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उत्तरकाण्ड · सर्ग 105

दुर्वासा का आगमन

सर्ग 104सर्ग-सूचीसर्ग 106

श्लोक 1 (uttara.105.1)

तथा तयोः संवदतोर्दुर्वासा भगवानृषिः । रामस्य दर्शनाकाङ्क्षी राजद्वारमुपागमत् ।। ७.१०५.१ ।।

tathā tayoḥ saṃvadatordurvāsā bhagavānṛṣiḥ | rāmasya darśanākāṅkṣī rājadvāramupāgamat || 7.105.1 ||

उन दोनों की इस प्रकार बातचीत चल ही रही थी कि भगवान् दुर्वासा ऋषि, राम के दर्शन की इच्छा से राजद्वार पर आ पहुँचे।

श्लोक 2 (uttara.105.2)

सो ऽभिगम्य तु सौमित्रिमुवाच ऋषिसत्तमः । रामं दर्शय मे शीघ्रं पुरा मे ऽर्थो ऽतिवर्तते ।। ७.१०५.२ ।।

so 'bhigamya tu saumitrimuvāca ṛṣisattamaḥ | rāmaṃ darśaya me śīghraṃ purā me 'rtho 'tivartate || 7.105.2 ||

उस ऋषिश्रेष्ठ ने सौमित्र के पास जाकर कहा -- "शीघ्र ही मुझे राम के दर्शन कराओ; मेरा कार्य अत्यन्त अत्यावश्यक है, विलम्ब सहन नहीं कर सकता।"

श्लोक 3 (uttara.105.3)

मुनेस्तु भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । अभिवाद्य महात्मानं वाक्यमेतदुवाच ह ।। ७.१०५.३ ।।

munestu bhāṣitaṃ śrutvā lakṣmaṇaḥ paravīrahā | abhivādya mahātmānaṃ vākyametaduvāca ha || 7.105.3 ||

मुनि की यह बात सुनकर, शत्रुवीरों का नाश करने वाले लक्ष्मण ने उस महात्मा को प्रणाम करके यह वचन कहा।

श्लोक 4 (uttara.105.4)

किं कार्यं ब्रूहि भगवन्को वा ऽर्थः किं करोम्यहम् । व्यग्रो हि राघवो ब्रह्मन्मुहूर्तं प्रतिपाल्यताम् ।। ७.१०५.४ ।।

kiṃ kāryaṃ brūhi bhagavanko vā 'rthaḥ kiṃ karomyaham | vyagro hi rāghavo brahmanmuhūrtaṃ pratipālyatām || 7.105.4 ||

"हे भगवन्! बताइए, आपका क्या कार्य है, मैं क्या करूँ? हे ब्रह्मन्! राघव अभी व्यस्त हैं, कृपया कुछ क्षण प्रतीक्षा कीजिए।"

श्लोक 5 (uttara.105.5)

तच्छ्रुत्वा ऋषिशार्दूलः क्रोधेन कलुषीकृतः । उवाच लक्ष्मणं वाक्यं निर्दहन्निव चक्षुषा ।। ७.१०५.५ ।।

tacchrutvā ṛṣiśārdūlaḥ krodhena kaluṣīkṛtaḥ | uvāca lakṣmaṇaṃ vākyaṃ nirdahanniva cakṣuṣā || 7.105.5 ||

यह सुनकर वह ऋषिश्रेष्ठ क्रोध से कलुषित हो गए, और मानो अपनी दृष्टि से भस्म करते हुए लक्ष्मण से यह वचन कहा।

श्लोक 6 (uttara.105.6)

अस्मिन्क्षणे मां सौमित्रे रामाय प्रतिवेदय । अस्मिन्क्षणे मां सौमित्रे न निवेदयसे यदि ।। ७.१०५.६ ।।

asminkṣaṇe māṃ saumitre rāmāya prativedaya | asminkṣaṇe māṃ saumitre na nivedayase yadi || 7.105.6 ||

"हे सौमित्रे! इसी क्षण मेरा निवेदन राम से करो। हे सौमित्रे! यदि तुम इसी क्षण मेरा निवेदन नहीं करते..."

