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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 42

किंकर-वध

सर्ग 41सर्ग-सूचीसर्ग 43

श्लोक 1 (sundara.42.1)

ततः पक्षिनिनादेन वृक्षभङ्गस्वनेन च। बभूवुस्त्राससम्भ्रान्ताः सर्वे लङ्कानिवासिनः ॥ 42.1 ॥

tataḥ pakṣininādena vṛkṣabhaṅgasvanena ca| babhūvustrāsasambhrāntāḥ sarve laṅkānivāsinaḥ || 42.1 ||

तब पक्षियों की चीत्कार और वृक्षों के टूटने की ध्वनि से लंकावासी सब लोग भय से व्याकुल हो उठे।

श्लोक 2 (sundara.42.2)

विद्रुताश्च भयत्रस्ता विनेदुर्मृगपक्षिणः। रक्षसां च निमित्तानि क्रूराणि प्रतिपेदिरे ॥ 42.2 ॥

vidrutāśca bhayatrastā vinedurmṛgapakṣiṇaḥ| rakṣasāṃ ca nimittāni krūrāṇi pratipedire || 42.2 ||

भयभीत होकर इधर-उधर भागते मृग और पक्षी चीत्कार करने लगे, और राक्षसों को क्रूर अपशकुन दिखाई देने लगे।

श्लोक 3 (sundara.42.3)

ततो गतायां निद्रायां राक्षस्यो विकृताननाः। तद् वनं ददृशुर्भग्नं तं च वीरं महाकपिम् ॥ 42.3 ॥

tato gatāyāṃ nidrāyāṃ rākṣasyo vikṛtānanāḥ| tad vanaṃ dadṛśurbhagnaṃ taṃ ca vīraṃ mahākapim || 42.3 ||

तब निद्रा भंग होने पर उन विकृतमुखी राक्षसियों ने उस वन को भग्न देखा, और उस वीर महाकपि को भी देखा।

श्लोक 4 (sundara.42.4)

स ता दृष्ट्वा महाबाहुर्महासत्त्वो महाबलः। चकार सुमहद्रूपं राक्षसीनां भयावहम् ॥ 42.4 ॥

sa tā dṛṣṭvā mahābāhurmahāsattvo mahābalaḥ| cakāra sumahadrūpaṃ rākṣasīnāṃ bhayāvaham || 42.4 ||

उन्हें देखकर उस महाबाहु, महासत्त्व, महाबली वानर ने राक्षसियों को भयभीत करने वाला अत्यंत विशाल रूप धारण कर लिया।

श्लोक 5 (sundara.42.5)

ततस्तु गिरिसंकाशमतिकायं महाबलम्। राक्षस्यो वानरं दृष्ट्वा पप्रच्छुर्जनकात्मजाम् ॥ 42.5 ॥

tatastu girisaṃkāśamatikāyaṃ mahābalam| rākṣasyo vānaraṃ dṛṣṭvā papracchurjanakātmajām || 42.5 ||

तब उस पर्वताकार, विशालकाय, महाबली वानर को देखकर राक्षसियों ने जनकनन्दिनी सीता से पूछा —

श्लोक 6 (sundara.42.6)

कोऽयं कस्य कुतो वायं किंनिमित्तमिहागतः। कथं त्वया सहानेन संवादः कृत इत्युत ॥ 42.6 ॥

ko'yaṃ kasya kuto vāyaṃ kiṃnimittamihāgataḥ| kathaṃ tvayā sahānena saṃvādaḥ kṛta ityuta || 42.6 ||

"यह कौन है? किसका है? कहाँ से और किसलिए यहाँ आया है? तुम्हारा इससे यह वार्तालाप कैसे हुआ?"

श्लोक 7 (sundara.42.7)

आचक्ष्व नो विशालाक्षि मा भूत्ते सुभगे भयम्। संवादमसितापाङ्गि त्वया किं कृतवानयम् ॥ 42.7 ॥

ācakṣva no viśālākṣi mā bhūtte subhage bhayam| saṃvādamasitāpāṅgi tvayā kiṃ kṛtavānayam || 42.7 ||

"हे विशालाक्षि! हमें बताओ, तुम्हें कोई भय न हो, हे सुभगे! हे असितापांगि! इसने तुमसे क्या बातचीत की है?"

