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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 62

मधुवन का विध्वंस

सर्ग 61सर्ग-सूचीसर्ग 63

श्लोक 1 (sundara.62.1)

तानुवाच हरिश्रेष्ठो हनूमान् वानरर्षभः। अव्यग्रमनसो यूयं मधु सेवत वानराः ॥ 62.1 ॥

tānuvāca hariśreṣṭho hanūmān vānararṣabhaḥ| avyagramanaso yūyaṃ madhu sevata vānarāḥ || 62.1 ||

वानरश्रेष्ठ हनुमान ने उनसे कहा -- "हे वानरो! तुम निश्चिन्त मन से मधुपान करो।

श्लोक 2 (sundara.62.2)

अहमावर्जयिष्यामि युष्माकं परिपन्थिनः। श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं हरीणां प्रवरोऽङ्गदः ॥ 62.2 ॥

ahamāvarjayiṣyāmi yuṣmākaṃ paripanthinaḥ| śrutvā hanūmato vākyaṃ harīṇāṃ pravaro'ṅgadaḥ || 62.2 ||

मैं स्वयं तुम्हारे विघ्न डालने वालों को रोक दूँगा। हनुमान के इस वचन को सुनकर वानरों में श्रेष्ठ अंगद ने

श्लोक 3 (sundara.62.3)

प्रत्युवाच प्रसन्नात्मा पिबन्तु हरयो मधु। अवश्यं कृतकार्यस्य वाक्यं हनुमतो मया ॥ 62.3 ॥

pratyuvāca prasannātmā pibantu harayo madhu| avaśyaṃ kṛtakāryasya vākyaṃ hanumato mayā || 62.3 ||

प्रसन्नचित्त होकर उत्तर दिया -- "वानर मधुपान करें। जिसने अपना कार्य निश्चित रूप से पूर्ण कर लिया है, उस हनुमान का वचन

श्लोक 4 (sundara.62.4)

अकार्यमपि कर्तव्यं किमङ्गं पुनरीदृशम्। अङ्गदस्य मुखाच्छ्रुत्वा वचनं वानरर्षभाः ॥ 62.4 ॥

akāryamapi kartavyaṃ kimaṅgaṃ punarīdṛśam| aṅgadasya mukhācchrutvā vacanaṃ vānararṣabhāḥ || 62.4 ||

"चाहे अनुचित कार्य ही क्यों न हो, फिर भी करना चाहिए -- फिर ऐसा शुभ कार्य तो अवश्य ही।" अंगद के मुख से यह वचन सुनकर वानरश्रेष्ठों ने

श्लोक 5 (sundara.62.5)

साधु साध्विति संहृष्टा वानराः प्रत्यपूजयन्। पूजयित्वाङ्गदं सर्वे वानरा वानरर्षभम् ॥ 62.5 ॥

sādhu sādhviti saṃhṛṣṭā vānarāḥ pratyapūjayan| pūjayitvāṅgadaṃ sarve vānarā vānararṣabham || 62.5 ||

अत्यन्त हर्षित होकर "साधु! साधु!" कहकर उनका सम्मान किया। वानरश्रेष्ठ अंगद का सम्मान करके सभी वानर

श्लोक 6 (sundara.62.6)

जग्मुर्मधुवनं यत्र नदीवेग इव द्रुमम्। ते प्रविष्टा मधुवनं पालानाक्रम्य शक्तितः ॥ 62.6 ॥

jagmurmadhuvanaṃ yatra nadīvega iva drumam| te praviṣṭā madhuvanaṃ pālānākramya śaktitaḥ || 62.6 ||

मधुवन की ओर ऐसे दौड़े जैसे नदी का वेग किसी वृक्ष की ओर दौड़ता है। मधुवन में प्रवेश करके उन्होंने बलपूर्वक रक्षकों को दबा दिया,

श्लोक 7 (sundara.62.7)

अतिसर्गाच्च पटवो दृष्ट्वा श्रुत्वा च मैथिलीम्। पपुः सर्वे मधु तदा रसवत् फलमाददुः ॥ 62.7 ॥

atisargācca paṭavo dṛṣṭvā śrutvā ca maithilīm| papuḥ sarve madhu tadā rasavat phalamādaduḥ || 62.7 ||

