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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 35

हनुमान द्वारा सीता के समक्ष राम का वर्णन

सर्ग 34सर्ग-सूचीसर्ग 36

श्लोक 1 (sundara.35.1)

तां तु रामकथां श्रुत्वा वैदेही वानरर्षभात् । उवाच वचनं सान्त्वमिदं मधुरया गिरा ॥ 35.1 ॥

tāṃ tu rāmakathāṃ śrutvā vaidehī vānararṣabhāt | uvāca vacanaṃ sāntvamidaṃ madhurayā girā || 35.1 ||

वानरश्रेष्ठ हनुमान से राम की वह कथा सुनकर वैदेही ने मधुर वाणी में यह सांत्वनापूर्ण वचन कहा --

श्लोक 2 (sundara.35.2)

क्व ते रामेण संसर्गः कथं जानासि लक्ष्मणम् । वानराणां नराणां च कथमासीत् समागमः ॥ 35.2 ॥

kva te rāmeṇa saṃsargaḥ kathaṃ jānāsi lakṣmaṇam | vānarāṇāṃ narāṇāṃ ca kathamāsīt samāgamaḥ || 35.2 ||

'तुम्हारा राम से कहाँ सम्पर्क हुआ? तुम लक्ष्मण को कैसे जानते हो? वानरों और मनुष्यों का यह मिलन कैसे हुआ?'

श्लोक 3 (sundara.35.3)

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च वानर । तानि भूयः समाचक्ष्व न मां शोकः समाविशेत् ॥ 35.3 ॥

yāni rāmasya cihnāni lakṣmaṇasya ca vānara | tāni bhūyaḥ samācakṣva na māṃ śokaḥ samāviśet || 35.3 ||

'हे वानर! राम और लक्ष्मण के जो चिह्न हैं, वे मुझे पुनः विस्तार से बताओ, जिससे मुझे फिर शोक न घेर ले।'

श्लोक 4 (sundara.35.4)

कीदृशं तस्य संस्थानं रूपं तस्य च कीदृशम् । कथमूरू कथं बाहू लक्ष्मणस्य च शंस मे ॥ 35.4 ॥

kīdṛśaṃ tasya saṃsthānaṃ rūpaṃ tasya ca kīdṛśam | kathamūrū kathaṃ bāhū lakṣmaṇasya ca śaṃsa me || 35.4 ||

'उनका शरीर कैसा है, उनका रूप कैसा है? उनकी जंघाएँ कैसी हैं, भुजाएँ कैसी हैं -- और लक्ष्मण की भी मुझे बताओ।'

श्लोक 5 (sundara.35.5)

एवमुक्तस्तु वैदेह्या हनूमान् मारुतात्मजः । ततो रामं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ 35.5 ॥

evamuktastu vaidehyā hanūmān mārutātmajaḥ | tato rāmaṃ yathātattvamākhyātumupacakrame || 35.5 ||

वैदेही द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर पवनपुत्र हनुमान राम का यथार्थ वर्णन करने लगे --

श्लोक 6 (sundara.35.6)

जानन्ती बत दिष्ट्या मां वैदेहि परिपृच्छसि । भर्तुः कमलपत्राक्षि संस्थानं लक्ष्मणस्य च ॥ 35.6 ॥

jānantī bata diṣṭyā māṃ vaidehi paripṛcchasi | bhartuḥ kamalapatrākṣi saṃsthānaṃ lakṣmaṇasya ca || 35.6 ||

'हे कमल-नयनी वैदेही! यह मेरा सौभाग्य है कि जानते हुए भी तुम मुझसे अपने पति और लक्ष्मण के स्वरूप के विषय में पूछ रही हो।'

श्लोक 7 (sundara.35.7)

यानि रामस्य चिह्नानि लक्ष्मणस्य च यानि वै । लक्षितानि विशालाक्षि वदतः शृणु तानि मे ॥ 35.7 ॥

yāni rāmasya cihnāni lakṣmaṇasya ca yāni vai | lakṣitāni viśālākṣi vadataḥ śṛṇu tāni me || 35.7 ||

'हे विशालाक्षि! राम और लक्ष्मण के जो चिह्न मैंने देखे हैं, उन्हें बताते हुए मुझसे सुनो।'

श्लोक 8 (sundara.35.8)

रामः कमलपत्राक्षः पूर्णचन्द्रनिभाननः । रूपदाक्षिण्यसम्पन्नः प्रसूतो जनकात्मजे ॥ 35.8 ॥

rāmaḥ kamalapatrākṣaḥ pūrṇacandranibhānanaḥ | rūpadākṣiṇyasampannaḥ prasūto janakātmaje || 35.8 ||

'हे जनकनन्दिनी! राम के नेत्र कमल-दल के समान हैं, मुख पूर्णचन्द्र के समान है; वे जन्म से ही रूप और सौम्यता से सम्पन्न हैं।'

श्लोक 9 (sundara.35.9)

तेजसाऽऽदित्यसंकाशः क्षमया पृथिवीसमः । बृहस्पतिसमो बुद्ध्या यशसा वासवोपमः ॥ 35.9 ॥

tejasā''dityasaṃkāśaḥ kṣamayā pṛthivīsamaḥ | bṛhaspatisamo buddhyā yaśasā vāsavopamaḥ || 35.9 ||

'तेज में वे सूर्य के समान हैं, क्षमा में पृथ्वी के समान, बुद्धि में बृहस्पति के समान और यश में इन्द्र के समान हैं।'

श्लोक 10 (sundara.35.10)

रक्षिता जीवलोकस्य स्वजनस्य च रक्षिता । रक्षिता स्वस्य वृत्तस्य धर्मस्य च परंतपः ॥ 35.10 ॥

rakṣitā jīvalokasya svajanasya ca rakṣitā | rakṣitā svasya vṛttasya dharmasya ca paraṃtapaḥ || 35.10 ||

'वे समस्त प्राणी-जगत् के रक्षक हैं, अपने स्वजनों के भी रक्षक हैं; अपने आचरण के रक्षक और धर्म के भी रक्षक हैं -- शत्रुओं को संतप्त करने वाले।'

श्लोक 11 (sundara.35.11)

रामो भामिनि लोकस्य चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता । मर्यादानां च लोकस्य कर्ता कारयिता च सः ॥ 35.11 ॥

rāmo bhāmini lokasya cāturvarṇyasya rakṣitā | maryādānāṃ ca lokasya kartā kārayitā ca saḥ || 35.11 ||

'हे भामिनि! राम संसार के चारों वर्णों के रक्षक हैं; वे लोक-मर्यादाओं के स्वयं पालक और दूसरों से भी पालन करवाने वाले हैं।'

श्लोक 12 (sundara.35.12)

अर्चिष्मानर्चितोऽत्यर्थं ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः । साधूनामुपकारज्ञः प्रचारज्ञश्च कर्मणाम् ॥ 35.12 ॥

arciṣmānarcito'tyarthaṃ brahmacaryavrate sthitaḥ | sādhūnāmupakārajñaḥ pracārajñaśca karmaṇām || 35.12 ||

