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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 34

सीता की शंका और हनुमान का आश्वासन

सर्ग 33सर्ग-सूचीसर्ग 35

श्लोक 1 (sundara.34.1)

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् हरिपुंगवः । दुःखाद् दुःखाभिभूतायाः सान्त्वमुत्तरमब्रवीत् ॥ 34.1 ॥

tasyāstad vacanaṃ śrutvā hanūmān haripuṃgavaḥ | duḥkhād duḥkhābhibhūtāyāḥ sāntvamuttaramabravīt || 34.1 ||

उसके वचन सुनकर वानरश्रेष्ठ हनुमान ने, दुःख पर दुःख से अभिभूत उस सीता को सान्त्वनापूर्ण उत्तर दिया।

श्लोक 2 (sundara.34.2)

अहं रामस्य संदेशाद् देवि दूतस्तवागतः । वैदेहि कुशली रामः स त्वां कौशलमब्रवीत् ॥ 34.2 ॥

ahaṃ rāmasya saṃdeśād devi dūtastavāgataḥ | vaidehi kuśalī rāmaḥ sa tvāṃ kauśalamabravīt || 34.2 ||

'हे देवी! मैं राम के संदेश से आपके पास दूत बनकर आया हूँ। हे वैदेही! राम कुशल से हैं, और उन्होंने आपका कुशल-क्षेम पूछा है।'

श्लोक 3 (sundara.34.3)

यो ब्राह्ममस्त्रं वेदांश्च वेद वेदविदां वरः । स त्वां दाशरथी रामो देवि कौशलमब्रवीत् ॥ 34.3 ॥

yo brāhmamastraṃ vedāṃśca veda vedavidāṃ varaḥ | sa tvāṃ dāśarathī rāmo devi kauśalamabravīt || 34.3 ||

'जो ब्रह्मास्त्र और वेदों को जानते हैं, वेदज्ञों में श्रेष्ठ हैं -- उन्हीं दशरथनन्दन राम ने, हे देवी, आपका कुशल पूछा है।'

श्लोक 4 (sundara.34.4)

लक्ष्मणश्च महातेजा भर्तुस्तेऽनुचरः प्रियः । कृतवाञ्छोकसंतप्तः शिरसा तेऽभिवादनम् ॥ 34.4 ॥

lakṣmaṇaśca mahātejā bhartuste'nucaraḥ priyaḥ | kṛtavāñchokasaṃtaptaḥ śirasā te'bhivādanam || 34.4 ||

'और आपके पति के प्रिय अनुचर, महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी, शोक-संतप्त होते हुए भी, सिर झुकाकर आपको प्रणाम भेजा है।'

श्लोक 5 (sundara.34.5)

सा तयोः कुशलं देवी निशम्य नरसिंहयोः । प्रतिसंहृष्टसर्वांगी हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ 34.5 ॥

sā tayoḥ kuśalaṃ devī niśamya narasiṃhayoḥ | pratisaṃhṛṣṭasarvāṃgī hanūmantamathābravīt || 34.5 ||

उन दोनों नरसिंहों का कुशल-समाचार सुनकर, उन देवी का सम्पूर्ण शरीर हर्ष से रोमांचित हो उठा, और उन्होंने हनुमान से कहा --

श्लोक 6 (sundara.34.6)

कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मा । एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि ॥ 34.6 ॥

kalyāṇī bata gātheyaṃ laukikī pratibhāti mā | eti jīvantamānando naraṃ varṣaśatādapi || 34.6 ||

'सचमुच लोक में प्रचलित यह कहावत मुझे सत्य प्रतीत होती है कि जीवित मनुष्य को सौ वर्ष बीत जाने पर भी अन्ततः आनन्द अवश्य प्राप्त होता है।'

श्लोक 7 (sundara.34.7)

तयोः समागमे तस्मिन् प्रीतिरुत्पादिताद्भुता । परस्परेण चालापं विश्वस्तौ तौ प्रचक्रतुः ॥ 34.7 ॥

tayoḥ samāgame tasmin prītirutpāditādbhutā | paraspareṇa cālāpaṃ viśvastau tau pracakratuḥ || 34.7 ||

