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उत्तरकाण्ड · सर्ग 11

रावण का लंका-अधिकार

सर्ग 10सर्ग-सूचीसर्ग 12

श्लोक 1 (uttara.11.1)

सुमाली वरलब्धांस्तु ज्ञात्वा चैतान्निशाचरान् । उदतिष्ठद्भयं त्यक्त्वा सानुगः स रसातलात् ।। ११.१ ।।

sumālī varalabdhāṃs tu jñātvā caitān niśācarān | udatiṣṭhad bhayaṃ tyaktvā sānugaḥ sa rasātalāt || 11.1 ||

यह जानकर कि रावण और अन्य राक्षसों को वरदान प्राप्त हो चुका है, सुमाली भय त्यागकर अपने अनुयायियों सहित पाताल से बाहर निकल आया।

श्लोक 2 (uttara.11.2)

मारीचश्च प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदरः । उदतिष्ठन्सुसंरब्धाः सचिवास्तस्य रक्षसः ।। ११.२ ।।

mārīcaś ca prahastaś ca virūpākṣo mahodaraḥ | udatiṣṭhan susaṃrabdhāḥ sacivās tasya rakṣasaḥ || 11.2 ||

मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर — सुमाली के ये मंत्री-राक्षस भी बड़े उत्साह से उठ खड़े हुए।

श्लोक 3 (uttara.11.3)

सुमाली सचिवैः सार्धं वृतो राक्षसपुङ्गवैः । अभिगम्य दशग्रीवं परिष्वज्येदमब्रवीत् ।। ११.३ ।।

sumālī sacivaiḥ sārdhaṃ vṛto rākṣasapuṅgavaiḥ | abhigamya daśagrīvaṃ pariṣvajyedam abravīt || 11.3 ||

सुमाली अपने उन श्रेष्ठ राक्षस मंत्रियों से घिरा हुआ दशग्रीव के पास गया, उसे गले लगाया और यह बोला।

श्लोक 4 (uttara.11.4)

दिष्ट्या ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितो ऽयं मनोरथः । यस्त्वं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान्वरमुत्तमम् ।। ११.४ ।।

diṣṭyā te vatsa samprāptaś cintito 'yaṃ manorathaḥ | yas tvaṃ tribhuvanaśreṣṭhāl labdhavān varam uttamam || 11.4 ||

पुत्र, सौभाग्य से तुम्हारा वह मनोरथ पूर्ण हुआ जो तुमने संजोया था, कि तुमने त्रिभुवन के सबसे बड़े से उत्तम वरदान प्राप्त किया।

श्लोक 5 (uttara.11.5)

यत्कृते च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् । तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ।। ११.५ ।।

yatkṛte ca vayaṃ laṅkāṃ tyaktvā yātā rasātalam | tadgataṃ no mahābāho mahad viṣṇukṛtaṃ bhayam || 11.5 ||

हे महाबाहो, जिस विष्णु के भय से हमने लंका त्यागकर पाताल में शरण ली थी, वह बड़ा भय अब हमसे दूर हो गया है।

श्लोक 6 (uttara.11.6)

असकृत्तद्भयाद्भीताः परित्यज्य स्वमालयम् । विद्रुताः सहिताः सर्वे प्रविष्टाः स्म रसातलम् ।। ११.६ ।।

asakṛt tadbhayād bhītāḥ parityajya svam ālayam | vidrutāḥ sahitāḥ sarve praviṣṭāḥ sma rasātalam || 11.6 ||

बार-बार उसी भय से भयभीत होकर, अपना निवास छोड़कर, हम सब भागकर पाताल में प्रविष्ट हुए थे।

श्लोक 7 (uttara.11.7)

अस्मदीया च लङ्केयं नगरी राक्षसोचिता । निवेशिता तव भ्रात्रा धनाध्यक्षेण धीमता ।। ११.७ ।।

asmadīyā ca laṅkeyaṃ nagarī rākṣasocitā | niveśitā tava bhrātrā dhanādhyakṣeṇa dhīmatā || 11.7 ||

यह लंका नगरी हमारी ही थी, राक्षसों के योग्य; अब तुम्हारे बुद्धिमान भाई धनाध्यक्ष ने उसे बसा लिया है।

श्लोक 8 (uttara.11.8)

