उत्तरकाण्ड · सर्ग 102
अंगद और चन्द्रकेतु के राज्यों की स्थापना
श्लोक 1 (uttara.102.1)
तच्छ्रुत्वा हर्षमापेदे राघवो भ्रातृभिः सह । वाक्यं चाद्भुतसङ्काशं तदा प्रोवाच लक्ष्मणम् ।। ७.१०२.१ ।।
tacchrutvā harṣamāpede rāghavo bhrātṛbhiḥ saha | vākyaṃ cādbhutasaṅkāśaṃ tadā provāca lakṣmaṇam || 7.102.1 ||
यह सुनकर राघव अपने भाइयों सहित अत्यन्त हर्षित हुए, और तब उन्होंने लक्ष्मण से यह अद्भुत वचन कहा।
श्लोक 2 (uttara.102.2)
इमौ कुमारौ सौमित्रे तव धर्मविशारदौ । अङ्गदश्चन्द्रकेतुश्च राज्यार्थे दृढविक्रमौ ।। ७.१०२.२ ।।
imau kumārau saumitre tava dharmaviśāradau | aṅgadaścandraketuśca rājyārthe dṛḍhavikramau || 7.102.2 ||
"हे सौमित्रे! ये तुम्हारे दोनों कुमार -- अंगद और चन्द्रकेतु -- धर्म में निपुण तथा राज्य के योग्य दृढ़ पराक्रमी हैं।"
श्लोक 3 (uttara.102.3)
इमौ राज्ये ऽभिषेक्ष्यामि देशः साधु विधीयताम् । रमणीयो ह्यसम्बाधो रमेतां यत्र धन्विनौ ।। ७.१०२.३ ।।
imau rājye 'bhiṣekṣyāmi deśaḥ sādhu vidhīyatām | ramaṇīyo hyasambādho rametāṃ yatra dhanvinau || 7.102.3 ||
"मैं इन दोनों का राज्याभिषेक करूँगा; अतः कोई उपयुक्त देश निश्चित किया जाए, जो रमणीय और बाधारहित हो, जहाँ ये दोनों धनुर्धर सुखपूर्वक रह सकें।"
श्लोक 4 (uttara.102.4)
न राज्ञो यत्र पीडा स्यान्नाश्रमाणां विनाशनम् । स देशो दृश्यतां सौम्य नापराध्यामहे यथा ।। ७.१०२.४ ।।
na rājño yatra pīḍā syānnāśramāṇāṃ vināśanam | sa deśo dṛśyatāṃ saumya nāparādhyāmahe yathā || 7.102.4 ||
"हे सौम्य! ऐसा देश खोजा जाए जहाँ न तो राजा को कोई कष्ट हो और न ही आश्रमों का विनाश हो, जिससे हमसे कोई अपराध न बने।"
श्लोक 5 (uttara.102.5)
तथोक्तवति रामे तु भरतः प्रत्युवाच ह । अयं कारुपथो देशो रमणीयो निरामयः ।। ७.१०२.५ ।।
tathoktavati rāme tu bharataḥ pratyuvāca ha | ayaṃ kārupatho deśo ramaṇīyo nirāmayaḥ || 7.102.5 ||
राम के ऐसा कहने पर भरत ने उत्तर दिया -- "यह कारुपथ नामक देश रमणीय और निरुपद्रव है।"
श्लोक 6 (uttara.102.6)
निवेश्यतां तत्र पुरमङ्गदस्य महात्मनः । चन्द्रकेतोः सुरुचिरं चन्द्रकान्तं निरामयम् ।। ७.१०२.६ ।।
niveśyatāṃ tatra puramaṅgadasya mahātmanaḥ | candraketoḥ suruciraṃ candrakāntaṃ nirāmayam || 7.102.6 ||
"वहाँ महात्मा अंगद के लिए एक नगर स्थापित किया जाए, और चन्द्रकेतु के लिए सुन्दर तथा निरुपद्रव चन्द्रकान्त नगर।"
श्लोक 7 (uttara.102.7)
तद्वाक्यं भरतेनोक्तं प्रतिजग्राह राघवः । तं च कृत्वा वशे देशमङ्गदस्य न्यवेशयत् ।। ७.१०२.७ ।।
tadvākyaṃ bharatenoktaṃ pratijagrāha rāghavaḥ | taṃ ca kṛtvā vaśe deśamaṅgadasya nyaveśayat || 7.102.7 ||
भरत के इस वचन को राघव ने स्वीकार किया, और उस देश को अपने अधीन करके वहाँ अंगद को स्थापित किया।
श्लोक 8 (uttara.102.8)
अङ्गदीया पुरी रम्याप्यङ्गदस्य निवेशिता । रमणीया सुगुप्ता च रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।। ७.१०२.८ ।।
aṅgadīyā purī ramyāpyaṅgadasya niveśitā | ramaṇīyā suguptā ca rāmeṇākliṣṭakarmaṇā || 7.102.8 ||
अक्लिष्टकर्मा राम ने अंगद के लिए रमणीय और सुरक्षित अंगदीया नगरी की स्थापना की।
श्लोक 9 (uttara.102.9)
चन्द्रकेतोश्च मल्लस्य मल्लभूम्यां निवेशिता । चन्द्रकान्तेति विख्याता दिव्या स्वर्गपुरी यथा ।। ७.१०२.९ ।।
candraketośca mallasya mallabhūmyāṃ niveśitā | candrakānteti vikhyātā divyā svargapurī yathā || 7.102.9 ||
