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सुन्दरकाण्ड · सर्ग 7

पुष्पक विमान का विस्मय

सर्ग 6सर्ग-सूचीसर्ग 8

श्लोक 1 (sundara.7.1)

स वेश्मजालं बलवान् ददर्श व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालम् । यथा महत्प्रावृषि मेघजालं विद्युत्पिनद्धं सविहङ्गजालम् ॥ 7.1 ॥

sa veśmajālaṃ balavān dadarśa vyāsaktavaidūryasuvarṇajālam | yathā mahatprāvṛṣi meghajālaṃ vidyutpinaddhaṃ savihaṅgajālam || 7.1 ||

उस बलवान् हनुमान् ने वैदूर्यमणियों और स्वर्ण से जड़े हुए भवनों के समूह को देखा, मानो वर्षा ऋतु में बिजली से युक्त और पक्षियों के झुंडों सहित मेघों का विशाल समूह हो।

श्लोक 2 (sundara.7.2)

निवेशनानां विविधाश्च शालाः प्रधानशङ्खायुधचापशालाः । मनोहराश्चापि पुनर्विशाला ददर्श वेश्माद्रिषु चन्द्रशालाः ॥ 7.2 ॥

niveśanānāṃ vividhāśca śālāḥ pradhānaśaṅkhāyudhacāpaśālāḥ | manoharāścāpi punarviśālā dadarśa veśmādriṣu candraśālāḥ || 7.2 ||

उन्होंने उन भवनों के विविध कक्षों को देखा - जिनमें शंख, अस्त्र और धनुष रखे रहते थे - तथा उन पर्वत-सदृश भवनों पर मनोहर एवं विशाल चन्द्रशालाएँ (छत पर बने कक्ष) भी देखीं।

श्लोक 3 (sundara.7.3)

गृहाणि नानावसुराजितानि देवासुरैश्चापि सुपूजितानि । सर्वैश्च दोषैः परिवर्जितानि कपिर्ददर्श स्वबलार्जितानि ॥ 7.3 ॥

gṛhāṇi nānāvasurājitāni devāsuraiścāpi supūjitāni | sarvaiśca doṣaiḥ parivarjitāni kapirdadarśa svabalārjitāni || 7.3 ||

वानर हनुमान् ने ऐसे भवन देखे जो विविध धन-सम्पत्ति से सुशोभित थे, देवताओं और असुरों द्वारा भी सम्मानित थे, सभी दोषों से रहित थे तथा जिन्हें उनके स्वामियों ने अपने ही पराक्रम से अर्जित किया था।

श्लोक 4 (sundara.7.4)

तानि प्रयत्नाभिसमाहितानि मयेन साक्षादिव निर्मितानि । महीतले सर्वगुणोत्तराणि ददर्श लंकाधिपतेर्गृहाणि ॥ 7.4 ॥

tāni prayatnābhisamāhitāni mayena sākṣādiva nirmitāni | mahītale sarvaguṇottarāṇi dadarśa laṃkādhipatergṛhāṇi || 7.4 ||

उन्होंने लंकापति के उन भवनों को देखा, जो अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक बनाए गए थे, मानो साक्षात् मय द्वारा ही निर्मित हों, तथा पृथ्वी पर सभी गुणों में सर्वश्रेष्ठ थे।

श्लोक 5 (sundara.7.5)

ततो ददर्शोच्छ्रितमेघरूपं मनोहरं काञ्चनचारुरूपम् । रक्षोऽधिपस्यात्मबलानुरूपं गृहोत्तमं ह्यप्रतिरूपरूपम् ॥ 7.5 ॥

tato dadarśocchritamegharūpaṃ manoharaṃ kāñcanacārurūpam | rakṣo'dhipasyātmabalānurūpaṃ gṛhottamaṃ hyapratirūparūpam || 7.5 ||

तत्पश्चात् उन्होंने उस सर्वोत्तम भवन को देखा, जो ऊँचे मेघ के समान, मनोहर, स्वर्ण के समान सुन्दर रूपवाला था, राक्षसराज के अपने बल के अनुरूप था तथा जिसका रूप अतुलनीय था।

श्लोक 6 (sundara.7.6)

महीतले स्वर्गमिव प्रकीर्णं श्रिया ज्वलन्तं बहुरत्नकीर्णम् । नानातरूणां कुसुमावकीर्णं गिरेरिवाग्रं रजसावकीर्णम् ॥ 7.6 ॥

mahītale svargamiva prakīrṇaṃ śriyā jvalantaṃ bahuratnakīrṇam | nānātarūṇāṃ kusumāvakīrṇaṃ girerivāgraṃ rajasāvakīrṇam || 7.6 ||

मानो पृथ्वी पर स्वर्ग ही बिखेर दिया गया हो, ऐसा वह भवन शोभा से देदीप्यमान, अनेक रत्नों से बिखरा हुआ तथा नाना वृक्षों के पुष्पों से आच्छादित था - मानो पर्वत-शिखर पराग से आच्छादित हो।

