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उत्तरकाण्ड · सर्ग 13

कुम्भकर्ण की निद्रा और कुबेर-दूत का वध

सर्ग 12सर्ग-सूचीसर्ग 14

श्लोक 1 (uttara.13.1)

अथ लोकेश्वरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित् । निद्रा समभवत्तीव्रा कुम्भकर्णस्य रूपिणी ।। १३.१ ।।

atha lokeśvarotsṛṣṭā tatra kālena kenacit | nidrā samabhavat tīvrā kumbhakarṇasya rūpiṇī || 13.1 ||

तब लोकेश्वर (ब्रह्मा) द्वारा भेजी हुई, कुछ समय बाद, कुम्भकर्ण को मूर्तिमान-सी तीव्र निद्रा घेरने लगी।

श्लोक 2 (uttara.13.2)

ततो भ्रातरमासीनं कुम्भकर्णो ऽब्रवीद्वचः । निद्रा मां बाधते राजन्कारयस्व ममालयम् ।। १३.२ ।।

tato bhrātaram āsīnaṃ kumbhakarṇo 'bravīd vacaḥ | nidrā māṃ bādhate rājan kārayasva mamālayam || 13.2 ||

तब कुम्भकर्ण ने बैठे हुए अपने भाई से कहा — "हे राजन्, मुझे नींद सता रही है, मेरे लिए एक आवास बनवा दो।"

श्लोक 3 (uttara.13.3)

विनियुक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत् । विस्तीर्णं योजनं शुभ्रं ततो द्विगुणमायतम् ।। १३.३ ।।

viniyuktās tato rājñā śilpino viśvakarmavat | vistīrṇaṃ yojanaṃ śubhraṃ tato dviguṇam āyatam || 13.3 ||

तब राजा ने विश्वकर्मा जैसे शिल्पियों को नियुक्त किया, जिन्होंने एक योजन चौड़ा और उससे दुगुना लंबा, उज्ज्वल भवन बनाया।

श्लोक 4 (uttara.13.4)

दर्शनीयं निराबाधं कुम्भकर्णस्य चक्रिरे । स्फाटिकैः काञ्चनैश्चित्रैः स्तम्भैः सर्वत्र शोभितम् ।। १३.४ ।।

darśanīyaṃ nirābādhaṃ kumbhakarṇasya cakrire | sphāṭikaiḥ kāñcanaiś citraiḥ stambhaiḥ sarvatra śobhitam || 13.4 ||

उन्होंने कुम्भकर्ण के लिए एक दर्शनीय, बाधारहित भवन बनाया, जो स्फटिक और स्वर्ण के विचित्र स्तंभों से सर्वत्र सुशोभित था।

श्लोक 5 (uttara.13.5)

वैडूर्यकृतसोपानं किङ्किणीजालकं तथा । दान्ततोरणविन्यस्तं वज्रस्फटिकवेदिकम् ।। १३.५ ।।

vaiḍūryakṛtasopānaṃ kiṅkiṇījālakaṃ tathā | dāntatoraṇavinyastaṃ vajrasphaṭikavedikam || 13.5 ||

उसकी सीढ़ियाँ वैडूर्यमणि से बनी थीं, वह छोटी घंटियों के जाल से सुसज्जित था, उसके द्वार हाथीदाँत के तोरणों से युक्त थे, और वेदिकाएँ वज्र तथा स्फटिक से बनी थीं।

श्लोक 6 (uttara.13.6)

मनोहरं सर्वसुखं कारयामास राक्षसः । सर्वत्र सुखदं नित्यं मेरोः पुण्यां गुहामिव ।। १३.६ ।।

manoharaṃ sarvasukhaṃ kārayāmāsa rākṣasaḥ | sarvatra sukhadaṃ nityaṃ meroḥ puṇyāṃ guhām iva || 13.6 ||

उस राक्षस ने वह मनोहर, सर्वसुखयुक्त भवन बनवाया, जो सर्वत्र सदा सुख देने वाला था, मानो मेरु पर्वत की पावन गुफा हो।

श्लोक 7 (uttara.13.7)

