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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 29

सीता के शुभ शकुन

सर्ग 28सर्ग-सूचीसर्ग 30

श्लोक 1 (sundara.29.1)

तथागतां तां व्यथितामनिन्दितां व्यतीतहर्षां परिदीनमानसाम् । शुभां निमित्तानि शुभानि भेजिरे नरं श्रिया जुष्टमिवोपसेविनः ॥ 29.1 ॥

tathāgatāṃ tāṃ vyathitāmaninditāṃ vyatītaharṣāṃ paridīnamānasām | śubhāṃ nimittāni śubhāni bhejire naraṃ śriyā juṣṭamivopasevinaḥ || 29.1 ||

इस प्रकार व्यथित, निष्कलंक, हर्षरहित और उदास मन वाली उस सीता पर शुभ शकुन उसी प्रकार आ बसे जैसे सेवकगण समृद्धिशाली किसी पुरुष के पास आकर बस जाते हैं।

श्लोक 2 (sundara.29.2)

तस्याः शुभं वाममरालपक्ष्म- राज्यावृतं कृष्णविशालशुक्लम् । प्रास्पन्दतैकं नयनं सुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवाभिताम्रम् ॥ 29.2 ॥

tasyāḥ śubhaṃ vāmamarālapakṣma- rājyāvṛtaṃ kṛṣṇaviśālaśuklam | prāspandataikaṃ nayanaṃ sukeśyā mīnāhataṃ padmamivābhitāmram || 29.2 ||

सुन्दर केशों वाली सीता का घुमावदार पलकों से घिरा, काला, विशाल और उज्ज्वल शुभ बायाँ नेत्र, मछली द्वारा आहत लाल कमल के समान फड़कने लगा।

श्लोक 3 (sundara.29.3)

भुजश्च चार्वञ्चितवृत्तपीनः परार्घ्यकालागुरुचन्दनार्हः । अनुत्तमेनाघ्युषितः प्रियेण चिरेण वामः समवेपताशु ॥ 29.3 ॥

bhujaśca cārvañcitavṛttapīnaḥ parārghyakālāgurucandanārhaḥ | anuttamenāghyuṣitaḥ priyeṇa cireṇa vāmaḥ samavepatāśu || 29.3 ||

और उसकी सुन्दर, कुछ मुड़ी हुई, गोल तथा पुष्ट, उत्तम कृष्ण अगुरु और चन्दन के योग्य बाईं भुजा, जो चिरकाल तक उस अनुपम प्रियतम द्वारा आलिंगित रही थी, सहसा काँपने लगी।

श्लोक 4 (sundara.29.4)

गजेन्द्रहस्तप्रतिमश्च पीन- स्तयोर्द्वयोः संहतयोस्तु जातः । प्रस्पन्दमानः पुनरूरुरस्या रामं पुरस्तात् स्थितमाचचक्षे ॥ 29.4 ॥

gajendrahastapratimaśca pīna- stayordvayoḥ saṃhatayostu jātaḥ | praspandamānaḥ punarūrurasyā rāmaṃ purastāt sthitamācacakṣe || 29.4 ||

और उसकी परस्पर सटी हुई दोनों जंघाओं में से, गजराज की सूँड़ के समान पुष्ट जंघा पुनः स्पन्दित होने लगी, मानो यह घोषित कर रही हो कि राम स्वयं उसके सम्मुख उपस्थित हैं।

श्लोक 5 (sundara.29.5)

शुभं पुनर्हेमसमानवर्ण- मीषद्रजोध्वस्तमिवातुलाक्ष्याः । वासः स्थितायाः शिखराग्रदन्त्याः किंचित् परिस्रंसत चारुगात्र्याः ॥ 29.5 ॥

śubhaṃ punarhemasamānavarṇa- mīṣadrajodhvastamivātulākṣyāḥ | vāsaḥ sthitāyāḥ śikharāgradantyāḥ kiṃcit parisraṃsata cārugātryāḥ || 29.5 ||

और पुनः स्वर्ण के समान वर्ण वाला, मानो हल्की धूल से मलिन उस अनुपमेय नेत्रों वाली, कली के समान दाँतों वाली, सुन्दर अंगों वाली सीता का वह शुभ वस्त्र, खड़े-खड़े ही कुछ खिसक गया।

श्लोक 6 (sundara.29.6)

एतैर्निमित्तैरपरैश्च सुभ्रूः संचोदिता प्रागपि साधुसिद्धैः । वातातपक्लान्तमिव प्रणष्टं वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष ॥ 29.6 ॥

etairnimittairaparaiśca subhrūḥ saṃcoditā prāgapi sādhusiddhaiḥ | vātātapaklāntamiva praṇaṣṭaṃ varṣeṇa bījaṃ pratisaṃjaharṣa || 29.6 ||

इन तथा अन्य शुभ शकुनों से, जो पहले भी सच्चे सिद्ध हो चुके थे, प्रेरित होकर उस भ्रूयुक्ता सीता को नए सिरे से हर्ष हुआ, मानो वायु और धूप से मुरझाया हुआ बीज वर्षा से पुनः अंकुरित हो उठा हो।

श्लोक 7 (sundara.29.7)

तस्याः पुनर्बिम्बफलोपमोष्ठं स्वक्षिभ्रुकेशान्तमरालपक्ष्म । वक्त्रं बभासे सितशुक्लदंष्ट्रं राहोर्मुखाच्चन्द्र इव प्रमुक्तः ॥ 29.7 ॥

tasyāḥ punarbimbaphalopamoṣṭhaṃ svakṣibhrukeśāntamarālapakṣma | vaktraṃ babhāse sitaśukladaṃṣṭraṃ rāhormukhāccandra iva pramuktaḥ || 29.7 ||

और उसका मुख, बिम्बफल के समान अरुण अधरों वाला, सुन्दर नेत्र-भ्रू और घुमावदार पलकों वाला, श्वेत-उज्ज्वल दाँतों वाला, राहु के मुख से मुक्त हुए चन्द्रमा के समान चमक उठा।

श्लोक 8 (sundara.29.8)

सा वीतशोका व्यपनीततन्द्रा शान्तज्वरा हर्षविबुद्धसत्त्वा । अशोभतार्या वदनेन शुक्ले शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन ॥ 29.8 ॥

sā vītaśokā vyapanītatandrā śāntajvarā harṣavibuddhasattvā | aśobhatāryā vadanena śukle śītāṃśunā rātririvoditena || 29.8 ||

शोकरहित, थकान से मुक्त, अन्तर्दाह शान्त तथा हर्ष से जाग्रत चेतना वाली वह आर्या सीता अपने मुख से उसी प्रकार सुशोभित हुईं जैसे शुक्ल पक्ष की रात्रि उदित चन्द्रमा से सुशोभित होती है।

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