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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 41

प्रमदावन का विध्वंस

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श्लोक 1 (sundara.41.1)

स च वाग्भिः प्रशस्ताभिर्गमिष्यन् पूजितस्तया। तस्माद् देशादपाक्रम्य चिन्तयामास वानरः ॥ 41.1 ॥

sa ca vāgbhiḥ praśastābhirgamiṣyan pūjitastayā| tasmād deśādapākramya cintayāmāsa vānaraḥ || 41.1 ||

जाने को उद्यत उस वानर का उन प्रशंसनीय वचनों से सम्मान करने के पश्चात्, वह उस स्थान से कुछ दूर हटकर मन ही मन सोचने लगा।

श्लोक 2 (sundara.41.2)

अल्पशेषमिदं कार्यं दृष्टेयमसितेक्षणा। त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते ॥ 41.2 ॥

alpaśeṣamidaṃ kāryaṃ dṛṣṭeyamasitekṣaṇā| trīnupāyānatikramya caturtha iha dṛśyate || 41.2 ||

"इस असितनयना सीता का दर्शन हो जाने से अब मेरे कार्य का बहुत थोड़ा भाग शेष रह गया है। तीन उपायों को छोड़कर अब यहाँ चौथा उपाय ही दिखाई देता है।"

श्लोक 3 (sundara.41.3)

न साम रक्षःसु गुणाय कल्पते न दानमर्थोपचितेषु युज्यते। न भेदसाध्या बलदर्पिता जनाः पराक्रमस्त्वेष ममेह रोचते ॥ 41.3 ॥

na sāma rakṣaḥsu guṇāya kalpate na dānamarthopaciteṣu yujyate| na bhedasādhyā baladarpitā janāḥ parākramastveṣa mameha rocate || 41.3 ||

"राक्षसों पर सामनीति काम नहीं करती, जो पहले से ही समृद्ध हैं उन पर दान का प्रयोग व्यर्थ है, और बलगर्वित जनों में भेदनीति सिद्ध नहीं होती — मुझे तो यहाँ केवल पराक्रम ही रुचता है।"

श्लोक 4 (sundara.41.4)

न चास्य कार्यस्य पराक्रमादृते विनिश्चयः कश्चिदिहोपपद्यते। हतप्रवीराश्च रणे तु राक्षसाः कथंचिदीयुर्यदिहाद्य मार्दवम् ॥ 41.4 ॥

na cāsya kāryasya parākramādṛte viniścayaḥ kaścidihopapadyate| hatapravīrāśca raṇe tu rākṣasāḥ kathaṃcidīyuryadihādya mārdavam || 41.4 ||

"और पराक्रम के बिना इस कार्य में कोई भी निश्चय यहाँ सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि यदि इनके प्रमुख वीर किसी प्रकार युद्ध में मारे जाएँ, तो ये राक्षस अवश्य ही दुर्बल पड़ जाएँगे।"

श्लोक 5 (sundara.41.5)

कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्। पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति ॥ 41.5 ॥

kārye karmaṇi nirvṛtte yo bahūnyapi sādhayet| pūrvakāryāvirodhena sa kāryaṃ kartumarhati || 41.5 ||

"जिसे कोई कार्य सौंपा गया हो, वह उस मूल कार्य के विरोध में गए बिना यदि और भी अनेक कार्य सिद्ध कर ले, तो वही उस कार्य को करने का अधिकारी है।"

श्लोक 6 (sundara.41.6)

न ह्येकः साधको हेतुः स्वल्पस्यापीह कर्मणः। यो ह्यर्थं बहुधा वेद स समर्थोऽर्थसाधने ॥ 41.6 ॥

na hyekaḥ sādhako hetuḥ svalpasyāpīha karmaṇaḥ| yo hyarthaṃ bahudhā veda sa samartho'rthasādhane || 41.6 ||

"किसी छोटे से छोटे कार्य को भी सिद्ध करने का कोई एक ही साधन पर्याप्त नहीं होता; जो किसी प्रयोजन को अनेक प्रकार से जानता है, वही उसे सिद्ध करने में समर्थ होता है।"

श्लोक 7 (sundara.41.7)

इहैव तावत्कृतनिश्चयो ह्यहं व्रजेयमद्य प्लवगेश्वरालयम्। परात्मसम्मर्दविशेषतत्त्ववित् ततः कृतं स्यान्मम भर्तृशासनम् ॥ 41.7 ॥

ihaiva tāvatkṛtaniścayo hyahaṃ vrajeyamadya plavageśvarālayam| parātmasammardaviśeṣatattvavit tataḥ kṛtaṃ syānmama bhartṛśāsanam || 41.7 ||

"यदि मैं यहीं शत्रु और अपने बल के भेद का निश्चयपूर्वक ज्ञान करके ही वानरेश्वर सुग्रीव के आवास को जाऊँ, तभी मेरे स्वामी की आज्ञा वस्तुतः मुझसे पूर्ण हुई मानी जाएगी।"

श्लोक 8 (sundara.41.8)

कथं नु खल्वद्य भवेत् सुखागतं प्रसह्य युद्धं मम राक्षसैः सह। तथैव खल्वात्मबलं च सारवत् समानयेन्मां च रणे दशाननः ॥ 41.8 ॥

kathaṃ nu khalvadya bhavet sukhāgataṃ prasahya yuddhaṃ mama rākṣasaiḥ saha| tathaiva khalvātmabalaṃ ca sāravat samānayenmāṃ ca raṇe daśānanaḥ || 41.8 ||

"अब राक्षसों के साथ मेरा यह युद्ध किस प्रकार सुखपूर्वक और सार्थक हो सकेगा? मेरा बल कैसे सफल होगा? और वह दशानन युद्ध में मुझे किस भाँति महत्त्व देगा?"