तत्र निद्रां समाविष्टः कुम्भकर्णो महाबलः । बहून्यब्दसहस्राणि शयानो न प्रबुद्ध्यते ।। १३.७ ।।

tatra nidrāṃ samāviṣṭaḥ kumbhakarṇo mahābalaḥ | bahūny abdasahasrāṇi śayāno na prabudhyate || 13.7 ||

वहाँ निद्रामग्न होकर वह महाबली कुम्भकर्ण हजारों वर्षों तक सोया रहता था और जागता नहीं था।

श्लोक 8 (uttara.13.8)

निद्राभिभूते तु तदा कुम्भकर्णे दशाननः । देवर्षियक्षगन्धर्वान्सञ्जघ्ने हि निरङ्कुशः ।। १३.८ ।।

nidrābhibhūte tu tadā kumbhakarṇe daśānanaḥ | devarṣiyakṣagandharvān sañjaghne hi niraṅkuśaḥ || 13.8 ||

जब कुम्भकर्ण निद्रा के वशीभूत था, तब दशानन निरंकुश होकर देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गंधर्वों का संहार करने लगा।

श्लोक 9 (uttara.13.9)

उद्यानानि च चित्राणि नन्दनादीनि यानि च । तानि गत्वा सुसङ्क्रुद्धो भिनत्ति स्म दशाननः ।। १३.९ ।।

udyānāni ca citrāṇi nandanādīni yāni ca | tāni gatvā susaṅkruddho bhinatti sma daśānanaḥ || 13.9 ||

वह दशानन उन सुंदर उद्यानों में, जो नंदनवन आदि थे, जाकर अत्यंत क्रुद्ध होकर उन्हें उजाड़ देता था।

श्लोक 10 (uttara.13.10)

नदीं गज इव क्रीडन्वृक्षान्वायुरिव क्षिपन् । नगान्वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षसः ।। १३.१० ।।

nadīṃ gaja iva krīḍan vṛkṣān vāyur iva kṣipan | nagān vajra ivotsṛṣṭo vidhvaṃsayati rākṣasaḥ || 13.10 ||

वह राक्षस, नदी में हाथी के समान क्रीड़ा करता, वृक्षों को वायु के समान उखाड़ता, और पर्वतों को छोड़े हुए वज्र के समान नष्ट कर देता था।

श्लोक 11 (uttara.13.11)

तथावृत्तं तु विज्ञाय दशग्रीवं धनेश्वरः । कुलानुरूपं धर्मज्ञो वृत्तं संस्मृत्य चात्मनः ।। १३.११ ।।

tathāvṛttaṃ tu vijñāya daśagrīvaṃ dhaneśvaraḥ | kulānurūpaṃ dharmajño vṛttaṃ saṃsmṛtya cātmanaḥ || 13.11 ||

दशग्रीव का ऐसा आचरण जानकर, धर्मज्ञ धनेश्वर ने अपने कुल के अनुरूप अपने ही आचरण का स्मरण करते हुए —

श्लोक 12 (uttara.13.12)

सौभ्रात्रदर्शनार्थं तु दूतं वैश्रवणस्तदा । लङ्कां सम्प्रेषयामास दशग्रीवस्य वै हितम् ।। १३.१२ ।।

saubhrātradarśanārthaṃ tu dūtaṃ vaiśravaṇas tadā | laṅkāṃ sampreṣayāmāsa daśagrīvasya vai hitam || 13.12 ||

भाईचारे का उदाहरण दिखाने के लिए वैश्रवण ने तब दशग्रीव के हित के लिए लंका को एक दूत भेजा।

श्लोक 13 (uttara.13.13)

स गत्वा नगरीं लङ्कामाससाद विभीषणम् । मानितस्तेन धर्मेण पृष्टश्चागमनं प्रति ।। १३.१३ ।।

sa gatvā nagarīṃ laṅkām āsasāda vibhīṣaṇam | mānitas tena dharmeṇa pṛṣṭaś cāgamanaṃ prati || 13.13 ||

वह दूत लंकानगरी जाकर विभीषण के पास पहुँचा; विभीषण ने धर्मपूर्वक उसका सम्मान किया और उसके आगमन का कारण पूछा।

श्लोक 14 (uttara.13.14)

