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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 27

त्रिजटा का स्वप्न

सर्ग 26सर्ग-सूचीसर्ग 28

श्लोक 1 (sundara.27.1)

इत्युक्ताः सीतया घोरं राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः । काश्चिज्जग्मुस्तदाख्यातुं रावणस्य दुरात्मनः ॥ 27.1 ॥

ityuktāḥ sītayā ghoraṃ rākṣasyaḥ krodhamūrcchitāḥ | kāścijjagmustadākhyātuṃ rāvaṇasya durātmanaḥ || 27.1 ||

सीता द्वारा इस प्रकार भयंकर वचन कहे जाने पर राक्षसियाँ क्रोध से मूर्छित हो गईं; उनमें से कुछ यह बात दुरात्मा रावण को बताने चली गईं।

श्लोक 2 (sundara.27.2)

ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो भीमदर्शनाः । पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन् ॥ 27.2 ॥

tataḥ sītāmupāgamya rākṣasyo bhīmadarśanāḥ | punaḥ paruṣamekārthamanarthārthamathābruvan || 27.2 ||

तब वे भयंकर रूप वाली राक्षसियाँ पुनः सीता के पास आकर एक ही अनर्थकारी अभिप्राय से कठोर वचन बोलने लगीं।

श्लोक 3 (sundara.27.3)

अद्येदानीं तवानार्ये सीते पापविनिश्चये । राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति मांसमेतद् यथासुखम् ॥ 27.3 ॥

adyedānīṃ tavānārye sīte pāpaviniścaye | rākṣasyo bhakṣayiṣyanti māṃsametad yathāsukham || 27.3 ||

"हे अनार्ये, हे पापपूर्ण निश्चय वाली सीते, अभी इसी क्षण राक्षसियाँ तेरे इस मांस को अपनी इच्छानुसार खा जाएँगी।"

श्लोक 4 (sundara.27.4)

सीतां ताभिरनार्याभिर्दृष्ट्वा संतर्जितां तदा । राक्षसी त्रिजटा वृद्धा प्रबुद्धा वाक्यमब्रवीत् ॥ 27.4 ॥

sītāṃ tābhiranāryābhirdṛṣṭvā saṃtarjitāṃ tadā | rākṣasī trijaṭā vṛddhā prabuddhā vākyamabravīt || 27.4 ||

उन अनार्या राक्षसियों द्वारा इस प्रकार धमकाई गई सीता को देखकर, नींद से जागी हुई वृद्धा राक्षसी त्रिजटा ने यह वचन कहा।

श्लोक 5 (sundara.27.5)

आत्मानं खादतानार्या न सीतां भक्षयिष्यथ । जनकस्य सुतामिष्टां स्नुषां दशरथस्य च ॥ 27.5 ॥

ātmānaṃ khādatānāryā na sītāṃ bhakṣayiṣyatha | janakasya sutāmiṣṭāṃ snuṣāṃ daśarathasya ca || 27.5 ||

"हे अनार्याओ, तुम अपने आप को ही खा डालो - तुम जनक की प्रिय पुत्री और दशरथ की स्नेहमयी पुत्रवधू सीता को नहीं खा सकोगी।"

श्लोक 6 (sundara.27.6)

स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः । राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च ॥ 27.6 ॥

svapno hyadya mayā dṛṣṭo dāruṇo romaharṣaṇaḥ | rākṣasānāmabhāvāya bharturasyā bhavāya ca || 27.6 ||

"क्योंकि आज मैंने एक भयंकर, रोमांचकारी स्वप्न देखा है - जो राक्षसों के विनाश और इसके पति के कल्याण का सूचक है।"

श्लोक 7 (sundara.27.7)

एवमुक्तास्त्रिजटया राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः । सर्वा एवाब्रुवन् भीतास्त्रिजटां तामिदं वचः ॥ 27.7 ॥

evamuktāstrijaṭayā rākṣasyaḥ krodhamūrcchitāḥ | sarvā evābruvan bhītāstrijaṭāṃ tāmidaṃ vacaḥ || 27.7 ||

त्रिजटा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, क्रोध से मूर्छित वे सभी राक्षसियाँ भयभीत हो गईं और त्रिजटा से यह बोलीं।