यदि नामात्र शक्यं स्यात्साम्ना दानेन वानघ । तरसा वा महाबाहो प्रत्यानेतुं कृतं भवेत् ।। ११.८ ।।

yadi nāmātra śakyaṃ syāt sāmnā dānena vānagha | tarasā vā mahābāho pratyānetuṃ kṛtaṃ bhavet || 11.8 ||

हे निष्पाप, यदि यहाँ साम से, दान से अथवा हे महाबाहो, बल से भी उसे वापस लाना संभव हो, तो वह उचित ही होगा।

श्लोक 9 (uttara.11.9)

त्वं तु लङ्केश्वरस्तात भविष्यसि न संशयः । त्वया राक्षसवंशो ऽयं निमग्नो ऽपि समुद्धृतः । सर्वेषां नः प्रभुश्चैव भविष्यसि महाबल ।। ११.९ ।।

tvaṃ tu laṅkeśvaras tāta bhaviṣyasi na saṃśayaḥ | tvayā rākṣasavaṃśo 'yaṃ nimagno 'pi samuddhṛtaḥ | sarveṣāṃ naḥ prabhuś caiva bhaviṣyasi mahābala || 11.9 ||

तुम ही निःसंदेह लंका के स्वामी बनोगे। तुमने ही इस डूबते हुए राक्षस-वंश का उद्धार किया है, और हे महाबल, तुम ही हम सबके स्वामी बनोगे।

श्लोक 10 (uttara.11.10)

अथाब्रवीद्दशग्रीवो मातामहमुपस्थितम् । वित्तेशो गुरुरस्माकं नार्हसे वक्तुमीदृशम् ।। ११.१० ।।

athābravīd daśagrīvo mātāmaham upasthitam | vitteśo gurur asmākaṃ nārhase vaktum īdṛśam || 11.10 ||

तब दशग्रीव ने अपने सामने खड़े नाना से कहा, "धनाध्यक्ष हमारे बड़े हैं, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए।"

श्लोक 11 (uttara.11.11)

साम्नापि राक्षसेन्द्रेण प्रत्याख्यातो गरीयसा । किञ्चिन्नाह तदा रक्षो ज्ञात्वा तस्य चकीर्षितम् ।। ११.११ ।।

sāmnāpi rākṣasendreṇa pratyākhyāto garīyasā | kiñcin nāha tadā rakṣo jñātvā tasya cakīrṣitam || 11.11 ||

राक्षसों के महान स्वामी द्वारा सामपूर्वक भी अस्वीकृत होकर, उस राक्षस ने उसका अभिप्राय समझकर उस समय कुछ नहीं कहा।

श्लोक 12 (uttara.11.12)

कस्यचित्त्वथ कालस्य वसन्तं रावणं ततः । उक्तवन्तं तथा वाक्यं दशग्रीवं निशाचरः ।। ११.१२ ।।

kasyacit tv atha kālasya vasantaṃ rāvaṇaṃ tataḥ | uktavantaṃ tathā vākyaṃ daśagrīvaṃ niśācaraḥ || 11.12 ||

फिर कुछ समय बीत जाने पर, उस प्रकार बोलकर बैठे हुए दशग्रीव को उस निशाचर ने देखा।

श्लोक 13 (uttara.11.13)

प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यमिदमाह स कारणम् ।। ११.१३ ।।

prahastaḥ praśritaṃ vākyam idam āha sa kāraṇam || 11.13 ||

प्रहस्त ने विनयपूर्ण किन्तु सकारण यह वचन कहा।

श्लोक 14 (uttara.11.14)

दशग्रीव महाबाहो नार्हस्त्वं वक्तुमीदृशम् । सौभ्रात्रं नास्ति शूराणां शृणु चेदं वचो मम ।। ११.१४ ।।

daśagrīva mahābāho nārhas tvaṃ vaktum īdṛśam | saubhrātraṃ nāsti śūrāṇāṃ śṛṇu cedaṃ vaco mama || 11.14 ||

"हे महाबाहो दशग्रीव, तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। शूरवीरों में सहोदरत्व का कोई बंधन नहीं होता, मेरी यह बात सुनो।"

श्लोक 15 (uttara.11.15)

अदितिश्च दितिश्चैव भगिन्यौ सहिते हि ते । भार्ये परमरूपिण्यौ कश्यपस्य प्रजापतेः ।। ११.१५ ।।

aditiś ca ditiś caiva bhaginyau sahite hi te | bhārye paramarūpiṇyau kaśyapasya prajāpateḥ || 11.15 ||

