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किष्किन्धाकाण्ड · सर्ग 59

सम्पाति द्वारा सीता-हरण का वृत्तांत

सर्ग 58सर्ग-सूचीसर्ग 60

श्लोक 1 (kishkindha.59.1)

ततस्तदमृतास्वादं गृध्रराजेन भाषितम्। निशम्य वदता हृष्टास्ते वचः प्लवगर्षभाः ॥ 59.1 ॥

tatastadamṛtāsvādaṃ gṛdhrarājena bhāṣitam| niśamya vadatā hṛṣṭāste vacaḥ plavagarṣabhāḥ || 59.1 ||

तदनन्तर, गृध्रराज द्वारा कहे गये उस अमृततुल्य वचन को सुनकर, वे श्रेष्ठ वानर अत्यंत प्रसन्न और हर्षित हुए।

श्लोक 2 (kishkindha.59.2)

जाम्बवान् वानरश्रेष्ठः सह सर्वैः प्लवङ्गमैः। भूतलात् सहसोत्थाय गृध्रराजानमब्रवीत् ॥ 59.2 ॥

jāmbavān vānaraśreṣṭhaḥ saha sarvaiḥ plavaṅgamaiḥ| bhūtalāt sahasotthāya gṛdhrarājānamabravīt || 59.2 ||

वानरश्रेष्ठ जाम्बवान् समस्त वानरों के साथ भूमि से सहसा उठकर गृध्रराज से बोले—

श्लोक 3 (kishkindha.59.3)

क्व सीता केन वा दृष्टा को वा हरति मैथिलीम्। तदाख्यातु भवान् सर्वं गतिर्भव वनौकसाम् ॥ 59.3 ॥

kva sītā kena vā dṛṣṭā ko vā harati maithilīm| tadākhyātu bhavān sarvaṃ gatirbhava vanaukasām || 59.3 ||

"सीता कहाँ है? उसे किसने देखा? मैथिली को कौन हर ले गया? यह सब आप हमें बताइये और वनवासियों की शरण बनिये।

श्लोक 4 (kishkindha.59.4)

को दाशरथिबाणानां वज्रवेगनिपातिनाम्। स्वयं लक्ष्मणमुक्तानां न चिन्तयति विक्रमम् ॥ 59.4 ॥

ko dāśarathibāṇānāṃ vajraveganipātinām| svayaṃ lakṣmaṇamuktānāṃ na cintayati vikramam || 59.4 ||

जो वज्र के समान वेग से गिरने वाले दशरथपुत्र राम के बाणों की, तथा स्वयं लक्ष्मण द्वारा छोड़े गये बाणों की पराक्रम-शक्ति के विषय में सोच भी नहीं सकता — ऐसा कौन है?

श्लोक 5 (kishkindha.59.5)

स हरीन् प्रतिसम्मुक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान्। पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥ 59.5 ॥

sa harīn pratisammuktān sītāśrutisamāhitān| punarāśvāsayan prīta idaṃ vacanamabravīt || 59.5 ||

सीता के विषय में सुनने को उत्सुक और आत्महत्या से विरत हुए उन वानरों को प्रसन्नतापूर्वक आश्वस्त करते हुए उस सम्पाति ने यह वचन कहा—

श्लोक 6 (kishkindha.59.6)

श्रूयतामिह वैदेह्या यथा मे हरणं श्रुतम्। येन चापि ममाख्यातं यत्र चायतलोचना ॥ 59.6 ॥

śrūyatāmiha vaidehyā yathā me haraṇaṃ śrutam| yena cāpi mamākhyātaṃ yatra cāyatalocanā || 59.6 ||

"सुनो, मैंने वैदेही के हरण के विषय में जैसा सुना है, तथा जिससे मुझे यह बताया गया कि वह विशाल-नेत्रा सीता कहाँ है, वह सब मैं बताता हूँ।

श्लोक 7 (kishkindha.59.7)

अहमस्मिन् गिरौ दुर्गे बहुयोजनमायते। चिरान्निपतितो वृद्धः क्षीणप्राणपराक्रमः ॥ 59.7 ॥

ahamasmin girau durge bahuyojanamāyate| cirānnipatito vṛddhaḥ kṣīṇaprāṇaparākramaḥ || 59.7 ||

मैं बहुत योजन विस्तार वाले इस दुर्गम पर्वत पर बहुत काल पहले गिर पड़ा था — वृद्ध, क्षीण प्राणशक्ति और पराक्रम से रहित।