'वे तेजस्वी, अत्यन्त पूजित, ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित हैं; साधुजनों के उपकार को पहचानने वाले और कर्मों की सही प्रक्रिया को जानने वाले हैं।'

श्लोक 13 (sundara.35.13)

राजनीत्यां विनीतश्च ब्राह्मणानामुपासकः । ज्ञानवान् शीलसम्पन्नो विनीतश्च परंतपः ॥ 35.13 ॥

rājanītyāṃ vinītaśca brāhmaṇānāmupāsakaḥ | jñānavān śīlasampanno vinītaśca paraṃtapaḥ || 35.13 ||

'राजनीति में निपुण, ब्राह्मणों के उपासक; ज्ञानवान्, शीलसम्पन्न, विनम्र और शत्रुओं को संतप्त करने वाले हैं।'

श्लोक 14 (sundara.35.14)

यजुर्वेदविनीतश्च वेदविद्भिः सुपूजितः । धनुर्वेदे च वेदे च वेदाङ्गेषु च निष्ठितः ॥ 35.14 ॥

yajurvedavinītaśca vedavidbhiḥ supūjitaḥ | dhanurvede ca vede ca vedāṅgeṣu ca niṣṭhitaḥ || 35.14 ||

'यजुर्वेद में निष्णात, वेदज्ञों द्वारा सुपूजित; धनुर्वेद में, वेदों में और वेदांगों में निष्ठावान् हैं।'

श्लोक 15 (sundara.35.15)

विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवः शुभाननः । गूढजत्रुः सुताम्राक्षो रामो नाम जनैः श्रुतः ॥ 35.15 ॥

vipulāṃso mahābāhuḥ kambugrīvaḥ śubhānanaḥ | gūḍhajatruḥ sutāmrākṣo rāmo nāma janaiḥ śrutaḥ || 35.15 ||

'विशाल कंधों वाले, महाबाहु, शंख के समान ग्रीवा वाले, सुन्दर मुख वाले, छिपी हुई हँसलियों वाले और सुन्दर ताम्रवर्ण नेत्रों वाले -- वे लोगों में राम नाम से विख्यात हैं।'

श्लोक 16 (sundara.35.16)

दुन्दुभिस्वननिर्घोषः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् । समश्च सुविभक्ताङ्गो वर्णं श्यामं समाश्रितः ॥ 35.16 ॥

dundubhisvananirghoṣaḥ snigdhavarṇaḥ pratāpavān | samaśca suvibhaktāṅgo varṇaṃ śyāmaṃ samāśritaḥ || 35.16 ||

'उनका स्वर दुंदुभि के समान गंभीर है, वर्ण स्निग्ध है, वे प्रतापी हैं; सुडौल, सुविभक्त अंगों वाले और श्याम वर्ण के हैं।'

श्लोक 17 (sundara.35.17)

त्रिस्थिरस्त्रिप्रलम्बश्च त्रिसमस्त्रिषु चोन्नतः । त्रिताम्रस्त्रिषु च स्निग्धो गम्भीरस्त्रिषु नित्यशः ॥ 35.17 ॥

tristhirastripralambaśca trisamastriṣu connataḥ | tritāmrastriṣu ca snigdho gambhīrastriṣu nityaśaḥ || 35.17 ||

'(शरीर-लक्षण-शास्त्र के अनुसार) वे तीन अंगों में सुदृढ़ (वक्ष, कटि, मुष्टि), तीन में दीर्घ, तीन में सम, तीन में उन्नत, तीन में ताम्रवर्ण, तीन में स्निग्ध और तीन में सदैव गम्भीर हैं।'

श्लोक 18 (sundara.35.18)

त्रिवलीमांस्त्र्यवनतश्चतुर्व्यङ्गस्त्रिशीर्षवान् । चतुष्कलश्चतुर्लेखश्चतुष्किष्कुश्चतुःसमः ॥ 35.18 ॥

trivalīmāṃstryavanataścaturvyaṅgastriśīrṣavān | catuṣkalaścaturlekhaścatuṣkiṣkuścatuḥsamaḥ || 35.18 ||

'वे तीन रेखाओं (त्रिवली) से युक्त, तीन स्थानों पर अवनत, चार अंगों में सूक्ष्म, तीन उभारों वाले सिर से युक्त, चार कलाओं वाले, चार रेखाओं वाले, चार किष्कु (हाथ) ऊँचे और चार जोड़ी अंगों में सम हैं।'

श्लोक 19 (sundara.35.19)

चतुर्दशसमद्वन्द्वश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्गतिः । महोष्ठहनुनासश्च पञ्चस्निग्धोऽष्टवंशवान् ॥ 35.19 ॥

caturdaśasamadvandvaścaturdaṃṣṭraścaturgatiḥ | mahoṣṭhahanunāsaśca pañcasnigdho'ṣṭavaṃśavān || 35.19 ||

'वे चौदह जोड़ी अंगों में सम, चार दाढ़ों वाले, चार प्रकार की गति (सिंह, व्याघ्र, गज, वृषभ के समान) वाले, विशाल ओष्ठ-ठुड्डी-नासिका वाले, पाँच अंगों में स्निग्ध और आठ दीर्घ अंगों वाले हैं।'

श्लोक 20 (sundara.35.20)

दशपद्मो दशबृहत् त्रिभिर्व्याप्तो द्विशुक्लवान् । षडुन्नतो नवतनुस्त्रिभिर्व्याप्नोति राघवः ॥ 35.20 ॥

daśapadmo daśabṛhat tribhirvyāpto dviśuklavān | ṣaḍunnato navatanustribhirvyāpnoti rāghavaḥ || 35.20 ||

'राघव दस अंगों में कमल के समान कोमल, दस अंगों में विशाल हैं; तेज, यश और कीर्ति -- इन तीन गुणों से व्याप्त हैं; दोनों (मातृ-पितृ) कुलों से शुद्ध, छह अंगों में उन्नत और नौ अंगों में सूक्ष्म हैं।'

श्लोक 21 (sundara.35.21)

सत्यधर्मरतः श्रीमान् संग्रहानुग्रहे रतः । देशकालविभागज्ञः सर्वलोकप्रियंवदः ॥ 35.21 ॥

satyadharmarataḥ śrīmān saṃgrahānugrahe rataḥ | deśakālavibhāgajñaḥ sarvalokapriyaṃvadaḥ || 35.21 ||

'सत्य और धर्म में रत, श्रीसम्पन्न, अपने लोगों को संगृहीत करने और उन पर अनुग्रह करने में तत्पर; देश-काल का विभाजन जानने वाले और सम्पूर्ण संसार से प्रिय वचन बोलने वाले हैं।'

श्लोक 22 (sundara.35.22)

