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उत्तरकाण्ड · सर्ग 101

भरत की गन्धर्वों पर विजय

सर्ग 100सर्ग-सूचीसर्ग 102

श्लोक 1 (uttara.101.1)

श्रुत्वा सेनापतिं प्राप्तं भरतं केकयाधिपः । युधाजिद्गार्ग्यसहितं परां प्रीतिमुपागमत् ।। ७.१०१.१ ।।

śrutvā senāpatiṃ prāptaṃ bharataṃ kekayādhipaḥ | yudhājidgārgyasahitaṃ parāṃ prītimupāgamat || 7.101.1 ||

यह सुनकर कि सेनापति भरत, युधाजित् और गार्ग्य के साथ आ पहुँचे हैं, केकयाधिपति को अत्यन्त प्रसन्नता हुई।

श्लोक 2 (uttara.101.2)

स निर्ययौ जनौघेन महता केकयाधिपः । त्वरमाणो ऽभिचक्राम गन्धर्वान्कामरूपिणः ।। ७.१०१.२ ।।

sa niryayau janaughena mahatā kekayādhipaḥ | tvaramāṇo 'bhicakrāma gandharvānkāmarūpiṇaḥ || 7.101.2 ||

वह केकयाधिपति एक विशाल जनसमूह के साथ निकल पड़ा और शीघ्रता करते हुए इच्छानुसार रूप धारण करने वाले गन्धर्वों की ओर बढ़ा।

श्लोक 3 (uttara.101.3)

भरतश्च युधाजिच्च समेतौ लघुविक्रमैः । गन्धर्वनगरं प्राप्तौ सबलौ सपदानुगौ ।। ७.१०१.३ ।।

bharataśca yudhājicca sametau laghuvikramaiḥ | gandharvanagaraṃ prāptau sabalau sapadānugau || 7.101.3 ||

भरत और युधाजित् दोनों, तीव्र गति वाले वीरों के साथ मिलकर, अपनी सेना और अनुचरों सहित गन्धर्वनगर जा पहुँचे।

श्लोक 4 (uttara.101.4)

श्रुत्वा तु भरतं प्राप्तं गन्धर्वास्ते समागताः । योद्धुकामा महावीर्या व्यनदन् वै समन्ततः ।। ७.१०१.४ ।।

śrutvā tu bharataṃ prāptaṃ gandharvāste samāgatāḥ | yoddhukāmā mahāvīryā vyanadan vai samantataḥ || 7.101.4 ||

भरत के आगमन का समाचार सुनकर, वे महापराक्रमी गन्धर्व एकत्र हो गए और युद्ध की इच्छा से चारों ओर गरज उठे।

श्लोक 5 (uttara.101.5)

ततः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् । सप्तरात्रं महाभीमं न चान्यतरयोर्जयः ।। ७.१०१.५ ।।

tataḥ samabhavadyuddhaṃ tumulaṃ romaharṣaṇam | saptarātraṃ mahābhīmaṃ na cānyatarayorjayaḥ || 7.101.5 ||

तब सात रात्रियों तक अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी युद्ध चला, किन्तु किसी भी पक्ष की विजय नहीं हुई।

श्लोक 6 (uttara.101.6)

खड्गशक्तिधनुर्ग्राहा नद्यः शोणितसंस्रवाः । नृकलेवरवाहिन्यः प्रवृत्ताः सर्वतोदिशम् ।। ७.१०१.६ ।।

khaḍgaśaktidhanurgrāhā nadyaḥ śoṇitasaṃsravāḥ | nṛkalevaravāhinyaḥ pravṛttāḥ sarvatodiśam || 7.101.6 ||

उस युद्ध में तलवारों, शक्तियों और धनुषों से भरी हुई तथा मनुष्यों के शवों को बहाती हुई रक्त की नदियाँ चारों दिशाओं में बहने लगीं।

श्लोक 7 (uttara.101.7)

ततो रामानुजः क्रुद्धः कालस्यास्त्रं सुदारुणम् । संवर्तं नाम भरतो गन्धर्वेष्वभ्यचोदयत् ।। ७.१०१.७ ।।

tato rāmānujaḥ kruddhaḥ kālasyāstraṃ sudāruṇam | saṃvartaṃ nāma bharato gandharveṣvabhyacodayat || 7.101.7 ||

तब क्रोधित होकर राम के अनुज भरत ने गन्धर्वों पर काल का अत्यन्त भयंकर अस्त्र, जिसका नाम संवर्त था, चलाया।

श्लोक 8 (uttara.101.8)

ते बद्धाः कालपाशेन संवर्तेन विदारिताः । क्षणेनाभिहतास्तेन तिस्रः कोट्यो महात्मनाम् ।। ७.१०१.८ ।।

te baddhāḥ kālapāśena saṃvartena vidāritāḥ | kṣaṇenābhihatāstena tisraḥ koṭyo mahātmanām || 7.101.8 ||

काल के पाश में बँधकर, संवर्त अस्त्र से विदीर्ण होकर, उन तीन करोड़ महान वीरों का उसी क्षण संहार हो गया।

श्लोक 9 (uttara.101.9)

तं घातं घोरसङ्काशं न स्मरन्ति दिवौकसः । निमेषान्तरमात्रेण तादृशानां महात्मनाम् ।। ७.१०१.९ ।।

taṃ ghātaṃ ghorasaṅkāśaṃ na smaranti divaukasaḥ | nimeṣāntaramātreṇa tādṛśānāṃ mahātmanām || 7.101.9 ||