श्लोक 8 (kishkindha.59.8)

तं मामेवंगतं पुत्रः सुपार्श्वो नाम नामतः। आहारेण यथाकालं बिभर्ति पततां वरः ॥ 59.8 ॥

taṃ māmevaṃgataṃ putraḥ supārśvo nāma nāmataḥ| āhāreṇa yathākālaṃ bibharti patatāṃ varaḥ || 59.8 ||

इस दुर्दशा को प्राप्त मुझे मेरा पुत्र, पक्षियों में श्रेष्ठ सुपार्श्व नामक, समय-समय पर भोजन लाकर पालता रहा है।

श्लोक 9 (kishkindha.59.9)

तीक्ष्णकामास्तु गन्धर्वास्तीक्ष्णकोपा भुजङ्गमाः। मृगाणां तु भयं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णक्षुधा वयम् ॥ 59.9 ॥

tīkṣṇakāmāstu gandharvāstīkṣṇakopā bhujaṅgamāḥ| mṛgāṇāṃ tu bhayaṃ tīkṣṇaṃ tatastīkṣṇakṣudhā vayam || 59.9 ||

गंधर्वों की कामवासना प्रबल होती है, सर्पों का क्रोध प्रबल होता है, मृगों का भय प्रबल होता है — वैसे ही हम गृध्रों की भूख प्रबल होती है।

श्लोक 10 (kishkindha.59.10)

स कदाचित् क्षुधार्तस्य ममाहाराभिकांक्षिणः। गतसूर्येऽहनि प्राप्तो मम पुत्रो ह्यनामिषः ॥ 59.10 ॥

sa kadācit kṣudhārtasya mamāhārābhikāṃkṣiṇaḥ| gatasūrye'hani prāpto mama putro hyanāmiṣaḥ || 59.10 ||

एक दिन, भूख से पीड़ित और भोजन की प्रतीक्षा करते हुए मुझे, दिन ढलने पर मेरा पुत्र बिना किसी माँस के लौटा।

श्लोक 11 (kishkindha.59.11)

स मयाऽऽहारसंरोधात् पीडितः प्रीतिवर्धनः। अनुमान्य यथातत्त्वमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 59.11 ॥

sa mayā''hārasaṃrodhāt pīḍitaḥ prītivardhanaḥ| anumānya yathātattvamidaṃ vacanamabravīt || 59.11 ||

भोजन न मिलने से मैंने उसे डाँटा; तब प्रिय-वर्धक उस पुत्र ने मुझे समझाते हुए यथार्थ बात इस प्रकार कही—

श्लोक 12 (kishkindha.59.12)

अहं तात यथाकालमामिषार्थी खमाप्लुतः। महेन्द्रस्य गिरेर्द्वारमावृत्य सुसमाश्रितः ॥ 59.12 ॥

ahaṃ tāta yathākālamāmiṣārthī khamāplutaḥ| mahendrasya girerdvāramāvṛtya susamāśritaḥ || 59.12 ||

'हे तात! भोजन की इच्छा से समय पर आकाश में उड़कर मैं महेन्द्र पर्वत के प्रवेश-द्वार पर छा जाकर अच्छी तरह वहीं ठहर गया।

श्लोक 13 (kishkindha.59.13)

तत्र सत्त्वसहस्राणां सागरान्तरचारिणाम्। पन्थानमेकोऽध्यवसं संनिरोद्धुमवाङ्मुखः ॥ 59.13 ॥

tatra sattvasahasrāṇāṃ sāgarāntaracāriṇām| panthānameko'dhyavasaṃ saṃniroda‍dhumavāṅmukhaḥ || 59.13 ||

वहाँ समुद्र में विचरण करने वाले सहस्रों प्राणियों का मार्ग रोकने के लिये मैं अकेला ही नीचे मुख किये हुए बैठा रहा।

श्लोक 14 (kishkindha.59.14)

तत्र कश्चिन्मया दृष्टः सूर्योदयसमप्रभाम्। स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ 59.14 ॥

tatra kaścinmayā dṛṣṭaḥ sūryodayasamaprabhām| striyamādāya gacchan vai bhinnāñjanacayopamaḥ || 59.14 ||

तभी मैंने देखा कि कोई, अंजन के ढेर के समान श्याम, प्रातःकालीन सूर्य के समान कांतिमती एक स्त्री को लेकर जा रहा है।

श्लोक 15 (kishkindha.59.15)