श्लोक 8 (sundara.27.8)

कथयस्व त्वया दृष्टः स्वप्नोऽयं कीदृशो निशि । तासां श्रुत्वा तु वचनं राक्षसीनां मुखोद्गतम् ॥ 27.8 ॥

kathayasva tvayā dṛṣṭaḥ svapno'yaṃ kīdṛśo niśi | tāsāṃ śrutvā tu vacanaṃ rākṣasīnāṃ mukhodgatam || 27.8 ||

"बता, तूने रात्रि में यह कैसा स्वप्न देखा है।" उन राक्षसियों के मुख से निकले इस वचन को सुनकर,

श्लोक 9 (sundara.27.9)

उवाच वचनं काले त्रिजटा स्वप्नसंश्रितम् । गजदन्तमयीं दिव्यां शिबिकामन्तरिक्षगाम् ॥ 27.9 ॥

uvāca vacanaṃ kāle trijaṭā svapnasaṃśritam | gajadantamayīṃ divyāṃ śibikāmantarikṣagām || 27.9 ||

त्रिजटा ने उस समय स्वप्न से सम्बन्धित यह वचन कहा: "हाथीदाँत से बनी एक दिव्य पालकी आकाश में चलती हुई,

श्लोक 10 (sundara.27.10)

युक्तां वाजिसहस्रेण स्वयमास्थाय राघवः । शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन समागतः ॥ 27.10 ॥

yuktāṃ vājisahasreṇa svayamāsthāya rāghavaḥ | śuklamālyāmbaradharo lakṣmaṇena samāgataḥ || 27.10 ||

और हजार घोड़ों से जुती हुई थी - उस पर स्वयं राघव, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, लक्ष्मण के साथ सवार होकर आए।"

श्लोक 11 (sundara.27.11)

स्वप्ने चाद्य मया दृष्टा सीता शुक्लाम्बरावृता । सागरेण परिक्षिप्तं श्वेतपर्वतमास्थिता ॥ 27.11 ॥

svapne cādya mayā dṛṣṭā sītā śuklāmbarāvṛtā | sāgareṇa parikṣiptaṃ śvetaparvatamāsthitā || 27.11 ||

"और उसी स्वप्न में मैंने श्वेत वस्त्र पहने सीता को समुद्र से घिरे एक श्वेत पर्वत पर बैठे देखा।"

श्लोक 12 (sundara.27.12)

रामेण संगता सीता भास्करेण प्रभा यथा । राघवश्च पुनर्दृष्टश्चतुर्दन्तं महागजम् ॥ 27.12 ॥

rāmeṇa saṃgatā sītā bhāskareṇa prabhā yathā | rāghavaśca punardṛṣṭaścaturdantaṃ mahāgajam || 27.12 ||

"सीता राम से उसी प्रकार मिली हुई थीं जैसे प्रभा सूर्य से मिली रहती है। और मैंने राघव को पुनः एक विशाल चतुर्दन्त गजराज पर आरूढ़ देखा,

श्लोक 13 (sundara.27.13)

आरूढः शैलसंकाशं चकास सहलक्ष्मणः । ततस्तु सूर्यसंकाशौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥ 27.13 ॥

ārūḍhaḥ śailasaṃkāśaṃ cakāsa sahalakṣmaṇaḥ | tatastu sūryasaṃkāśau dīpyamānau svatejasā || 27.13 ||

जो पर्वत के समान विशाल था, और वे लक्ष्मण सहित देदीप्यमान हो रहे थे। तत्पश्चात् वे दोनों अपने तेज से सूर्य के समान चमकते हुए,

श्लोक 14 (sundara.27.14)

शुक्लमाल्याम्बरधरौ जानकीं पर्युपस्थितौ । ततस्तस्य नगस्याग्रे ह्याकाशस्थस्य दन्तिनः ॥ 27.14 ॥

śuklamālyāmbaradharau jānakīṃ paryupasthitau | tatastasya nagasyāgre hyākāśasthasya dantinaḥ || 27.14 ||

श्वेत माला-वस्त्र धारण किए हुए जानकी के निकट आए। तत्पश्चात् आकाश में स्थित उस गजराज के शिखर पर,