उन दोनों के उस मिलन में एक अद्भुत स्नेह उत्पन्न हुआ, और परस्पर विश्वस्त होकर वे दोनों बातचीत करने लगे।

श्लोक 8 (sundara.34.8)

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः । सीतायाः शोकतप्तायाः समीपमुपचक्रमे ॥ 34.8 ॥

tasyāstad vacanaṃ śrutvā hanūmān mārutātmajaḥ | sītāyāḥ śokataptāyāḥ samīpamupacakrame || 34.8 ||

उसका वह वचन सुनकर पवनपुत्र हनुमान शोक-संतप्त सीता के समीप जाने लगे।

श्लोक 9 (sundara.34.9)

यथा यथा समीपं स हनूमानुपसर्पति । तथा तथा रावणं सा तं सीता परिशङ्कते ॥ 34.9 ॥

yathā yathā samīpaṃ sa hanūmānupasarpati | tathā tathā rāvaṇaṃ sā taṃ sītā pariśaṅkate || 34.9 ||

किन्तु ज्यों-ज्यों हनुमान उनके समीप आते गए, त्यों-त्यों सीता को उन्हें रावण समझने की आशंका होने लगी।

श्लोक 10 (sundara.34.10)

अहो धिग् धिक्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे । रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावणः ॥ 34.10 ॥

aho dhig dhikkṛtamidaṃ kathitaṃ hi yadasya me | rūpāntaramupāgamya sa evāyaṃ hi rāvaṇaḥ || 34.10 ||

'हाय, धिक्कार है, धिक्कार है कि मैंने यह सब उसे बता दिया! दूसरा रूप धारण कर आया यह वही रावण है।'

श्लोक 11 (sundara.34.11)

तामशोकस्य शाखां तु विमुक्त्वा शोककर्शिता । तस्यामेवानवद्याङ्गी धरण्यां समुपाविशत् ॥ 34.11 ॥

tāmaśokasya śākhāṃ tu vimuktvā śokakarśitā | tasyāmevānavadyāṅgī dharaṇyāṃ samupāviśat || 34.11 ||

तब शोक से क्षीण, निर्दोष अंगों वाली वह सीता उस अशोक-वृक्ष की शाखा को छोड़कर वहीं धरती पर बैठ गईं।

श्लोक 12 (sundara.34.12)

अवन्दत महाबाहुस्ततस्तां जनकात्मजाम् । सा चैनं भयसंत्रस्ता भूयो नैनमुदैक्षत ॥ 34.12 ॥

avandata mahābāhustatastāṃ janakātmajām | sā cainaṃ bhayasaṃtrastā bhūyo nainamudaikṣata || 34.12 ||

तब उस महाबाहु हनुमान ने जनकनन्दिनी सीता को प्रणाम किया; किन्तु भय से त्रस्त वह उसकी ओर फिर नहीं देख सकीं।

श्लोक 13 (sundara.34.13)

तं दृष्ट्वा वन्दमानं च सीता शशिनिभानना । अब्रवीद् दीर्घमुच्छ्वस्य वानरं मधुरस्वरा ॥ 34.13 ॥

taṃ dṛṣṭvā vandamānaṃ ca sītā śaśinibhānanā | abravīd dīrghamucchvasya vānaraṃ madhurasvarā || 34.13 ||

उसे प्रणाम करते देखकर, चन्द्रमुखी सीता ने एक दीर्घ श्वास लेते हुए, मधुर स्वर में उस वानर से कहा --

श्लोक 14 (sundara.34.14)

मायां प्रविष्टो मायावी यदि त्वं रावणः स्वयम् । उत्पादयसि मे भूयः संतापं तन्न शोभनम् ॥ 34.14 ॥

māyāṃ praviṣṭo māyāvī yadi tvaṃ rāvaṇaḥ svayam | utpādayasi me bhūyaḥ saṃtāpaṃ tanna śobhanam || 34.14 ||

'यदि तुम माया में प्रविष्ट हुए स्वयं मायावी रावण हो, तो मुझे पुनः संताप देते हो -- यह उचित नहीं।'