और अनुमति पाकर वे कुशल वानर, मैथिली का समाचार देख-सुनकर, सभी उस समय मधु पीने लगे तथा रसीले फल ग्रहण करने लगे।

श्लोक 8 (sundara.62.8)

उत्पत्य च ततः सर्वे वनपालान् समागतान्। ते ताडयन्तः शतशः सक्ता मधुवने तदा ॥ 62.8 ॥

utpatya ca tataḥ sarve vanapālān samāgatān| te tāḍayantaḥ śataśaḥ saktā madhuvane tadā || 62.8 ||

फिर सब उछल-उछलकर, मधुवन में मग्न होकर, वहाँ आए हुए रक्षकों को सैकड़ों की संख्या में पीटने लगे।

श्लोक 9 (sundara.62.9)

मधूनि द्रोणमात्राणि बाहुभिः परिगृह्य ते। पिबन्ति कपयः केचित् सङ्घशस्तत्र हृष्टवत् ॥ 62.9 ॥

madhūni droṇamātrāṇi bāhubhiḥ parigṛhya te| pibanti kapayaḥ kecit saṅghaśastatra hṛṣṭavat || 62.9 ||

कुछ वानर द्रोणभर मधु को अपनी बाँहों में भरकर वहाँ समूहों में हर्षपूर्वक पीने लगे।

श्लोक 10 (sundara.62.10)

घ्नन्ति स्म सहिताः सर्वे भक्षयन्ति तथापरे। केचित् पीत्वापविध्यन्ति मधूनि मधुपिङ्गलाः ॥ 62.10 ॥

ghnanti sma sahitāḥ sarve bhakṣayanti tathāpare| kecit pītvāpavidhyanti madhūni madhupiṅgalāḥ || 62.10 ||

सभी मिलकर मारपीट करने लगे, तो कुछ अन्य खाते रहे; मधु के समान पीत वर्ण वाले कुछ वानर पीकर मधु को इधर-उधर फेंकने लगे।

श्लोक 11 (sundara.62.11)

मधूच्छिष्टेन केचिच्च जघ्नुरन्योन्यमुत्कटाः। अपरे वृक्षमूलेषु शाखा गृह्य व्यवस्थिताः ॥ 62.11 ॥

madhūcchiṣṭena kecicca jaghnuranyonyamutkaṭāḥ| apare vṛkṣamūleṣu śākhā gṛhya vyavasthitāḥ || 62.11 ||

कुछ उन्मत्त वानर मधु की जूठन से एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे; कुछ अन्य वृक्षों की जड़ों में शाखा पकड़कर खड़े रहे,

श्लोक 12 (sundara.62.12)

अत्यर्थं च मदग्लानाः पर्णान्यास्तीर्य शेरते। उन्मत्तवेगाः प्लवगा मधुमत्ताश्च हृष्टवत् ॥ 62.12 ॥

atyarthaṃ ca madaglānāḥ parṇānyāstīrya śerate| unmattavegāḥ plavagā madhumattāśca hṛṣṭavat || 62.12 ||

और अत्यधिक मद से शिथिल होकर पत्ते बिछाकर लेट गए; वे वानर उन्मत्त गति वाले, मधु से मतवाले और हर्षित थे,

श्लोक 13 (sundara.62.13)

क्षिपन्त्यपि तथान्योन्यं स्खलन्ति च तथापरे। केचित् क्ष्वेडान् प्रकुर्वन्ति केचित् कूजन्ति हृष्टवत् ॥ 62.13 ॥

kṣipantyapi tathānyonyaṃ skhalanti ca tathāpare| kecit kṣveḍān prakurvanti kecit kūjanti hṛṣṭavat || 62.13 ||

एक-दूसरे पर वस्तुएँ फेंकते और कुछ लड़खड़ाते रहे; कुछ सिंहनाद करते तो कुछ हर्षपूर्वक कूजते रहे।

श्लोक 14 (sundara.62.14)