श्लोक 15 (sundara.27.15)

भर्त्रा परिगृहीतस्य जानकी स्कन्धमाश्रिता । भर्तुरङ्कात् समुत्पत्य ततः कमललोचना ॥ 27.15 ॥

bhartrā parigṛhītasya jānakī skandhamāśritā | bharturaṅkāt samutpatya tataḥ kamalalocanā || 27.15 ||

अपने पति द्वारा थामी हुई जानकी उसके कन्धे पर बैठी थीं। फिर वह कमलनयनी सीता अपने पति की गोद से उठकर,

श्लोक 16 (sundara.27.16)

चन्द्रसूर्यौ मया दृष्टा पाणिभ्यां परिमार्जती । ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यामास्थितः स गजोत्तमः । सीतया च विशालाक्ष्या लङ्काया उपरि स्थितः ॥ 27.16 ॥

candrasūryau mayā dṛṣṭā pāṇibhyāṃ parimārjatī | tatastābhyāṃ kumārābhyāmāsthitaḥ sa gajottamaḥ | sītayā ca viśālākṣyā laṅkāyā upari sthitaḥ || 27.16 ||

मैंने उन्हें अपने हाथों से चन्द्रमा और सूर्य का स्पर्श करते देखा। तत्पश्चात् उन दोनों राजकुमारों और विशालाक्षी सीता को लेकर वह श्रेष्ठ गजराज लंका के ऊपर जा खड़ा हुआ।

श्लोक 17 (sundara.27.17)

पाण्डुरर्षभयुक्तेन रथेनाष्टयुजा स्वयम् । इहोपयातः काकुत्स्थः सीतया सह भार्यया ॥ 27.17 ॥

pāṇḍurarṣabhayuktena rathenāṣṭayujā svayam | ihopayātaḥ kākutsthaḥ sītayā saha bhāryayā || 27.17 ||

"फिर वे स्वयं काकुत्स्थ, आठ श्वेत बैलों से जुते हुए रथ पर सवार होकर, अपनी पत्नी सीता सहित यहाँ आए।"

श्लोक 18 (sundara.27.18)

शुक्लमाल्याम्बरधरो लक्ष्मणेन सहागतः । ततोऽन्यत्र मया दृष्टो रामः सत्यपराक्रमः ॥ 27.18 ॥

śuklamālyāmbaradharo lakṣmaṇena sahāgataḥ | tato'nyatra mayā dṛṣṭo rāmaḥ satyaparākramaḥ || 27.18 ||

"श्वेत माला-वस्त्र धारण किए वे लक्ष्मण सहित आए। फिर मैंने कहीं और सत्यपराक्रमी राम को,

श्लोक 19 (sundara.27.19)

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह वीर्यवान् । आरुह्य पुष्पकं दिव्यं विमानं सूर्यसंनिभम् ॥ 27.19 ॥

lakṣmaṇena saha bhrātrā sītayā saha vīryavān | āruhya puṣpakaṃ divyaṃ vimānaṃ sūryasaṃnibham || 27.19 ||

अपने भाई लक्ष्मण और सीता सहित उस पराक्रमी को, सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर,

श्लोक 20 (sundara.27.20)

उत्तरां दिशमालोच्य प्रस्थितः पुरुषोत्तमः । एवं स्वप्ने मया दृष्टो रामो विष्णुपराक्रमः ॥ 27.20 ॥

uttarāṃ diśamālocya prasthitaḥ puruṣottamaḥ | evaṃ svapne mayā dṛṣṭo rāmo viṣṇuparākramaḥ || 27.20 ||

उत्तर दिशा की ओर देखते हुए प्रस्थान करते हुए देखा। इस प्रकार स्वप्न में मैंने विष्णु के समान पराक्रमी राम को,

श्लोक 21 (sundara.27.21)

लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया सह भार्यया । न हि रामो महातेजाः शक्यो जेतुं सुरासुरैः ॥ 27.21 ॥

lakṣmaṇena saha bhrātrā sītayā saha bhāryayā | na hi rāmo mahātejāḥ śakyo jetuṃ surāsuraiḥ || 27.21 ||

अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित देखा। निश्चय ही वह महातेजस्वी राम देवताओं और असुरों द्वारा भी जीता नहीं जा सकता,

श्लोक 22 (sundara.27.22)

राक्षसैर्वापि चान्यैर्वा स्वर्गः पापजनैरिव । रावणश्च मया दृष्टो मुण्डस्तैलसमुक्षितः ॥ 27.22 ॥

rākṣasairvāpi cānyairvā svargaḥ pāpajanairiva | rāvaṇaśca mayā dṛṣṭo muṇḍastailasamukṣitaḥ || 27.22 ||

न ही राक्षसों द्वारा, न किसी अन्य के द्वारा - जैसे स्वर्ग पापियों द्वारा नहीं जीता जा सकता। और मैंने रावण को मुण्डित सिर और तेल से लथपथ देखा,

श्लोक 23 (sundara.27.23)

रक्तवासाः पिबन्मत्तः करवीरकृतस्रजः । विमानात् पुष्पकादद्य रावणः पतितः क्षितौ ॥ 27.23 ॥

raktavāsāḥ pibanmattaḥ karavīrakṛtasrajaḥ | vimānāt puṣpakādadya rāvaṇaḥ patitaḥ kṣitau || 27.23 ||

"लाल वस्त्र पहने, मदिरा पीकर मतवाला, कनेर के फूलों की माला पहने हुए - आज ही रावण उस पुष्पक विमान से पृथ्वी पर गिर पड़ा।"

श्लोक 24 (sundara.27.24)

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः । रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः ॥ 27.24 ॥

kṛṣyamāṇaḥ striyā muṇḍo dṛṣṭaḥ kṛṣṇāmbaraḥ punaḥ | rathena kharayuktena raktamālyānulepanaḥ || 27.24 ||

मैंने उसे पुनः मुण्डित सिर, काले वस्त्र पहने, एक स्त्री द्वारा घसीटे जाते हुए देखा, लाल माला और लाल अनुलेपन लगाए हुए, गधों से जुते रथ पर,

श्लोक 25 (sundara.27.25)

पिबंस्तैलं हसन्नृत्यन् भ्रान्तचित्ताकुलेन्द्रियः । गर्दभेन ययौ शीघ्रं दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ 27.25 ॥

pibaṃstailaṃ hasannṛtyan bhrāntacittākulendriyaḥ | gardabhena yayau śīghraṃ dakṣiṇāṃ diśamāsthitaḥ || 27.25 ||

तेल पीता हुआ, हँसता-नाचता, भ्रमित चित्त और व्याकुल इन्द्रियों वाला, गधे पर सवार होकर तेजी से दक्षिण दिशा की ओर जाता हुआ।

श्लोक 26 (sundara.27.26)

पुनरेव मया दृष्टो रावणो राक्षसेश्वरः । पतितोऽवाक्शिरा भूमौ गर्दभाद् भयमोहितः ॥ 27.26 ॥

punareva mayā dṛṣṭo rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ | patito'vākśirā bhūmau gardabhād bhayamohitaḥ || 27.26 ||

फिर मैंने उस राक्षसराज रावण को भय से मोहित होकर उस गधे से सिर के बल भूमि पर गिरते देखा।

श्लोक 27 (sundara.27.27)

सहसोत्थाय सम्भ्रान्तो भयार्तो मदविह्वलः । उन्मत्तरूपो दिग्वासा दुर्वाक्यं प्रलपन् बहु ॥ 27.27 ॥

sahasotthāya sambhrānto bhayārto madavihvalaḥ | unmattarūpo digvāsā durvākyaṃ pralapan bahu || 27.27 ||

अचानक उठकर, घबराया हुआ, भय से पीड़ित, मद से विह्वल, उन्मत्त-सा दिगम्बर होकर बहुत-सी अपशब्द बड़बड़ाता हुआ,

श्लोक 28 (sundara.27.28)

दुर्गन्धं दुःसहं घोरं तिमिरं नरकोपमम् । मलपङ्कं प्रविश्याशु मग्नस्तत्र स रावणः ॥ 27.28 ॥

durgandhaṃ duḥsahaṃ ghoraṃ timiraṃ narakopamam | malapaṅkaṃ praviśyāśu magnastatra sa rāvaṇaḥ || 27.28 ||