सोऽहमभ्यवहारार्थं तौ दृष्ट्वा कृतनिश्चयः। तेन साम्ना विनीतेन पन्थानमनुयाचितः ॥ 59.15 ॥

so'hamabhyavahārārthaṃ tau dṛṣṭvā kṛtaniścayaḥ| tena sāmnā vinītena panthānamanuyācitaḥ || 59.15 ||

भोजन के लिये उन दोनों को देखकर मैंने निश्चय कर लिया; परन्तु उस विनम्रता से युक्त व्यक्ति ने साम-नीति से मुझसे मार्ग माँगा।

श्लोक 16 (kishkindha.59.16)

नहि सामोपपन्नानां प्रहर्ता विद्यते भुवि। नीचेष्वपि जनः कश्चित् किमङ्ग बत मद्विधः ॥ 59.16 ॥

nahi sāmopapannānāṃ prahartā vidyate bhuvi| nīceṣvapi janaḥ kaścit kimaṅga bata madvidhaḥ || 59.16 ||

साम-नीति से याचना करने वालों पर पृथ्वी में कोई भी प्रहार नहीं करता, नीच से नीच व्यक्ति भी नहीं — फिर मेरे जैसे का क्या कहना!

श्लोक 17 (kishkindha.59.17)

स यातस्तेजसा व्योम संक्षिपन्निव वेगितः। अथाहं खेचरैर्भूतैरभिगम्य सभाजितः ॥ 59.17 ॥

sa yātastejasā vyoma saṃkṣipanniva vegitaḥ| athāhaṃ khecarairbhūtairabhigamya sabhājitaḥ || 59.17 ||

वह अपने तेज से मानो आकाश को समेटता हुआ वेग से चला गया; तत्पश्चात् आकाशचारी प्राणियों ने मेरे पास आकर मेरा सम्मान किया।

श्लोक 18 (kishkindha.59.18)

दिष्ट्या जीवति सीतेति ह्यब्रुवन् मां महर्षयः। कथंचित् सकलत्रोऽसौ गतस्ते स्वस्त्यसंशयम् ॥ 59.18 ॥

diṣṭyā jīvati sīteti hyabruvan māṃ maharṣayaḥ| kathaṃcit sakalatro'sau gataste svastyasaṃśayam || 59.18 ||

महर्षियों ने मुझसे कहा — 'सौभाग्य से सीता जीवित है; वह किसी प्रकार अपनी पत्नी के साथ चला गया है, तुम्हारा कल्याण निःसंदेह होगा।'

श्लोक 19 (kishkindha.59.19)

एवमुक्तस्ततोऽहं तैः सिद्धैः परमशोभनैः। स च मे रावणो राजा रक्षसां प्रतिवेदितः ॥ 59.19 ॥

evamuktastato'haṃ taiḥ siddhaiḥ paramaśobhanaiḥ| sa ca me rāvaṇo rājā rakṣasāṃ prativeditaḥ || 59.19 ||

इस प्रकार उन परम शोभन सिद्धों द्वारा कहे जाने पर, तब उन्होंने मुझे राक्षसों के राजा रावण का भी परिचय दिया,

श्लोक 20 (kishkindha.59.20)

पश्यन् दाशरथेर्भार्यां रामस्य जनकात्मजाम्। भ्रष्टाभरणकौशेयां शोकवेगपराजिताम् ॥ 59.20 ॥

paśyan dāśaratherbhāryāṃ rāmasya janakātmajām| bhraṣṭābharaṇakauśeyāṃ śokavegaparājitām || 59.20 ||

दशरथ की पुत्रवधू, राम की पत्नी, जनक की पुत्री को — जिसके आभूषण अस्तव्यस्त हो गये थे और वह शोक के आवेग से पराजित थी,

श्लोक 21 (kishkindha.59.21)

रामलक्ष्मणयोर्नाम क्रोशन्तीं मुक्तमूर्धजाम्। एष कालात्ययस्तात इति वाक्यविदां वरः ॥ 59.21 ॥

rāmalakṣmaṇayornāma krośantīṃ muktamūrdhajām| eṣa kālātyayastāta iti vākyavidāṃ varaḥ || 59.21 ||

राम और लक्ष्मण का नाम पुकारती हुई, बिखरे केशों वाली उस स्त्री को दिखाया। 'हे तात, यही समय बीत जाने का कारण है' — इस प्रकार उन वाक्य-कुशलों में श्रेष्ठ ने मुझसे कहा।'

श्लोक 22 (kishkindha.59.22)