हरयो मधुना मत्ताः केचित् सुप्ता महीतले। धृष्टाः केचिद्धसन्त्यन्ये केचित् कुर्वन्ति चेतरत् ॥ 62.14 ॥

harayo madhunā mattāḥ kecit suptā mahītale| dhṛṣṭāḥ keciddhasantyanye kecit kurvanti cetarat || 62.14 ||

मधु से मतवाले वानरों में कुछ भूमि पर सो गए; कुछ ढीठ होकर हँसने लगे तो कुछ इसके विपरीत करने लगे।

श्लोक 15 (sundara.62.15)

कृत्वा केचिद् वदन्त्यन्ये केचिद् बुध्यन्ति चेतरत्। येऽप्यत्र मधुपालाः स्युः प्रेष्या दधिमुखस्य तु ॥ 62.15 ॥

kṛtvā kecid vadantyanye kecid budhyanti cetarat| ye'pyatra madhupālāḥ syuḥ preṣyā dadhimukhasya tu || 62.15 ||

कुछ कुछ करके कुछ और ही कहने लगे; कुछ ने ठीक विपरीत ही समझा। वहाँ जो मधु-रक्षक थे, जो दधिमुख के सेवक थे,

श्लोक 16 (sundara.62.16)

तेऽपि तैर्वानरैर्भीमैः प्रतिषिद्धा दिशो गताः। जानुभिश्च प्रघृष्टाश्च देवमार्गं च दर्शिताः ॥ 62.16 ॥

te'pi tairvānarairbhīmaiḥ pratiṣiddhā diśo gatāḥ| jānubhiśca praghṛṣṭāśca devamārgaṃ ca darśitāḥ || 62.16 ||

उन भयंकर वानरों द्वारा वे भी रोके जाकर दिशाओं में भगा दिए गए, घुटनों के बल घसीटे गए तथा देवमार्ग दिखा दिए गए।

श्लोक 17 (sundara.62.17)

अब्रुवन् परमोद्विग्ना गत्वा दधिमुखं वचः। हनूमता दत्तवरैर्हतं मधुवनं बलात्। वयं च जानुभिर्घृष्टा देवमार्गं च दर्शिताः ॥ 62.17 ॥

abruvan paramodvignā gatvā dadhimukhaṃ vacaḥ| hanūmatā dattavarairhataṃ madhuvanaṃ balāt| vayaṃ ca jānubhirghṛṣṭā devamārgaṃ ca darśitāḥ || 62.17 ||

अत्यन्त व्याकुल होकर उन्होंने दधिमुख के पास जाकर यह वचन कहा -- "हनुमान द्वारा वर पाए हुए वानरों ने बलपूर्वक मधुवन को उजाड़ दिया है, और हमें भी घुटनों के बल घसीटा गया तथा देवमार्ग दिखा दिया गया है।"

श्लोक 18 (sundara.62.18)

तदा दधिमुखः क्रुद्धो वनपस्तत्र वानरः। हतं मधुवनं श्रुत्वा सान्त्वयामास तान् हरीन् ॥ 62.18 ॥

tadā dadhimukhaḥ kruddho vanapastatra vānaraḥ| hataṃ madhuvanaṃ śrutvā sāntvayāmāsa tān harīn || 62.18 ||

तब वन-रक्षक वानर दधिमुख मधुवन के उजड़ने का समाचार सुनकर क्रोधित हो उठा और उन वानरों को सांत्वना देते हुए बोला --

श्लोक 19 (sundara.62.19)

एतागच्छत गच्छामो वानरानतिदर्पितान्। बलेनावारयिष्यामि प्रभुञ्जानान् मधूत्तमम् ॥ 62.19 ॥

etāgacchata gacchāmo vānarānatidarpitān| balenāvārayiṣyāmi prabhuñjānān madhūttamam || 62.19 ||

"आओ, चलें; जो अत्यन्त गर्वित वानर उत्तम मधु का उपभोग कर रहे हैं, उन्हें मैं बलपूर्वक रोकूँगा।"

श्लोक 20 (sundara.62.20)