वह रावण शीघ्र ही दुर्गन्धयुक्त, असहनीय, भयंकर और नरक के समान अन्धकारमय मल-कीचड़ में जा घुसा और उसमें डूब गया।

श्लोक 29 (sundara.27.29)

प्रस्थितो दक्षिणामाशां प्रविष्टोऽकर्दमं ह्रदम् । कण्ठे बद्ध्वा दशग्रीवं प्रमदा रक्तवासिनी ॥ 27.29 ॥

prasthito dakṣiṇāmāśāṃ praviṣṭo'kardamaṃ hradam | kaṇṭhe baddhvā daśagrīvaṃ pramadā raktavāsinī || 27.29 ||

दक्षिण दिशा की ओर चलकर वह एक कीचड़ भरे जलाशय में जा घुसा; और लाल वस्त्र पहने एक स्त्री ने दशग्रीव को गले से बाँधकर,

श्लोक 30 (sundara.27.30)

काली कर्दमलिप्तांगी दिशं याम्यां प्रकर्षति । एवं तत्र मया दृष्टः कुम्भकर्णो महाबलः ॥ 27.30 ॥

kālī kardamaliptāṃgī diśaṃ yāmyāṃ prakarṣati | evaṃ tatra mayā dṛṣṭaḥ kumbhakarṇo mahābalaḥ || 27.30 ||

काले रंग की, कीचड़ से लिपटे शरीर वाली वह स्त्री उसे दक्षिण दिशा की ओर घसीट रही थी। वहाँ मैंने महाबली कुम्भकर्ण को भी उसी प्रकार देखा,

श्लोक 31 (sundara.27.31)

रावणस्य सुताः सर्वे मुण्डास्तैलसमुक्षिताः । वराहेण दशग्रीवः शिशुमारेण चेन्द्रजित् ॥ 27.31 ॥

rāvaṇasya sutāḥ sarve muṇḍāstailasamukṣitāḥ | varāheṇa daśagrīvaḥ śiśumāreṇa cendrajit || 27.31 ||

और रावण के सभी पुत्र मुण्डित सिर और तेल से सने हुए थे - दशग्रीव को एक शूकर, और इन्द्रजित को एक शिशुमार (जलजन्तु) ले जा रहा था,

श्लोक 32 (sundara.27.32)

उष्ट्रेण कुम्भकर्णश्च प्रयातो दक्षिणां दिशम् । एकस्तत्र मया दृष्टः श्वेतच्छत्रो विभीषणः ॥ 27.32 ॥

uṣṭreṇa kumbhakarṇaśca prayāto dakṣiṇāṃ diśam | ekastatra mayā dṛṣṭaḥ śvetacchatro vibhīṣaṇaḥ || 27.32 ||

और कुम्भकर्ण को एक ऊँट - सभी दक्षिण दिशा की ओर जा रहे थे। उनमें से केवल विभीषण को मैंने वहाँ श्वेत छत्र लिए हुए देखा,

श्लोक 33 (sundara.27.33)

शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लगन्धानुलेपनः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्नृत्तगीतैरलंकृतः ॥ 27.33 ॥

śuklamālyāmbaradharaḥ śuklagandhānulepanaḥ | śaṅkhadundubhinirghoṣairnṛttagītairalaṃkṛtaḥ || 27.33 ||

श्वेत माला-वस्त्र धारण किए हुए, श्वेत चन्दन का लेप लगाए हुए, शंख-दुन्दुभियों की ध्वनि और नृत्य-गीत से अलंकृत,

श्लोक 34 (sundara.27.34)

आरुह्य शैलसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् । चतुर्दन्तं गजं दिव्यमास्ते तत्र विभीषणः ॥ 27.34 ॥

āruhya śailasaṃkāśaṃ meghastanitaniḥsvanam | caturdantaṃ gajaṃ divyamāste tatra vibhīṣaṇaḥ || 27.34 ||

और पर्वताकार, मेघ-गर्जन के समान गम्भीर स्वर वाले दिव्य चतुर्दन्त गज पर आरूढ़ - वहाँ विभीषण विराजमान थे,