"अदिति और दिति दोनों बहनें थीं, परस्पर स्नेहयुक्त, दोनों परम रूपवती और प्रजापति कश्यप की पत्नियाँ थीं।"

श्लोक 16 (uttara.11.16)

अदितिर्जनयामास देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् । दितिस्त्वजनयत्पुत्रान्कश्यपस्यात्मसम्भवान् ।। ११.१६ ।।

aditir janayāmāsa devāṃs tribhuvaneśvarān | ditis tv ajanayat putrān kaśyapasyātmasambhavān || 11.16 ||

"अदिति ने त्रिभुवन के स्वामी देवताओं को जन्म दिया, और दिति ने कश्यप से ही उत्पन्न पुत्रों को जन्म दिया।"

श्लोक 17 (uttara.11.17)

दैत्यानां किल धर्मज्ञ पुरीयं सवनार्णवा । सपर्वता मही वीर ते ऽभवन्प्रभविष्णवः ।। ११.१७ ।।

daityānāṃ kila dharmajña purīyaṃ savanārṇavā | saparvatā mahī vīra te 'bhavan prabhaviṣṇavaḥ || 11.17 ||

"हे धर्मज्ञ वीर, यह सागरों और पर्वतों सहित समस्त पृथ्वी पहले दैत्यों की थी, वे ही इसके प्रभावशाली स्वामी थे।"

श्लोक 18 (uttara.11.18)

निहत्य तांस्तु समरे विष्णुना प्रभविष्णुना । देवानां वशमानीतं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।। ११.१८ ।।

nihatya tāṃs tu samare viṣṇunā prabhaviṣṇunā | devānāṃ vaśam ānītaṃ trailokyam idam avyayam || 11.18 ||

"किन्तु सामर्थ्यवान विष्णु ने युद्ध में उन्हें मारकर यह अविनाशी त्रैलोक्य देवताओं के अधीन कर दिया।"

श्लोक 19 (uttara.11.19)

नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम् । सुरासुरैराचरितं तत्कुरुष्व वचो मम ।। ११.१९ ।।

naitad eko bhavān eva kariṣyati viparyayam | surāsurair ācaritaṃ tat kuruṣva vaco mama || 11.19 ||

"जो कार्य देवताओं और असुरों ने मिलकर किया, उसे तुम अकेले पलट नहीं सकते — मेरी यह बात मान लो।"

श्लोक 20 (uttara.11.20)

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । चिन्तयित्वा मुहूर्तं वै बाढमित्येव सो ऽब्रवीत् ।। ११.२० ।।

evam ukto daśagrīvaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | cintayitvā muhūrtaṃ vai bāḍham ity eva so 'bravīt || 11.20 ||

यह सुनकर दशग्रीव मन ही मन प्रसन्न हुआ, क्षणभर विचार करके "बहुत अच्छा" कहकर सहमत हो गया।

श्लोक 21 (uttara.11.21)

स तु तेनैव हर्षेण तस्मिन्नहनि वीर्यवान् । वनं गतो दशग्रीवः सह तैः क्षणदाचरैः ।। ११.२१ ।।

sa tu tenaiva harṣeṇa tasminn ahani vīryavān | vanaṃ gato daśagrīvaḥ saha taiḥ kṣaṇadācaraiḥ || 11.21 ||

उसी हर्ष में, उसी दिन, वह वीर्यवान दशग्रीव उन निशाचरों के साथ वन को चला गया।

श्लोक 22 (uttara.11.22)

त्रिकूटस्थः स तु तदा दशग्रीवो निशाचरः । प्रेषयामास दौत्येन प्रहस्तं वाक्यकोविदम् ।। ११.२२ ।।

trikūṭasthaḥ sa tu tadā daśagrīvo niśācaraḥ | preṣayāmāsa dautyena prahastaṃ vākyakovidam || 11.22 ||

तब त्रिकूट पर्वत पर स्थित दशग्रीव ने वाक्यकुशल प्रहस्त को दूत बनाकर भेजा।

श्लोक 23 (uttara.11.23)

प्रहस्त शीघ्रं गच्छ त्वं ब्रूहि नैर्ऋतपुङ्गवम् । वचसा मम वित्तेशं सामपूर्वमिदं वचः ।। ११.२३ ।।

prahasta śīghraṃ gaccha tvaṃ brūhi nairṛtapuṅgavam | vacasā mama vitteśaṃ sāmapūrvam idaṃ vacaḥ || 11.23 ||