देवता भी इतने महान पुरुषों के इस प्रकार के भीषण संहार को, जो एक क्षण मात्र में हुआ, स्मरण नहीं कर पाते।

श्लोक 10 (uttara.101.10)

हतेषु तेषु सर्वेषु भरतः केकयीसुतः । निवेशयामास तदा समृद्धे द्वे पुरोत्तमे ।। ७.१०१.१० ।।

hateṣu teṣu sarveṣu bharataḥ kekayīsutaḥ | niveśayāmāsa tadā samṛddhe dve purottame || 7.101.10 ||

उन सबके मारे जाने पर, कैकेयीपुत्र भरत ने वहाँ दो समृद्ध एवं श्रेष्ठ नगरों की स्थापना की।

श्लोक 11 (uttara.101.11)

तक्षं तक्षशिलायां तु पुष्कलं पुष्कलावते । गन्धर्वदेशे रुचिरे गान्धारविषये च सः ।। ७.१०१.११ ।।

takṣaṃ takṣaśilāyāṃ tu puṣkalaṃ puṣkalāvate | gandharvadeśe rucire gāndhāraviṣaye ca saḥ || 7.101.11 ||

उसने तक्ष को तक्षशिला में और पुष्कल को पुष्कलावत में, उस मनोहर गन्धर्वदेश अर्थात् गान्धार प्रदेश में स्थापित किया।

श्लोक 12 (uttara.101.12)

धनरत्नौघसङ्कीर्णे काननैरुपशोभिते । अन्योन्यसङ्घर्षकृते स्पर्धया गुणविस्तरैः ।। ७.१०१.१२ ।।

dhanaratnaughasaṅkīrṇe kānanairupaśobhite | anyonyasaṅgharṣakṛte spardhayā guṇavistaraiḥ || 7.101.12 ||

वे नगर प्रचुर धन-रत्नों से भरे हुए, वनों से सुशोभित तथा अपने-अपने गुणों के विस्तार में परस्पर होड़ करते हुए थे।

श्लोक 13 (uttara.101.13)

उभे सुरुचिरप्रख्ये व्यवहारैरकिल्बिषैः । उद्यानयानसम्पूर्णे सुविभक्तान्तरापणे ।। ७.१०१.१३ ।।

ubhe suruciraprakhye vyavahārairakilbiṣaiḥ | udyānayānasampūrṇe suvibhaktāntarāpaṇe || 7.101.13 ||

दोनों नगर अत्यन्त सुन्दर और प्रसिद्ध थे, निष्कपट व्यवहार वाले, उद्यानों और सवारियों से परिपूर्ण तथा सुव्यवस्थित बाजारों से युक्त थे।

श्लोक 14 (uttara.101.14)

उभे पुरवरे रम्ये विस्तरैरुपशोभिते । गृहमुख्यैः सुरुचिरैर्विमानसमवर्णिभिः ।। ७.१०१.१४ ।।

ubhe puravare ramye vistarairupaśobhite | gṛhamukhyaiḥ surucirairvimānasamavarṇibhiḥ || 7.101.14 ||

दोनों श्रेष्ठ और रमणीय नगर विशालता से सुशोभित थे, तथा उनके भव्य भवन देवविमानों के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 15 (uttara.101.15)

शोभिते शोभनीयैश्च देवायतनविस्तरैः । तालैस्तमालैस्तिलकैर्वकुलैरुपशोभिते ।। ७.१०१.१५ ।।

śobhite śobhanīyaiśca devāyatanavistaraiḥ | tālaistamālaistilakairvakulairupaśobhite || 7.101.15 ||

वे देवमन्दिरों की विशालता से तथा ताल, तमाल, तिलक और वकुल वृक्षों की पंक्तियों से सुशोभित थे।

श्लोक 16 (uttara.101.16)

निवेश्य पञ्चभिर्वर्षैर्भरतो राघवानुजः । पुनरायान्महाबाहुरयोध्यां केकयीसुतः ।। ७.१०१.१६ ।।

niveśya pañcabhirvarṣairbharato rāghavānujaḥ | punarāyānmahābāhurayodhyāṃ kekayīsutaḥ || 7.101.16 ||

पाँच वर्षों में इस प्रकार की स्थापना करके, राघव के अनुज तथा कैकेयीपुत्र, महाबाहु भरत पुनः अयोध्या लौट आए।

श्लोक 17 (uttara.101.17)

सो ऽभिवाद्य महात्मानं साक्षाद्धर्ममिवापरम् । राघवं भरतः श्रीमान्ब्रह्माणमिव वासवः ।। ७.१०१.१७ ।।

so 'bhivādya mahātmānaṃ sākṣāddharmamivāparam | rāghavaṃ bharataḥ śrīmānbrahmāṇamiva vāsavaḥ || 7.101.17 ||

श्रीमान् भरत ने साक्षात् धर्मस्वरूप उस महात्मा राघव को इस प्रकार प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्मा को प्रणाम करते हैं।

श्लोक 18 (uttara.101.18)

शशंस च यथावृत्तं गन्धर्ववधमुत्तमम् । निवेशनं च देशस्य श्रुत्वा प्रीतो ऽस्य राघवः ।। ७.१०१.१८ ।।

śaśaṃsa ca yathāvṛttaṃ gandharvavadhamuttamam | niveśanaṃ ca deśasya śrutvā prīto 'sya rāghavaḥ || 7.101.18 ||

उसने गन्धर्वों के उस उत्तम संहार का तथा देश की स्थापना का वृत्तान्त यथावत् सुनाया, और यह सुनकर राघव प्रसन्न हुए।

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