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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 4

हनुमान का लंका-नगरी में प्रवेश

सर्ग 3सर्ग-सूचीसर्ग 5

श्लोक 1 (sundara.4.1)

स निर्जत्य पुरीम् लण्का श्रेष्ठाम् ताम् कामरूपिणीम् । विक्रमेण महातेजा हनुमान् कपिसत्तमः ॥ 4.1 ॥

sa nirjatya purīm laṇkā śreṣṭhām tām kāmarūpiṇīm | vikrameṇa mahātejā hanumān kapisattamaḥ || 4.1 ||

अपने पराक्रम से उस श्रेष्ठ नगरी लंका को, जो इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ थी, जीतकर, वह महातेजस्वी हनुमान, वानरों में श्रेष्ठ...

श्लोक 2 (sundara.4.2)

अद्वारेण महावीर्यः प्राकारमवपुप्लुवे । निशि लङ्कां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः ॥ 4.2 ॥

advāreṇa mahāvīryaḥ prākāramavapupluve | niśi laṅkāṃ mahāsattvo viveśa kapikuñjaraḥ || 4.2 ||

...द्वार न होने वाले स्थान से उस महाबली ने प्राकार को लाँघा, और रात्रि में वह महाबलशाली गजराज-सम वानर लंका में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 3 (sundara.4.3)

प्रविश्य नगरीम् लङ्काम् कपिराजहितम्करः । चक्रेणाऽथ पदम् सव्यम् शत्रूणाम् स तु मूर्धनि ॥ 4.3 ॥

praviśya nagarīm laṅkām kapirājahitamkaraḥ | cakreṇā'tha padam savyam śatrūṇām sa tu mūrdhani || 4.3 ||

वानरराज का हित चाहते हुए, लंका नगरी में प्रवेश करके, उसने अपने शत्रुओं के मस्तकों पर अपना बायाँ पैर रखा।

श्लोक 4 (sundara.4.4)

प्रविष्टः सत्त्वसंपन्नो विशायाम् मारुतात्मजः । स महापथमास्थाय मुक्तापुष्पविराजितम् ॥ 4.4 ॥

praviṣṭaḥ sattvasaṃpanno viśāyām mārutātmajaḥ | sa mahāpathamāsthāya muktāpuṣpavirājitam || 4.4 ||

वह बलशाली पवनपुत्र रात्रि में नगर में प्रविष्ट होकर, बिखरे हुए मोतियों और फूलों से सुशोभित उस राजमार्ग पर चलने लगा।

श्लोक 5 (sundara.4.5)

ततस्तु ताम् पुरीम् लङ्काम् रम्यामभिययौ कपिः । हसित उद्घुष्ट निनदैः तूर्य घोष पुरः सरैः ॥ 4.5 ॥

tatastu tām purīm laṅkām ramyāmabhiyayau kapiḥ | hasita udghuṣṭa ninadaiḥ tūrya ghoṣa puraḥ saraiḥ || 4.5 ||

तत्पश्चात् वह वानर उस सुंदर लंका नगरी की ओर बढ़ा, जो द्वारों पर हास्य, कोलाहल और वाद्ययंत्रों की ध्वनि से गूँज रही थी।

श्लोक 6 (sundara.4.6)

वज्र अन्कुश निकाशैः च वज्र जाल विभूषितैः । गृह मेधैः पुरी रम्या बभासे द्यौः इव अम्बुदैः ॥ 4.6 ॥

vajra ankuśa nikāśaiḥ ca vajra jāla vibhūṣitaiḥ | gṛha medhaiḥ purī ramyā babhāse dyauḥ iva ambudaiḥ || 4.6 ||

वज्र के समान दृढ़, हीरक-जालों से सुसज्जित उस सुंदर नगरी की मेघ-सदृश अट्टालिकाओं से, वह आकाश को मेघों से आच्छादित सा प्रकाशित कर रही थी।