श्लोक 7 (sundara.7.7)

नारीप्रवेकैरिव दीप्यमानं तडिद्भिरम्भोधरमर्च्यमानम् । हंसप्रवेकैरिव वाह्यमानं श्रिया युतं खे सुकृतं विमानम् ॥ 7.7 ॥

nārīpravekairiva dīpyamānaṃ taḍidbhirambhodharamarcyamānam | haṃsapravekairiva vāhyamānaṃ śriyā yutaṃ khe sukṛtaṃ vimānam || 7.7 ||

वह सुन्दर विमान आकाश में शोभायुक्त होकर ऐसे प्रकाशमान था मानो सर्वश्रेष्ठ स्त्रियों से दीप्त हो, मानो मेघ बिजली से सुशोभित हो रहा हो, और मानो श्रेष्ठ हंसों द्वारा वहन किया जा रहा हो।

श्लोक 8 (sundara.7.8)

यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं यथा नभश्च ग्रहचन्द्रचित्रम् । ददर्श युक्तीकृतचारुमेघ- चित्रं विमानं बहुरत्नचित्रम् ॥ 7.8 ॥

yathā nagāgraṃ bahudhātucitraṃ yathā nabhaśca grahacandracitram | dadarśa yuktīkṛtacārumegha- citraṃ vimānaṃ bahuratnacitram || 7.8 ||

उन्होंने उस विमान को देखा, जो अनेक धातुओं से चित्रित पर्वत-शिखर के समान, तथा ग्रहों और चन्द्रमा से सुशोभित आकाश के समान था, कुशलता से बनाए गए सुन्दर मेघ-चित्रों से युक्त था और अनेक रत्नों से चित्रित था।

श्लोक 9 (sundara.7.9)

मही कृता पर्वतराजिपूर्णा शैलाः कृता वृक्षवितानपूर्णाः । वृक्षाः कृताः पुष्पवितानपूर्णाः पुष्पं कृतं केसरपत्रपूर्णम् ॥ 7.9 ॥

mahī kṛtā parvatarājipūrṇā śailāḥ kṛtā vṛkṣavitānapūrṇāḥ | vṛkṣāḥ kṛtāḥ puṣpavitānapūrṇāḥ puṣpaṃ kṛtaṃ kesarapatrapūrṇam || 7.9 ||

उसमें पर्वत-श्रेणियों से पूर्ण पृथ्वी बनाई गई थी, वृक्षों की छतरियों से भरे पर्वत बनाए गए थे, पुष्पों की छतरियों से भरे वृक्ष बनाए गए थे, तथा केसर और पंखुड़ियों से भरे पुष्प बनाए गए थे।

श्लोक 10 (sundara.7.10)

कृतानि वेश्मानि च पाण्डुराणि तथा सुपुष्पाण्यपि पुष्कराणि । पुनश्च पद्मानि सकेसराणि वनानि चित्राणि सरोवराणि ॥ 7.10 ॥

kṛtāni veśmāni ca pāṇḍurāṇi tathā supuṣpāṇyapi puṣkarāṇi | punaśca padmāni sakesarāṇi vanāni citrāṇi sarovarāṇi || 7.10 ||

वहाँ श्वेत भवन भी बनाए गए थे, तथा सुन्दर पुष्पोंवाले सरोवर, केसरयुक्त कमल तथा अद्भुत वन और जलाशय भी बनाए गए थे।

श्लोक 11 (sundara.7.11)

पुष्पाह्वयं नाम विराजमानं रत्नप्रभाभिश्च विघूर्णमानम् । वेश्मोत्तमानामपि चोच्चमानं महाकपिस्तत्र महाविमानम् ॥ 7.11 ॥

puṣpāhvayaṃ nāma virājamānaṃ ratnaprabhābhiśca vighūrṇamānam | veśmottamānāmapi coccamānaṃ mahākapistatra mahāvimānam || 7.11 ||

वहाँ उस महान् वानर ने पुष्पक नामक उस विशाल विमान को देखा, जो अत्यन्त शोभायमान था, रत्नों की आभा से जगमगा रहा था तथा सर्वश्रेष्ठ भवनों से भी ऊँचा था।

श्लोक 12 (sundara.7.12)

कृताश्च वैदूर्यमया विहङ्गा रूप्यप्रवालैश्च तथा विहङ्गाः । चित्राश्च नानावसुभिर्भुजङ्गा जात्यानुरूपास्तुरगाः शुभाङ्गाः ॥ 7.12 ॥

kṛtāśca vaidūryamayā vihaṅgā rūpyapravālaiśca tathā vihaṅgāḥ | citrāśca nānāvasubhirbhujaṅgā jātyānurūpāsturagāḥ śubhāṅgāḥ || 7.12 ||