श्लोक 8 (sundara.42.8)

अथाब्रवीत् तदा साध्वी सीता सर्वाङ्गशोभना। रक्षसां कामरूपाणां विज्ञाने का गतिर्मम ॥ 42.8 ॥

athābravīt tadā sādhvī sītā sarvāṅgaśobhanā| rakṣasāṃ kāmarūpāṇāṃ vijñāne kā gatirmama || 42.8 ||

तब उस सर्वांगसुंदरी साध्वी सीता ने कहा — "कामरूपधारी इन राक्षसों को पहचानने का साधन मुझे कहाँ है?"

श्लोक 9 (sundara.42.9)

यूयमेवास्य जानीत योऽयं यद् वा करिष्यति। अहिरेव ह्यहेः पादान् विजानाति न संशयः ॥ 42.9 ॥

yūyamevāsya jānīta yo'yaṃ yad vā kariṣyati| ahireva hyaheḥ pādān vijānāti na saṃśayaḥ || 42.9 ||

"यह कौन है और क्या करेगा, यह तुम्हीं जान सकती हो; सर्प ही सर्प के पैरों को पहचानता है, इसमें संदेह नहीं।"

श्लोक 10 (sundara.42.10)

अहमप्यतिभीतास्मि नैव जानामि को ह्ययम्। वेद्मि राक्षसमेवैनं कामरूपिणमागतम् ॥ 42.10 ॥

ahamapyatibhītāsmi naiva jānāmi ko hyayam| vedmi rākṣasamevainaṃ kāmarūpiṇamāgatam || 42.10 ||

"मैं भी अत्यंत भयभीत हूँ; मैं सचमुच नहीं जानती कि यह कौन है। इतना ही जानती हूँ कि यह कोई कामरूपधारी राक्षस बनकर यहाँ आया है।"

श्लोक 11 (sundara.42.11)

वैदेह्या वचनं श्रुत्वा राक्षस्यो विद्रुता द्रुतम्। स्थिताः काश्चिद्गताः काश्चिद् रावणाय निवेदितुम् ॥ 42.11 ॥

vaidehyā vacanaṃ śrutvā rākṣasyo vidrutā drutam| sthitāḥ kāścida‍gatāḥ kāścid rāvaṇāya niveditum || 42.11 ||

वैदेही के वचन सुनकर राक्षसियाँ शीघ्रता से तितर-बितर हो गईं — कुछ वहीं रुक गईं, कुछ भाग गईं, और कुछ रावण को सूचित करने चली गईं।

श्लोक 12 (sundara.42.12)

रावणस्य समीपे तु राक्षस्यो विकृताननाः। विरूपं वानरं भीमं रावणाय न्यवेदिषुः ॥ 42.12 ॥

rāvaṇasya samīpe tu rākṣasyo vikṛtānanāḥ| virūpaṃ vānaraṃ bhīmaṃ rāvaṇāya nyavediṣuḥ || 42.12 ||

तब उन विकृतमुखी राक्षसियों ने रावण के समीप जाकर उसे उस भयंकर और विकराल वानर के विषय में निवेदन किया।

श्लोक 13 (sundara.42.13)

अशोकवनिकामध्ये राजन् भीमवपुः कपिः। सीतया कृतसंवादस्तिष्ठत्यमितविक्रमः ॥ 42.13 ॥

aśokavanikāmadhye rājan bhīmavapuḥ kapiḥ| sītayā kṛtasaṃvādastiṣṭhatyamitavikramaḥ || 42.13 ||

"हे राजन्! अशोकवाटिका के मध्य में भीमकाय, अमितविक्रम एक वानर खड़ा है, जिसने सीता से बातचीत की है।"

श्लोक 14 (sundara.42.14)

न च तं जानकी सीता हरिं हरिणलोचना। अस्माभिर्बहुधा पृष्टा निवेदयितुमिच्छति ॥ 42.14 ॥

na ca taṃ jānakī sītā hariṃ hariṇalocanā| asmābhirbahudhā pṛṣṭā nivedayitumicchati || 42.14 ||

"किंतु मृगनयनी जानकी सीता, हमारे द्वारा बार-बार पूछे जाने पर भी, उसके विषय में कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं।"

श्लोक 15 (sundara.42.15)

वासवस्य भवेद् दूतो दूतो वैश्रवणस्य वा। प्रेषितो वापि रामेण सीतान्वेषणकाङ्क्षया ॥ 42.15 ॥

vāsavasya bhaved dūto dūto vaiśravaṇasya vā| preṣito vāpi rāmeṇa sītānveṣaṇakāṅkṣayā || 42.15 ||