श्लोक 35 (sundara.27.35)

चतुर्भिः सचिवैः सार्धं वैहायसमुपस्थितः ॥ 27.35 ॥

caturbhiḥ sacivaiḥ sārdhaṃ vaihāyasamupasthitaḥ || 27.35 ||

अपने चार मंत्रियों के साथ आकाशमार्ग में स्थित थे।

श्लोक 36 (sundara.27.36)

समाजश्च महान् वृत्तो गीतवादित्रनिःस्वनः । पिबतां रक्तमाल्यानां रक्षसां रक्तवाससाम् ॥ 27.36 ॥

samājaśca mahān vṛtto gītavāditraniḥsvanaḥ | pibatāṃ raktamālyānāṃ rakṣasāṃ raktavāsasām || 27.36 ||

और वहाँ एक विशाल समारोह हुआ, जो गीत-वाद्य की ध्वनि से गूँज रहा था, जिसमें लाल वस्त्र और लाल मालाएँ पहने राक्षस मदिरापान कर रहे थे;

श्लोक 37 (sundara.27.37)

लङ्का चेयं पुरी रम्या सवाजिरथकुञ्जरा । सागरे पतिता दृष्टा भग्नगोपुरतोरणा ॥ 27.37 ॥

laṅkā ceyaṃ purī ramyā savājirathakuñjarā | sāgare patitā dṛṣṭā bhagnagopuratoraṇā || 27.37 ||

और यह सुन्दर लंकापुरी अपने घोड़ों, रथों और हाथियों सहित समुद्र में गिरी हुई, अपने टूटे हुए फाटकों और तोरणों सहित दिखाई दी।

श्लोक 38 (sundara.27.38)

लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता । दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरस्विना ॥ 27.38 ॥

laṅkā dṛṣṭā mayā svapne rāvaṇenābhirakṣitā | dagdhā rāmasya dūtena vānareṇa tarasvinā || 27.38 ||

स्वप्न में मैंने रावण द्वारा सुरक्षित लंका को, राम के एक वेगवान वानर दूत द्वारा जलाई गई देखा।

श्लोक 39 (sundara.27.39)

पीत्वा तैलं प्रमत्ताश्च प्रहसन्त्यो महास्वनाः । लङ्कायां भस्मरूक्षायां सर्वा राक्षसयोषितः ॥ 27.39 ॥

pītvā tailaṃ pramattāśca prahasantyo mahāsvanāḥ | laṅkāyāṃ bhasmarūkṣāyāṃ sarvā rākṣasayoṣitaḥ || 27.39 ||

उस भस्म से धूसरित लंका में तेल पीकर मतवाली हुई सभी राक्षस-स्त्रियाँ ऊँचे स्वर में हँस रही थीं,

श्लोक 40 (sundara.27.40)

कुम्भकर्णादयश्चेमे सर्वे राक्षसपुंगवाः । रक्तं निवसनं गृह्य प्रविष्टा गोमयह्रदम् ॥ 27.40 ॥

kumbhakarṇādayaśceme sarve rākṣasapuṃgavāḥ | raktaṃ nivasanaṃ gṛhya praviṣṭā gomayahradam || 27.40 ||

और कुम्भकर्ण आदि ये सभी श्रेष्ठ राक्षस लाल वस्त्र लेकर गोबर के एक जलाशय में घुस गए।

श्लोक 41 (sundara.27.41)

अपगच्छत पश्यध्वं सीतामाप्नोति राघवः । घातयेत् परमामर्षी युष्मान् सार्धं हि राक्षसैः ॥ 27.41 ॥

apagacchata paśyadhvaṃ sītāmāpnoti rāghavaḥ | ghātayet paramāmarṣī yuṣmān sārdhaṃ hi rākṣasaiḥ || 27.41 ||

'दूर हट जाओ! देखो, राघव सीता को पा लेंगे! वे अत्यन्त क्रोधित होकर तुम सबको अन्य राक्षसों सहित मार डालेंगे।'

श्लोक 42 (sundara.27.42)