श्लोक 7 (uttara.105.7)

विषयं त्वां पुरं चैव शपिष्ये राघवं तथा । भरतं चैव सौमित्रे युष्माकं या च सन्ततिः ।। ७.१०५.७ ।।

viṣayaṃ tvāṃ puraṃ caiva śapiṣye rāghavaṃ tathā | bharataṃ caiva saumitre yuṣmākaṃ yā ca santatiḥ || 7.105.7 ||

"...तो हे सौमित्रे! मैं तुम्हारे राज्य और इस नगर को, राघव को, भरत को तथा तुम्हारी सम्पूर्ण सन्तति को शाप दे दूँगा।"

श्लोक 8 (uttara.105.8)

न हि शक्ष्याम्यहं भूयो मन्युं धारयितुं हृदि । तच्छ्रुत्वा घोरसङ्काशं वाक्यं तस्य महात्मनः । चिन्तयामास मनसा तस्य वाक्यस्य निश्चयम् ।। ७.१०५.८ ।।

na hi śakṣyāmyahaṃ bhūyo manyuṃ dhārayituṃ hṛdi | tacchrutvā ghorasaṅkāśaṃ vākyaṃ tasya mahātmanaḥ | cintayāmāsa manasā tasya vākyasya niścayam || 7.105.8 ||

"क्योंकि अब मैं अपने क्रोध को हृदय में रोक नहीं सकूँगा।" उस महात्मा के इस भयंकर प्रतीत होने वाले वचन को सुनकर, लक्ष्मण मन ही मन उस वचन के निर्णय पर विचार करने लगे।

श्लोक 9 (uttara.105.9)

एकस्य मरणं मे ऽस्तु मा भूत्सर्वविनाशनम् । इति बुद्ध्या विनिश्चित्य राघवाय न्यवेदयत् ।। ७.१०५.९ ।।

ekasya maraṇaṃ me 'stu mā bhūtsarvavināśanam | iti buddhyā viniścitya rāghavāya nyavedayat || 7.105.9 ||

"मेरी अकेले की मृत्यु हो जाए, किन्तु सबका विनाश न हो" -- ऐसा बुद्धिपूर्वक निश्चय करके उन्होंने राघव को सूचित किया।

श्लोक 10 (uttara.105.10)

लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा रामः कालं विसृज्य च । निस्सृत्य त्वरितं राजा अत्रेः पुत्रं ददर्श ह ।। ७.१०५.१० ।।

lakṣmaṇasya vacaḥ śrutvā rāmaḥ kālaṃ visṛjya ca | nissṛtya tvaritaṃ rājā atreḥ putraṃ dadarśa ha || 7.105.10 ||

लक्ष्मण की बात सुनकर राम काल से विदा लेकर शीघ्रता से बाहर निकले और महाराज ने अत्रिपुत्र दुर्वासा को देखा।

श्लोक 11 (uttara.105.11)

सो ऽभिवाद्य महात्मानं ज्वलन्तमिव तेजसा । किं कार्यमिति काकुत्स्थः कृताञ्जलिरभाषत ।। ७.१०५.११ ।।

so 'bhivādya mahātmānaṃ jvalantamiva tejasā | kiṃ kāryamiti kākutsthaḥ kṛtāñjalirabhāṣata || 7.105.11 ||

तेज से मानो प्रज्वलित उस महात्मा को प्रणाम करके काकुत्स्थ ने हाथ जोड़कर पूछा -- "आपका क्या कार्य है?"