भ्राता चास्य च वैमात्रः सौमित्रिरमितप्रभः । अनुरागेण रूपेण गुणैश्चापि तथाविधः ॥ 35.22 ॥

bhrātā cāsya ca vaimātraḥ saumitriramitaprabhaḥ | anurāgeṇa rūpeṇa guṇaiścāpi tathāvidhaḥ || 35.22 ||

'और उनके सौतेले भाई, अमित तेजस्वी सौमित्र (लक्ष्मण) भी स्नेह, रूप और गुणों में उन्हीं के समान हैं।'

श्लोक 23 (sundara.35.23)

स सुवर्णच्छविः श्रीमान् रामः श्यामो महायशाः । तावुभौ नरशार्दूलौ त्वद्दर्शनकृतोत्सवौ ॥ 35.23 ॥

sa suvarṇacchaviḥ śrīmān rāmaḥ śyāmo mahāyaśāḥ | tāvubhau naraśārdūlau tvaddarśanakṛtotsavau || 35.23 ||

वे श्रीसम्पन्न, स्वर्ण-आभा वाले, श्याम वर्ण और महायशस्वी राम -- वे दोनों नरश्रेष्ठ, आपके दर्शन को ही उत्सव मानते हुए,

श्लोक 24 (sundara.35.24)

विचिन्वन्तौ महीं कृत्स्नामस्माभिः सह संगतौ । त्वामेव मार्गमाणौ तौ विचरन्तौ वसुन्धराम् ॥ 35.24 ॥

vicinvantau mahīṃ kṛtsnāmasmābhiḥ saha saṃgatau | tvāmeva mārgamāṇau tau vicarantau vasundharām || 35.24 ||

सारी पृथ्वी को खोजते हुए, हमसे मिलकर, केवल आपको ही ढूँढ़ते हुए इस वसुन्धरा पर विचरण करते हुए,

श्लोक 25 (sundara.35.25)

ददर्शतुर्मृगपतिं पूर्वजेनावरोपितम् । ऋष्यमूकस्य मूले तु बहुपादपसंकुले ॥ 35.25 ॥

dadarśaturmṛgapatiṃ pūrvajenāvaropitam | ṛṣyamūkasya mūle tu bahupādapasaṃkule || 35.25 ||

उन्होंने ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में, अनेक वृक्षों से भरे स्थान पर, अपने बड़े भाई द्वारा राज्य से च्युत किए गए वानरराज को देखा,

श्लोक 26 (sundara.35.26)

भ्रातुर्भयार्तमासीनं सुग्रीवं प्रियदर्शनम् । वयं च हरिराजं तं सुग्रीवं सत्यसङ्गरम् ॥ 35.26 ॥

bhrāturbhayārtamāsīnaṃ sugrīvaṃ priyadarśanam | vayaṃ ca harirājaṃ taṃ sugrīvaṃ satyasaṅgaram || 35.26 ||

-- अपने भाई के भय से पीड़ित, प्रियदर्शन सुग्रीव को; और हम भी उन्हीं सत्यप्रतिज्ञ वानरराज सुग्रीव की सेवा करते हैं,

श्लोक 27 (sundara.35.27)

परिचर्यामहे राज्यात् पूर्वजेनावरोपितम् । ततस्तौ चीरवसनौ धनुःप्रवरपाणिनौ ॥ 35.27 ॥

paricaryāmahe rājyāt pūrvajenāvaropitam | tatastau cīravasanau dhanuḥpravarapāṇinau || 35.27 ||

जिसे उसके बड़े भाई ने राज्य से हटा दिया था। तत्पश्चात् वल्कल वस्त्र पहने और उत्तम धनुष हाथ में लिए वे दोनों,

श्लोक 28 (sundara.35.28)

ऋष्यमूकस्य शैलस्य रम्यं देशमुपागतौ । स तौ दृष्ट्वा नरव्याघ्रौ धन्विनौ वानरर्षभः ॥ 35.28 ॥

ṛṣyamūkasya śailasya ramyaṃ deśamupāgatau | sa tau dṛṣṭvā naravyāghrau dhanvinau vānararṣabhaḥ || 35.28 ||

ऋष्यमूक पर्वत के रमणीय प्रदेश में आए। धनुर्धारी उन दोनों नरव्याघ्रों को देखकर वह वानरश्रेष्ठ सुग्रीव,

श्लोक 29 (sundara.35.29)

अभिप्लुतो गिरेस्तस्य शिखरं भयमोहितः । ततः स शिखरे तस्मिन् वानरेन्द्रो व्यवस्थितः ॥ 35.29 ॥

abhipluto girestasya śikharaṃ bhayamohitaḥ | tataḥ sa śikhare tasmin vānarendro vyavasthitaḥ || 35.29 ||

भय से व्याकुल होकर उस पर्वत के शिखर पर जा चढ़ा। तब उस शिखर पर स्थित वह वानरेन्द्र,

श्लोक 30 (sundara.35.30)

तयोः समीपं मामेव प्रेषयामास सत्वरम् । तावहं पुरुषव्याघ्रौ सुग्रीववचनात् प्रभू ॥ 35.30 ॥

tayoḥ samīpaṃ māmeva preṣayāmāsa satvaram | tāvahaṃ puruṣavyāghrau sugrīvavacanāt prabhū || 35.30 ||

-- और मुझे शीघ्र उन दोनों के पास भेजा। मैं सुग्रीव के वचन से उन दोनों समर्थ नरव्याघ्रों के पास,

श्लोक 31 (sundara.35.31)

रूपलक्षणसम्पन्नौ कृताञ्जलिरुपस्थितः । तौ परिज्ञाततत्त्वार्थौ मया प्रीतिसमन्वितौ ॥ 35.31 ॥

rūpalakṣaṇasampannau kṛtāñjalirupasthitaḥ | tau parijñātatattvārthau mayā prītisamanvitau || 35.31 ||

-- रूप और शुभ लक्षणों से सम्पन्न, हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ। उनकी वास्तविक स्थिति जानकर, स्नेहपूर्वक,

श्लोक 32 (sundara.35.32)

पृष्ठमारोप्य तं देशं प्रापितौ पुरुषर्षभौ । निवेदितौ च तत्त्वेन सुग्रीवाय महात्मने ॥ 35.32 ॥

pṛṣṭhamāropya taṃ deśaṃ prāpitau puruṣarṣabhau | niveditau ca tattvena sugrīvāya mahātmane || 35.32 ||

मैंने उन दोनों पुरुषश्रेष्ठों को अपनी पीठ पर बिठाकर उस स्थान तक पहुँचाया, और महात्मा सुग्रीव से उनका यथार्थ परिचय कराया।

श्लोक 33 (sundara.35.33)

तयोरन्योन्यसम्भाषाद् भृशं प्रीतिरजायत । तत्र तौ कीर्तिसम्पन्नौ हरीश्वरनरेश्वरौ ॥ 35.33 ॥

tayoranyonyasambhāṣād bhṛśaṃ prītirajāyata | tatra tau kīrtisampannau harīśvaranareśvarau || 35.33 ||