"वह वासव का दूत हो सकता है, या वैश्रवण का दूत, अथवा सीता की खोज में स्वयं राम द्वारा भेजा गया हो।"

श्लोक 16 (sundara.42.16)

तेनैवाद्भुतरूपेण यत्तत्तव मनोहरम्। नानामृगगणाकीर्णं प्रमृष्टं प्रमदावनम् ॥ 42.16 ॥

tenaivādbhutarūpeṇa yattattava manoharam| nānāmṛgagaṇākīrṇaṃ pramṛṣṭaṃ pramadāvanam || 42.16 ||

"उसी अद्भुत रूपधारी ने तुम्हारे उस मनोहर, नाना मृगगणों से व्याप्त प्रमदावन को पूर्णतः उजाड़ दिया है।"

श्लोक 17 (sundara.42.17)

न तत्र कश्चिदुद्देशो यस्तेन न विनाशितः। यत्र सा जानकी देवी स तेन न विनाशितः ॥ 42.17 ॥

na tatra kaściduddeśo yastena na vināśitaḥ| yatra sā jānakī devī sa tena na vināśitaḥ || 42.17 ||

"वहाँ ऐसा कोई स्थान नहीं जिसे उसने नष्ट न किया हो — केवल वह स्थान, जहाँ देवी जानकी बैठी हैं, उसने नष्ट नहीं किया।"

श्लोक 18 (sundara.42.18)

जानकीरक्षणार्थं वा श्रमाद् वा नोपलक्ष्यते। अथवा कः श्रमस्तस्य सैव तेनाभिरक्षिता ॥ 42.18 ॥

jānakīrakṣaṇārthaṃ vā śramād vā nopalakṣyate| athavā kaḥ śramastasya saiva tenābhirakṣitā || 42.18 ||

"जानकी की रक्षा के लिए ऐसा किया या थकान से, यह ज्ञात नहीं — अथवा उसे थकान ही कहाँ हो सकती है? यही कि उसने स्वयं उनकी रक्षा की है।"

श्लोक 19 (sundara.42.19)

चारुपल्लवपत्राढ्यं यं सीता स्वयमास्थिता। प्रवृद्धः शिंशपावृक्षः स च तेनाभिरक्षितः ॥ 42.19 ॥

cārupallavapatrāḍhyaṃ yaṃ sītā svayamāsthitā| pravṛddhaḥ śiṃśapāvṛkṣaḥ sa ca tenābhirakṣitaḥ || 42.19 ||

"वह सुंदर पल्लवों-पत्रों से सम्पन्न, विकसित शिंशपा वृक्ष, जिसके नीचे सीता स्वयं बैठी हैं, उसे भी उसने बचा रखा है।"

श्लोक 20 (sundara.42.20)

तस्योग्ररूपस्योग्रं त्वं दण्डमाज्ञातुमर्हसि। सीता सम्भाषिता येन वनं तेन विनाशितम् ॥ 42.20 ॥

tasyograrūpasyograṃ tvaṃ daṇḍamājñātumarhasi| sītā sambhāṣitā yena vanaṃ tena vināśitam || 42.20 ||

"जिसने सीता से वार्तालाप किया और वन को नष्ट किया, उस उग्ररूपधारी को तुम्हें उसके योग्य उग्र दंड देना चाहिए।"

श्लोक 21 (sundara.42.21)

मनःपरिगृहीतां तां तव रक्षोगणेश्वर। कः सीतामभिभाषेत यो न स्यात् त्यक्तजीवितः ॥ 42.21 ॥

manaḥparigṛhītāṃ tāṃ tava rakṣogaṇeśvara| kaḥ sītāmabhibhāṣeta yo na syāt tyaktajīvitaḥ || 42.21 ||

"हे राक्षसगणेश्वर! तुम्हारे मन में बसी हुई उस सीता से जो जीवन त्याग चुका हो, वही भला बात कर सकता है, अन्यथा कौन?"