श्लोक 9 (sundara.41.9)

ततः समासाद्य रणे दशाननं समन्त्रिवर्गं सबलं सयायिनम्। हृदि स्थितं तस्य मतं बलं च सुखेन मत्वाहमितः पुनर्व्रजे ॥ 41.9 ॥

tataḥ samāsādya raṇe daśānanaṃ samantrivargaṃ sabalaṃ sayāyinam| hṛdi sthitaṃ tasya mataṃ balaṃ ca sukhena matvāhamitaḥ punarvraje || 41.9 ||

"अतः मैं युद्ध में मंत्रिवर्ग तथा चढ़ी हुई सेना सहित उस दशानन का सामना करके, उसके हृदय में स्थित अभिप्राय और बल को भलीभाँति जानकर ही यहाँ से सुखपूर्वक लौटूँगा।"

श्लोक 10 (sundara.41.10)

इदमस्य नृशंसस्य नन्दनोपममुत्तमम्। वनं नेत्रमनःकान्तं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ 41.10 ॥

idamasya nṛśaṃsasya nandanopamamuttamam| vanaṃ netramanaḥkāntaṃ nānādrumalatāyutam || 41.10 ||

"इस क्रूर रावण का यह उत्तम वन, नन्दनवन के समान, नेत्रों और मन को आनंद देने वाला, नाना प्रकार के वृक्षों और लताओं से युक्त है —"

श्लोक 11 (sundara.41.11)

इदं विध्वंसयिष्यामि शुष्कं वनमिवानलः। अस्मिन् भग्ने ततः कोपं करिष्यति स रावणः ॥ 41.11 ॥

idaṃ vidhvaṃsayiṣyāmi śuṣkaṃ vanamivānalaḥ| asmin bhagne tataḥ kopaṃ kariṣyati sa rāvaṇaḥ || 41.11 ||

"— इसे मैं ऐसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे अग्नि सूखे वन को भस्म कर देती है। और जब यह टूट जाएगा, तो रावण अवश्य ही क्रोधित होगा।"

श्लोक 12 (sundara.41.12)

ततो महत्साश्वमहारथद्विपं बलं समानेष्यति राक्षसाधिपः। त्रिशूलकालायसपट्टिशायुधं ततो महद्युद्धमिदं भविष्यति ॥ 41.12 ॥

tato mahatsāśvamahārathadvipaṃ balaṃ samāneṣyati rākṣasādhipaḥ| triśūlakālāyasapaṭṭiśāyudhaṃ tato mahadyuddhamidaṃ bhaviṣyati || 41.12 ||

"तब वह राक्षसाधिपति घोड़ों, महारथों और हाथियों से युक्त, त्रिशूल, लोहे की गदाओं और पट्टिशों से सुसज्जित एक विशाल सेना एकत्र करेगा — और तब यहाँ एक महान युद्ध छिड़ जाएगा।"

श्लोक 13 (sundara.41.13)

अहं च तैः संयति चण्डविक्रमैः समेत्य रक्षोभिरभङ्गविक्रमः। निहत्य तद् रावणचोदितं बलं सुखं गमिष्यामि हरीश्वरालयम् ॥ 41.13 ॥

ahaṃ ca taiḥ saṃyati caṇḍavikramaiḥ sametya rakṣobhirabhaṅgavikramaḥ| nihatya tad rāvaṇacoditaṃ balaṃ sukhaṃ gamiṣyāmi harīśvarālayam || 41.13 ||

"और मैं उस संग्राम में उन प्रचंडविक्रमी राक्षसों से भिड़कर, अपने अखंडित पराक्रम से रावण द्वारा भेजी गई उस सेना का वध करके, सुखपूर्वक वानरराज सुग्रीव के आवास को जाऊँगा।"

श्लोक 14 (sundara.41.14)

ततो मारुतवत् क्रुद्धो मारुतिर्भीमविक्रमः। ऊरुवेगेन महता द्रुमान् क्षेप्तुमथारभत् ॥ 41.14 ॥

tato mārutavat kruddho mārutirbhīmavikramaḥ| ūruvegena mahatā drumān kṣeptumathārabhat || 41.14 ||

तब वायु के समान क्रुद्ध और भीषण पराक्रमी मारुति अपनी जंघाओं के प्रबल वेग से वृक्षों को उखाड़ कर फेंकने लगे।

श्लोक 15 (sundara.41.15)