उनकी परस्पर बातचीत से गहरी मित्रता उत्पन्न हुई; वहाँ वे दोनों कीर्तिसम्पन्न, वानरराज और नरेश,

श्लोक 34 (sundara.35.34)

परस्परकृताश्वासौ कथया पूर्ववृत्तया । तं ततः सान्त्वयामास सुग्रीवं लक्ष्मणाग्रजः ॥ 35.34 ॥

parasparakṛtāśvāsau kathayā pūrvavṛttayā | taṃ tataḥ sāntvayāmāsa sugrīvaṃ lakṣmaṇāgrajaḥ || 35.34 ||

-- पूर्ववृत्तान्त की कथा से परस्पर आश्वस्त हुए। तत्पश्चात् लक्ष्मण के बड़े भाई राम ने सुग्रीव को सांत्वना दी,

श्लोक 35 (sundara.35.35)

स्त्रीहेतोर्वालिना भ्रात्रा निरस्तं पुरुतेजसा । ततस्त्वन्नाशजं शोकं रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ 35.35 ॥

strīhetorvālinā bhrātrā nirastaṃ purutejasā | tatastvannāśajaṃ śokaṃ rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ || 35.35 ||

जिसे उसके तेजस्वी भाई वालि ने एक स्त्री के कारण निकाल दिया था। तत्पश्चात् अथक कर्मी राम के, आपके वियोग से उत्पन्न शोक को,

श्लोक 36 (sundara.35.36)

लक्ष्मणो वानरेन्द्राय सुग्रीवाय न्यवेदयत् । स श्रुत्वा वानरेन्द्रस्तु लक्ष्मणेनेरितं वचः ॥ 35.36 ॥

lakṣmaṇo vānarendrāya sugrīvāya nyavedayat | sa śrutvā vānarendrastu lakṣmaṇeneritaṃ vacaḥ || 35.36 ||

लक्ष्मण ने वानरराज सुग्रीव को बताया। लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर वह वानरेन्द्र सुग्रीव

श्लोक 37 (sundara.35.37)

तदासीन्निष्प्रभोऽत्यर्थं ग्रहग्रस्त इवांशुमान् । ततस्त्वद्गात्रशोभीनि रक्षसा ह्रियमाणया ॥ 35.37 ॥

tadāsīnniṣprabho'tyarthaṃ grahagrasta ivāṃśumān | tatastvadgātraśobhīni rakṣasā hriyamāṇayā || 35.37 ||

तत्क्षण ऐसे मलिन हो गया मानो सूर्य ग्रहण से ग्रस्त हो गया हो। तत्पश्चात् उस राक्षस द्वारा हरी जाती हुई आपके शरीर की शोभा बढ़ाने वाले,

श्लोक 38 (sundara.35.38)

यान्याभरणजालानि पातितानि महीतले । तानि सर्वाणि रामाय आनीय हरियूथपाः ॥ 35.38 ॥

yānyābharaṇajālāni pātitāni mahītale | tāni sarvāṇi rāmāya ānīya hariyūthapāḥ || 35.38 ||

-- जो आभूषणों के समूह पृथ्वी पर गिर पड़े थे, उन सभी को वानरसेनापतियों ने लाकर,

श्लोक 39 (sundara.35.39)

संहृष्टा दर्शयामासुर्गतिं तु न विदुस्तव । तानि रामाय दत्तानि मयैवोपहृतानि च ॥ 35.39 ॥

saṃhṛṣṭā darśayāmāsurgatiṃ tu na vidustava | tāni rāmāya dattāni mayaivopahṛtāni ca || 35.39 ||

हर्षपूर्वक राम को दिखाया, यद्यपि वे आपके भाग्य को नहीं जानते थे। वे आभूषण मैंने ही राम को लाकर सौंपे --

श्लोक 40 (sundara.35.40)

स्वनवन्त्यवकीर्णानि तस्मिन् विहतचेतसि । तान्यङ्के दर्शनीयानि कृत्वा बहुविधं तदा ॥ 35.40 ॥

svanavantyavakīrṇāni tasmin vihatacetasi | tānyaṅke darśanīyāni kṛtvā bahuvidhaṃ tadā || 35.40 ||

-- झंकृत होते वे आभूषण उस विषण्ण-चित्त राम के समक्ष बिखर गए; और उन सुन्दर आभूषणों को अपनी गोद में रखकर वे विविध प्रकार से

श्लोक 41 (sundara.35.41)

तेन देवप्रकाशेन देवेन परिदेवितम् । पश्यतस्तानि रुदतस्ताम्यतश्च पुनः पुनः ॥ 35.41 ॥

tena devaprakāśena devena paridevitam | paśyatastāni rudatastāmyataśca punaḥ punaḥ || 35.41 ||

उन्होंने विलाप किया -- वे देवतुल्य तेजस्वी राम, उन आभूषणों को देखते, रोते और बार-बार मूर्च्छित होते हुए,

श्लोक 42 (sundara.35.42)

प्रादीपयद् दाशरथेस्तदा शोकहुताशनम् ॥ 35.42 ॥

prādīpayad dāśarathestadā śokahutāśanam || 35.42 ||

उन्होंने दशरथिनन्दन के शोकाग्नि को और भी प्रज्वलित कर दिया।

श्लोक 43 (sundara.35.43)

शायितं च चिरं तेन दुःखार्तेन महात्मना । मयापि विविधैर्वाक्यैः कृच्छ्रादुत्थापितः पुनः ॥ 35.43 ॥

śāyitaṃ ca ciraṃ tena duḥkhārtena mahātmanā | mayāpi vividhairvākyaiḥ kṛcchrādutthāpitaḥ punaḥ || 35.43 ||

वे दुःखार्त महात्मा राम बहुत देर तक भूमि पर पड़े रहे; मैंने भी अनेक प्रकार के वचनों से बड़ी कठिनाई से उन्हें पुनः उठाया।

श्लोक 44 (sundara.35.44)

तानि दृष्ट्वा महार्हाणि दर्शयित्वा मुहुर्मुहुः । राघवः सहसौमित्रिः सुग्रीवे संन्यवेशयत् ॥ 35.44 ॥

tāni dṛṣṭvā mahārhāṇi darśayitvā muhurmuhuḥ | rāghavaḥ sahasaumitriḥ sugrīve saṃnyaveśayat || 35.44 ||

उन बहुमूल्य आभूषणों को देख-देखकर और बार-बार दिखाकर, राघव ने सौमित्र के साथ उन्हें सुग्रीव को सौंप दिया।

श्लोक 45 (sundara.35.45)

स तवादर्शनादार्ये राघवः परितप्यते । महता ज्वलता नित्यमग्निनेवाग्निपर्वतः ॥ 35.45 ॥

sa tavādarśanādārye rāghavaḥ paritapyate | mahatā jvalatā nityamagninevāgniparvataḥ || 35.45 ||