प्रियां बहुमतां भार्यां वनवासमनुव्रताम् । भर्त्सितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघवः ॥ 27.42 ॥

priyāṃ bahumatāṃ bhāryāṃ vanavāsamanuvratām | bhartsitāṃ tarjitāṃ vāpi nānumaṃsyati rāghavaḥ || 27.42 ||

'राघव अपनी उस प्रिय और अत्यन्त आदरणीय पत्नी को, जो वन-वास में उनका अनुसरण करती रहीं, धमकाए या डराए जाने को कभी क्षमा नहीं करेंगे।'

श्लोक 43 (sundara.27.43)

तदलं क्रूरवाक्यैश्च सान्त्वमेवाभिधीयताम् । अभियाचाम वैदेहीमेतद्धि मम रोचते ॥ 27.43 ॥

tadalaṃ krūravākyaiśca sāntvamevābhidhīyatām | abhiyācāma vaidehīmetaddhi mama rocate || 27.43 ||

'अतः इन क्रूर वचनों से क्या लाभ - अब केवल सान्त्वना के वचन ही कहे जाएँ। हम वैदेही से क्षमा-याचना करें - मुझे तो यही उचित लगता है।'

श्लोक 44 (sundara.27.44)

यस्या ह्येवंविधः स्वप्नो दुःखितायाः प्रदृश्यते । सा दुःखैर्बहुभिर्मुक्ता प्रियं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ 27.44 ॥

yasyā hyevaṃvidhaḥ svapno duḥkhitāyāḥ pradṛśyate | sā duḥkhairbahubhirmuktā priyaṃ prāpnotyanuttamam || 27.44 ||

'क्योंकि जिस दुःखी स्त्री को इस प्रकार का स्वप्न दिखाई देता है, वह शीघ्र ही अपने अनेक दुःखों से मुक्त होकर परम सुख को प्राप्त करती है।'

श्लोक 45 (sundara.27.45)

भर्त्सितामपि याचध्वं राक्षस्यः किं विवक्षया । राघवाद्धि भयं घोरं राक्षसानामुपस्थितम् ॥ 27.45 ॥

bhartsitāmapi yācadhvaṃ rākṣasyaḥ kiṃ vivakṣayā | rāghavāddhi bhayaṃ ghoraṃ rākṣasānāmupasthitam || 27.45 ||

'हे राक्षसियो, तुमने धमकाया तो अवश्य, अब उससे क्षमा माँगो - अधिक कहने से क्या लाभ? राघव से भयंकर भय अब राक्षसों पर मँडरा रहा है।'

श्लोक 46 (sundara.27.46)

प्रणिपातप्रसन्ना हि मैथिली जनकात्मजा । अलमेषा परित्रातुं राक्षस्यो महतो भयात् ॥ 27.46 ॥

praṇipātaprasannā hi maithilī janakātmajā | alameṣā paritrātuṃ rākṣasyo mahato bhayāt || 27.46 ||

'क्योंकि जनकनन्दिनी मैथिली प्रणिपात से ही प्रसन्न हो जाती हैं - हे राक्षसियो, वे ही तुम्हें इस महान भय से बचाने में समर्थ हैं।'

श्लोक 47 (sundara.27.47)

अपि चास्या विशालाक्ष्या न किंचिदुपलक्षये । विरूपमपि चांगेषु सुसूक्ष्ममपि लक्षणम् ॥ 27.47 ॥

api cāsyā viśālākṣyā na kiṃcidupalakṣaye | virūpamapi cāṃgeṣu susūkṣmamapi lakṣaṇam || 27.47 ||

'और इस विशालाक्षी के अंगों में मुझे कोई भी अशुभ लक्षण दिखाई नहीं देता, चाहे वह कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो।'

श्लोक 48 (sundara.27.48)

छायावैगुण्यमात्रं तु शङ्के दुःखमुपस्थितम् । अदुःखार्हामिमां देवीं वैहायसमुपस्थिताम् ॥ 27.48 ॥

chāyāvaiguṇyamātraṃ tu śaṅke duḥkhamupasthitam | aduḥkhārhāmimāṃ devīṃ vaihāyasamupasthitām || 27.48 ||

