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उत्तरकाण्ड · सर्ग 103

कालरूपी तपस्वी का आगमन

सर्ग 102सर्ग-सूचीसर्ग 104

श्लोक 1 (uttara.103.1)

कस्यचित्त्वथ कालस्य रामे धर्मपरे स्थिते । कालस्तापसरूपेण राजद्वारमुपागमत् ।। ७.१०३.१ ।।

kasyacittvatha kālasya rāme dharmapare sthite | kālastāpasarūpeṇa rājadvāramupāgamat || 7.103.1 ||

कुछ समय बीत जाने पर, जब राम धर्मपरायण होकर राज्य कर रहे थे, तब काल तपस्वी का रूप धारण कर राजद्वार पर आया।

श्लोक 2 (uttara.103.2)

सो ऽब्रवील्लक्ष्मणं वाक्यं धृतिमन्तं यशश्विनम् । मां निवेदय रामाय सम्प्राप्तं कार्यगौरवात् ।। ७.१०३.२ ।।

so 'bravīllakṣmaṇaṃ vākyaṃ dhṛtimantaṃ yaśaśvinam | māṃ nivedaya rāmāya samprāptaṃ kāryagauravāt || 7.103.2 ||

उसने धैर्यवान् और यशस्वी लक्ष्मण से यह वचन कहा -- "मुझे राम से निवेदन करो कि मैं एक अत्यन्त गुरुतर कार्य से यहाँ आया हूँ।"

श्लोक 3 (uttara.103.3)

दूतो ऽस्म्यतिबलस्याहं महर्षेरमितौजसः । रामं दिदृक्षुरायातः कार्येण हि महाबल ।। ७.१०३.३ ।।

dūto 'smyatibalasyāhaṃ maharṣeramitaujasaḥ | rāmaṃ didṛkṣurāyātaḥ kāryeṇa hi mahābala || 7.103.3 ||

"हे महाबल! मैं अत्यन्त बलशाली और अमित तेजस्वी महर्षि का दूत हूँ, और किसी कार्यवश ही राम को देखने आया हूँ।"

श्लोक 4 (uttara.103.4)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सौमित्रिस्त्वरया ऽन्वितः । न्यवेदयत रामाय तापसं तं समागतम् ।। ७.१०३.४ ।।

tasya tadvacanaṃ śrutvā saumitristvarayā 'nvitaḥ | nyavedayata rāmāya tāpasaṃ taṃ samāgatam || 7.103.4 ||

उसकी यह बात सुनकर सौमित्र ने शीघ्रता के साथ राम को उस आगत तपस्वी की सूचना दी।

श्लोक 5 (uttara.103.5)

जयस्व राम धर्मेण उभौ लोकौ महाद्युते । दूतस्त्वां द्रष्टुमायातस्तपसा भास्करप्रभः ।। ७.१०३.५ ।।

jayasva rāma dharmeṇa ubhau lokau mahādyute | dūtastvāṃ draṣṭumāyātastapasā bhāskaraprabhaḥ || 7.103.5 ||

"हे महाद्युते राम! धर्म के द्वारा दोनों लोकों पर विजयी होइए। तपस्या से सूर्य के समान तेजस्वी एक दूत आपसे मिलने आया है।"

श्लोक 6 (uttara.103.6)

तद्वाक्यं लक्ष्मणेनोक्तं श्रुत्वा राम उवाच ह । प्रवेश्यतां मुनिस्तात महौजास्तस्य वाक्यधृत् ।। ७.१०३.६ ।।

tadvākyaṃ lakṣmaṇenoktaṃ śrutvā rāma uvāca ha | praveśyatāṃ munistāta mahaujāstasya vākyadhṛt || 7.103.6 ||

लक्ष्मण द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर राम ने कहा -- "हे तात! उस महातेजस्वी मुनि को भीतर लाओ, और उसकी आज्ञा का पालन करो।"

श्लोक 7 (uttara.103.7)

सौमित्रिस्तु तथेत्युक्त्वा प्रावेशयत तं मुनिम् । ज्वलन्तमेव तेजोभिः प्रदहन्तमिवांशुभिः ।। ७.१०३.७ ।।

saumitristu tathetyuktvā prāveśayata taṃ munim | jvalantameva tejobhiḥ pradahantamivāṃśubhiḥ || 7.103.7 ||

सौमित्र ने "ऐसा ही हो" कहकर उस मुनि को भीतर लाया, जो अपने तेज से इस प्रकार दीप्त था मानो अपनी किरणों से जला रहा हो।

श्लोक 8 (uttara.103.8)

सो ऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यपानं स्वतेजसा । ऋषिर्मधुरया वाचा वर्धस्वेत्याह राघवम् ।। ७.१०३.८ ।।

so 'bhigamya raghuśreṣṭhaṃ dīpyapānaṃ svatejasā | ṛṣirmadhurayā vācā vardhasvetyāha rāghavam || 7.103.8 ||

अपने तेज से देदीप्यमान रघुश्रेष्ठ के समीप जाकर उस ऋषि ने मधुर वाणी में राघव से कहा -- "तुम्हारा कल्याण हो।"

श्लोक 9 (uttara.103.9)

तस्मै रामो महातेजाः पूजामर्घ्यपुरोगमाम् । ददौ कुशलमव्यग्रं प्रष्टुमेवोपचक्रमे ।। ७.१०३.९ ।।

tasmai rāmo mahātejāḥ pūjāmarghyapurogamām | dadau kuśalamavyagraṃ praṣṭumevopacakrame || 7.103.9 ||