'हे आर्ये! आपके दर्शन न होने से राघव संतप्त रहते हैं, सदा उस प्रज्वलित महाग्नि से जैसे कोई अग्निपर्वत जल रहा हो।'

श्लोक 46 (sundara.35.46)

त्वत्कृते तमनिद्रा च शोकश्चिन्ता च राघवम् । तापयन्ति महात्मानमग्न्यगारमिवाग्नयः ॥ 35.46 ॥

tvatkṛte tamanidrā ca śokaścintā ca rāghavam | tāpayanti mahātmānamagnyagāramivāgnayaḥ || 35.46 ||

'आपके कारण अनिद्रा, शोक और चिन्ता उस महात्मा राघव को इस प्रकार संतप्त करती हैं जैसे अग्निशाला को अग्नि की ज्वालाएँ।'

श्लोक 47 (sundara.35.47)

तवादर्शनशोकेन राघवः परिचाल्यते । महता भूमिकम्पेन महानिव शिलोच्चयः ॥ 35.47 ॥

tavādarśanaśokena rāghavaḥ paricālyate | mahatā bhūmikampena mahāniva śiloccayaḥ || 35.47 ||

'आपके दर्शन न होने के शोक से राघव इस प्रकार डोल उठते हैं जैसे बड़े भूकम्प से कोई विशाल शिलाराशि।'

श्लोक 48 (sundara.35.48)

काननानि सुरम्याणि नदीप्रस्रवणानि च । चरन् न रतिमाप्नोति त्वामपश्यन् नृपात्मजे ॥ 35.48 ॥

kānanāni suramyāṇi nadīprasravaṇāni ca | caran na ratimāpnoti tvāmapaśyan nṛpātmaje || 35.48 ||

'हे राजकुमारी! अत्यन्त रमणीय वनों, नदियों और झरनों में विचरण करते हुए भी वे आपको न देखकर कोई सुख नहीं पाते।'

श्लोक 49 (sundara.35.49)

स त्वां मनुजशार्दूलः क्षिप्रं प्राप्स्यति राघवः । समित्रबान्धवं हत्वा रावणं जनकात्मजे ॥ 35.49 ॥

sa tvāṃ manujaśārdūlaḥ kṣipraṃ prāpsyati rāghavaḥ | samitrabāndhavaṃ hatvā rāvaṇaṃ janakātmaje || 35.49 ||

'हे जनकनन्दिनी! वे नरश्रेष्ठ राघव मित्रों और बन्धुओं सहित रावण का वध कर शीघ्र ही आपको प्राप्त करेंगे।'

श्लोक 50 (sundara.35.50)

सहितौ रामसुग्रीवावुभावकुरुतां तदा । समयं वालिनं हन्तुं तव चान्वेषणं प्रति ॥ 35.50 ॥

sahitau rāmasugrīvāvubhāvakurutāṃ tadā | samayaṃ vālinaṃ hantuṃ tava cānveṣaṇaṃ prati || 35.50 ||

तब राम और सुग्रीव दोनों ने मिलकर एक प्रतिज्ञा की -- वालि का वध करने की और आपकी खोज करने की।

श्लोक 51 (sundara.35.51)

ततस्ताभ्यां कुमाराभ्यां वीराभ्यां स हरीश्वरः । किष्किन्धां समुपागम्य वाली युद्धे निपातितः ॥ 35.51 ॥

tatastābhyāṃ kumārābhyāṃ vīrābhyāṃ sa harīśvaraḥ | kiṣkindhāṃ samupāgamya vālī yuddhe nipātitaḥ || 35.51 ||

तत्पश्चात् उन दोनों वीर राजकुमारों के साथ किष्किन्धा पहुँचकर, वह वानरराज वालि युद्ध में मार गिराया गया।

श्लोक 52 (sundara.35.52)

ततो निहत्य तरसा रामो वालिनमाहवे । सर्वर्क्षहरिसङ्घानां सुग्रीवमकरोत् पतिम् ॥ 35.52 ॥

tato nihatya tarasā rāmo vālinamāhave | sarvarkṣaharisaṅghānāṃ sugrīvamakarot patim || 35.52 ||

तत्पश्चात् युद्ध में वालि को शीघ्रता से मारकर राम ने सुग्रीव को समस्त भालू और वानर-समूहों का स्वामी बना दिया।

श्लोक 53 (sundara.35.53)

रामसुग्रीवयोरैक्यं देव्येवं समजायत । हनूमन्तं च मां विद्धि तयोर्दूतमुपागतम् ॥ 35.53 ॥

rāmasugrīvayoraikyaṃ devyevaṃ samajāyata | hanūmantaṃ ca māṃ viddhi tayordūtamupāgatam || 35.53 ||

हे देवी! इस प्रकार राम और सुग्रीव की मित्रता हुई। मुझे उन दोनों का दूत बनकर आया हनुमान जानिए।

श्लोक 54 (sundara.35.54)

स्वं राज्यं प्राप्य सुग्रीवः स्वानानीय महाकपीन् । त्वदर्थं प्रेषयामास दिशो दश महाबलान् ॥ 35.54 ॥

svaṃ rājyaṃ prāpya sugrīvaḥ svānānīya mahākapīn | tvadarthaṃ preṣayāmāsa diśo daśa mahābalān || 35.54 ||

अपना राज्य पाकर सुग्रीव ने अपने महाबलशाली वानरों को इकट्ठा कर, आपकी खोज हेतु उन्हें दसों दिशाओं में भेज दिया।

श्लोक 55 (sundara.35.55)

आदिष्टा वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महौजसः । अद्रिराजप्रतीकाशाः सर्वतः प्रस्थिता महीम् ॥ 35.55 ॥

ādiṣṭā vānarendreṇa sugrīveṇa mahaujasaḥ | adrirājapratīkāśāḥ sarvataḥ prasthitā mahīm || 35.55 ||

उन महातेजस्वी वानरराज सुग्रीव की आज्ञा से, पर्वतराज के समान विशालकाय वानर सभी दिशाओं में पृथ्वी पर निकल पड़े।

श्लोक 56 (sundara.35.56)

ततस्ते मार्गमाणा वै सुग्रीववचनातुराः । चरन्ति वसुधां कृत्स्नां वयमन्ये च वानराः ॥ 35.56 ॥

tataste mārgamāṇā vai sugrīvavacanāturāḥ | caranti vasudhāṃ kṛtsnāṃ vayamanye ca vānarāḥ || 35.56 ||

तत्पश्चात् सुग्रीव के वचन के लिए उत्सुक होकर हम और अन्य वानर सम्पूर्ण पृथ्वी पर खोज करने लगे।

श्लोक 57 (sundara.35.57)

