उत्तरकाण्ड · सर्ग 107
राम का स्वर्गगमन का संकल्प
श्लोक 1 (uttara.107.1)
विसृज्य लक्ष्मणं रामो दुःखशोकसमन्वितः । पुरोधसं मन्त्रिणश्च नैगमांश्चेदमब्रवीत् ।। ७.१०७.१ ।।
visṛjya lakṣmaṇaṃ rāmo duḥkhaśokasamanvitaḥ | purodhasaṃ mantriṇaś ca naigamāṃś cedam abravīt || 7.107.1 ||
लक्ष्मण को त्यागकर, दुःख और शोक से युक्त राम ने पुरोहित, मंत्रियों तथा नगरवासी प्रतिनिधियों से यह कहा।
श्लोक 2 (uttara.107.2)
अद्य राज्ये ऽभिषेक्ष्यामि भरतं धर्मवत्सलम् । अयोध्यायाः पतिं वीरं ततो यास्याम्यहं वनम् ।। ७.१०७.२ ।।
adya rājye 'bhiṣekṣyāmi bharataṃ dharmavatsalam | ayodhyāyāḥ patiṃ vīraṃ tato yāsyāmy ahaṃ vanam || 7.107.2 ||
"आज मैं धर्मप्रिय भरत को राज्य पर अभिषिक्त करूँगा, वीर भरत को अयोध्या का स्वामी बनाऊँगा, और उसके बाद मैं वन को चला जाऊँगा।"
श्लोक 3 (uttara.107.3)
प्रवेशयत सम्भारान्माभूत्कालस्य पर्ययः । अद्यैवाहं गमिष्यामि लक्ष्मणेन गतां गतिम् ।। ७.१०७.३ ।।
praveśayata sambhārān mā bhūt kālasya paryayaḥ | adyaivāhaṃ gamiṣyāmi lakṣmaṇena gatāṃ gatim || 7.107.3 ||
"आवश्यक सामग्री ले आओ, विलम्ब न होने पाये। आज ही मैं उस गति को प्राप्त होऊँगा जिसे लक्ष्मण ने प्राप्त किया है।"
श्लोक 4 (uttara.107.4)
तच्छ्रुत्वा राघवेणोक्तं सर्वाः प्रकृतयो भृशम् । मूर्धभिः प्रणता भूमौ गतसत्त्वा इवाभवन् ।। ७.१०७.४ ।।
tac chrutvā rāghaveṇoktaṃ sarvāḥ prakṛtayo bhṛśam | mūrdhabhiḥ praṇatā bhūmau gatasattvā ivābhavan || 7.107.4 ||
राघव के यह वचन सुनकर समस्त प्रजा अत्यंत विह्वल हो गयी, सिर के बल भूमि पर गिर पड़ी और मानो चेतनाशून्य हो गयी।
श्लोक 5 (uttara.107.5)
भरतश्च विसञ्ज्ञो ऽभूच्छ्रुत्वा रामस्य भाषितम् । राज्यं विगर्हयामास राघवं चेदमब्रवीत् ।। ७.१०७.५ ।।
bharataś ca visañjño 'bhūc chrutvā rāmasya bhāṣitam | rājyaṃ vigarhayām āsa rāghavaṃ cedam abravīt || 7.107.5 ||
राम की यह बात सुनकर भरत भी मूर्च्छित हो गये; उन्होंने राज्य की निंदा करते हुए राघव से यह कहा।
श्लोक 6 (uttara.107.6)
सत्येनाहं शपे राजन्स्वर्गलोके न चैव हि । न कामये यथा राज्यं त्वां विना रघुनन्दन ।। ७.१०७.६ ।।
satyenāhaṃ śape rājan svargaloke na caiva hi | na kāmaye yathā rājyaṃ tvāṃ vinā raghunandana || 7.107.6 ||
"हे राजन्! मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि स्वर्गलोक में भी नहीं, आपके बिना, हे रघुनंदन, मैं राज्य की कदापि इच्छा नहीं करता।"
श्लोक 7 (uttara.107.7)
इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्च नराधिप । कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् ।। ७.१०७.७ ।।
imau kuśalavau rājann abhiṣiñca narādhipa | kosaleṣu kuśaṃ vīram uttareṣu tathā lavam || 7.107.7 ||
"हे राजन्! हे नराधिप! इन दोनों कुश और लव को अभिषिक्त कीजिए -- वीर कुश को कोसल में, और उसी प्रकार लव को उत्तर कोसल में।"