"प्रहस्त, शीघ्र जाओ और राक्षसश्रेष्ठ धनाध्यक्ष से मेरी ओर से सामपूर्वक यह वचन कहो —"

श्लोक 24 (uttara.11.24)

इयं लङ्का पुरी राजन्राक्षसानां महात्मनाम् । त्वया निवेशिता सौम्य नैतद्युक्तं तवानघ ।। ११.२४ ।।

iyaṃ laṅkā purī rājan rākṣasānāṃ mahātmanām | tvayā niveśitā saumya naitad yuktaṃ tavānagha || 11.24 ||

"यह लंकापुरी, हे राजन्, महात्मा राक्षसों की थी; हे सौम्य निष्पाप, तुमने इसमें निवास किया है, यह उचित नहीं।"

श्लोक 25 (uttara.11.25)

तद्भवान्यदि नो ह्यद्य दद्यादतुलविक्रम । कृता भवेन्मम प्रीतिर्धर्मश्चैवानुपालितः ।। ११.२५ ।।

tad bhavān yadi no hy adya dadyād atulavikrama | kṛtā bhaven mama prītir dharmaś caivānupālitaḥ || 11.25 ||

"हे अतुलपराक्रमी, यदि आप आज इसे हमें दे दें, तो मुझे प्रसन्नता होगी और धर्म का भी पालन होगा।"

श्लोक 26 (uttara.11.26)

स तु गत्वा पुरीं लङ्कां धनदेन सुरक्षिताम् । अब्रवीत्परमोदारं वित्तपालमिदं वचः ।। ११.२६ ।।

sa tu gatvā purīṃ laṅkāṃ dhanadena surakṣitām | abravīt paramodāraṃ vittapālam idaṃ vacaḥ || 11.26 ||

वह प्रहस्त धनद द्वारा सुरक्षित लंकापुरी में जाकर उस उदार धनपाल से यह बोला।

श्लोक 27 (uttara.11.27)

प्रेषितो ऽहं तव भ्रात्रा दशग्रीवेण सुव्रत । त्वत्समीपं महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वर ।। ११.२७ ।।

preṣito 'haṃ tava bhrātrā daśagrīveṇa suvrata | tvatsamīpaṃ mahābāho sarvaśastrabhṛtāṃ vara || 11.27 ||

"हे सुव्रत, हे महाबाहो, हे सर्वशस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, मुझे आपके भाई दशग्रीव ने आपके पास भेजा है।"

श्लोक 28 (uttara.11.28)

तच्छ्रूयतां महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । वचनं मम वित्तेश यद्ब्रवीति दशाननः ।। ११.२८ ।।

tac chrūyatāṃ mahāprājña sarvaśāstraviśārada | vacanaṃ mama vitteśa yad bravīti daśānanaḥ || 11.28 ||

"हे महाप्राज्ञ, सर्वशास्त्रविशारद धनेश, दशानन जो कहते हैं वह वचन सुनिए।"

श्लोक 29 (uttara.11.29)

इयं किल पुरी रम्या सुमालिप्रमुखैः पुरा । भुक्तपूर्वा विशालाक्ष राक्षसैर्भीमविक्रमैः ।। ११.२९ ।।

iyaṃ kila purī ramyā sumālipramukhaiḥ purā | bhuktapūrvā viśālākṣa rākṣasair bhīmavikramaiḥ || 11.29 ||

"हे विशालाक्ष, यह सुंदर नगरी पहले सुमाली आदि भीमपराक्रमी राक्षसों द्वारा भोगी जाती थी।"

श्लोक 30 (uttara.11.30)

तेन विज्ञाप्यते सो ऽयं साम्प्रतं विश्रवात्मज । तदेषा दीयतां तात याचतस्तस्य सामतः ।। ११.३० ।।

tena vijñāpyate so 'yaṃ sāmprataṃ viśravātmaja | tad eṣā dīyatāṃ tāta yācatas tasya sāmataḥ || 11.30 ||

"हे विश्रवानन्दन, इसी कारण वे अब निवेदन करते हैं — पिताजी, सामपूर्वक याचना करने वाले उन्हें यह नगरी दे दी जाए।"

श्लोक 31 (uttara.11.31)