अङ्गदो नाम लक्ष्मीवान् वालिसूनुर्महाबलः । प्रस्थितः कपिशार्दूलस्त्रिभागबलसंवृतः ॥ 35.57 ॥

aṅgado nāma lakṣmīvān vālisūnurmahābalaḥ | prasthitaḥ kapiśārdūlastribhāgabalasaṃvṛtaḥ || 35.57 ||

अंगद नामक, भाग्यशाली, वालि-पुत्र, महाबली, उस वानरश्रेष्ठ ने सेना के एक तिहाई भाग के साथ प्रस्थान किया।

श्लोक 58 (sundara.35.58)

तेषां नो विप्रणष्टानां विन्ध्ये पर्वतसत्तमे । भृशं शोकपरीतानामहोरात्रगणा गताः ॥ 35.58 ॥

teṣāṃ no vipraṇaṣṭānāṃ vindhye parvatasattame | bhṛśaṃ śokaparītānāmahorātragaṇā gatāḥ || 35.58 ||

उस श्रेष्ठ विन्ध्य पर्वत पर मार्ग भूले, अत्यन्त शोकाकुल हम सबके अनेक दिन-रात बीत गए।

श्लोक 59 (sundara.35.59)

ते वयं कार्यनैराश्यात् कालस्यातिक्रमेण च । भयाच्च कपिराजस्य प्राणांस्त्यक्तुमुपस्थिताः ॥ 35.59 ॥

te vayaṃ kāryanairāśyāt kālasyātikrameṇa ca | bhayācca kapirājasya prāṇāṃstyaktumupasthitāḥ || 35.59 ||

कार्य की निराशा से, समय बीत जाने से, और वानरराज के भय से हम अपने प्राण त्यागने को तत्पर हो गए।

श्लोक 60 (sundara.35.60)

विचित्य गिरिदुर्गाणि नदीप्रस्रवणानि च । अनासाद्य पदं देव्याः प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिताः ॥ 35.60 ॥

vicitya giridurgāṇi nadīprasravaṇāni ca | anāsādya padaṃ devyāḥ prāṇāṃstyaktuṃ vyavasthitāḥ || 35.60 ||

पर्वत के दुर्गम स्थानों, नदियों और झरनों को खोजकर भी देवी का कोई पता न पाकर हम प्राण त्यागने के लिए तैयार हो गए थे।

श्लोक 61 (sundara.35.61)

ततस्तस्य गिरेर्मूर्ध्नि वयं प्रायमुपास्महे । दृष्ट्वा प्रायोपविष्टांश्च सर्वान् वानरपुङ्गवान् ॥ 35.61 ॥

tatastasya girermūrdhni vayaṃ prāyamupāsmahe | dṛṣṭvā prāyopaviṣṭāṃśca sarvān vānarapuṅgavān || 35.61 ||

तब उस पर्वत के शिखर पर हमने प्रायोपवेशन (अनशन द्वारा मृत्यु का व्रत) आरम्भ किया। मृत्यु की प्रतीक्षा में बैठे उन सभी श्रेष्ठ वानरों को देखकर,

श्लोक 62 (sundara.35.62)

भृशं शोकार्णवे मग्नः पर्यदेवयदङ्गदः । तव नाशं च वैदेहि वालिनश्च तथा वधम् ॥ 35.62 ॥

bhṛśaṃ śokārṇave magnaḥ paryadevayadaṅgadaḥ | tava nāśaṃ ca vaidehi vālinaśca tathā vadham || 35.62 ||

अंगद शोक-सागर में डूबकर विलाप करने लगे -- हे वैदेही, आपके खो जाने के लिए, वालि के वध के लिए,

श्लोक 63 (sundara.35.63)

प्रायोपवेशमस्माकं मरणं च जटायुषः । तेषां नः स्वामिसंदेशान्निराशानां मुमूर्षताम् ॥ 35.63 ॥

prāyopaveśamasmākaṃ maraṇaṃ ca jaṭāyuṣaḥ | teṣāṃ naḥ svāmisaṃdeśānnirāśānāṃ mumūrṣatām || 35.63 ||

और हमारे प्रायोपवेशन के लिए, और जटायु की मृत्यु के लिए। तब स्वामी की आज्ञा के कारण निराश, मरने को उद्यत हम सबके लिए,

श्लोक 64 (sundara.35.64)

कार्यहेतोरिहायातः शकुनिर्वीर्यवान् महान् । गृध्रराजस्य सोदर्यः सम्पातिर्नाम गृध्रराट् ॥ 35.64 ॥

kāryahetorihāyātaḥ śakunirvīryavān mahān | gṛdhrarājasya sodaryaḥ sampātirnāma gṛdhrarāṭ || 35.64 ||

मानो हमारे प्रयोजन के लिए ही वहाँ एक महान् बलशाली पक्षी आया -- गृध्रराज जटायु का भाई, संपाति नामक गृध्रराज।

श्लोक 65 (sundara.35.65)

श्रुत्वा भ्रातृवधं कोपादिदं वचनमब्रवीत् । यवीयान् केन मे भ्राता हतः क्व च निपातितः ॥ 35.65 ॥

śrutvā bhrātṛvadhaṃ kopādidaṃ vacanamabravīt | yavīyān kena me bhrātā hataḥ kva ca nipātitaḥ || 35.65 ||

अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर उसने क्रोध से यह कहा -- 'मेरे छोटे भाई को किसने मारा, और वह कहाँ गिरा?'

श्लोक 66 (sundara.35.66)

एतदाख्यातुमिच्छामि भवद्भिर्वानरोत्तमाः । अङ्गदोऽकथयत् तस्य जनस्थाने महद्वधम् ॥ 35.66 ॥

etadākhyātumicchāmi bhavadbhirvānarottamāḥ | aṅgado'kathayat tasya janasthāne mahadvadham || 35.66 ||

'हे वानरश्रेष्ठो! मैं यह जानना चाहता हूँ।' तब अंगद ने उसे जनस्थान में हुए उस महान् वध का वृत्तान्त सुनाया --

श्लोक 67 (sundara.35.67)

रक्षसा भीमरूपेण त्वामुद्दिश्य यथार्थतः । जटायोस्तु वधं श्रुत्वा दुःखितः सोऽरुणात्मजः ॥ 35.67 ॥

rakṣasā bhīmarūpeṇa tvāmuddiśya yathārthataḥ | jaṭāyostu vadhaṃ śrutvā duḥkhitaḥ so'ruṇātmajaḥ || 35.67 ||

-- कि किस प्रकार भीषण रूप वाले उस राक्षस ने, आपके ही निमित्त, जटायु का वध किया। यह सुनकर दुःखी हुए वे अरुणपुत्र संपाति,

श्लोक 68 (sundara.35.68)

त्वामाह स वरारोहे वसन्तीं रावणालये । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्पातेः प्रीतिवर्धनम् ॥ 35.68 ॥

tvāmāha sa varārohe vasantīṃ rāvaṇālaye | tasya tad vacanaṃ śrutvā sampāteḥ prītivardhanam || 35.68 ||