श्लोक 7 (sundara.4.7)

प्रजज्वाल तदा लन्का रक्षः गण गृहैः शुभैः । सित अभ्र सदृशैः चित्रैः पद्म स्वस्तिक संस्थितैः ॥ 4.7 ॥

prajajvāla tadā lankā rakṣaḥ gaṇa gṛhaiḥ śubhaiḥ | sita abhra sadṛśaiḥ citraiḥ padma svastika saṃsthitaiḥ || 4.7 ||

तब लंका राक्षसों के मंगलमय भवनों से जगमगा उठी, जो विचित्र थे, श्वेत मेघों के समान थे और कमल तथा स्वस्तिक के आकार में बने थे।

श्लोक 8 (sundara.4.8)

वर्धमान गृहैः च अपि सर्वतः सुविभाषितैः । ताम् चित्र माल्य आभरणाम् कपि राज हितम् करः ॥ 4.8 ॥

vardhamāna gṛhaiḥ ca api sarvataḥ suvibhāṣitaiḥ | tām citra mālya ābharaṇām kapi rāja hitam karaḥ || 4.8 ||

और सर्वत्र फैले हुए, सुसज्जित समृद्ध भवनों वाली, विचित्र मालाओं और आभूषणों वाली उस नगरी को - वानरराज का हित करने वाला वह हनुमान...

श्लोक 9 (sundara.4.9)

राघव अर्थम् चरन् श्रीमान् ददर्श च ननन्द च । भवनाद्भवनं गच्छ्न् ददर्श पवनात्मजः ॥ 4.9 ॥

rāghava artham caran śrīmān dadarśa ca nananda ca | bhavanādbhavanaṃ gacchn dadarśa pavanātmajaḥ || 4.9 ||

...राम के प्रयोजन हेतु विचरण करता हुआ वह श्रीमान् उसे देखकर आनंदित हुआ; और एक भवन से दूसरे भवन जाता हुआ वह पवनपुत्र चारों ओर देखने लगा।

श्लोक 10 (sundara.4.10)

विविधाकृतिरूपाणि भवनानि ततस्ततः । शुश्राव मधुरम् गीतम् त्रि स्थान स्वर भूषितम् ॥ 4.10 ॥

vividhākṛtirūpāṇi bhavanāni tatastataḥ | śuśrāva madhuram gītam tri sthāna svara bhūṣitam || 4.10 ||

उसने यहाँ-वहाँ नाना आकार और रूप वाले भवन देखे, और तीनों स्वरस्थानों (मंद्र, मध्य, तार) से सुसज्जित मधुर गीत सुना।

श्लोक 11 (sundara.4.11)

स्त्रीणाम् मद समृद्धानाम् दिवि च अप्सरसाम् इव । शुश्राव कान्ची निनदम् नूपुराणाम् च निह्स्वनम् ॥ 4.11 ॥

strīṇām mada samṛddhānām divi ca apsarasām iva | śuśrāva kāncī ninadam nūpurāṇām ca nihsvanam || 4.11 ||

मद से भरी हुई स्त्रियों का, स्वर्ग की अप्सराओं के समान वह गीत था; और उसने करधनी की झंकार तथा नूपुरों की मधुर ध्वनि सुनी।

श्लोक 12 (sundara.4.12)

सोपान निनदामः चैव भवनेषु महात्मनम् । आस्फोटित निनादामः च क्ष्वेडितामः च ततः ततः ॥ 4.12 ॥

sopāna ninadāmaḥ caiva bhavaneṣu mahātmanam | āsphoṭita ninādāmaḥ ca kṣveḍitāmaḥ ca tataḥ tataḥ || 4.12 ||

और सर्वत्र, महापुरुषों के भवनों में, उसने सीढ़ियों पर पदचाप, भुजाएँ चटकाने की ध्वनि और गर्जन सुना।

श्लोक 13 (sundara.4.13)