श्रुत्वा दधिमुखस्येदं वचनं वानरर्षभाः। पुनर्वीरा मधुवनं तेनैव सहिता ययुः ॥ 62.20 ॥

śrutvā dadhimukhasyedaṃ vacanaṃ vānararṣabhāḥ| punarvīrā madhuvanaṃ tenaiva sahitā yayuḥ || 62.20 ||

दधिमुख के इस वचन को सुनकर वे वीर वानरश्रेष्ठ उसके साथ पुनः मधुवन को गए।

श्लोक 21 (sundara.62.21)

मध्ये चैषां दधिमुखः सुप्रगृह्य महातरुम्। समभ्यधावन् वेगेन सर्वे ते च प्लवंगमाः ॥ 62.21 ॥

madhye caiṣāṃ dadhimukhaḥ supragṛhya mahātarum| samabhyadhāvan vegena sarve te ca plavaṃgamāḥ || 62.21 ||

दधिमुख एक विशाल वृक्ष को कसकर पकड़कर उनके बीच वेग से दौड़ पड़ा, और वे सभी वानर भी वेग से दौड़ पड़े।

श्लोक 22 (sundara.62.22)

ते शिलाः पादपांश्चैव पाषाणानपि वानराः। गृहीत्वाभ्यागमन् क्रुद्धा यत्र ते कपिकुञ्जराः ॥ 62.22 ॥

te śilāḥ pādapāṃścaiva pāṣāṇānapi vānarāḥ| gṛhītvābhyāgaman kruddhā yatra te kapikuñjarāḥ || 62.22 ||

वे वानर शिलाओं, वृक्षों तथा पत्थरों को लेकर क्रोधपूर्वक वहाँ आए जहाँ वे गजतुल्य वानर थे।

श्लोक 23 (sundara.62.23)

ते स्वामिवचनं वीरा हृदयेष्ववसज्य तत्। त्वरया ह्यभ्यधावन्त सालतालशिलायुधाः ॥ 62.23 ॥

te svāmivacanaṃ vīrā hṛdayeṣvavasajya tat| tvarayā hyabhyadhāvanta sālatālaśilāyudhāḥ || 62.23 ||

वे वीर वानर अपने स्वामी के वचन को हृदय में धारण कर, साल, ताल वृक्षों तथा शिलाओं को हथियार बनाकर वेग से दौड़ पड़े।

श्लोक 24 (sundara.62.24)

वृक्षस्थांश्च तलस्थांश्च वानरान् बलदर्पितान्। अभ्यक्रामन्त ते वीराः पालाः तत्र सहस्रशः ॥ 62.24 ॥

vṛkṣasthāṃśca talasthāṃśca vānarān baladarpitān| abhyakrāmanta te vīrāḥ pālāḥ tatra sahasraśaḥ || 62.24 ||

तब उन वीर वन-रक्षकों ने सहस्रों की संख्या में, बल से उन्मत्त उन वानरों पर टूट पड़े जो वृक्षों पर तथा वृक्षों के नीचे स्थित थे।

श्लोक 25 (sundara.62.25)

बलान्निवारयन्तश्च आसेदुर्हरयो हरीन्। संदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ 62.25 ॥

balānnivārayantaśca āsedurharayo harīn| saṃdaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kruddhā bhartsayanto muhurmuhuḥ || 62.25 ||

बलपूर्वक रोकते हुए रक्षक वानर उन मदमत्त वानरों पर टूट पड़े; क्रोध से होंठ काटते हुए वे बार-बार धमकाने लगे।

श्लोक 26 (sundara.62.26)

अथ दृष्ट्वा दधिमुखं क्रुद्धं वानरपुङ्गवाः। अभ्यधावन्त वेगेन हनुमत्प्रमुखास्तदा ॥ 62.26 ॥

atha dṛṣṭvā dadhimukhaṃ kruddhaṃ vānarapuṅgavāḥ| abhyadhāvanta vegena hanumatpramukhāstadā || 62.26 ||

तब दधिमुख को क्रोधित देखकर हनुमान आदि वानरश्रेष्ठ वेगपूर्वक उसकी ओर दौड़े।

श्लोक 27 (sundara.62.27)