श्लोक 15 (sundara.34.15)

स्वं परित्यज्य रूपं यः परिव्राजकरूपवान् । जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ॥ 34.15 ॥

svaṃ parityajya rūpaṃ yaḥ parivrājakarūpavān | janasthāne mayā dṛṣṭastvaṃ sa eva hi rāvaṇaḥ || 34.15 ||

'जिसने अपना असली रूप त्यागकर परिव्राजक (भिक्षुक संन्यासी) का रूप धारण किया था, और जिसे मैंने जनस्थान में देखा था -- तुम वही रावण हो।'

श्लोक 16 (sundara.34.16)

उपवासकृशां दीनां कामरूप निशाचर । संतापयसि मां भूयः संतापं तन्न शोभनम् ॥ 34.16 ॥

upavāsakṛśāṃ dīnāṃ kāmarūpa niśācara | saṃtāpayasi māṃ bhūyaḥ saṃtāpaṃ tanna śobhanam || 34.16 ||

'हे इच्छानुसार रूप धारण करने वाले निशाचर! उपवास से क्षीण और दीन मुझे तुम फिर से संतप्त कर रहे हो -- यह संताप उचित नहीं।'

श्लोक 17 (sundara.34.17)

अथवा नैतदेवं हि यन्मया परिशङ्कितम् । मनसो हि मम प्रीतिरुत्पन्ना तव दर्शनात् ॥ 34.17 ॥

athavā naitadevaṃ hi yanmayā pariśaṅkitam | manaso hi mama prītirutpannā tava darśanāt || 34.17 ||

'अथवा शायद ऐसा नहीं है, जैसी मैंने आशंका की; क्योंकि तुम्हें देखकर तो मेरे मन में हर्ष ही उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 18 (sundara.34.18)

यदि रामस्य दूतस्त्वमागतो भद्रमस्तु ते । पृच्छामि त्वां हरिश्रेष्ठ प्रिया रामकथा हि मे ॥ 34.18 ॥

yadi rāmasya dūtastvamāgato bhadramastu te | pṛcchāmi tvāṃ hariśreṣṭha priyā rāmakathā hi me || 34.18 ||

'यदि तुम राम के दूत बनकर आए हो, तो तुम्हारा कल्याण हो! हे वानरश्रेष्ठ! मैं तुमसे पूछती हूँ, क्योंकि राम-कथा मुझे अत्यन्त प्रिय है।'

श्लोक 19 (sundara.34.19)

गुणान् रामस्य कथय प्रियस्य मम वानर । चित्तं हरसि मे सौम्य नदीकूलं यथा रयः ॥ 34.19 ॥

guṇān rāmasya kathaya priyasya mama vānara | cittaṃ harasi me saumya nadīkūlaṃ yathā rayaḥ || 34.19 ||

'हे वानर! मेरे प्रिय राम के गुणों का वर्णन करो। हे सौम्य! जैसे तीव्र धारा नदी के किनारे को काट डालती है, वैसे ही तुम मेरे चित्त को हर लेते हो।'

श्लोक 20 (sundara.34.20)

अहो स्वप्नस्य सुखता याहमेव चिराहृता । प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम् ॥ 34.20 ॥

aho svapnasya sukhatā yāhameva cirāhṛtā | preṣitaṃ nāma paśyāmi rāghaveṇa vanaukasam || 34.20 ||

'अहो, इस स्वप्न में कैसी मधुरता है कि इतने समय पहले हरी गई मैं आज सचमुच राघव द्वारा भेजे गए इस वनवासी को देख रही हूँ!'