शुश्राव जपताम् तत्र मन्त्रन् रक्षोगृहेषु वै । स्वाध्याय निरतामः चैव यातु धानान् ददर्श सः ॥ 4.13 ॥

śuśrāva japatām tatra mantran rakṣogṛheṣu vai | svādhyāya niratāmaḥ caiva yātu dhānān dadarśa saḥ || 4.13 ||

वहाँ उसने राक्षसों के घरों में मंत्रोच्चार सुना, और यातुधानों को स्वाध्याय में लीन देखा।

श्लोक 14 (sundara.4.14)

रावण स्तव सम्युक्तान् गर्जतः राक्षसान् अपि । राज मार्गम् समावृत्य स्थितम् रक्षः बलम् महत् ॥ 4.14 ॥

rāvaṇa stava samyuktān garjataḥ rākṣasān api | rāja mārgam samāvṛtya sthitam rakṣaḥ balam mahat || 4.14 ||

उसने रावण की स्तुति में एकत्र होकर गर्जते राक्षसों को भी देखा, और राजमार्ग को घेरे हुए एक विशाल रक्षक-सेना को खड़ा देखा।

श्लोक 15 (sundara.4.15)

ददर्श मध्यमे गुल्मे राक्षसस्य चरान् बहून् । दीक्षितान् जटिलान् मुण्डान् गः अजिन अम्बर वाससः ॥ 4.15 ॥

dadarśa madhyame gulme rākṣasasya carān bahūn | dīkṣitān jaṭilān muṇḍān gaḥ ajina ambara vāsasaḥ || 4.15 ||

मध्य पहरे में उसने रावण के अनेक गुप्तचरों को देखा - कुछ दीक्षित, कुछ जटाधारी, कुछ मुंडित सिर वाले, गोचर्म और वल्कल वस्त्र पहने हुए।

श्लोक 16 (sundara.4.16)

दर्भ मुष्टि प्रहरणान् अग्नि कुण्ड आयुधामः तथा । कूट मुद्गर पाणीमः च दण्ड आयुध धरान् अपि ॥ 4.16 ॥

darbha muṣṭi praharaṇān agni kuṇḍa āyudhāmaḥ tathā | kūṭa mudgara pāṇīmaḥ ca daṇḍa āyudha dharān api || 4.16 ||

दर्भ की मुट्ठी को हथियार के रूप में लिए हुए, तथा अग्निकुंड को भी; कुछ हाथों में मुद्गर और गदा लिए, कुछ दंड धारण किए हुए।

श्लोक 17 (sundara.4.17)

एक अक्ष अनेक कर्णामः च चलल् लम्ब पयः धरान् । करालान् भुग्न वक्त्रामः च विकटान् वामनामः तथा ॥ 4.17 ॥

eka akṣa aneka karṇāmaḥ ca calal lamba payaḥ dharān | karālān bhugna vaktrāmaḥ ca vikaṭān vāmanāmaḥ tathā || 4.17 ||

कुछ एक आँख वाले, कुछ अनेक कानों वाले, हिलते हुए लटकते पेटों वाले; भयानक, टेढ़े मुख वाले, विकट रूप वाले और बौने भी।

श्लोक 18 (sundara.4.18)

धन्विनः खड्गिनः चैव शतघ्नी मुसल आयुधान् । परिघ उत्तम हस्तामः च विचित्र कवच उज्ज्वलान् ॥ 4.18 ॥

dhanvinaḥ khaḍginaḥ caiva śataghnī musala āyudhān | parigha uttama hastāmaḥ ca vicitra kavaca ujjvalān || 4.18 ||

धनुर्धारी, तलवारधारी, गदा और मूसल हथियार लिए हुए, बड़े परिघ हाथों में लिए हुए, विचित्र कवचों से चमकते हुए।

श्लोक 19 (sundara.4.19)