पृष्ट्वा च कुशलं राज्ञो ज्ञातीनां च बिभीषणः । सभायां दर्शयामास तमासीनं दशाननम् ।। १३.१४ ।।

pṛṣṭvā ca kuśalaṃ rājño jñātīnāṃ ca bibhīṣaṇaḥ | sabhāyāṃ darśayāmāsa tam āsīnaṃ daśānanam || 13.14 ||

विभीषण ने राजा और कुटुम्बियों की कुशल-क्षेम पूछकर उसे सभा में ले जाकर वहाँ बैठे दशानन को दिखाया।

श्लोक 15 (uttara.13.15)

स दृष्ट्वा तत्र राजानं दीप्यमानं स्वतेजसा । जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत ।। १३.१५ ।।

sa dṛṣṭvā tatra rājānaṃ dīpyamānaṃ svatejasā | jayeti vācā sampūjya tūṣṇīṃ samabhivartata || 13.15 ||

उस दूत ने वहाँ अपने तेज से देदीप्यमान राजा को देखकर, "जय हो" कहकर सम्मान किया और मौन होकर उसके सामने खड़ा हुआ।

श्लोक 16 (uttara.13.16)

तं तत्रोत्तमपर्यङ्के वरास्तरणशोभिते । उपविष्टं दशग्रीवं दूतो वाक्यमथाब्रवीत् ।। १३.१६ ।।

taṃ tatrottamaparyaṅke varāstaraṇaśobhite | upaviṣṭaṃ daśagrīvaṃ dūto vākyam athābravīt || 13.16 ||

उस उत्तम पलंग पर, उत्कृष्ट बिछौने से सुशोभित, बैठे हुए दशग्रीव से दूत ने यह वचन कहा।

श्लोक 17 (uttara.13.17)

राजन्वदामि ते सर्वं भ्राता तव यदब्रवीत् । उभयोः सदृशं वीर वृत्तस्य च कुलस्य च ।। १३.१७ ।।

rājan vadāmi te sarvaṃ bhrātā tava yad abravīt | ubhayoḥ sadṛśaṃ vīra vṛttasya ca kulasya ca || 13.17 ||

"हे राजन्, आपके भाई ने जो कुछ कहा, वह सब मैं आपसे कहता हूँ; हे वीर, यह बात दोनों के आचरण और कुल के अनुरूप ही है।"

श्लोक 18 (uttara.13.18)

साधु पर्याप्तमेतावत्कृतश्चारित्रसङ्ग्रहः । साधु धर्मे व्यवस्थानं क्रियतां यदि शक्यते ।। १३.१८ ।।

sādhu paryāptam etāvat kṛtaś cāritrasaṅgrahaḥ | sādhu dharme vyavasthānaṃ kriyatāṃ yadi śakyate || 13.18 ||

"अब तक जो आचरण किया, वह पर्याप्त है, बहुत हो चुका; यदि संभव हो तो अब धर्म में स्थिर हो जाइए।"

श्लोक 19 (uttara.13.19)

दृष्टं मे नन्दनं भग्नमृषयो निहताः श्रुताः । देवतानां समुद्योगस्त्वत्तो राजन्मम श्रुतः ।। १३.१९ ।।

dṛṣṭaṃ me nandanaṃ bhagnam ṛṣayo nihatāḥ śrutāḥ | devatānāṃ samudyogas tvatto rājan mama śrutaḥ || 13.19 ||

"मैंने नंदनवन को उजड़ा देखा है, सुना है कि ऋषि मारे गए हैं; हे राजन्, यह भी सुना है कि आपके कारण देवता तैयारी कर रहे हैं।"

श्लोक 20 (uttara.13.20)

निराकृतश्च बहुशस्त्वया ऽहं राक्षसाधिप । अपराद्धा हि बाल्याच्च रमणीयाः स्वबान्धवाः ।। १३.२० ।।

nirākṛtaś ca bahuśas tvayāhaṃ rākṣasādhipa | aparāddhā hi bālyāc ca ramaṇīyāḥ svabāndhavāḥ || 13.20 ||

"हे राक्षसाधिप, आपने मुझे कई बार तिरस्कृत किया है; फिर भी बचपन की भूल से भी प्रिय बंधुजन अपराध कर बैठते हैं (और क्षम्य होते हैं)।"

श्लोक 21 (uttara.13.21)