-- हे वरारोहे! ने हमें बताया कि आप रावण के भवन में निवास कर रही हैं। संपाति के उस आनन्दवर्धक वचन को सुनकर,

श्लोक 69 (sundara.35.69)

अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः प्रस्थापिता वयम् । विन्ध्यादुत्थाय सम्प्राप्ताः सागरस्यान्तमुत्तमम् ॥ 35.69 ॥

aṅgadapramukhāḥ sarve tataḥ prasthāpitā vayam | vindhyādutthāya samprāptāḥ sāgarasyāntamuttamam || 35.69 ||

अंगद के नेतृत्व में हम सब वहाँ से चल पड़े; विन्ध्य से उठकर हम समुद्र के उस उत्तम तट पर जा पहुँचे।

श्लोक 70 (sundara.35.70)

त्वद्दर्शने कृतोत्साहा हृष्टाः पुष्टाः प्लवङ्गमाः । अङ्गदप्रमुखाः सर्वे वेलोपान्तमुपागताः ॥ 35.70 ॥

tvaddarśane kṛtotsāhā hṛṣṭāḥ puṣṭāḥ plavaṅgamāḥ | aṅgadapramukhāḥ sarve velopāntamupāgatāḥ || 35.70 ||

आपके दर्शन के उत्साह से हर्षित और उत्साहित सभी वानर, अंगद के नेतृत्व में, समुद्र के तट पर पहुँच गए।

श्लोक 71 (sundara.35.71)

चिन्तां जग्मुः पुनर्भीमां त्वद्दर्शनसमुत्सुकाः । अथाहं हरिसैन्यस्य सागरं दृश्य सीदतः ॥ 35.71 ॥

cintāṃ jagmuḥ punarbhīmāṃ tvaddarśanasamutsukāḥ | athāhaṃ harisainyasya sāgaraṃ dṛśya sīdataḥ || 35.71 ||

आपके दर्शन के लिए उत्सुक होते हुए भी वे पुनः भयंकर चिन्ता में पड़ गए। तब मैंने वानर-सेना को समुद्र देखकर विषण्ण होते देखा,

श्लोक 72 (sundara.35.72)

व्यवधूय भयं तीव्रं योजनानां शतं प्लुतः । लङ्का चापि मया रात्रौ प्रविष्टा राक्षसाकुला ॥ 35.72 ॥

vyavadhūya bhayaṃ tīvraṃ yojanānāṃ śataṃ plutaḥ | laṅkā cāpi mayā rātrau praviṣṭā rākṣasākulā || 35.72 ||

और अपने तीव्र भय को त्यागकर सौ योजन की छलांग लगाई। और राक्षसों से भरी उस लंका में मैं रात्रि में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 73 (sundara.35.73)

रावणश्च मया दृष्टस्त्वं च शोकनिपीडिता । एतत् ते सर्वमाख्यातं यथावृत्तमनिन्दिते ॥ 35.73 ॥

rāvaṇaśca mayā dṛṣṭastvaṃ ca śokanipīḍitā | etat te sarvamākhyātaṃ yathāvṛttamanindite || 35.73 ||

वहाँ मैंने रावण को और शोक से पीड़ित आपको देखा। हे निष्कलंके! यह सब मैंने आपको ज्यों का त्यों बता दिया है।

श्लोक 74 (sundara.35.74)

अभिभाषस्व मां देवि दूतो दाशरथेरहम् । तन्मां रामकृतोद्योगं त्वन्निमित्तमिहागतम् ॥ 35.74 ॥

abhibhāṣasva māṃ devi dūto dāśaratheraham | tanmāṃ rāmakṛtodyogaṃ tvannimittamihāgatam || 35.74 ||

'हे देवी! अब मुझसे बात कीजिए, क्योंकि मैं दशरथिनन्दन राम का दूत हूँ। मुझे राम के प्रयत्न से भेजा गया, आपके निमित्त यहाँ आया जानिए --'

श्लोक 75 (sundara.35.75)

सुग्रीवसचिवं देवि बुद्ध्यस्व पवनात्मजम् । कुशली तव काकुत्स्थः सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ 35.75 ॥

sugrīvasacivaṃ devi buddhyasva pavanātmajam | kuśalī tava kākutsthaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ || 35.75 ||

'-- हे देवी! मुझे सुग्रीव का मन्त्री, पवनपुत्र समझिए। आपके काकुत्स्थ (राम), जो समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं, कुशल हैं।'

श्लोक 76 (sundara.35.76)

गुरोराराधने युक्तो लक्ष्मणः शुभलक्षणः । तस्य वीर्यवतो देवि भर्तुस्तव हिते रतः ॥ 35.76 ॥

gurorārādhane yukto lakṣmaṇaḥ śubhalakṣaṇaḥ | tasya vīryavato devi bhartustava hite rataḥ || 35.76 ||

'शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण अपने बड़े भाई की सेवा में तत्पर हैं, और हे देवी! उन पराक्रमी आपके पति के हित में सदा लगे रहते हैं।'

श्लोक 77 (sundara.35.77)

अहमेकस्तु सम्प्राप्तः सुग्रीववचनादिह । मयेयमसहायेन चरता कामरूपिणा ॥ 35.77 ॥

ahamekastu samprāptaḥ sugrīvavacanādiha | mayeyamasahāyena caratā kāmarūpiṇā || 35.77 ||

'मैं अकेला ही सुग्रीव के वचन से यहाँ आया हूँ; बिना किसी सहायक के, इच्छानुसार रूप धारण करने की शक्ति रखते हुए,'

श्लोक 78 (sundara.35.78)

दक्षिणा दिगनुक्रान्ता त्वन्मार्गविचयैषिणा । दिष्ट्याहं हरिसैन्यानां त्वन्नाशमनुशोचताम् ॥ 35.78 ॥

dakṣiṇā diganukrāntā tvanmārgavicayaiṣiṇā | diṣṭyāhaṃ harisainyānāṃ tvannāśamanuśocatām || 35.78 ||

'-- आपका मार्ग खोजते हुए मैंने दक्षिण दिशा का भ्रमण किया। सौभाग्य से, आपके वियोग पर शोक करने वाली वानर-सेना के लिए मैं,'

श्लोक 79 (sundara.35.79)

अपनेष्यामि संतापं तवाधिगमशासनात् । दिष्ट्या हि न मम व्यर्थं सागरस्येह लङ्घनम् ॥ 35.79 ॥

apaneṣyāmi saṃtāpaṃ tavādhigamaśāsanāt | diṣṭyā hi na mama vyarthaṃ sāgarasyeha laṅghanam || 35.79 ||

'-- आपकी प्राप्ति का समाचार देकर उनका संताप दूर करूँगा। सौभाग्य से मेरा यह समुद्र-लंघन व्यर्थ नहीं गया।'

श्लोक 80 (sundara.35.80)