श्लोक 22 (sundara.42.22)

राक्षसीनां वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः। चिताग्निरिव जज्वाल कोपसंवर्तितेक्षणः ॥ 42.22 ॥

rākṣasīnāṃ vacaḥ śrutvā rāvaṇo rākṣaseśvaraḥ| citāgniriva jajvāla kopasaṃvartitekṣaṇaḥ || 42.22 ||

राक्षसियों के वचन सुनकर राक्षसराज रावण चिता की अग्नि के समान प्रज्वलित हो उठा, उसकी आँखें क्रोध से घूमने लगीं।

श्लोक 23 (sundara.42.23)

तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः। दीप्ताभ्यामिव दीपाभ्यां सार्चिषः स्नेहबिन्दवः ॥ 42.23 ॥

tasya kruddhasya netrābhyāṃ prāpatannaśrubindavaḥ| dīptābhyāmiva dīpābhyāṃ sārciṣaḥ snehabindavaḥ || 42.23 ||

उस क्रुद्ध रावण की आँखों से ऐसे अश्रुबिंदु गिरने लगे मानो ज्वलंत दीपकों से अग्निसहित स्नेह की बूँदें टपक रही हों।

श्लोक 24 (sundara.42.24)

आत्मनः सदृशान् वीरान् किंकरान्नाम राक्षसान्। व्यादिदेश महातेजा निग्रहार्थं हनूमतः ॥ 42.24 ॥

ātmanaḥ sadṛśān vīrān kiṃkarānnāma rākṣasān| vyādideśa mahātejā nigrahārthaṃ hanūmataḥ || 42.24 ||

उस महातेजस्वी रावण ने हनुमान को पकड़ने के लिए अपने ही समान वीर, किंकर नामक राक्षसों को भेजा।

श्लोक 25 (sundara.42.25)

तेषामशीतिसाहस्रं किंकराणां तरस्विनाम्। निर्ययुर्भवनात् तस्मात् कूटमुद्गरपाणयः ॥ 42.25 ॥

teṣāmaśītisāhasraṃ kiṃkarāṇāṃ tarasvinām| niryayurbhavanāt tasmāt kūṭamuda‍garapāṇayaḥ || 42.25 ||

उन वेगवान् अस्सी हज़ार किंकरों ने, हाथों में लौह-मुद्गर लिए हुए,

श्लोक 26 (sundara.42.26)

महोदरा महादंष्ट्रा घोररूपा महाबलाः। युद्धाभिमनसः सर्वे हनूमद्ग्रहणोन्मुखाः ॥ 42.26 ॥

mahodarā mahādaṃṣṭrā ghorarūpā mahābalāḥ| yuddhābhimanasaḥ sarve hanūmad‍grahaṇonmukhāḥ || 42.26 ||

विशाल उदर वाले, विशाल दाढ़ों वाले, भीषण रूप वाले, महाबली, युद्ध की इच्छा से भरे और हनुमान को पकड़ने को उद्यत होकर उस भवन से निकल पड़े।

श्लोक 27 (sundara.42.27)

ते कपिं तं समासाद्य तोरणस्थमवस्थितम्। अभिपेतुर्महावेगाः पतंगा इव पावकम् ॥ 42.27 ॥

te kapiṃ taṃ samāsādya toraṇasthamavasthitam| abhipeturmahāvegāḥ pataṃgā iva pāvakam || 42.27 ||

तोरण पर खड़े उस वानर के निकट पहुँचकर वे अत्यंत वेग से उस पर टूट पड़े, जैसे पतंगे अग्नि पर टूट पड़ते हैं।

श्लोक 28 (sundara.42.28)

ते गदाभिर्विचित्राभिः परिघैः काञ्चनाङ्गदैः। आजग्मुर्वानरश्रेष्ठं शरैरादित्यसंनिभैः ॥ 42.28 ॥

te gadābhirvicitrābhiḥ parighaiḥ kāñcanāṅgadaiḥ| ājagmurvānaraśreṣṭhaṃ śarairādityasaṃnibhaiḥ || 42.28 ||

विचित्र गदाओं से, स्वर्णांगद-मंडित परिघों से, तथा सूर्य के समान तेजस्वी बाणों से उन्होंने उस वानरश्रेष्ठ पर आक्रमण किया।

श्लोक 29 (sundara.42.29)

मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः प्रासतोमरपाणयः। परिवार्य हनूमन्तं सहसा तस्थुरग्रतः ॥ 42.29 ॥

muda‍garaiḥ paṭṭiśaiḥ śūlaiḥ prāsatomarapāṇayaḥ| parivārya hanūmantaṃ sahasā tasthuragrataḥ || 42.29 ||

मुद्गरों, पट्टिशों, शूलों, प्रासों और तोमरों को हाथों में लिए हुए वे सहसा हनुमान को घेरकर उनके सामने आ खड़े हुए।

श्लोक 30 (sundara.42.30)