अहं तु हिमवत्पृष्ठं गतो धर्ममुपासितुम् । रौद्रं व्रतं समास्थाय नियतो नियतेन्द्रियः ।। १३.२१ ।।

ahaṃ tu himavatpṛṣṭhaṃ gato dharmam upāsitum | raudraṃ vrataṃ samāsthāya niyato niyatendriyaḥ || 13.21 ||

"मैं तो हिमालय की चोटी पर धर्म-उपासना के लिए गया था, वहाँ रौद्र व्रत धारण कर, संयमित और नियतेन्द्रिय होकर।"

श्लोक 22 (uttara.13.22)

तत्र देवो मया दृष्टः सह देव्या मया प्रभुः । सव्यं चक्षुर्मया दैवात्तत्र देव्यां निपातितम् ।। १३.२२ ।।

tatra devo mayā dṛṣṭaḥ saha devyā mayā prabhuḥ | savyaṃ cakṣur mayā daivāt tatra devyāṃ nipātitam || 13.22 ||

"वहाँ मैंने प्रभु महादेव को देवी सहित देखा; दैवयोग से मेरी बायीं आँख वहाँ देवी पर जा पड़ी।"

श्लोक 23 (uttara.13.23)

का न्वियं स्यादिति शुभा न खल्वन्येन हेतुना । रूपं ह्यनुपमं कृत्वा रुद्राणी तत्र तिष्ठति ।। १३.२३ ।।

kā nv iyaṃ syād iti śubhā na khalv anyena hetunā | rūpaṃ hy anupamaṃ kṛtvā rudrāṇī tatra tiṣṭhati || 13.23 ||

मैंने सोचा "यह शुभा कौन होगी" — किसी अन्य कारण से नहीं, अपितु रुद्राणी ने वहाँ अनुपम रूप धारण कर रखा था, इसीलिए।

श्लोक 24 (uttara.13.24)

देव्या दिव्यप्रभावेण दग्धं सव्यं ममेक्षणम् । रेणुध्वस्तमिव ज्योतिः पिङ्गुलत्वमुपागतम् ।। १३.२४ ।।

devyā divyaprabhāveṇa dagdhaṃ savyaṃ mamekṣaṇam | reṇudhvastam iva jyotiḥ piṅgulatvam upāgatam || 13.24 ||

देवी के दिव्य प्रभाव से मेरी बायीं आँख जल गई, वह धूल से धुंधले हुए प्रकाश की भांति भूरी (पिंगल) हो गई।

श्लोक 25 (uttara.13.25)

ततो ऽहमन्यद्विस्तीर्णं गत्वा तस्य गिरेस्तटम् । तूष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समाधारं महाव्रतम् ।। १३.२५ ।।

tato 'ham anyad vistīrṇaṃ gatvā tasya girestaṭam | tūṣṇīṃ varṣaśatāny aṣṭau samādhāraṃ mahāvratam || 13.25 ||

"तब मैंने उस पर्वत के एक अन्य विस्तीर्ण तट पर जाकर, मौन रहते हुए, आठ सौ वर्षों तक उस महाव्रत को धारण किए रखा।"

श्लोक 26 (uttara.13.26)

समाप्ते नियमे तस्मिंस्तत्र देवो महेश्वरः । प्रीतः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभुः ।। १३.२६ ।।

samāpte niyame tasmiṃs tatra devo maheśvaraḥ | prītaḥ prītena manasā prāha vākyam idaṃ prabhuḥ || 13.26 ||

वह नियम पूर्ण होने पर, वहाँ प्रभु महेश्वर प्रसन्न मन से प्रसन्न होकर मुझसे यह वचन बोले।

श्लोक 27 (uttara.13.27)

पैङ्गल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूपनिरीक्षणात् । प्रीतो ऽस्मि तव धर्मज्ञ तपसानेन सुव्रत ।। १३.२७ ।।

paiṅgalyaṃ yad avāptaṃ hi devyā rūpanirīkṣaṇāt | prīto 'smi tava dharmajña tapasānena suvrata || 13.27 ||

"जो पिंगलता तुम्हें देवी का रूप देखने से प्राप्त हुई, हे धर्मज्ञ, हे सुव्रत, इस तप से मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।"

श्लोक 28 (uttara.13.28)