सवृक्षं तं महाबाहुमापतन्तं महाबलम्। वेगवन्तं विजग्राह बाहुभ्यां कुपितोऽङ्गदः ॥ 62.27 ॥

savṛkṣaṃ taṃ mahābāhumāpatantaṃ mahābalam| vegavantaṃ vijagrāha bāhubhyāṃ kupito'ṅgadaḥ || 62.27 ||

क्रोधित अंगद ने वृक्षसहित उस महाबाहु, महाबली, वेगपूर्वक झपटते हुए दधिमुख को दोनों भुजाओं से पकड़ लिया।

श्लोक 28 (sundara.62.28)

मदान्धो न कृपां चक्रे आर्यकोऽयं ममेति सः। अथैनं निष्पिपेषाशु वेगेन वसुधातले ॥ 62.28 ॥

madāndho na kṛpāṃ cakre āryako'yaṃ mameti saḥ| athainaṃ niṣpipeṣāśu vegena vasudhātale || 62.28 ||

क्रोध से अंधा हुआ अंगद यह सोचकर भी कि "यह मेरे पितामह के समान है" उस पर दया न करते हुए तत्काल उसे वेगपूर्वक भूमि पर पटक दिया।

श्लोक 29 (sundara.62.29)

स भग्नबाहूरुमुखो विह्वलः शोणितोक्षितः। प्रमुमोह महावीरो मुहूर्तं कपिकुञ्जरः ॥ 62.29 ॥

sa bhagnabāhūrumukho vihvalaḥ śoṇitokṣitaḥ| pramumoha mahāvīro muhūrtaṃ kapikuñjaraḥ || 62.29 ||

भुजाएँ, जाँघें और मुख टूट जाने से विह्वल, रक्त से सने हुए वह महावीर, गजतुल्य वानर, कुछ क्षण के लिए मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 30 (sundara.62.30)

स कथंचिद् विमुक्तस्तैर्वानरैर्वानरर्षभः। उवाचैकान्तमागत्य स्वान् भृत्यान् समुपागतान् ॥ 62.30 ॥

sa kathaṃcid vimuktastairvānarairvānararṣabhaḥ| uvācaikāntamāgatya svān bhṛtyān samupāgatān || 62.30 ||

उन वानरों से किसी प्रकार मुक्त होकर वह वानरश्रेष्ठ एकान्त में जाकर अपने पास आए हुए सेवकों से बोला --

श्लोक 31 (sundara.62.31)

एतागच्छत गच्छामो भर्ता नो यत्र वानरः। सुग्रीवो विपुलग्रीवः सह रामेण तिष्ठति ॥ 62.31 ॥

etāgacchata gacchāmo bhartā no yatra vānaraḥ| sugrīvo vipulagrīvaḥ saha rāmeṇa tiṣṭhati || 62.31 ||

"आओ, चलें वहाँ जहाँ हमारे स्वामी, विशाल ग्रीवा वाले वानरराज सुग्रीव, राम के साथ निवास करते हैं।"

श्लोक 32 (sundara.62.32)

सर्वं चैवाङ्गदे दोषं श्रावयिष्याम पार्थिवे। अमर्षी वचनं श्रुत्वा घातयिष्यति वानरान् ॥ 62.32 ॥

sarvaṃ caivāṅgade doṣaṃ śrāvayiṣyāma pārthive| amarṣī vacanaṃ śrutvā ghātayiṣyati vānarān || 62.32 ||

"हम राजा को अंगद के इस समस्त दोष का समाचार सुनाएँगे; हमारा वचन सुनकर क्रोधित राजा उन वानरों को मरवा डालेंगे।"

श्लोक 33 (sundara.62.33)

इष्टं मधुवनं ह्येतत् सुग्रीवस्य महात्मनः। पितृपैतामहं दिव्यं देवैरपि दुरासदम् ॥ 62.33 ॥

iṣṭaṃ madhuvanaṃ hyetat sugrīvasya mahātmanaḥ| pitṛpaitāmahaṃ divyaṃ devairapi durāsadam || 62.33 ||

