḥ suhotraśca mahākapiḥ || 54.10 ||

'ये तुम्हारा वास्तव में अनुसरण नहीं करेंगे — मैं यह तुमसे प्रत्यक्ष कह रहा हूँ — जैसे यह जाम्बवान, नील और महाकपि सुहोत्र भी नहीं करेंगे।'

श्लोक 11 (kishkindha.54.11)

नह्यहं ते इमे सर्वे सामदानादिभिर्गुणैः । दण्डेन न त्वया शक्याः सुग्रीवादपकर्षितुम् ॥ 54.11 ॥

nahyahaṃ te ime sarve sāmadānādibhirguṇaiḥ | daṇḍena na tvayā śakyāḥ sugrīvādapakarṣitum || 54.11 ||

'क्योंकि साम, दान आदि उपायों से अथवा दंड से भी तुम इन सबको सुग्रीव से अलग नहीं कर सकते।'

श्लोक 12 (kishkindha.54.12)

विगृह्यासनमप्याहुर्दुर्बलेन बलीयसा । आत्मरक्षाकरस्तस्मान्न विगृह्णीत दुर्बलः ॥ 54.12 ॥

vigṛhyāsanamapyāhurdurbalena balīyasā | ātmarakṣākarastasmānna vigṛhṇīta durbalaḥ || 54.12 ||

'कहा गया है कि दुर्बल को बलवान से शत्रुता मोल लेकर पद ग्रहण करना भी हानिकर होता है; इसलिए आत्मरक्षा चाहने वाले दुर्बल को विरोध नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 13 (kishkindha.54.13)

यां चेमां मन्यसे धात्रीमेतद् बिलमिति श्रुतम् । एतल्लक्ष्मणबाणानामीषत् कार्यं विदारणम् ॥ 54.13 ॥

yāṃ cemāṃ manyase dhātrīmetad bilamiti śrutam | etallakṣmaṇabāṇānāmīṣat kāryaṃ vidāraṇam || 54.13 ||

'और इस स्थान को, जिसे तुम आश्रयदात्री गुफा समझ रहे हो, विदीर्ण कर देना लक्ष्मण के बाणों के लिए एक तुच्छ कार्य है।'

श्लोक 14 (kishkindha.54.14)

स्वल्पं हि कृतमिन्द्रेण क्षिपता ह्यशनिं पुरा । लक्ष्मणो निशितैर्बाणैर्भिन्द्यात् पत्रपुटं यथा ॥ 54.14 ॥

svalpaṃ hi kṛtamindreṇa kṣipatā hyaśaniṃ purā | lakṣmaṇo niśitairbāṇairbhindyāt patrapuṭaṃ yathā || 54.14 ||

'इंद्र ने वज्र फेंककर जो पहले किया था वह तो अत्यंत तुच्छ कार्य था; लक्ष्मण अपने तीक्ष्ण बाणों से इसे उसी प्रकार विदीर्ण कर देंगे जैसे कोई पत्ते के दोने को फाड़ दे।'

श्लोक 15 (kishkindha.54.15)

लक्ष्मणस्य च नाराचा बहवः सन्ति तद्विधाः । वज्राशनिसमस्पर्शा गिरीणामपि दारकाः ॥ 54.15 ॥

lakṣmaṇasya ca nārācā bahavaḥ santi tadvidhāḥ | vajrāśanisamasparśā girīṇāmapi dārakāḥ || 54.15 ||

'और लक्ष्मण के पास वज्र के समान स्पर्श वाले तथा पर्वतों को भी विदीर्ण कर सकने वाले ऐसे अनेक नाराच बाण हैं।'

श्लोक 16 (kishkindha.54.16)

अवस्थानं यदैव त्वमासिष्यसि परंतप । तदैव हरयः सर्वे त्यक्ष्यन्ति कृतनिश्चयाः ॥ 54.16 ॥

avasthānaṃ yadaiva tvamāsiṣyasi paraṃtapa | tadaiva harayaḥ sarve tyakṣyanti kṛtaniścayāḥ || 54.16 ||

'हे परंतप! जिस क्षण तुम यहाँ स्थायी रूप से बस जाने का निश्चय करोगे, उसी क्षण सभी वानर दृढ़ निश्चय करके तुम्हें त्याग देंगे।'