महातेजस्वी राम ने अर्घ्य आदि से उसका पूजन किया और स्वस्थचित्त होकर उसका कुशल-क्षेम पूछना आरम्भ किया।

श्लोक 10 (uttara.103.10)

पृष्टश्च कुशलं तेन रामेण वदतां वरः । आसने काञ्चने दिव्ये निषसाद महायशाः ।। ७.१०३.१० ।।

pṛṣṭaśca kuśalaṃ tena rāmeṇa vadatāṃ varaḥ | āsane kāñcane divye niṣasāda mahāyaśāḥ || 7.103.10 ||

राम द्वारा कुशल पूछे जाने पर, वाणी में श्रेष्ठ और महायशस्वी उस मुनि ने दिव्य स्वर्णासन पर आसन ग्रहण किया।

श्लोक 11 (uttara.103.11)

तमुवाच ततो रामः स्वागतं ते महामुने । प्रापयास्य च वाक्यानि यतो दूतस्त्वमागतः ।। ७.१०३.११ ।।

tamuvāca tato rāmaḥ svāgataṃ te mahāmune | prāpayāsya ca vākyāni yato dūtastvamāgataḥ || 7.103.11 ||

तब राम ने उससे कहा -- "हे महामुने! तुम्हारा स्वागत है; जिस कार्य से तुम दूत बनकर आए हो, वह वचन कहो।"

श्लोक 12 (uttara.103.12)

चोदितो राजसिंहेन मुनिर्वाक्यमभाषत । द्वन्द्वमेतत्प्रवक्तव्यं हितं वै यद्यपेक्षसे ।। ७.१०३.१२ ।।

codito rājasiṃhena munirvākyamabhāṣata | dvandvametatpravaktavyaṃ hitaṃ vai yadyapekṣase || 7.103.12 ||

राजसिंह द्वारा प्रेरित होकर उस मुनि ने कहा -- "यदि तुम अपना हित चाहते हो, तो यह बात केवल हम दोनों के बीच ही कही जानी चाहिए।"

श्लोक 13 (uttara.103.13)

यः शृणोति निरीक्षेद्वा स वध्यो भविता तव । भवेद्वै मुनिमुख्यस्य वचनं यद्यपेक्षसे ।। ७.१०३.१३ ।।

yaḥ śṛṇoti nirīkṣedvā sa vadhyo bhavitā tava | bhavedvai munimukhyasya vacanaṃ yadyapekṣase || 7.103.13 ||

"जो कोई हमारी यह बात सुने या देखे, वह तुम्हारे द्वारा वध्य होगा -- यदि तुम इस मुनिश्रेष्ठ का वचन सुनना चाहते हो, तो यही प्रतिज्ञा करनी होगी।"

श्लोक 14 (uttara.103.14)

स तथेति प्रतिज्ञाय रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । द्वारि तिष्ठ महाबाहो प्रतिहारं विसर्जय ।। ७.१०३.१४ ।।

sa tatheti pratijñāya rāmo lakṣmaṇamabravīt | dvāri tiṣṭha mahābāho pratihāraṃ visarjaya || 7.103.14 ||

"ऐसा ही हो" कहकर प्रतिज्ञा करके राम ने लक्ष्मण से कहा -- "हे महाबाहो! तुम द्वार पर खड़े रहो, और द्वारपाल को हटा दो।"

श्लोक 15 (uttara.103.15)

स मे वध्यः खलु भवेत् कथाद्वन्द्वं समीरितम् । ऋषेर्मम च सौमित्रे पश्येद्वा शृणुयाच्च यः ।। ७.१०३.१५ ।।

sa me vadhyaḥ khalu bhavet kathādvandvaṃ samīritam | ṛṣermama ca saumitre paśyedvā śṛṇuyācca yaḥ || 7.103.15 ||

"हे सौमित्रे! ऋषि और मेरे बीच हो रही इस गोपनीय बातचीत को जो कोई देखेगा या सुनेगा, वह निश्चय ही मेरे द्वारा वध्य होगा।"

श्लोक 16 (uttara.103.16)

ततो निक्षिप्य काकुत्स्थो लक्ष्मणं द्वारि सङ्ग्रहम् । तमुवाच मुने वाक्यं कथयस्वेति राघवः ।। ७.१०३.१६ ।।

tato nikṣipya kākutstho lakṣmaṇaṃ dvāri saṅgraham | tamuvāca mune vākyaṃ kathayasveti rāghavaḥ || 7.103.16 ||

तब काकुत्स्थ ने लक्ष्मण को द्वार पर रक्षक के रूप में नियुक्त करके उस मुनि से कहा -- "हे मुने! अपनी बात कहो।"

श्लोक 17 (uttara.103.17)

यत्ते मनीषितं वाक्यं येन वा ऽसि समाहितः । कथयस्वाविशङ्कस्त्वं ममापि हृदि वर्तते ।। ७.१०३.१७ ।।

yatte manīṣitaṃ vākyaṃ yena vā 'si samāhitaḥ | kathayasvāviśaṅkastvaṃ mamāpi hṛdi vartate || 7.103.17 ||

"तुम्हारे मन में जो भी बात हो, जिस उद्देश्य से तुम अत्यन्त सावधान होकर आए हो, वह निःशंक होकर कहो; वह भी मेरे हृदय में सन्निहित है।"

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