मया चैतद्व्रतं चीर्णं त्वया चैव धनाधिप । तृतीयः पुरुषो नास्ति यश्चरेव्रतमीदृशम् ।। १३.२८ ।।

mayā caitad vrataṃ cīrṇaṃ tvayā caiva dhanādhipa | tṛtīyaḥ puruṣo nāsti yaś carev vratam īdṛśam || 13.28 ||

"हे धनाधिप, यह व्रत मैंने भी किया है और तुमने भी; तीसरा कोई पुरुष नहीं जो ऐसा व्रत कर सके।"

श्लोक 29 (uttara.13.29)

व्रतं सुनिश्चयं ह्येतन्मया ह्युत्पादितं पुरा । तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर ।। १३.२९ ।।

vrataṃ suniścayaṃ hy etan mayā hy utpāditaṃ purā | tatsakhitvaṃ mayā saumya rocayasva dhaneśvara || 13.29 ||

"यह व्रत मैंने ही स्वयं पहले उत्पन्न किया था; इसलिए, हे सौम्य धनेश्वर, मुझसे सखा-भाव स्वीकार करो।"

श्लोक 30 (uttara.13.30)

तपसा निर्जितश्चैव सखा भव ममानघ । देव्या दग्धं प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम् ।। १३.३० ।।

tapasā nirjitaś caiva sakhā bhava mamānagha | devyā dagdhaṃ prabhāveṇa yac ca savyaṃ tavekṣaṇam || 13.30 ||

"हे निष्पाप, तप से जीते जाकर मेरे सखा बनो; और देवी के प्रभाव से जो तुम्हारी बायीं आँख जल गई है,"

श्लोक 31 (uttara.13.31)

एकाक्षिपिङ्गलेत्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम् । एवं तेन सखित्वं च प्राप्यानुज्ञां च शङ्करात् ।। १३.३१ ।।

ekākṣipiṅgalety eva nāma sthāsyati śāśvatam | evaṃ tena sakhitvaṃ ca prāpyānujñāṃ ca śaṅkarāt || 13.31 ||

"'एकाक्षिपिंगल' यही नाम तुम्हारा सदा के लिए रहेगा।" इस प्रकार उससे सखा-भाव और शंकर से आज्ञा प्राप्त कर,

श्लोक 32 (uttara.13.32)

आगत्य च श्रुतो ऽयं मे तव पापविनिश्चयः ।। १३.३२ ।।

āgatya ca śruto 'yaṃ me tava pāpaviniścayaḥ || 13.32 ||

मैंने यहाँ लौटकर आने पर तुम्हारे इस पापपूर्ण निश्चय के बारे में सुना है।

श्लोक 33 (uttara.13.33)

तदधर्मिष्ठसंयोगान्निवर्त कुलदूषणात् । चिन्त्यते हि वधोपायः सर्षिसङ्घैः सुरैस्तव ।। १३.३३ ।।

tad adharmiṣṭhasaṃyogān nivarta kuladūṣaṇāt | cintyate hi vadhopāyaḥ sarṣisaṅghaiḥ suraistava || 13.33 ||

"इसलिए इस अधर्मपूर्ण संगति से, कुल को दूषित करने वाले कार्य से निवृत्त हो जाओ; ऋषिगणों सहित देवता तुम्हारे वध का उपाय सोच रहे हैं।"

श्लोक 34 (uttara.13.34)

एवमुक्तो दशग्रीवः क्रुद्धसंरक्तलोचनः । हस्तौ दन्तांश्च सम्पीड्य वाक्यमेतदुवाच ह ।। १३.३४ ।।

evam ukto daśagrīvaḥ kruddhasaṃraktalocanaḥ | hastau dantāṃś ca sampīḍya vākyam etad uvāca ha || 13.34 ||

यह सुनकर दशग्रीव क्रोध से लाल नेत्र किए हुए, हाथों और दांतों को भींचकर यह वचन बोला।

श्लोक 35 (uttara.13.35)

विज्ञातं ते मया दूत वाक्यं यस्य प्रभाषसे । नैतत्त्वमसि नैवासौ भ्रात्रा येनासि चोदितः ।। १३.३५ ।।

vijñātaṃ te mayā dūta vākyaṃ yasya prabhāṣase | naitat tvam asi naivāsau bhrātrā yenāsi coditaḥ || 13.35 ||