श्लोक 17 (kishkindha.54.17)

स्मरन्तः पुत्रदाराणां नित्योद्विग्ना बुभुक्षिताः । खेदिता दुःखशय्याभिस्त्वां करिष्यन्ति पृष्ठतः ॥ 54.17 ॥

smarantaḥ putradārāṇāṃ nityodvignā bubhukṣitāḥ | kheditā duḥkhaśayyābhistvāṃ kariṣyanti pṛṣṭhataḥ || 54.17 ||

'अपने पुत्रों और पत्नियों को याद करते हुए, सदा उद्विग्न और भूखे, दुःखभरी शय्याओं से पीड़ित होकर वे तुम्हें पीछे छोड़ देंगे।'

श्लोक 18 (kishkindha.54.18)

स त्वं हीनः सुहृद्भिश्च हितकामैश्च बन्धुभिः । तृणादपि भृशोद्विग्नः स्पन्दमानाद् भविष्यसि ॥ 54.18 ॥

sa tvaṃ hīnaḥ suhṛdbhiśca hitakāmaiśca bandhubhiḥ | tṛṇādapi bhṛśodvignaḥ spandamānād bhaviṣyasi || 54.18 ||

'तब मित्रों और हितैषी बंधुओं से रहित होकर तुम हिलते हुए तिनके मात्र से भी अत्यंत भयभीत हो जाओगे।'

श्लोक 19 (kishkindha.54.19)

अत्युग्रवेगा निशिता घोरा लक्ष्मणसायकाः । अपवृत्तं जिघांसन्तो महावेगा दुरासदाः ॥ 54.19 ॥

atyugravegā niśitā ghorā lakṣmaṇasāyakāḥ | apavṛttaṃ jighāṃsanto mahāvegā durāsadāḥ || 54.19 ||

'लक्ष्मण के बाण अत्यंत उग्रवेगी, तीक्ष्ण और भयंकर हैं; वे महान वेगशाली और दुर्धर्ष हैं, जो विद्रोही को मार डालने के लिए सदा उद्यत रहते हैं।'

श्लोक 20 (kishkindha.54.20)

अस्माभिस्तु गतं सार्धं विनीतवदुपस्थितम् । आनुपूर्व्यात्तु सुग्रीवो राज्ये त्वां स्थापयिष्यति ॥ 54.20 ॥

asmābhistu gataṃ sārdhaṃ vinītavadupasthitam | ānupūrvyāttu sugrīvo rājye tvāṃ sthāpayiṣyati || 54.20 ||

'किन्तु यदि तुम हमारे साथ चलकर विनम्रतापूर्वक उपस्थित होगे, तो सुग्रीव क्रमशः तुम्हें राज्य में प्रतिष्ठित कर देंगे।'

श्लोक 21 (kishkindha.54.21)

धर्मराजः पितृव्यस्ते प्रीतिकामो दृढव्रतः । शुचिः सत्यप्रतिज्ञश्च स त्वां जातु न नाशयेत् ॥ 54.21 ॥

dharmarājaḥ pitṛvyaste prītikāmo dṛḍhavrataḥ | śuciḥ satyapratijñaśca sa tvāṃ jātu na nāśayet || 54.21 ||

'तुम्हारा चाचा धर्मात्मा, तुम्हारे प्रेम का इच्छुक, दृढ़-व्रती, पवित्र और सत्यप्रतिज्ञ है; वह तुम्हारा कभी विनाश नहीं करेगा।'

श्लोक 22 (kishkindha.54.22)

प्रियकामश्च ते मातुस्तदर्थं चास्य जीवितम् । तस्यापत्यं च नास्त्यन्यत् तस्मादङ्गद गम्यताम् ॥ 54.22 ॥

priyakāmaśca te mātustadarthaṃ cāsya jīvitam | tasyāpatyaṃ ca nāstyanyat tasmādaṅgada gamyatām || 54.22 ||

'वह तुम्हारी माता को प्रसन्न रखना चाहता है, और उसका जीवन भी उसी हेतु समर्पित है; और तुम्हारे अतिरिक्त उसकी कोई अन्य संतान भी नहीं है। अतः हे अंगद! चलो, यहाँ से प्रस्थान करें।'

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