प्रहस्तादभिसंश्रुत्य देवो वैश्रवणो वचः । प्रत्युवाच प्रहस्तं तं वाक्यं वाक्यविशारदः ।। ११.३१ ।।

prahastād abhisaṃśrutya devo vaiśravaṇo vacaḥ | pratyuvāca prahastaṃ taṃ vākyaṃ vākyaviśāradaḥ || 11.31 ||

प्रहस्त से यह वचन सुनकर वाक्यविशारद देव वैश्रवण ने प्रहस्त को यह उत्तर दिया।

श्लोक 32 (uttara.11.32)

दत्ता ममेयं पित्रा तु लङ्का शून्या निशाचरैः । निवासिते च मे यक्षैर्दानमानादिभिर्गुणैः ।। ११.३२ ।।

dattā mameyaṃ pitrā tu laṅkā śūnyā niśācaraiḥ | nivāsite ca me yakṣair dānamānādibhir guṇaiḥ || 11.32 ||

"यह लंका, जो निशाचरों से रहित थी, मेरे पिता ने मुझे दी थी, और मैंने ही दान-मान आदि गुणों वाले यक्षों से इसे बसाया।"

श्लोक 33 (uttara.11.33)

ब्रूहि गच्छ दशग्रीवं पुरं राज्यं च यन्मम । तवाप्येतन्महाबाहो भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ।। ११.३३ ।।

brūhi gaccha daśagrīvaṃ puraṃ rājyaṃ ca yan mama | tavāpy etan mahābāho bhuṅkṣva rājyam akaṇṭakam || 11.33 ||

"जाकर दशग्रीव से कहो — यह नगरी और राज्य मेरा है, फिर भी हे महाबाहो, यह निष्कंटक राज्य तुम्हारे लिए भी है, इसे भोगो।"

श्लोक 34 (uttara.11.34)

एवमुक्त्वा धनाध्यक्षो जगाम पितुरन्तिकम् ।। ११.३४ ।।

evam uktvā dhanādhyakṣo jagāma pitur antikam || 11.34 ||

यह कहकर धनाध्यक्ष अपने पिता के पास गया।

श्लोक 35 (uttara.11.35)

अभिवाद्य गुरुं प्राह रावणस्य यदीप्सितम् । एष तात दशग्रीवो दूतं प्रेषितवान्मम ।। ११.३५ ।।

abhivādya guruṃ prāha rāvaṇasya yad īpsitam | eṣa tāta daśagrīvo dūtaṃ preṣitavān mama || 11.35 ||

गुरु को प्रणाम करके उसने रावण की इच्छा बताई — "पिताजी, दशग्रीव ने मेरे पास यह दूत भेजा है।"

श्लोक 36 (uttara.11.36)

दीयतां नगरी लङ्का पूर्वं रक्षोगणोषिता । मयात्र यदनुष्ठेयं तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।। ११.३६ ।।

dīyatāṃ nagarī laṅkā pūrvaṃ rakṣogaṇoṣitā | mayātra yad anuṣṭheyaṃ tan mamācakṣva suvrata || 11.36 ||

"पहले राक्षसगणों से बसी हुई लंकानगरी दे दी जाए — इसमें मुझे क्या करना चाहिए, हे सुव्रत, यह मुझे बताइए।"

श्लोक 37 (uttara.11.37)

ब्रह्मर्षिस्त्वेवमुक्तो ऽसौ विश्रवा मुनिपुङ्गवः । प्राञ्जलिं धनदं प्राह शृणु पुत्र वचो मम ।। ११.३७ ।।

brahmarṣis tv evam ukto 'sau viśravā munipuṅgavaḥ | prāñjaliṃ dhanadaṃ prāha śṛṇu putra vaco mama || 11.37 ||

इस प्रकार कहे जाने पर ब्रह्मर्षि विश्रवा मुनिश्रेष्ठ ने हाथ जोड़े खड़े धनद से कहा — "पुत्र, मेरी बात सुनो।"

श्लोक 38 (uttara.11.38)

दशग्रीवो महाबाहुरुक्तवान्मम सन्निधौ । मया निर्भर्त्सितश्चासीद्बहुशोक्तः सुदुर्मतिः ।। ११.३८ ।।

daśagrīvo mahābāhur uktavān mama sannidhau | mayā nirbhartsitaś cāsīd bahuśo 'ktaḥ sudurmatiḥ || 11.38 ||

"मेरे सामने महाबाहु दशग्रीव ने ऐसी बात कही थी; मैंने उस दुर्बुद्धि को कई बार डांटा भी था।"