वहाँ वैदूर्यमणि से बने पक्षी, चाँदी और मूँगे से बने पक्षी, नाना धातुओं से बने अद्भुत सर्प, तथा अपनी जाति के अनुरूप सुन्दर अंगोंवाले घोड़े भी बनाए गए थे।

श्लोक 13 (sundara.7.13)

प्रवालजाम्बूनदपुष्पपक्षाः सलीलमावर्जितजिह्मपक्षाः । कामस्य साक्षादिव भान्ति पक्षाः कृता विहङ्गाः सुमुखाः सुपक्षाः ॥ 7.13 ॥

pravālajāmbūnadapuṣpapakṣāḥ salīlamāvarjitajihmapakṣāḥ | kāmasya sākṣādiva bhānti pakṣāḥ kṛtā vihaṅgāḥ sumukhāḥ supakṣāḥ || 7.13 ||

मूँगे और स्वर्ण-पुष्पों से बने पंखोंवाले, क्रीड़ापूर्वक झुके हुए घुमावदार पंखोंवाले, सुन्दर मुखवाले और सुन्दर पंखोंवाले वे पक्षी मानो साक्षात् कामदेव के ही पंख हों, ऐसी शोभा दे रहे थे।

श्लोक 14 (sundara.7.14)

नियुज्यमानाश्च गजाः सुहस्ताः सकेसराश्चोत्पलपत्रहस्ताः । बभूव देवी च कृतासुहस्ता लक्ष्मीस्तथा पद्मिनि पद्महस्ता ॥ 7.14 ॥

niyujyamānāśca gajāḥ suhastāḥ sakesarāścotpalapatrahastāḥ | babhūva devī ca kṛtāsuhastā lakṣmīstathā padmini padmahastā || 7.14 ||

वहाँ सुन्दर सूंडोंवाले हाथी बनाए गए थे, जो केसरयुक्त कमल-पत्तियाँ अपनी सूंड में लिए हुए थे; और वहाँ कमलासना देवी लक्ष्मी की भी प्रतिमा थी, जो हाथ में कमल लिए हुई थीं।

श्लोक 15 (sundara.7.15)

इतीव तद्गृहमभिगम्य शोभनं सविस्मयो नगमिव चारुकन्दरम् । पुनश्च तत्परमसुगन्धि सुन्दरं हिमात्यये नगमिव चारुकन्दरम् ॥ 7.15 ॥

itīva tada‍gṛhamabhigamya śobhanaṃ savismayo nagamiva cārukandaram | punaśca tatparamasugandhi sundaraṃ himātyaye nagamiva cārukandaram || 7.15 ||

इस प्रकार उस सुन्दर भवन के निकट पहुँचकर, आश्चर्यचकित होकर - मानो सुन्दर गुफाओंवाले पर्वत के पास हों - तथा पुनः उस अत्यन्त सुगन्धित, सुन्दर स्थान को (देखकर) - मानो हेमन्त ऋतु के अन्त में सुन्दर गुफाओंवाला पर्वत हो।

श्लोक 16 (sundara.7.16)

ततः स तां कपिरभिपत्य पूजितां चरन् पुरीं दशमुखबाहुपालिताम् । अदृश्य तां जनकसुतां सुपूजितां सुदुःखितां पतिगुणवेगनिर्जिताम् ॥ 7.16 ॥

tataḥ sa tāṃ kapirabhipatya pūjitāṃ caran purīṃ daśamukhabāhupālitām | adṛśya tāṃ janakasutāṃ supūjitāṃ suduḥkhitāṃ patiguṇaveganirjitām || 7.16 ||

तत्पश्चात् वह वानर उस पूजित नगरी में पहुँचकर, जो दशमुख (रावण) की भुजाओं से सुरक्षित थी, विचरण करते हुए भी उस अत्यन्त पूजित, दुःखी तथा अपने पति के गुणों के वेग से सदा वशीभूत रहनेवाली जानकी को नहीं देख सके।

श्लोक 17 (sundara.7.17)

ततस्तदा बहुविधभावितात्मनः कृतात्मनो जनकसुतां सुवर्त्मनः । अपश्यतोऽभवदतिदुःखितं मनः सचक्षुषः प्रविचरतो महात्मनः ॥ 7.17 ॥

tatastadā bahuvidhabhāvitātmanaḥ kṛtātmano janakasutāṃ suvartmanaḥ | apaśyato'bhavadatiduḥkhitaṃ manaḥ sacakṣuṣaḥ pravicarato mahātmanaḥ || 7.17 ||

तत्पश्चात् उस महात्मा हनुमान् का, जिनका मन अनेक प्रकार से साधित था, जो आत्मसंयमी और सन्मार्गगामी थे तथा जो सतर्क नेत्रों से इधर-उधर विचरण कर रहे थे, जानकी को न देख पाने के कारण मन अत्यन्त दुःखी हो गया।

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