श्लोक 21 (sundara.34.21)

स्वप्नेऽपि यद्यहं वीरं राघवं सहलक्ष्मणम् । पश्येयं नावसीदेयं स्वप्नोऽपि मम मत्सरी ॥ 34.21 ॥

svapne'pi yadyahaṃ vīraṃ rāghavaṃ sahalakṣmaṇam | paśyeyaṃ nāvasīdeyaṃ svapno'pi mama matsarī || 34.21 ||

'यदि स्वप्न में भी मैं वीर राघव को लक्ष्मण-सहित देख पाती, तो मैं व्याकुल न होती -- परन्तु मेरे स्वप्न भी मानो मुझसे ईर्ष्या करते हैं।'

श्लोक 22 (sundara.34.22)

नाहं स्वप्नमिमं मन्ये स्वप्ने दृष्ट्वा हि वानरम् । न शक्योऽभ्युदयः प्राप्तुं प्राप्तश्चाभ्युदयो मम ॥ 34.22 ॥

nāhaṃ svapnamimaṃ manye svapne dṛṣṭvā hi vānaram | na śakyo'bhyudayaḥ prāptuṃ prāptaścābhyudayo mama || 34.22 ||

'मैं इसे स्वप्न नहीं मानती, क्योंकि स्वप्न में वानर देखने से कोई शुभ फल नहीं मिलता -- परन्तु मुझे तो शुभ फल की प्राप्ति हो रही है।'

श्लोक 23 (sundara.34.23)

किं नु स्याच्चित्तमोहोऽयं भवेद् वातगतिस्त्वियम् । उन्मादजो विकारो वा स्यादयं मृगतृष्णिका ॥ 34.23 ॥

kiṃ nu syāccittamoho'yaṃ bhaved vātagatistviyam | unmādajo vikāro vā syādayaṃ mṛgatṛṣṇikā || 34.23 ||

'क्या यह मेरे मन का कोई भ्रम है, या वायु-विकार है? अथवा क्या यह उन्माद से उत्पन्न कोई विकार है, या मात्र मृगतृष्णा (मरीचिका) है?'

श्लोक 24 (sundara.34.24)

अथवा नायमुन्मादो मोहोऽप्युन्मादलक्षणः । सम्बुध्ये चाहमात्मानमिमं चापि वनौकसम् ॥ 34.24 ॥

athavā nāyamunmādo moho'pyunmādalakṣaṇaḥ | sambudhye cāhamātmānamimaṃ cāpi vanaukasam || 34.24 ||

'अथवा नहीं, यह उन्माद नहीं है, न ही उन्माद के लक्षणों वाला भ्रम है -- क्योंकि मुझे अपना और इस वनवासी वानर का भी पूरा भान है।'

श्लोक 25 (sundara.34.25)

इत्येवं बहुधा सीता सम्प्रधार्य बलाबलम् । रक्षसां कामरूपत्वान्मेने तं राक्षसाधिपम् ॥ 34.25 ॥

ityevaṃ bahudhā sītā sampradhārya balābalam | rakṣasāṃ kāmarūpatvānmene taṃ rākṣasādhipam || 34.25 ||

इस प्रकार अनेक प्रकार से सीता ने अपनी आशंका के पक्ष-विपक्ष पर विचार किया, और चूँकि राक्षस इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं, अतः उन्होंने उसे राक्षसराज (रावण) ही मान लिया।

श्लोक 26 (sundara.34.26)

एतां बुद्धिं तदा कृत्वा सीता सा तनुमध्यमा । न प्रतिव्याजहाराथ वानरं जनकात्मजा ॥ 34.26 ॥

etāṃ buddhiṃ tadā kṛtvā sītā sā tanumadhyamā | na prativyājahārātha vānaraṃ janakātmajā || 34.26 ||

ऐसा निश्चय करके, उस क्षीण-कटि जनकनन्दिनी सीता ने उस वानर को कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 27 (sundara.34.27)

सीताया निश्चितं बुद्ध्वा हनूमान् मारुतात्मजः । श्रोत्रानुकूलैर्वचनैस्तदा तां सम्प्रहर्षयन् ॥ 34.27 ॥

sītāyā niścitaṃ buddhvā hanūmān mārutātmajaḥ | śrotrānukūlairvacanaistadā tāṃ sampraharṣayan || 34.27 ||

सीता के मनोभाव को समझकर पवनपुत्र हनुमान ने कर्णप्रिय वचनों से उन्हें प्रसन्न करना आरम्भ किया --

श्लोक 28 (sundara.34.28)