श्लोक 39 (uttara.11.39)

स क्रोधेन मया चोक्तो ध्वंसते च पुनः पुनः । श्रेयो ऽभियुक्तं धर्म्यं च शृणु पुत्र वचो मम ।। ११.३९ ।।

sa krodhena mayā cokto dhvaṃsate ca punaḥ punaḥ | śreyo 'bhiyuktaṃ dharmyaṃ ca śṛṇu putra vaco mama || 11.39 ||

"क्रोध में आकर मैंने बार-बार उससे कहा 'तुम नष्ट हो जाओगे'; अब पुत्र, मेरी यह हितकर और धर्मयुक्त बात सुनो।"

श्लोक 40 (uttara.11.40)

वरप्रदानसम्मूढो मान्या ऽमान्यान् स दुर्मतिः । न वेत्ति मम शापाच्च प्रकृतिं दारुणां गतः ।। ११.४० ।।

varapradānasammūḍho mānyāmānyān sa durmatiḥ | na vetti mama śāpāc ca prakṛtiṃ dāruṇāṃ gataḥ || 11.40 ||

"वरदान पाकर मोहग्रस्त वह दुर्बुद्धि अब मान्य-अमान्य का भेद नहीं जानता; मेरे शाप से भी उसका स्वभाव क्रूर हो गया है।"

श्लोक 41 (uttara.11.41)

तस्माद्गच्छ महाबाहो कैलासं धरणीधरम् । निवेशय निवासार्थं त्यक्त्वा लङ्कां सहानुगः ।। ११.४१ ।।

tasmād gaccha mahābāho kailāsaṃ dharaṇīdharam | niveśaya nivāsārthaṃ tyaktvā laṅkāṃ sahānugaḥ || 11.41 ||

"इसलिए, हे महाबाहो, तुम कैलास पर्वत को जाओ और लंका त्यागकर वहीं अपने अनुयायियों सहित निवास बसाओ।"

श्लोक 42 (uttara.11.42)

तत्र मन्दाकिनी रम्या नदीनामुत्तमा नदी । काञ्चनैः सूर्यसङ्काशैः पङ्कजैः संवृतोदका ।। ११.४२ ।।

tatra mandākinī ramyā nadīnām uttamā nadī | kāñcanaiḥ sūryasaṅkāśaiḥ paṅkajaiḥ saṃvṛtodakā || 11.42 ||

"वहाँ नदियों में श्रेष्ठ सुंदर मंदाकिनी बहती है, जिसका जल सूर्य के समान चमकीले सुनहरे कमलों से आच्छादित है।"

श्लोक 43 (uttara.11.43)

कुमुदैरुत्पलैश्चैव तथा ऽन्यैश्च सुगन्धिभिः ।। ११.४३ ।।

kumudair utpalaiś caiva tathānyaiś ca sugandhibhiḥ || 11.43 ||

"साथ ही कुमुद, उत्पल और अन्य सुगंधित पुष्पों से भी वह सुशोभित है।"

श्लोक 44 (uttara.11.44)

तत्र देवाः सगन्धर्वाः साप्सरोरगकिंनराः । विहारशीलाः सततं रमन्ते सर्वदा ऽश्रिताः ।। ११.४४ ।।

tatra devāḥ sagandharvāḥ sāpsaroragakiṃnarāḥ | vihāraśīlāḥ satataṃ ramante sarvadāśritāḥ || 11.44 ||

"वहाँ गंधर्वों, अप्सराओं, नागों और किन्नरों सहित देवगण सदा विहार करते हुए आनंद लेते हैं।"

श्लोक 45 (uttara.11.45)

न हि क्षमं तवानेन वैरं धनद रक्षसा । जानीषे हि यथा ऽनेन लब्धः परमको वरः ।। ११.४५ ।।

na hi kṣamaṃ tavānena vairaṃ dhanada rakṣasā | jānīṣe hi yathānena labdhaḥ paramako varaḥ || 11.45 ||

"हे धनद, इस राक्षस से वैर रखना तुम्हारे लिए उचित नहीं, क्योंकि तुम जानते ही हो कि इसने कैसा उत्कृष्ट वरदान पाया है।"

श्लोक 46 (uttara.11.46)