"हे दूत, मैं समझ गया कि तुम जिसकी ओर से बोल रहे हो, यह वचन उसी का है; यह तुम नहीं, और न ही मेरा भाई है, जिसने वास्तव में तुम्हें प्रेरित किया है।"

श्लोक 36 (uttara.13.36)

हितं नैष ममैतद्धि ब्रवीति धनरक्षकः । महेश्वरसखित्वं तु मूढ श्रावयते किल ।। १३.३६ ।।

hitaṃ naiṣa mamaitad dhi bravīti dhanarakṣakaḥ | maheśvarasakhitvaṃ tu mūḍha śrāvayate kila || 13.36 ||

"यह जो धनरक्षक कह रहा है, वह मेरे हित की बात नहीं है; हे मूर्ख, तू तो महेश्वर की मित्रता की डींग सुना रहा है।"

श्लोक 37 (uttara.13.37)

न चेदं क्षमणीयं मे यदेतद्भाषितं त्वया । यदेतावन्मया कालं दूत तस्य तु मर्षितम् ।। १३.३७ ।।

na cedaṃ kṣamaṇīyaṃ me yad etad bhāṣitaṃ tvayā | yad etāvan mayā kālaṃ dūta tasya tu marṣitam || 13.37 ||

"जो तुमने अभी कहा, वह मुझे क्षमा करने योग्य नहीं है; हे दूत, मैंने अब तक उसकी इतनी सारी बातें सहन की हैं।"

श्लोक 38 (uttara.13.38)

न हन्तव्यो गुरुर्ज्येष्ठो मया ऽयमिति मन्यते । तस्य त्विदानीं श्रुत्वा मे वाक्यमेषा कृता मतिः ।। १३.३८ ।।

na hantavyo gurur jyeṣṭho mayāyam iti manyate | tasya tv idānīṃ śrutvā me vākyam eṣā kṛtā matiḥ || 13.38 ||

"'यह मेरा बड़ा है, इसे नहीं मारना चाहिए' — मैं ऐसा सोचता था; परन्तु अब उसकी यह बात सुनकर मेरा यह निश्चय हो गया है।"

श्लोक 39 (uttara.13.39)

त्रीँल्लोकानपि जेष्यामि बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।। १३.३९ ।।

trīṁl lokān api jeṣyāmi bāhuvīryam upāśritaḥ || 13.39 ||

"मैं अपने बाहुबल के भरोसे तीनों लोकों को भी जीत लूँगा।"

श्लोक 40 (uttara.13.40)

एतन्मुहूर्तमेवाहं तस्यैकस्य तु वै कृते । चतुरो लोकपालांस्तान्नयिष्यामि यमक्षयम् ।। १३.४० ।।

etan muhūrtam evāhaṃ tasyaikasya tu vai kṛte | caturo lokapālāṃs tān nayiṣyāmi yamakṣayam || 13.40 ||

"उसी एक के कारण, मैं अभी इसी क्षण उन चारों लोकपालों को भी यम के धाम पहुँचा दूँगा।"

श्लोक 41 (uttara.13.41)

एवमुक्त्वा तु लङ्केशो दूतं खड्गेन जघ्निवान् । ददौ भक्षयितुं ह्येनं राक्षसानां दुरात्मनाम् ।। १३.४१ ।।

evam uktvā tu laṅkeśo dūtaṃ khaḍgena jaghnivān | dadau bhakṣayituṃ hy enaṃ rākṣasānāṃ durātmanām || 13.41 ||

यह कहकर लंकेश ने दूत को तलवार से मार डाला और उसे दुरात्मा राक्षसों को खाने के लिए दे दिया।

श्लोक 42 (uttara.13.42)

एवं कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावणः । त्रैलोक्यविजयाकाङ्क्षी ययौ यत्र धनेश्वरः ।। १३.४२ ।।

evaṃ kṛtasvastyayano ratham āruhya rāvaṇaḥ | trailokyavijayākāṅkṣī yayau yatra dhaneśvaraḥ || 13.42 ||

इस प्रकार मंगल-विधि सम्पन्न कर, रथ पर चढ़कर, त्रैलोक्य-विजय की इच्छा से रावण वहाँ चल पड़ा जहाँ धनेश्वर था।

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