हनूमानपि तेजस्वी श्रीमान् पर्वतसंनिभः। क्षितावाविद्ध्य लाङ्गूलं ननाद च महाध्वनिम् ॥ 42.30 ॥

hanūmānapi tejasvī śrīmān parvatasaṃnibhaḥ| kṣitāvāviddhya lāṅgūlaṃ nanāda ca mahādhvanim || 42.30 ||

तेजस्वी, श्रीमान्, पर्वत के समान विशालकाय हनुमान ने भी अपनी पूँछ को भूमि पर पटककर महाध्वनि से गर्जना की।

श्लोक 31 (sundara.42.31)

स भूत्वा तु महाकायो हनूमान् मारुतात्मजः। पुच्छमास्फोटयामास लङ्कां शब्देन पूरयन् ॥ 42.31 ॥

sa bhūtvā tu mahākāyo hanūmān mārutātmajaḥ| pucchamāsphoṭayāmāsa laṅkāṃ śabdena pūrayan || 42.31 ||

तब उस पवनपुत्र हनुमान ने अपने शरीर को अत्यंत विशाल बनाकर अपनी पूँछ को इस प्रकार पटका कि उस ध्वनि से लंका गूँज उठी।

श्लोक 32 (sundara.42.32)

तस्यास्फोटितशब्देन महता चानुनादिना। पेतुर्विहङ्गा गगनादुच्चैश्चेदमघोषयत् ॥ 42.32 ॥

tasyāsphoṭitaśabdena mahatā cānunādinā| peturvihaṅgā gaganāduccaiścedamaghoṣayat || 42.32 ||

उस पूँछ पटकने की महान् प्रतिध्वनि से आकाश से पक्षी गिरने लगे; और तब उसने ऊँचे स्वर में यह वचन कहा —

श्लोक 33 (sundara.42.33)

जयत्यतिबलो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः। राजा जयति सुग्रीवो राघवेणाभिपालितः ॥ 42.33 ॥

jayatyatibalo rāmo lakṣmaṇaśca mahābalaḥ| rājā jayati sugrīvo rāghaveṇābhipālitaḥ || 42.33 ||

"अतिबली राम की जय हो, और महाबली लक्ष्मण की जय हो! राघव द्वारा रक्षित राजा सुग्रीव की जय हो!"

श्लोक 34 (sundara.42.34)

दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः। हनूमान् शत्रुसैन्यानां निहन्ता मारुतात्मजः ॥ 42.34 ॥

dāso'haṃ kosalendrasya rāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ| hanūmān śatrusainyānāṃ nihantā mārutātmajaḥ || 42.34 ||

"मैं कोसलेन्द्र अक्लिष्टकर्मा राम का दास हूँ — शत्रुसेनाओं का संहारक, पवनपुत्र हनुमान।"

श्लोक 35 (sundara.42.35)

न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्। शिलाभिश्च प्रहरतः पादपैश्च सहस्रशः ॥ 42.35 ॥

na rāvaṇasahasraṃ me yuddhe pratibalaṃ bhavet| śilābhiśca praharataḥ pādapaiśca sahasraśaḥ || 42.35 ||

"युद्ध में सहस्रों शिलाओं और वृक्षों से प्रहार करने वाले मुझसे सहस्र रावण भी टक्कर नहीं ले सकते।"

श्लोक 36 (sundara.42.36)

अर्दयित्वा पुरीं लङ्कामभिवाद्य च मैथिलीम्। समृद्धार्थो गमिष्यामि मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ 42.36 ॥

ardayitvā purīṃ laṅkāmabhivādya ca maithilīm| samṛddhārtho gamiṣyāmi miṣatāṃ sarvarakṣasām || 42.36 ||

"लंका पुरी को उजाड़कर और मैथिली को प्रणाम करके, समस्त राक्षसों के देखते-देखते ही मैं अपने कार्य को सफल कर लौट जाऊँगा।"

श्लोक 37 (sundara.42.37)

तस्य संनादशब्देन तेऽभवन् भयशङ्किताः। ददृशुश्च हनूमन्तं संध्यामेघमिवोन्नतम् ॥ 42.37 ॥

tasya saṃnādaśabdena te'bhavan bhayaśaṅkitāḥ| dadṛśuśca hanūmantaṃ saṃdhyāmeghamivonnatam || 42.37 ||

उसकी उस भीषण गर्जना की ध्वनि से वे राक्षस भयभीत हो उठे, और हनुमान को संध्याकालीन मेघ के समान ऊँचा देखने लगे।