नातिस्थूलान् नातिकृशान् नातिदीर्घ अतिह्रस्वकान् । नातिगौरान्नातिकृष्णान्नातिकुब्जान्न वामनान् ॥ 4.19 ॥

nātisthūlān nātikṛśān nātidīrgha atihrasvakān | nātigaurānnātikṛṣṇānnātikubjānna vāmanān || 4.19 ||

न अत्यंत स्थूल, न अत्यंत कृश, न अत्यंत लंबे, न अत्यंत नाटे, न अत्यंत गोरे, न अत्यंत काले, न कुबड़े, न बौने -

श्लोक 20 (sundara.4.20)

विरूपान् बहु रूपामः च सुरूपामः च सुवर्चसः । ध्वजीन् पताकिनश्चैव ददर्श विविधायुधान् ॥ 4.20 ॥

virūpān bahu rūpāmaḥ ca surūpāmaḥ ca suvarcasaḥ | dhvajīn patākinaścaiva dadarśa vividhāyudhān || 4.20 ||

- विरूप और बहुरूप, तथा सुरूप और तेजस्वी भी - उसने ध्वजा और पताका धारण किए हुए तथा नाना प्रकार के शस्त्र लिए हुए देखा।

श्लोक 21 (sundara.4.21)

शक्ति वृक्ष आयुधामः चैव पट्टिश अशनि धारिणः । क्षेपणी पाश हस्तामः च ददर्श स महा कपिः ॥ 4.21 ॥

śakti vṛkṣa āyudhāmaḥ caiva paṭṭiśa aśani dhāriṇaḥ | kṣepaṇī pāśa hastāmaḥ ca dadarśa sa mahā kapiḥ || 4.21 ||

भाले और वृक्षों को हथियार के रूप में लिए हुए, पट्टिश और वज्र धारण किए हुए, हाथों में गोफन और फंदे लिए हुए - यह सब उस महाकपि ने देखा।

श्लोक 22 (sundara.4.22)

स्रग्विणः त्व् अनुलिप्तामः च वर आभरण भूषितान् । नानावेषसमायुक्तान्यथास्वैरगतान् बहून् ॥ 4.22 ॥

sragviṇaḥ tv anuliptāmaḥ ca vara ābharaṇa bhūṣitān | nānāveṣasamāyuktānyathāsvairagatān bahūn || 4.22 ||

मालाधारी, चंदनलिप्त, उत्तम आभूषणों से सुसज्जित, नाना वेष धारण किए हुए, स्वच्छंद घूमते हुए बहुत से लोग।

श्लोक 23 (sundara.4.23)

तीक्ष्ण शूल धरामः चैव वज्रिणः च महा बलान् । शत साहस्रम् अव्यग्रम् आरक्षम् मध्यमम् कपिः ॥ 4.23 ॥

tīkṣṇa śūla dharāmaḥ caiva vajriṇaḥ ca mahā balān | śata sāhasram avyagram ārakṣam madhyamam kapiḥ || 4.23 ||

तीक्ष्ण त्रिशूलधारी और वज्र-सम महाबली पुरुष - एक लाख की संख्या में सतर्क वह मध्यम रक्षक-सेना - उस वानर ने देखी।

श्लोक 24 (sundara.4.24)

रक्षोधिपतिनिर्दिष्टम् ददर्शान्तःपुराग्रतः । स तदा तद्गृहम् दृष्ट्वा महाहाटकतोरणम् ॥ 4.24 ॥

rakṣodhipatinirdiṣṭam dadarśāntaḥpurāgrataḥ | sa tadā tadgṛham dṛṣṭvā mahāhāṭakatoraṇam || 4.24 ||

राक्षसाधिपति की आज्ञा से नियुक्त उस सेना को हनुमान ने अंतःपुर के सामने खड़ी देखी। तब उस विशाल स्वर्ण-तोरण वाले भवन को देखकर -

श्लोक 25 (sundara.4.25)