मल्लभूमि में मल्लवीर चन्द्रकेतु के लिए चन्द्रकान्त नामक नगरी बसाई गई, जो दिव्य स्वर्गपुरी के समान प्रसिद्ध हुई।
श्लोक 10 (uttara.102.10)
ततो रामः परां प्रीतिं लक्ष्मणो भरतस्तथा । ययुर्युद्धे दुराधर्षा अभिषेकं च चक्रिरे ।। ७.१०२.१० ।।
tato rāmaḥ parāṃ prītiṃ lakṣmaṇo bharatastathā | yayuryuddhe durādharṣā abhiṣekaṃ ca cakrire || 7.102.10 ||
तब युद्ध में अजेय राम, लक्ष्मण और भरत को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, और उन्होंने उन दोनों कुमारों का राज्याभिषेक सम्पन्न किया।
श्लोक 11 (uttara.102.11)
अभिषिच्य कुमारौ स प्रस्थापयति राघवः । अङ्गदं पश्चिमां भूमिं चन्द्रकेतुमुदङ्मुखम् ।। ७.१०२.११ ।।
abhiṣicya kumārau sa prasthāpayati rāghavaḥ | aṅgadaṃ paścimāṃ bhūmiṃ candraketumudaṅmukham || 7.102.11 ||
उन दोनों कुमारों का अभिषेक करके राघव ने उन्हें विदा किया -- अंगद को पश्चिम दिशा की भूमि की ओर और चन्द्रकेतु को उत्तर दिशा की ओर।
श्लोक 12 (uttara.102.12)
अङ्गदं चापि सौमित्रिर्लक्ष्मणो ऽनुजगाम ह । चन्द्रकेतोस्तु भरतः पार्ष्णिग्राहो बभूव ह ।। ७.१०२.१२ ।।
aṅgadaṃ cāpi saumitrirlakṣmaṇo 'nujagāma ha | candraketostu bharataḥ pārṣṇigrāho babhūva ha || 7.102.12 ||
सौमित्र लक्ष्मण अंगद के साथ गए, तथा चन्द्रकेतु के पीछे रक्षक बनकर भरत गए।
श्लोक 13 (uttara.102.13)
लक्ष्मणस्त्वङ्गदीयायां संवत्सरमथोषितः । पुत्रे स्थिते दुराधर्षे अयोध्यां पुनरागमत् ।। ७.१०२.१३ ।।
lakṣmaṇastvaṅgadīyāyāṃ saṃvatsaramathoṣitaḥ | putre sthite durādharṣe ayodhyāṃ punarāgamat || 7.102.13 ||
लक्ष्मण अंगदीया नगरी में एक वर्ष तक रहे, और जब उनका अजेय पुत्र वहाँ सुस्थिर हो गया, तब वे पुनः अयोध्या लौट आए।
श्लोक 14 (uttara.102.14)
भरतो ऽपि तथैवोष्य संवत्सरमतो ऽधिकम् । अयोध्यां पुनरागम्य रामपादावुपास्त सः ।। ७.१०२.१४ ।।
bharato 'pi tathaivoṣya saṃvatsaramato 'dhikam | ayodhyāṃ punarāgamya rāmapādāvupāsta saḥ || 7.102.14 ||
भरत भी वहाँ एक वर्ष से कुछ अधिक समय तक रहे, और अयोध्या लौटकर राम के चरणों की सेवा में लग गए।
श्लोक 15 (uttara.102.15)
उभौ सौमित्रिभरतौ रामपादावनुव्रतौ । कालं गतमपि स्नेहान्न जज्ञाते ऽतिधार्मिकौ ।। ७.१०२.१५ ।।
ubhau saumitribharatau rāmapādāvanuvratau | kālaṃ gatamapi snehānna jajñāte 'tidhārmikau || 7.102.15 ||
सौमित्र और भरत दोनों, राम के चरणों में अनुरक्त और अत्यन्त धर्मपरायण, स्नेहवश समय के बीतने का भी बोध नहीं कर पाते थे।
श्लोक 16 (uttara.102.16)
एवं वर्षसहस्राणि दश तेषां ययुस्तदा । धर्मे प्रयतमानानां पौरकार्येषु नित्यदा ।। ७.१०२.१६ ।।
evaṃ varṣasahasrāṇi daśa teṣāṃ yayustadā | dharme prayatamānānāṃ paurakāryeṣu nityadā || 7.102.16 ||
इस प्रकार धर्म में तत्पर और सदा प्रजा के कार्यों में लगे रहने वाले उन सबके दस हजार वर्ष बीत गए।
श्लोक 17 (uttara.102.17)
विहृत्य कालं परिपूर्णमानसाः श्रिया वृता धर्मपुरे सुसंस्थिताः । त्रयः समिद्धा इव दीप्ततेजसो महाध्वरे साधु हुतास्त्रयो ऽग्नयः ।। ७.१०२.१७ ।।
vihṛtya kālaṃ paripūrṇamānasāḥ śriyā vṛtā dharmapure susaṃsthitāḥ | trayaḥ samiddhā iva dīptatejaso mahādhvare sādhu hutāstrayo 'gnayaḥ || 7.102.17 ||
इस प्रकार परिपूर्ण मन से समय बिताते हुए, ऐश्वर्य से घिरे, धर्मपुर में सुदृढ़ स्थित वे तीनों उस महायज्ञ में भलीभाँति हवन की गई तीन प्रज्वलित अग्नियों के समान तेजस्वी दिखाई देते थे।