'केवल उसके कान्ति की थोड़ी-सी मलिनता मुझे दिखाई देती है, जो मेरे विचार में उस दुःख के कारण है जो इस दुःख की अधिकारिणी न होते हुए भी इस देवी पर आ पड़ा है - और मेरे स्वप्न में जो आकाश में उठी हुई खड़ी थीं।'

श्लोक 49 (sundara.27.49)

अर्थसिद्धिं तु वैदेह्याः पश्याम्यहमुपस्थिताम् । राक्षसेन्द्रविनाशं च विजयं राघवस्य च ॥ 27.49 ॥

arthasiddhiṃ tu vaidehyāḥ paśyāmyahamupasthitām | rākṣasendravināśaṃ ca vijayaṃ rāghavasya ca || 27.49 ||

'मुझे वैदेही के प्रयोजन की सिद्धि निकट ही दिखाई दे रही है, और साथ ही राक्षसराज के विनाश और राघव की विजय का भी दर्शन हो रहा है।'

श्लोक 50 (sundara.27.50)

निमित्तभूतमेतत् तु श्रोतुमस्या महत् प्रियम् । दृश्यते च स्फुरच्चक्षुः पद्मपत्रमिवायतम् ॥ 27.50 ॥

nimittabhūtametat tu śrotumasyā mahat priyam | dṛśyate ca sphuraccakṣuḥ padmapatramivāyatam || 27.50 ||

'यह स्वयं ही इसके लिए शीघ्र सुनने योग्य महान प्रिय समाचार का शकुन है - देखो, कमल-दल के समान इसका दीर्घ नेत्र फड़क रहा है।'

श्लोक 51 (sundara.27.51)

ईषद्धि हृषितो वास्या दक्षिणाया ह्यदक्षिणः । अकस्मादेव वैदेह्या बाहुरेकः प्रकम्पते ॥ 27.51 ॥

īṣaddhi hṛṣito vāsyā dakṣiṇāyā hyadakṣiṇaḥ | akasmādeva vaidehyā bāhurekaḥ prakampate || 27.51 ||

'और यद्यपि यह दक्षिणमुखी है, फिर भी वैदेही की बाईं भुजा अचानक ही हर्षपूर्वक थोड़ा कँपने लगी है।'

श्लोक 52 (sundara.27.52)

करेणुहस्तप्रतिमः सव्यश्चोरुरनुत्तमः । वेपन् कथयतीवास्या राघवं पुरतः स्थितम् ॥ 27.52 ॥

kareṇuhastapratimaḥ savyaścoruranuttamaḥ | vepan kathayatīvāsyā rāghavaṃ purataḥ sthitam || 27.52 ||

'और गजशुण्ड के समान इसकी अनुपम बाईं जंघा भी काँपती हुई मानो यही कह रही है कि राघव स्वयं अब इसके सम्मुख उपस्थित हैं।'

श्लोक 53 (sundara.27.53)

पक्षी च शाखानिलयं प्रविष्टः पुनः पुनश्चोत्तमसान्त्ववादी । सुस्वागतां वाचमुदीरयाणः पुनः पुनश्चोदयतीव हृष्टः ॥ 27.53 ॥

pakṣī ca śākhānilayaṃ praviṣṭaḥ punaḥ punaścottamasāntvavādī | susvāgatāṃ vācamudīrayāṇaḥ punaḥ punaścodayatīva hṛṣṭaḥ || 27.53 ||

'और शाखा पर अपने घोंसले में बैठा एक पक्षी भी बार-बार उत्तम सान्त्वना के वचन बोलता हुआ और स्वागत की मधुर वाणी उच्चारता हुआ, मानो हर्षित होकर बार-बार इसे प्रोत्साहित कर रहा है।'

श्लोक 54 (sundara.27.54)

ततः सा ह्रीमती बाला भर्तुर्विजयहर्षिता । अवोचद् यदि तत् तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ॥ 27.54 ॥

tataḥ sā hrīmatī bālā bharturvijayaharṣitā | avocad yadi tat tathyaṃ bhaveyaṃ śaraṇaṃ hi vaḥ || 27.54 ||

तब वह लज्जाशील बाला सीता अपने पति की विजय की आशा से हर्षित होकर बोलीं: "यदि यह सत्य हो, तो मैं ही तुम्हारी शरण बनूँगी।"

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