श्लोक 8 (uttara.107.8)
शत्रुघ्नस्य तु गच्छन्तु दूतास्त्वरितविक्रमाः । इदं गमनमस्माकं स्वर्गायाख्यातु मा चिरम् ।। ७.१०७.८ ।।
śatrughnasya tu gacchantu dūtās tvaritavikramāḥ | idaṃ gamanam asmākaṃ svargāyākhyātu mā ciram || 7.107.8 ||
"और शत्रुघ्न के पास स्वच्छंद वेग से चलने वाले दूत जायें; बिना विलंब किये उन्हें हमारे इस स्वर्गगमन का समाचार दिया जाये।"
श्लोक 9 (uttara.107.9)
तच्छ्रुत्वा भरतेनोक्तं दृष्ट्वा चापि ह्यधोमुखान् । पौरान्दुःखेन सन्तप्तान्वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।। ७.१०७.९ ।।
tac chrutvā bharatenoktaṃ dṛṣṭvā cāpi hy adhomukhān | paurān duḥkhena santaptān vasiṣṭho vākyam abravīt || 7.107.9 ||
भरत की यह बात सुनकर, और दुःख से संतप्त, मुख नीचा किये हुए नागरिकों को देखकर, वसिष्ठ ने यह वचन कहा।
श्लोक 10 (uttara.107.10)
वत्स राम इमाः पश्य धरणीं प्रकृतीर्गताः । ज्ञात्वैषामीप्सितं कार्यं मा चैषां विप्रियं कृथाः ।। ७.१०७.१० ।।
vatsa rāma imāḥ paśya dharaṇīṃ prakṛtīr gatāḥ | jñātvaiṣām īpsitaṃ kāryaṃ mā caiṣāṃ vipriyaṃ kṛthāḥ || 7.107.10 ||
"हे वत्स राम! देखो, ये प्रजाजन धरती पर गिरे पड़े हैं। इनकी अभीष्ट इच्छा को जानकर इनका अप्रिय मत कीजिए।"
श्लोक 11 (uttara.107.11)
वसिष्ठस्य तु वाक्येन उत्थाप्य प्रकृतीजनम् । किं करोमीति काकुत्स्थः सर्वा वचनमब्रवीत् ।। ७.१०७.११ ।।
vasiṣṭhasya tu vākyena utthāpya prakṛtījanam | kiṃ karomīti kākutsthaḥ sarvā vacanam abravīt || 7.107.11 ||
वसिष्ठ के वचन से प्रजाजनों को उठाकर, काकुत्स्थ ने उन सबसे "मैं क्या करूँ?" यह वचन कहा।
श्लोक 12 (uttara.107.12)
ततः सर्वाः प्रकृतयो रामं वचनमब्रुवन् । गच्छन्तमनुगच्छामो यत्र राम गमिष्यसि ।। ७.१०७.१२ ।।
tataḥ sarvāḥ prakṛtayo rāmaṃ vacanam abruvan | gacchantam anugacchāmo yatra rāma gamiṣyasi || 7.107.12 ||
तब समस्त प्रजाजनों ने राम से यह वचन कहा -- "हे राम! जहाँ भी आप जायेंगे, आपके पीछे-पीछे हम भी चले चलेंगे।"
श्लोक 13 (uttara.107.13)
पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तमः । सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समागच्छाम सत्पथम् ।। ७.१०७.१३ ।।
paureṣu yadi te prītir yadi sneho hy anuttamaḥ | saputradārāḥ kākutstha samāgacchāma satpatham || 7.107.13 ||
"यदि आपको नगरवासियों पर प्रेम है, यदि आपका स्नेह सर्वोच्च है, तो हे काकुत्स्थ! हम अपने पुत्रों और पत्नियों सहित उसी सत्पथ पर आपके साथ चलें।"
श्लोक 14 (uttara.107.14)
तपोवनं वा दुर्गं वा नदीमम्भोनिधिं तथा । वयं ते यदि न त्याज्याः सर्वान्नो नय ईश्वर ।। ७.१०७.१४ ।।
tapovanaṃ vā durgaṃ vā nadīm ambhonidhiṃ tathā | vayaṃ te yadi na tyājyāḥ sarvān no naya īśvara || 7.107.14 ||
"चाहे तपोवन हो, चाहे दुर्गम स्थान हो, चाहे नदी हो या समुद्र -- यदि हम आपके त्याज्य नहीं हैं, तो हे ईश्वर! हम सबको साथ ले चलिए।"