राक्षसेन्द्रस्य विख्यातमद्रिमूर्ध्नि प्रतिष्ठितम् । पुण्डरीकावतंसाभिः परिखाभिरलम्कृतम् ॥ 4.25 ॥

rākṣasendrasya vikhyātamadrimūrdhni pratiṣṭhitam | puṇḍarīkāvataṃsābhiḥ parikhābhiralamkṛtam || 4.25 ||

- राक्षसेंद्र का वह विख्यात भवन, पर्वत-शिखर पर स्थित, श्वेत कमलों से सुशोभित खाइयों से अलंकृत -

श्लोक 26 (sundara.4.26)

प्राकार आवृतम् अत्यन्तम् ददर्श स महा कपिः । त्रिविष्टप निभम् दिव्यम् दिव्य नाद विनादितम् ॥ 4.26 ॥

prākāra āvṛtam atyantam dadarśa sa mahā kapiḥ | triviṣṭapa nibham divyam divya nāda vināditam || 4.26 ||

- सब ओर से प्राकार से घिरा हुआ, उस महाकपि ने देखा; वह दिव्य भवन स्वर्गलोक के समान था, दिव्य संगीत से गुंजायमान -

श्लोक 27 (sundara.4.27)

वाजि हेषित सम्घुष्टम् नादितम् भूषणैः तथा । रथैः यानैः विमानैः च तथा गज हयैः शुभैः ॥ 4.27 ॥

vāji heṣita samghuṣṭam nāditam bhūṣaṇaiḥ tathā | rathaiḥ yānaiḥ vimānaiḥ ca tathā gaja hayaiḥ śubhaiḥ || 4.27 ||

- घोड़ों की हिनहिनाहट और आभूषणों की झंकार से भी गूँजता हुआ, रथों, यानों और विमानों से, तथा मंगलकारी गजों और अश्वों से युक्त -

श्लोक 28 (sundara.4.28)

वारणैः च चतुः दन्तैः श्वेत अभ्र निचय उपमैः । भूषितम् रुचिर द्वारम् मत्तैः च मृग पक्षिभिः ॥ 4.28 ॥

vāraṇaiḥ ca catuḥ dantaiḥ śveta abhra nicaya upamaiḥ | bhūṣitam rucira dvāram mattaiḥ ca mṛga pakṣibhiḥ || 4.28 ||

- श्वेत मेघों के समूह सदृश चार दाँतों वाले गजों से युक्त, तथा उस भवन के सुंदर द्वार पर उन्मत्त पशु-पक्षियों से भरा हुआ -

श्लोक 29 (sundara.4.29)

रक्षितं सुमहावीर्यैर्यातुधानैः सहस्रशः । राक्षस अधिपतेः गुप्तम् आविवेश गृहम् कपिः ॥ 4.29 ॥

rakṣitaṃ sumahāvīryairyātudhānaiḥ sahasraśaḥ | rākṣasa adhipateḥ guptam āviveśa gṛham kapiḥ || 4.29 ||

अत्यंत पराक्रमी यातुधानों के सहस्रों द्वारा सुरक्षित, वह वानर राक्षसाधिपति के गुप्त निवास में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 30 (sundara.4.30)

सहेमजाम्बूनदचक्रवाळम् । महार्ह मुक्तामणिभूषितान्तम् । परार्थ्यकालागुरुचन्दनाक्तं । स रावणान्तःपुरमाविवेश ॥ 4.30 ॥

sahemajāmbūnadacakravāḷam | mahārha muktāmaṇibhūṣitāntam | parārthyakālāgurucandanāktaṃ | sa rāvaṇāntaḥpuramāviveśa || 4.30 ||

स्वर्ण और जांबूनद-स्वर्ण से बने आँगन वाले, बहुमूल्य मोतियों और मणियों से सुशोभित भीतरी भाग वाले, अमूल्य अगुरु और चंदन से सुगंधित उस भवन में - वह रावण के अंतःपुर में प्रविष्ट हुआ।

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