"यह मधुवन महात्मा सुग्रीव को अत्यन्त प्रिय है, यह उनके पिता-पितामह से प्राप्त दिव्य वन है, जो देवताओं के लिए भी दुर्गम है।"

श्लोक 34 (sundara.62.34)

स वानरानिमान् सर्वान् मधुलुब्धान् गतायुषः। घातयिष्यति दण्डेन सुग्रीवः ससुहृज्जनान् ॥ 62.34 ॥

sa vānarānimān sarvān madhulubdhān gatāyuṣaḥ| ghātayiṣyati daṇḍena sugrīvaḥ sasuhṛjjanān || 62.34 ||

"मधु के लोभी और जिनकी आयु अब समाप्त हो चुकी है, ऐसे इन सब वानरों को उनके सुहृदों सहित सुग्रीव दण्ड देकर मरवा डालेंगे।"

श्लोक 35 (sundara.62.35)

वध्या ह्येते दुरात्मानो नृपाज्ञापरिपन्थिनः। अमर्षप्रभवो रोषः सफलो मे भविष्यति ॥ 62.35 ॥

vadhyā hyete durātmāno nṛpājñāparipanthinaḥ| amarṣaprabhavo roṣaḥ saphalo me bhaviṣyati || 62.35 ||

"राजा की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले ये दुरात्मा वध के योग्य ही हैं; असहनशीलता से उपजा मेरा यह क्रोध अब सफल होगा।"

श्लोक 36 (sundara.62.36)

एवमुक्त्वा दधिमुखो वनपालान् महाबलः। जगाम सहसोत्पत्य वनपालैः समन्वितः ॥ 62.36 ॥

evamuktvā dadhimukho vanapālān mahābalaḥ| jagāma sahasotpatya vanapālaiḥ samanvitaḥ || 62.36 ||

ऐसा कहकर महाबली दधिमुख वन-रक्षकों के साथ तत्काल उड़कर वहाँ से चल पड़ा।

श्लोक 37 (sundara.62.37)

निमेषान्तरमात्रेण स हि प्राप्तो वनालयः। सहस्रांशुसुतो धीमान् सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ 62.37 ॥

nimeṣāntaramātreṇa sa hi prāpto vanālayaḥ| sahasrāṃśusuto dhīmān sugrīvo yatra vānaraḥ || 62.37 ||

क्षणभर में ही वह वहाँ जा पहुँचा जहाँ सूर्यपुत्र बुद्धिमान वानरराज सुग्रीव निवास करते थे।

श्लोक 38 (sundara.62.38)

रामं च लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च। समप्रतिष्ठां जगतीमाकाशान्निपपात ह ॥ 62.38 ॥

rāmaṃ ca lakṣmaṇaṃ caiva dṛṣṭvā sugrīvameva ca| samapratiṣṭhāṃ jagatīmākāśānnipapāta ha || 62.38 ||

राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव को देखकर वह आकाश से समतल भूमि पर उतर आया।

श्लोक 39 (sundara.62.39)

स निपत्य महावीरः सर्वैस्तैः परिवारितः। हरिर्दधिमुखः पालैः पालानां परमेश्वरः ॥ 62.39 ॥

sa nipatya mahāvīraḥ sarvaistaiḥ parivāritaḥ| harirdadhimukhaḥ pālaiḥ pālānāṃ parameśvaraḥ || 62.39 ||

वहाँ उतरकर वह महावीर दधिमुख, समस्त रक्षकों का परम स्वामी, अपने सभी साथियों से घिरा हुआ,

श्लोक 40 (sundara.62.40)

स दीनवदनो भूत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम्। सुग्रीवस्याशु तौ मूर्ध्ना चरणौ प्रत्यपीडयत् ॥ 62.40 ॥

sa dīnavadano bhūtvā kṛtvā śirasi cāñjalim| sugrīvasyāśu tau mūrdhnā caraṇau pratyapīḍayat || 62.40 ||

दीन मुख होकर, सिर पर अंजलि बाँधकर, तुरंत ही अपने मस्तक से सुग्रीव के दोनों चरणों को स्पर्श किया।

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