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उत्तरकाण्ड · सर्ग 104

काल द्वारा ब्रह्मा का संदेश

सर्ग 103सर्ग-सूचीसर्ग 105

श्लोक 1 (uttara.104.1)

शृणु राजन्महासत्व यदर्थमहमागतः । पितामहेन देवेन प्रेषितो ऽस्मि महाबल ।। ७.१०४.१ ।।

śṛṇu rājanmahāsattva yadarthamahamāgataḥ | pitāmahena devena preṣito 'smi mahābala || 7.104.1 ||

"हे महाबल राजन्! सुनो, मैं जिस कार्य के लिए आया हूँ, वह यह है -- मुझे देव पितामह ब्रह्मा ने भेजा है।"

श्लोक 2 (uttara.104.2)

तवाहं पूर्वसद्भावे पुत्रः परपुरञ्जय । मायासम्भावितो वीर कालः सर्वसमाहरः ।। ७.१०४.२ ।।

tavāhaṃ pūrvasadbhāve putraḥ parapurañjaya | māyāsambhāvito vīra kālaḥ sarvasamāharaḥ || 7.104.2 ||

"हे शत्रुनगरविजयी वीर! तुम्हारे पूर्व स्वरूप में मैं तुम्हारा ही पुत्र था, माया से उत्पन्न -- मैं सबका संहार करने वाला काल हूँ।"

श्लोक 3 (uttara.104.3)

पितामहश्च भगवानाह लोकपतिः प्रभुः । समयस्ते कृतः सौम्य लोकान्सम्परिरक्षितुम् ।। ७.१०४.३ ।।

pitāmahaśca bhagavānāha lokapatiḥ prabhuḥ | samayaste kṛtaḥ saumya lokānsamparirakṣitum || 7.104.3 ||

"और भगवान् लोकपति पितामह ने कहा है -- हे सौम्य! लोकों की रक्षा हेतु तुम्हारे लिए एक निश्चित अवधि तय की गई थी।"

श्लोक 4 (uttara.104.4)

सङ्क्षिप्य हि पुरा लोकान्मायया स्वयमेव हि । महार्णवे शयानो ऽप्सु मां त्वं पूर्वमजीजनः ।। ७.१०४.४ ।।

saṅkṣipya hi purā lokānmāyayā svayameva hi | mahārṇave śayāno 'psu māṃ tvaṃ pūrvamajījanaḥ || 7.104.4 ||

"बहुत पहले, स्वयं अपनी माया से लोकों को समेटकर, महासागर के जल में शयन करते हुए, तुमने सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया था।"

श्लोक 5 (uttara.104.5)

भोगवन्तं ततो नागमनन्तमुदकेशयम् । मायया जनयित्वा त्वं द्वौ च सत्त्वौ महाबलौ ।। ७.१०४.५ ।।

bhogavantaṃ tato nāgamanantamudakeśayam | māyayā janayitvā tvaṃ dvau ca sattvau mahābalau || 7.104.5 ||

"फिर माया से फणधारी अनन्त नाग को, जो जल में शयन करता था, उत्पन्न करके, तुमने दो अत्यन्त बलशाली प्राणी भी उत्पन्न किए।"

श्लोक 6 (uttara.104.6)

मधुं च कैटभं चैव ययोरस्थिचयैर्वृता । इयं पर्वतसम्बाधा मेदिनी चाभवन्मही ।। ७.१०४.६ ।।

madhuṃ ca kaiṭabhaṃ caiva yayorasthicayairvṛtā | iyaṃ parvatasambādhā medinī cābhavanmahī || 7.104.6 ||

"वे मधु और कैटभ थे, जिनकी अस्थियों के ढेर से पर्वतों से भरी हुई यह पृथ्वी बनी।"

श्लोक 7 (uttara.104.7)

पद्मे दिव्ये ऽर्कसङ्काशे नाभ्यामुत्पाद्य मामपि । प्राजापत्यं त्वया कर्म मयि सर्वं निवेशितम् ।। ७.१०४.७ ।।

padme divye 'rkasaṅkāśe nābhyāmutpādya māmapi | prājāpatyaṃ tvayā karma mayi sarvaṃ niveśitam || 7.104.7 ||