ततस्तद्धनुमान् वीरो बभञ्ज प्रमदावनम्। मत्तद्विजसमाघुष्टं नानाद्रुमलतायुतम् ॥ 41.15 ॥

tatastaddhanumān vīro babhañja pramadāvanam| mattadvijasamāghuṣṭaṃ nānādrumalatāyutam || 41.15 ||

तत्पश्चात् उस वीर हनुमान ने उस प्रमदावन को, जो मतवाले पक्षियों के कलरव से गूँज रहा था और नाना प्रकार के वृक्षों-लताओं से युक्त था, तोड़-फोड़ डाला।

श्लोक 16 (sundara.41.16)

तद्वनं मथितैर्वृक्षैर्भिन्नैश्च सलिलाशयैः। चूर्णितैः पर्वताग्रैश्च बभूवाप्रियदर्शनम् ॥ 41.16 ॥

tadvanaṃ mathitairvṛkṣairbhinnaiśca salilāśayaiḥ| cūrṇitaiḥ parvatāgraiśca babhūvāpriyadarśanam || 41.16 ||

उखड़े हुए वृक्षों, टूटे हुए जलाशयों और चूर-चूर हुए पर्वत-शिखरों से युक्त वह वन देखने में अप्रिय हो गया।

श्लोक 17 (sundara.41.17)

नानाशकुन्तविरुतैः प्रभिन्नसलिलाशयैः। ताम्रैः किसलयैः क्लान्तैः क्लान्तद्रुमलतायुतैः ॥ 41.17 ॥

nānāśakuntavirutaiḥ prabhinnasalilāśayaiḥ| tāmraiḥ kisalayaiḥ klāntaiḥ klāntadrumalatāyutaiḥ || 41.17 ||

नाना पक्षियों के कोलाहल से भरा, टूटे हुए जलाशयों वाला, कुम्हलाए हुए ताम्रवर्णी किसलयों वाला, और मुरझाई हुई लता-वृक्षावली वाला वह वन —

श्लोक 18 (sundara.41.18)

न बभौ तद् वनं तत्र दावानलहतं यथा। व्याकुलावरणा रेजुर्विह्वला इव ता लताः ॥ 41.18 ॥

na babhau tad vanaṃ tatra dāvānalahataṃ yathā| vyākulāvaraṇā rejurvihvalā iva tā latāḥ || 41.18 ||

— वह वन वहाँ वैसे ही शोभाहीन हो गया मानो दावाग्नि से दग्ध हो गया हो; अस्त-व्यस्त बाड़ों वाली वे लताएँ मानो व्याकुल होकर काँप रही थीं।

श्लोक 19 (sundara.41.19)

लतागृहैश्चित्रगृहैश्च सादितै- र्व्यालैर्मृगैरार्तरवैश्च पक्षिभिः। शिलागृहैरुन्मथितैस्तथा गृहैः प्रणष्टरूपं तदभून्महद् वनम् ॥ 41.19 ॥

latāgṛhaiścitragṛhaiśca sāditai- rvyālairmṛgairārtaravaiśca pakṣibhiḥ| śilāgṛhairunmathitaistathā gṛhaiḥ praṇaṣṭarūpaṃ tadabhūnmahad vanam || 41.19 ||

गिरी हुई लता-कुंजों और चित्रित भवनों से युक्त, पीड़ा से चीत्कार करते सर्पों, मृगों और पक्षियों से युक्त, तथा उखड़े हुए शिलागृहों और अन्य भवनों से युक्त वह विशाल वन अपना पूर्व रूप खो बैठा।

श्लोक 20 (sundara.41.20)

सा विह्वलाशोकलताप्रताना वनस्थली शोकलताप्रताना। जाता दशास्यप्रमदावनस्य कपेर्बलाद्धि प्रमदावनस्य ॥ 41.20 ॥

sā vihvalāśokalatāpratānā vanasthalī śokalatāpratānā| jātā daśāsyapramadāvanasya kaperbalāddhi pramadāvanasya || 41.20 ||

व्याकुल हुई वह वनस्थली, जिसकी अशोकलताओं की पंक्तियाँ अब शोक की लता-पंक्तियाँ बन गईं, वानर के बल से रावण के उसी प्रमदावन से मानो शोकवन में परिणत हो गई।

श्लोक 21 (sundara.41.21)

ततः स कृत्वा जगतीपतेर्महान् महद् व्यलीकं मनसो महात्मनः। युयुत्सुरेको बहुभिर्महाबलैः श्रिया ज्वलंस्तोरणमाश्रितः कपिः ॥ 41.21 ॥

tataḥ sa kṛtvā jagatīpatermahān mahad vyalīkaṃ manaso mahātmanaḥ| yuyutsureko bahubhirmahābalaiḥ śriyā jvalaṃstoraṇamāśritaḥ kapiḥ || 41.21 ||

तत्पश्चात् उस पृथ्वीपति के मन को इस प्रकार महान आघात पहुँचाकर, वह महान वानर अकेला ही अनेक महाबली राक्षसों से युद्ध करने की इच्छा से, तेज से प्रज्वलित होते हुए, तोरण पर जा बैठा।

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