आदित्य इव तेजस्वी लोककान्तः शशी यथा । राजा सर्वस्य लोकस्य देवो वैश्रवणो यथा ॥ 34.28 ॥

āditya iva tejasvī lokakāntaḥ śaśī yathā | rājā sarvasya lokasya devo vaiśravaṇo yathā || 34.28 ||

'वे सूर्य के समान तेजस्वी हैं, चन्द्रमा के समान संसार को प्रिय हैं, और कुबेर देव के समान समस्त लोक के अधिपति हैं,'

श्लोक 29 (sundara.34.29)

विक्रमेणोपपन्नश्च यथा विष्णुर्महायशाः । सत्यवादी मधुरवाग् देवो वाचस्पतिर्यथा ॥ 34.29 ॥

vikrameṇopapannaśca yathā viṣṇurmahāyaśāḥ | satyavādī madhuravāg devo vācaspatiryathā || 34.29 ||

'पराक्रम में महायशस्वी विष्णु के समान हैं, सत्यवादी और मधुरभाषी देव वाचस्पति (बृहस्पति) के समान हैं,'

श्लोक 30 (sundara.34.30)

रूपवान् सुभगः श्रीमान् कंदर्प इव मूर्तिमान् । स्थानक्रोधे प्रहर्ता च श्रेष्ठो लोके महारथः ॥ 34.30 ॥

rūpavān subhagaḥ śrīmān kaṃdarpa iva mūrtimān | sthānakrodhe prahartā ca śreṣṭho loke mahārathaḥ || 34.30 ||

'रूपवान्, सौभाग्यशाली, श्रीसम्पन्न, मानो साक्षात् कामदेव हैं; उचित अवसर पर ही क्रोध कर प्रहार करने वाले, संसार में श्रेष्ठ महारथी हैं।'

श्लोक 31 (sundara.34.31)

बाहुच्छायामवष्टब्धो यस्य लोको महात्मनः । अपक्रम्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम् ॥ 34.31 ॥

bāhucchāyāmavaṣṭabdho yasya loko mahātmanaḥ | apakramyāśramapadānmṛgarūpeṇa rāghavam || 34.31 ||

'जिन महात्मा राम की भुजाओं की छाया में सारा संसार आश्रय पाता है -- उन राघव को मृग का रूप धारण कर आश्रम से दूर ले जाकर,'

श्लोक 32 (sundara.34.32)

शून्ये येनापनीतासि तस्य द्रक्ष्यसि तत्फलम् । अचिराद् रावणं संख्ये यो वधिष्यति वीर्यवान् ॥ 34.32 ॥

śūnye yenāpanītāsi tasya drakṣyasi tatphalam | acirād rāvaṇaṃ saṃkhye yo vadhiṣyati vīryavān || 34.32 ||

'-- जिस रावण ने सूने आश्रम से तुम्हारा हरण किया, वह शीघ्र ही उसका फल देखेगा; वह पराक्रमी राम युद्ध में शीघ्र ही रावण का वध करेंगे।'

श्लोक 33 (sundara.34.33)

क्रोधप्रमुक्तैरिषुभिर्ज्वलद्भिरिव पावकैः । तेनाहं प्रेषितो दूतस्त्वत्सकाशमिहागतः ॥ 34.33 ॥

krodhapramuktairiṣubhirjvaladbhiriva pāvakaiḥ | tenāhaṃ preṣito dūtastvatsakāśamihāgataḥ || 34.33 ||

'-- क्रोध से छोड़े गए, अग्नि के समान प्रज्वलित बाणों से। उन्हीं राम ने मुझे दूत बनाकर भेजा है, और मैं यहाँ तुम्हारे समक्ष उपस्थित हुआ हूँ।'

श्लोक 34 (sundara.34.34)

त्वद्वियोगेन दुःखार्तः स त्वां कौशलमब्रवीत् । लक्ष्मणश्च महातेजाः सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ 34.34 ॥

tvadviyogena duḥkhārtaḥ sa tvāṃ kauśalamabravīt | lakṣmaṇaśca mahātejāḥ sumitrānandavardhanaḥ || 34.34 ||