श्लोक 38 (sundara.42.38)

स्वामिसंदेशनिःशङ्कास्ततस्ते राक्षसाः कपिम्। चित्रैः प्रहरणैर्भीमैरभिपेतुस्ततस्ततः ॥ 42.38 ॥

svāmisaṃdeśaniḥśaṅkāstataste rākṣasāḥ kapim| citraiḥ praharaṇairbhīmairabhipetustatastataḥ || 42.38 ||

तत्पश्चात् स्वामी के आदेश से निःशंक हुए वे राक्षस विचित्र और भयंकर शस्त्रों के साथ चारों ओर से उस वानर पर टूट पड़े।

श्लोक 39 (sundara.42.39)

स तैः परिवृतः शूरैः सर्वतः स महाबलः। आससादायसं भीमं परिघं तोरणाश्रितम् ॥ 42.39 ॥

sa taiḥ parivṛtaḥ śūraiḥ sarvataḥ sa mahābalaḥ| āsasādāyasaṃ bhīmaṃ parighaṃ toraṇāśritam || 42.39 ||

उन शूरवीरों से चारों ओर से घिरे हुए उस महाबली हनुमान ने तोरण के पास पड़े हुए एक भीषण लौह-परिघ को उठा लिया।

श्लोक 40 (sundara.42.40)

स तं परिघमादाय जघान रजनीचरान्। सपन्नगमिवादाय स्फुरन्तं विनतासुतः ॥ 42.40 ॥

sa taṃ parighamādāya jaghāna rajanīcarān| sapannagamivādāya sphurantaṃ vinatāsutaḥ || 42.40 ||

उस परिघ को लेकर उस वानर ने निशाचरों का वध किया, मानो फुफकारते हुए सर्प को पकड़े हुए हो।

श्लोक 41 (sundara.42.41)

विचचाराम्बरे वीरः परिगृह्य च मारुतिः। सूदयामास वज्रेण दैत्यानिव सहस्रदृक् ॥ 42.41 ॥

vicacārāmbare vīraḥ parigṛhya ca mārutiḥ| sūdayāmāsa vajreṇa daityāniva sahasradṛk || 42.41 ||

उस वीर मारुति ने उसी परिघ को लेकर आकाश में विचरण करते हुए उनका संहार किया, मानो सहस्रनेत्रधारी इंद्र वज्र से दैत्यों का वध कर रहे हों।

श्लोक 42 (sundara.42.42)

स हत्वा राक्षसान् वीरः किंकरान् मारुतात्मजः। युद्धाकाङ्क्षी महावीरस्तोरणं समवस्थितः ॥ 42.42 ॥

sa hatvā rākṣasān vīraḥ kiṃkarān mārutātmajaḥ| yuddhākāṅkṣī mahāvīrastoraṇaṃ samavasthitaḥ || 42.42 ||

उस किंकर राक्षसों का वध करने वाला वीर पवनपुत्र, युद्ध की इच्छा लिए हुए फिर से तोरण पर जा खड़ा हुआ।

श्लोक 43 (sundara.42.43)

ततस्तस्माद् भयान्मुक्ताः कतिचित्तत्र राक्षसाः। निहतान् किंकरान् सर्वान् रावणाय न्यवेदयन् ॥ 42.43 ॥

tatastasmād bhayānmuktāḥ katicittatra rākṣasāḥ| nihatān kiṃkarān sarvān rāvaṇāya nyavedayan || 42.43 ||

तब उस भय से बचे हुए कुछ राक्षसों ने जाकर रावण को सूचित किया कि सभी किंकर मारे गए हैं।

श्लोक 44 (sundara.42.44)

स राक्षसानां निहतं महाबलं निशम्य राजा परिवृत्तलोचनः। समादिदेशाप्रतिमं पराक्रमे प्रहस्तपुत्रं समरे सुदुर्जयम् ॥ 42.44 ॥

sa rākṣasānāṃ nihataṃ mahābalaṃ niśamya rājā parivṛttalocanaḥ| samādideśāpratimaṃ parākrame prahastaputraṃ samare sudurjayam || 42.44 ||

अपने महाबली राक्षससैन्य के मारे जाने का समाचार सुनकर, क्रोध से घूमते नेत्रों वाले उस राजा ने पराक्रम में अद्वितीय और युद्ध में दुर्जय प्रहस्तपुत्र को आज्ञा दी।

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