श्लोक 15 (uttara.107.15)
एषा नः परमा प्रीतिरेष नः परमो वरः । हृद्गता नः सदा प्रीतिस्तवानुगमने नृप ।। ७.१०७.१५ ।।
eṣā naḥ paramā prītir eṣa naḥ paramo varaḥ | hṛdgatā naḥ sadā prītis tavānugamane nṛpa || 7.107.15 ||
"यही हमारी सबसे बड़ी प्रसन्नता है, यही हमारा सबसे बड़ा वरदान है; हे नृप! आपके अनुगमन में ही हमारे हृदय की प्रीति सदा टिकी है।"
श्लोक 16 (uttara.107.16)
पौराणां दृढभक्तिं च बाढमित्येव सो ऽब्रवीत् । स्वकृतान्तं चान्ववेक्ष्य तस्मिन्नहनि राघवः ।। ७.१०७.१६ ।।
paurāṇāṃ dṛḍhabhaktiṃ ca bāḍham ity eva so 'bravīt | svakṛtāntaṃ cānvavekṣya tasminn ahani rāghavaḥ || 7.107.16 ||
नागरिकों की इस दृढ़ भक्ति को देखकर राघव ने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकृति दे दी, और उसी दिन अपने निश्चित कर्तव्य पर विचार किया।
श्लोक 17 (uttara.107.17)
कोसलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् । अभिषिच्य महात्मानावुभौ रामः कुशीलवौ ।। ७.१०७.१७ ।।
kosaleṣu kuśaṃ vīram uttareṣu tathā lavam | abhiṣicya mahātmānāv ubhau rāmaḥ kuśīlavau || 7.107.17 ||
वीर कुश को कोसल में और उसी प्रकार लव को उत्तर कोसल में, राम ने उन दोनों महात्मा कुश और लव को अभिषिक्त कर दिया।
श्लोक 18 (uttara.107.18)
अभिषिक्तौ सुतावङ्के प्रतिष्ठाप्य पुरे ततः । परिष्वज्य महाबाहुर्मूर्ध्न्युपाघ्राय चासकृत् ।। ७.१०७.१८ ।।
abhiṣiktau sutāv aṅke pratiṣṭhāpya pure tataḥ | pariṣvajya mahābāhur mūrdhny upāghrāya cāsakṛt || 7.107.18 ||
उन दोनों अभिषिक्त पुत्रों को गोद में बिठाकर, फिर नगर में प्रतिष्ठित करके, महाबाहु राम ने उन्हें बार-बार गले लगाया और उनके मस्तक को सूँघा।
श्लोक 19 (uttara.107.19)
रथानां तु सहस्राणि नागानामयुतानि च । दशायुतानि चाश्वानामेकैकस्य धनं ददौ ।। ७.१०७.१९ ।।
rathānāṃ tu sahasrāṇi nāgānām ayutāni ca | daśāyutāni cāśvānām ekaikasya dhanaṃ dadau || 7.107.19 ||
उसने प्रत्येक को धनरूप में हजारों रथ, अगणित [असंख्य] हाथी और दस-दस अयुत [लाख] घोड़े प्रदान किये।
श्लोक 20 (uttara.107.20)
बहुरत्नौ बहुधनौ हृष्टपुष्टजनावृतौ । स्वे पुरे प्रेषयामास भ्रातरौ तु कुशीलवौ ।। ७.१०७.२० ।।
bahuratnau bahudhanau hṛṣṭapuṣṭajanāvṛtau | sve pure preṣayām āsa bhrātarau tu kuśīlavau || 7.107.20 ||
इस प्रकार बहुत रत्नों और बहुत धन से युक्त, प्रसन्न और पुष्ट जनों से घिरे हुए उन दोनों भाइयों, कुश और लव को उसने अपने-अपने नगर भेज दिया।
श्लोक 21 (uttara.107.21)
अभिषिच्य सुतौ वीरौ प्रतिष्ठाप्य पुरे तदा । दूतान्सम्प्रेषयामास शत्रुघ्नाय महात्मने ।। ७.१०७.२१ ।।
abhiṣicya sutau vīrau pratiṣṭhāpya pure tadā | dūtān sampreṣayām āsa śatrughnāya mahātmane || 7.107.21 ||
इस प्रकार अपने दोनों वीर पुत्रों को अभिषिक्त कर और नगर में प्रतिष्ठित करके, उसने महात्मा शत्रुघ्न के पास दूत भेजे।