प्राप्स्याम्यहमिदं देवि त्वद्दर्शनकृतं यशः । राघवश्च महावीर्यः क्षिप्रं त्वामभिपत्स्यते ॥ 35.80 ॥

prāpsyāmyahamidaṃ devi tvaddarśanakṛtaṃ yaśaḥ | rāghavaśca mahāvīryaḥ kṣipraṃ tvāmabhipatsyate || 35.80 ||

'हे देवी! मुझे आपके दर्शन से यह यश प्राप्त होगा; और महापराक्रमी राघव शीघ्र ही आपको प्राप्त करेंगे,'

श्लोक 81 (sundara.35.81)

सपुत्रबान्धवं हत्वा रावणं राक्षसाधिपम् । माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः ॥ 35.81 ॥

saputrabāndhavaṃ hatvā rāvaṇaṃ rākṣasādhipam | mālyavān nāma vaidehi girīṇāmuttamo giriḥ || 35.81 ||

'-- रावण को उसके पुत्रों और बन्धुओं सहित मारकर। हे वैदेही! मालयवान् नामक पर्वतों में श्रेष्ठ एक पर्वत है --'

श्लोक 82 (sundara.35.82)

ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः । स च देवर्षिभिर्दिष्टः पिता मम महाकपिः । तीर्थे नदीपतेः पुण्ये शम्बसादनमुद्धरन् ॥ 35.82 ॥

tato gacchati gokarṇaṃ parvataṃ kesarī hariḥ | sa ca devarṣibhirdiṣṭaḥ pitā mama mahākapiḥ | tīrthe nadīpateḥ puṇye śambasādanamuddharan || 35.82 ||

'-- वहाँ से वानर केसरी गोकर्ण पर्वत को जाते हैं। और वे, देवताओं और ऋषियों द्वारा नियुक्त मेरे पिता, वह महाकपि, समुद्र के पुण्य तीर्थ में शम्बसादन नामक राक्षस का वध करते हैं।'

श्लोक 83 (sundara.35.83)

यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि । हनूमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा ॥ 35.83 ॥

yasyāhaṃ hariṇaḥ kṣetre jāto vātena maithili | hanūmāniti vikhyāto loke svenaiva karmaṇā || 35.83 ||

'हे मैथिली! मैं उसी वानर की पत्नी से पवनदेव द्वारा उत्पन्न हुआ, और अपने ही कर्मों से संसार में हनुमान नाम से विख्यात हूँ।'

श्लोक 84 (sundara.35.84)

विश्वासार्थं तु वैदेहि भर्तुरुक्ता मया गुणाः । अचिरात् त्वामितो देवि राघवो नयिता ध्रुवम् ॥ 35.84 ॥

viśvāsārthaṃ tu vaidehi bharturuktā mayā guṇāḥ | acirāt tvāmito devi rāghavo nayitā dhruvam || 35.84 ||

'हे वैदेही! मैंने आपके विश्वास के लिए ही आपके पति के गुण बताए हैं। हे देवी! शीघ्र ही राघव निश्चय ही आपको यहाँ से ले जाएँगे।'

श्लोक 85 (sundara.35.85)

एवं विश्वासिता सीता हेतुभिः शोककर्शिता । उपपन्नैरभिज्ञानैर्दूतं तमधिगच्छति ॥ 35.85 ॥

evaṃ viśvāsitā sītā hetubhiḥ śokakarśitā | upapannairabhijñānairdūtaṃ tamadhigacchati || 35.85 ||

इस प्रकार इन युक्तियों से आश्वस्त होकर, शोक से क्षीण सीता, इन समुचित प्रमाणों के आधार पर, उस दूत पर विश्वास करने लगीं।

श्लोक 86 (sundara.35.86)

अतुलं च गता हर्षं प्रहर्षेण तु जानकी । नेत्राभ्यां वक्रपक्ष्माभ्यां मुमोचानन्दजं जलम् ॥ 35.86 ॥

atulaṃ ca gatā harṣaṃ praharṣeṇa tu jānakī | netrābhyāṃ vakrapakṣmābhyāṃ mumocānandajaṃ jalam || 35.86 ||

और जानकी अतुलनीय हर्ष से भर गईं; अत्यधिक प्रसन्नता से उनकी घुमावदार पलकों वाली आँखों से आनन्द के आँसू बह चले।

श्लोक 87 (sundara.35.87)

चारु तद् वदनं तस्यास्ताम्रशुक्लायतेक्षणम् । अशोभत विशालाक्ष्या राहुमुक्त इवोडुराट् ॥ 35.87 ॥

cāru tad vadanaṃ tasyāstāmraśuklāyatekṣaṇam | aśobhata viśālākṣyā rāhumukta ivoḍurāṭ || 35.87 ||

उस विशालाक्षी का वह सुन्दर मुख, जिसके नेत्र रक्त-श्वेत और विशाल थे, राहु से मुक्त हुए चन्द्रमा के समान शोभायमान हुआ।

श्लोक 88 (sundara.35.88)

हनूमन्तं कपिं व्यक्तं मन्यते नान्यथेति सा । अथोवाच हनूमांस्तामुत्तरं प्रियदर्शनाम् ॥ 35.88 ॥

hanūmantaṃ kapiṃ vyaktaṃ manyate nānyatheti sā | athovāca hanūmāṃstāmuttaraṃ priyadarśanām || 35.88 ||

अब वे उन्हें स्पष्ट रूप से वानर हनुमान ही मानने लगीं, अन्य कुछ नहीं। तब हनुमान ने प्रियदर्शना सीता से यह उत्तर कहा --

श्लोक 89 (sundara.35.89)

एतत् ते सर्वमाख्यातं समाश्वसिहि मैथिलि । किं करोमि कथं वा ते रोचते प्रतियाम्यहम् ॥ 35.89 ॥

etat te sarvamākhyātaṃ samāśvasihi maithili | kiṃ karomi kathaṃ vā te rocate pratiyāmyaham || 35.89 ||

'यह सब मैंने आपको बता दिया; हे मैथिली, धीरज धरिए। मैं क्या करूँ, अथवा आपको क्या रुचिकर लगेगा? मैं अब लौटता हूँ।'

श्लोक 90 (sundara.35.90)

हतेऽसुरे संयति शम्बसादने कपिप्रवीरेण महर्षिचोदनात् । ततोऽस्मि वायुप्रभवो हि मैथिलि प्रभावतस्तत्प्रतिमश्च वानरः ॥ 35.90 ॥

hate'sure saṃyati śambasādane kapipravīreṇa maharṣicodanāt | tato'smi vāyuprabhavo hi maithili prabhāvatastatpratimaśca vānaraḥ || 35.90 ||

'हे मैथिली! जब उस वीर वानर (मेरे पिता) ने महर्षियों की प्रेरणा से युद्ध में असुर शम्बसादन का वध किया था -- उसी से मैं, वायुदेव से उत्पन्न, प्रभाव में उन्हीं के समान यह वानर हूँ।'

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