"और सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य कमल में अपनी नाभि से मुझे भी उत्पन्न करके, तुमने प्रजापति का सम्पूर्ण कार्य मुझमें निहित कर दिया।"

श्लोक 8 (uttara.104.8)

सो ऽहं सन्न्यस्तभारो हि त्वामुपासे जगत्पतिम् । रक्षां विधत्स्व भूतेषु मम तेजस्करो भवान् ।। ७.१०४.८ ।।

so 'haṃ sannyastabhāro hi tvāmupāse jagatpatim | rakṣāṃ vidhatsva bhūteṣu mama tejaskaro bhavān || 7.104.8 ||

"वह भार त्यागकर मैं अब जगत्पति तुम्हारी ही उपासना करता हूँ; तुम प्राणियों की रक्षा करो, क्योंकि तुम ही मेरे तेज के स्रोत हो।"

श्लोक 9 (uttara.104.9)

ततस्त्वमपि दुर्धर्षात्तस्माद्भावात्सनातनात् । रक्षार्थं सर्वभूतानां विष्णुत्वमुपजग्मिवान् ।। ७.१०४.९ ।।

tatastvamapi durdharṣāttasmādbhāvātsanātanāt | rakṣārthaṃ sarvabhūtānāṃ viṣṇutvamupajagmivān || 7.104.9 ||

"फिर तुमने भी उस अजेय, सनातन स्वरूप से समस्त प्राणियों की रक्षा हेतु विष्णुरूप धारण किया।"

श्लोक 10 (uttara.104.10)

अदित्यां वीर्यवान्पुत्रो भ्रातऽणां वीर्यवर्धनः । समुत्पन्नेषु कृत्येषु तेषां साह्याय कल्पसे ।। ७.१०४.१० ।।

adityāṃ vīryavānputro bhrāta'ṇāṃ vīryavardhanaḥ | samutpanneṣu kṛtyeṣu teṣāṃ sāhyāya kalpase || 7.104.10 ||

"अदिति के तेजस्वी पुत्र और भाइयों के पराक्रम को बढ़ाने वाले के रूप में, आवश्यकता पड़ने पर तुम उनके सहायक बनते हो।"

श्लोक 11 (uttara.104.11)

स त्वं वित्रास्यमानासु प्रजासु जगतां वर । रावणस्य वधाकाङ्क्षी मानुषेषु मनो ऽदधाः ।। ७.१०४.११ ।।

sa tvaṃ vitrāsyamānāsu prajāsu jagatāṃ vara | rāvaṇasya vadhākāṅkṣī mānuṣeṣu mano 'dadhāḥ || 7.104.11 ||

"हे जगत् में श्रेष्ठ! प्रजा को त्रस्त देखकर और रावण के वध की इच्छा से, तुमने मनुष्यों में जन्म लेने का मन बनाया।"

श्लोक 12 (uttara.104.12)

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । कृत्वा वासस्य नियतिं स्वयमेवात्मना पुरा ।। ७.१०४.१२ ।।

daśa varṣasahasrāṇi daśa varṣaśatāni ca | kṛtvā vāsasya niyatiṃ svayamevātmanā purā || 7.104.12 ||

"तुमने पहले ही स्वयं अपनी इच्छा से दस हजार वर्ष और दस सौ वर्ष अर्थात् ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करने की अवधि निश्चित कर ली थी।"

श्लोक 13 (uttara.104.13)

स त्वं मनोमयः पुत्रः पूर्णायुर्मानुषेष्विह । कालो ऽयं ते नरश्रेष्ठ समीपमुपवर्तितुम् ।। ७.१०४.१३ ।।

sa tvaṃ manomayaḥ putraḥ pūrṇāyurmānuṣeṣviha | kālo 'yaṃ te naraśreṣṭha samīpamupavartitum || 7.104.13 ||