एवमुक्तो गृहीत्वा ऽऽशु तद्वचः पितृगौरवात् । सदारपुत्रः सामात्यः सवाहनधनो गतः ।। ११.४६ ।।

evam ukto gṛhītvāśu tadvacaḥ pitṛgauravāt | sadāraputraḥ sāmātyaḥ savāhanadhano gataḥ || 11.46 ||

यह सुनकर, पिता के वचन का सम्मान करते हुए, वह तत्काल अपनी पत्नियों-पुत्रों, मंत्रियों तथा वाहन-धन सहित वहाँ से चल पड़ा।

श्लोक 47 (uttara.11.47)

प्रहस्तो ऽथ दशग्रीवं गत्वा वचनमब्रवीत् । प्रहृष्टात्मा महात्मानं सहामात्यं सहानुजम् ।। ११.४७ ।।

prahasto 'tha daśagrīvaṃ gatvā vacanam abravīt | prahṛṣṭātmā mahātmānaṃ sahāmātyaṃ sahānujam || 11.47 ||

तब प्रहस्त प्रसन्नचित्त होकर मंत्रियों और अनुजों सहित बैठे उस महात्मा दशग्रीव के पास जाकर बोला।

श्लोक 48 (uttara.11.48)

शून्या सा नगरी लङ्का त्यक्त्वैनां धनदो गतः । प्रविश्य तां सहास्माभिः स्वधर्मं प्रतिपालय ।। ११.४८ ।।

śūnyā sā nagarī laṅkā tyaktvaināṃ dhanado gataḥ | praviśya tāṃ sahāsmābhiḥ svadharmaṃ pratipālaya || 11.48 ||

"वह लंकानगरी अब खाली है, धनद उसे त्यागकर चले गए हैं। इसमें हमारे साथ प्रवेश करके अपने धर्म का पालन कीजिए।"

श्लोक 49 (uttara.11.49)

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहस्तेन महाबलः । विवेश नगरीं लङ्कां भ्रातृभिः सबलानुगैः ।। ११.४९ ।।

evam ukto daśagrīvaḥ prahastena mahābalaḥ | viveśa nagarīṃ laṅkāṃ bhrātṛbhiḥ sabalānugaiḥ || 11.49 ||

प्रहस्त द्वारा यह कहे जाने पर महाबली दशग्रीव अपने भाइयों, सेना और अनुयायियों सहित लंकानगरी में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 50 (uttara.11.50)

धनदेन परित्यक्तां सुविभक्तमहापथाम् । आरुरोह स देवारिः स्वर्गं देवाधिपो यथा ।। ११.५० ।।

dhanadena parityaktāṃ suvibhaktamahāpathām | āruroha sa devāriḥ svargaṃ devādhipo yathā || 11.50 ||

धनद द्वारा त्यागी गई, सुव्यवस्थित राजमार्गों वाली उस नगरी में वह देवशत्रु ऐसे चढ़ा जैसे देवराज स्वर्ग में चढ़ता है।

श्लोक 51 (uttara.11.51)

स चाभिषिक्तः क्षणदाचरैस्तदा निवेशयामास पुरीं दशाननः । निकामपूर्णा च बभूव सा पुरी निशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः ।। ११.५१ ।।

sa cābhiṣiktaḥ kṣaṇadācarais tadā niveśayāmāsa purīṃ daśānanaḥ | nikāmapūrṇā ca babhūva sā purī niśācarair nīlabalāhakopamaiḥ || 11.51 ||

तब निशाचरों द्वारा अभिषिक्त होकर दशानन ने उस नगरी में निवास किया, और वह नगरी नीले मेघों जैसे निशाचरों से भरपूर हो गई।

श्लोक 52 (uttara.11.52)

धनेश्वरस्त्वथ पितृवाक्यगौरवान्न्यवेशयच्छशिविमले गिरौ पुरीम् । स्वलङ्कृतैर्भवनवरैर्विभूषितां पुरन्दरस्येव तदा ऽमरावतीम् ।। ११.५२ ।।

dhaneśvaras tv atha pitṛvākyagauravān nyaveśayac chaśivimale girau purīm | svalaṅkṛtair bhavanavarair vibhūṣitāṃ purandarasyeva tadāmarāvatīm || 11.52 ||

और धनेश्वर ने पिता के वचन का सम्मान करते हुए चन्द्रमा-सी उज्ज्वल पर्वतशिखर पर अपनी नगरी बसाई — सुसज्जित उत्तम भवनों से विभूषित वह नगरी उस समय मानो इन्द्र की अमरावती ही थी।

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