श्लोक 12 (uttara.105.12)

तद्वाक्यं राघवेणोक्तं श्रुत्वा मुनिवरः प्रभुम् । प्रत्याह रामं दुर्वासाः श्रूयतां धर्मवत्सल ।। ७.१०५.१२ ।।

tadvākyaṃ rāghaveṇoktaṃ śrutvā munivaraḥ prabhum | pratyāha rāmaṃ durvāsāḥ śrūyatāṃ dharmavatsala || 7.105.12 ||

राघव द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने प्रभु राम से कहा -- "हे धर्मवत्सल! सुनो।"

श्लोक 13 (uttara.105.13)

अद्य वर्षसहस्रस्य समाप्तिस्तपसो मम । सो ऽहं भोजनमिच्छामि यथासिद्धं तवानघ ।। ७.१०५.१३ ।।

adya varṣasahasrasya samāptistapaso mama | so 'haṃ bhojanamicchāmi yathāsiddhaṃ tavānagha || 7.105.13 ||

"आज मेरी हजार वर्षों की तपस्या पूर्ण हो गई है; अतः हे अनघ! मैं तुम्हारे यहाँ जो कुछ भी तैयार हो, वही भोजन चाहता हूँ।"

श्लोक 14 (uttara.105.14)

तच्छ्रुत्वा वचनं राजा राघवः प्रीतमानसः । भोजनं मुनिमुख्याय यथासिद्धमुपाहरत् ।। ७.१०५.१४ ।।

tacchrutvā vacanaṃ rājā rāghavaḥ prītamānasaḥ | bhojanaṃ munimukhyāya yathāsiddhamupāharat || 7.105.14 ||

यह वचन सुनकर महाराज राघव ने प्रसन्नचित्त होकर, जो भी भोजन तैयार था, वह उस मुनिश्रेष्ठ के समक्ष प्रस्तुत किया।

श्लोक 15 (uttara.105.15)

स तु भुक्त्वा मुनिश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । साधु रामेति सम्भाष्य स्वमाश्रममुपागमत् ।। ७.१०५.१५ ।।

sa tu bhuktvā muniśreṣṭhastadannamamṛtopamam | sādhu rāmeti sambhāṣya svamāśramamupāgamat || 7.105.15 ||

उस मुनिश्रेष्ठ ने वह अमृततुल्य अन्न ग्रहण कर, "साधु राम" कहकर अपने आश्रम की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 16 (uttara.105.16)

तस्मिन् गते मुनिवरे स्वाश्रमं लक्ष्मणाग्रजः । संस्मृत्य कालवाक्यानि ततो दुःखमुपागमत् ।। ७.१०५.१६ ।।

tasmin gate munivare svāśramaṃ lakṣmaṇāgrajaḥ | saṃsmṛtya kālavākyāni tato duḥkhamupāgamat || 7.105.16 ||

जब वह श्रेष्ठ मुनि अपने आश्रम को चले गए, तब लक्ष्मण के अग्रज राम काल के वचनों का स्मरण करके दुःखी हो गए।

श्लोक 17 (uttara.105.17)

दुःखेन च सुसन्तप्तः स्मृत्वा तद्घोरदर्शनम् । अवाङ्मुखो दीनमना व्याहर्तुं न शशाक ह ।। ७.१०५.१७ ।।

duḥkhena ca susantaptaḥ smṛtvā tadghoradarśanam | avāṅmukho dīnamanā vyāhartuṃ na śaśāka ha || 7.105.17 ||

उस भयंकर प्रतिज्ञा का स्मरण कर वे अत्यन्त दुःख से संतप्त हो गए, उनका मुख नीचे झुक गया, मन दीन हो गया, और वे कुछ भी कह पाने में असमर्थ हो गए।

श्लोक 18 (uttara.105.18)

ततो बुद्ध्या विनिश्चित्य कालवाक्यानि राघवः । नैतदस्तीति निश्चित्य तूष्णीमासीन्महायशाः ।। ७.१०५.१८ ।।

tato buddhyā viniścitya kālavākyāni rāghavaḥ | naitadastīti niścitya tūṣṇīmāsīnmahāyaśāḥ || 7.105.18 ||

तब राघव ने बुद्धिपूर्वक काल के वचनों पर विचार करके, "यह कोई बड़ी बात नहीं" -- ऐसा निश्चय करके, वह महायशस्वी मौन हो गए।

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