"हे नरश्रेष्ठ! मनोमय पुत्र के रूप में मनुष्यों के बीच अपनी पूर्ण आयु भोगकर, अब वह समय तुम्हारे निकट आ पहुँचा है।"

श्लोक 14 (uttara.104.14)

यदि भूयो महाराज प्रजा इच्छस्युपासितुम् । वस वा वीर भद्रं त एवमाह पितामहः ।। ७.१०४.१४ ।।

yadi bhūyo mahārāja prajā icchasyupāsitum | vasa vā vīra bhadraṃ ta evamāha pitāmahaḥ || 7.104.14 ||

"हे महाराज! यदि तुम अभी और अधिक समय तक प्रजा की देखभाल करना चाहते हो, तो हे वीर, यहीं रहो; तुम्हारा कल्याण हो -- ऐसा पितामह ने कहा है।"

श्लोक 15 (uttara.104.15)

अथ वा विजिगीषा ते सुरलोकाय राघव । सनाथा विष्णुना देवा भवन्तु विगतज्वराः ।। ७.१०४.१५ ।।

atha vā vijigīṣā te suralokāya rāghava | sanāthā viṣṇunā devā bhavantu vigatajvarāḥ || 7.104.15 ||

"अथवा, हे राघव! यदि तुम्हारी इच्छा स्वर्गलोक की ओर हो, तो विष्णु के सनाथ होकर देवगण संतापरहित हो जाएँ।"

श्लोक 16 (uttara.104.16)

श्रुत्वा पितामहेनोक्तं वाक्यं कालसमीरितम् । राघवः प्रहसन्वाक्यं सर्वसंहारमब्रवीत् ।। ७.१०४.१६ ।।

śrutvā pitāmahenoktaṃ vākyaṃ kālasamīritam | rāghavaḥ prahasanvākyaṃ sarvasaṃhāramabravīt || 7.104.16 ||

पितामह द्वारा कहे गए और काल के द्वारा सुनाए गए इस वचन को सुनकर राघव मुस्कराए और अपने प्रस्थान अर्थात् सर्वसंहार से सम्बन्धित यह वचन कहा।

श्लोक 17 (uttara.104.17)

श्रुत्वा मे देवदेवस्य वाक्यं परममद्भुतम् । प्रीतिर्हि महती जाता तवागमनसम्भवा ।। ७.१०४.१७ ।।

śrutvā me devadevasya vākyaṃ paramamadbhutam | prītirhi mahatī jātā tavāgamanasambhavā || 7.104.17 ||

"देवाधिदेव के इस परम अद्भुत वचन को सुनकर, तुम्हारे आगमन से मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई है।"

श्लोक 18 (uttara.104.18)

त्रयाणामपि लोकानां कार्यार्थं मम सम्भवः । भद्रं ते ऽस्तु गमिष्यामि यत एवाहमागतः ।। ७.१०४.१८ ।।

trayāṇāmapi lokānāṃ kāryārthaṃ mama sambhavaḥ | bhadraṃ te 'stu gamiṣyāmi yata evāhamāgataḥ || 7.104.18 ||

"मेरा जन्म तीनों लोकों के कार्य हेतु ही हुआ था; तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं वहीं जाऊँगा जहाँ से मैं आया था।"

श्लोक 19 (uttara.104.19)

हद्गतो ह्यसि सम्प्राप्तो न मे तत्र विचारणा । मया हि सर्वकृत्येषु देवानां वशवर्तिनाम् । स्थातव्यं सर्वसंहार यथा ह्याह पितामहः ।। ७.१०४.१९ ।।

hadgato hyasi samprāpto na me tatra vicāraṇā | mayā hi sarvakṛtyeṣu devānāṃ vaśavartinām | sthātavyaṃ sarvasaṃhāra yathā hyāha pitāmahaḥ || 7.104.19 ||

"तुम मेरे हृदय में प्रविष्ट हो चुके हो, इसमें मुझे कोई विचार नहीं करना है। हे सर्वसंहार! देवताओं के वशवर्ती होकर उनके प्रत्येक कार्य में मुझे वैसा ही आचरण करना है, जैसा पितामह ने कहा है।"

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