'तुम्हारे वियोग से दुःखी होकर उन्होंने तुम्हारा कुशल पूछा है। और सुमित्रा के आनन्द को बढ़ाने वाले महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी,'

श्लोक 35 (sundara.34.35)

अभिवाद्य महाबाहुः स त्वां कौशलमब्रवीत् । रामस्य च सखा देवि सुग्रीवो नाम वानरः ॥ 34.35 ॥

abhivādya mahābāhuḥ sa tvāṃ kauśalamabravīt | rāmasya ca sakhā devi sugrīvo nāma vānaraḥ || 34.35 ||

'-- उस महाबाहु ने प्रणाम कर तुम्हारा कुशल पूछा है। और हे देवी! राम के मित्र, सुग्रीव नामक वानर ने,'

श्लोक 36 (sundara.34.36)

राजा वानरमुख्यानां स त्वां कौशलमब्रवीत् । नित्यं स्मरति ते रामः ससुग्रीवः सलक्ष्मणः ॥ 34.36 ॥

rājā vānaramukhyānāṃ sa tvāṃ kauśalamabravīt | nityaṃ smarati te rāmaḥ sasugrīvaḥ salakṣmaṇaḥ || 34.36 ||

'-- वानरों के प्रमुख राजा ने भी तुम्हारा कुशल पूछा है। सुग्रीव और लक्ष्मण सहित राम सदैव तुम्हारा स्मरण करते हैं।'

श्लोक 37 (sundara.34.37)

दिष्ट्या जीवसि वैदेहि राक्षसीवशमागता । नचिराद् द्रक्ष्यसे रामं लक्ष्मणं च महारथम् ॥ 34.37 ॥

diṣṭyā jīvasi vaidehi rākṣasīvaśamāgatā | nacirād drakṣyase rāmaṃ lakṣmaṇaṃ ca mahāratham || 34.37 ||

'हे वैदेही! सौभाग्य से तुम राक्षसियों के वश में पड़कर भी जीवित हो। शीघ्र ही तुम राम को और महारथी लक्ष्मण को देखोगी,'

श्लोक 38 (sundara.34.38)

मध्ये वानरकोटीनां सुग्रीवं चामितौजसम् । अहं सुग्रीवसचिवो हनूमान् नाम वानरः ॥ 34.38 ॥

madhye vānarakoṭīnāṃ sugrīvaṃ cāmitaujasam | ahaṃ sugrīvasacivo hanūmān nāma vānaraḥ || 34.38 ||

'-- तथा करोड़ों वानरों के मध्य अपरिमित तेजस्वी सुग्रीव को भी देखोगी। मैं सुग्रीव का मन्त्री हनुमान नामक वानर हूँ।'

श्लोक 39 (sundara.34.39)

प्रविष्टो नगरीं लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् । कृत्वा मूर्ध्नि पदन्यासं रावणस्य दुरात्मनः ॥ 34.39 ॥

praviṣṭo nagarīṃ laṅkāṃ laṅghayitvā mahodadhim | kṛtvā mūrdhni padanyāsaṃ rāvaṇasya durātmanaḥ || 34.39 ||

'मैं महासागर को लांघकर लंका नगरी में प्रविष्ट हुआ, और उस दुरात्मा रावण के सिर पर अपने पैर का निशान बनाकर,'

श्लोक 40 (sundara.34.40)

त्वां द्रष्टुमुपयातोऽहं समाश्रित्य पराक्रमम् । नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि । विशङ्का त्यज्यतामेषा श्रद्धत्स्व वदतो मम ॥ 34.40 ॥

tvāṃ draṣṭumupayāto'haṃ samāśritya parākramam | nāhamasmi tathā devi yathā māmavagacchasi | viśaṅkā tyajyatāmeṣā śraddhatsva vadato mama || 34.40 ||

'-- अपने पराक्रम का सहारा लेकर तुम्हें देखने के लिए आया हूँ। हे देवी! मैं वैसा नहीं हूँ जैसा तुम मुझे समझ रही हो; इस शंका को त्याग दो और मेरे कहे पर विश्वास करो।'

सर्ग 33सर्ग-सूचीसर्ग 35