एतदर्थं समग्रं मे सुपार्श्वः प्रत्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वापि हि मे बुद्धिर्नासीत् काचित् पराक्रमे ॥ 59.22 ॥

etadarthaṃ samagraṃ me supārśvaḥ pratyavedayat | tacchrutvāpi hi me buddhirnāsīt kācit parākrame || 59.22 ||

उसने यह सारा वृत्तांत मुझसे इस विषय में विस्तार से कह सुनाया। यह सुनकर भी रावण के विरुद्ध पराक्रम दिखाने का विचार मेरे मन में तनिक भी नहीं आया —

श्लोक 23 (kishkindha.59.23)

अपक्षो हि कथं पक्षी कर्म किंचित् समारभेत्। यत् तु शक्यं मया कर्तुं वाग्बुद्धिगुणवर्तिना ॥ 59.23 ॥

apakṣo hi kathaṃ pakṣī karma kiṃcit samārabhet| yat tu śakyaṃ mayā kartuṃ vāgbuddhiguṇavartinā || 59.23 ||

क्योंकि पंखरहित पक्षी भला कोई पराक्रम-कार्य कैसे आरंभ कर सकता है? किन्तु वाणी, बुद्धि और गुण से जो मेरे लिये करना संभव है,

श्लोक 24 (kishkindha.59.24)

श्रूयतां तत्र वक्ष्यामि भवतां पौरुषाश्रयम्। वाङ्मतिभ्यां हि सर्वेषां करिष्यामि प्रियं हि वः ॥ 59.24 ॥

śrūyatāṃ tatra vakṣyāmi bhavatāṃ pauruṣāśrayam| vāṅmatibhyāṃ hi sarveṣāṃ kariṣyāmi priyaṃ hi vaḥ || 59.24 ||

वह सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ — वह तुम्हारे पौरुष पर आधारित होगा; अपनी वाणी और बुद्धि से मैं तुम सबका भला निश्चय ही करूँगा।

श्लोक 25 (kishkindha.59.25)

यद्धि दाशरथेः कार्यं मम तन्नात्र संशयः। तद् भवन्तो मतिश्रेष्ठा बलवन्तो मनस्विनः ॥ 59.25 ॥

yaddhi dāśaratheḥ kāryaṃ mama tannātra saṃśayaḥ| tad bhavanto matiśreṣṭhā balavanto manasvinaḥ || 59.25 ||

क्योंकि दशरथपुत्र का जो भी कार्य है, वह निःसंदेह मेरा भी कार्य है; तुम सब बुद्धि में श्रेष्ठ, बलवान् और मनस्वी हो,

श्लोक 26 (kishkindha.59.26)

प्रहिताः कपिराजेन देवैरपि दुरासदाः। रामलक्ष्मणबाणाश्च विहिताः कङ्कपत्रिणः ॥ 59.26 ॥

prahitāḥ kapirājena devairapi durāsadāḥ| rāmalakṣmaṇabāṇāśca vihitāḥ kaṅkapatriṇaḥ || 59.26 ||

देवताओं के लिये भी दुर्जेय, वानरराज द्वारा भेजे गये हो; और राम-लक्ष्मण के बाण, बाज के पंखों से युक्त और तीक्ष्ण हैं,

श्लोक 27 (kishkindha.59.27)

त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्तास्त्राणनिग्रहे। कामं खलु दशग्रीवस्तेजोबलसमन्वितः। भवतां तु समर्थानां न किंचिदपि दुष्करम् ॥ 59.27 ॥

trayāṇāmapi lokānāṃ paryāptāstrāṇanigrahe| kāmaṃ khalu daśagrīvastejobalasamanvitaḥ| bhavatāṃ tu samarthānāṃ na kiṃcidapi duṣkaram || 59.27 ||

तीनों लोकों की भी रक्षा और संहार के लिये पर्याप्त हैं। निःसंदेह दशमुख रावण तेज और बल से युक्त है, किन्तु तुम जैसे समर्थ वानरों के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।

श्लोक 28 (kishkindha.59.28)

तदलं कालसङ्गेन क्रियतां बुद्धिनिश्चयः। नहि कर्मसु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ 59.28 ॥

tadalaṃ kālasaṅgena kriyatāṃ buddhiniścayaḥ| nahi karmasu sajjante buddhimanto bhavadvidhāḥ || 59.28 ||

अतः अब समय गँवाना उचित नहीं; बुद्धिपूर्वक निश्चय करो — तुम्हारे जैसे बुद्धिमान अपने कार्यों में कभी शिथिल नहीं पड़ते।"

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