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उत्तरकाण्ड · सर्ग 14

कैलास पर रावण का आक्रमण

सर्ग 13सर्ग-सूचीसर्ग 15

श्लोक 1 (uttara.14.1)

ततस्तु सचिवैः सार्धं षड्भिर्नित्यं बलोद्धतैः । महोदरप्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणैः ।। १४.१ ।।

tatas tu sacivaiḥ sārdhaṃ ṣaḍbhir nityaṃ baloddhataiḥ | mahodaraprahastābhyāṃ mārīcaśukasāraṇaiḥ || 14.1 ||

तब वह छह मंत्रियों के साथ, जो सदा बल में प्रचंड रहते थे — महोदर, प्रहस्त, मारीच, शुक और सारण —

श्लोक 2 (uttara.14.2)

धूम्राक्षेण च वीरेण नित्यं समरगृध्नुना । वृतः संप्रययौ श्रीमान्क्रोधाल्लोकान्दहन्निव ।। १४.२ ।।

dhūmrākṣeṇa ca vīreṇa nityaṃ samaragṛdhninā | vṛtaḥ sampraprayau śrīmān krodhāl lokān dahann iva || 14.2 ||

और वीर धूम्राक्ष के साथ, जो सदा युद्ध का लालायित था, घिरा हुआ वह श्रीमान क्रोध से मानो लोकों को जलाता हुआ चल पड़ा।

श्लोक 3 (uttara.14.3)

पुराणि स नदीः शैलान्वनान्युपवनानि च । अतिक्रम्य मुहूर्तेन कैलासं गिरिमागमत् ।। १४.३ ।।

purāṇi sa nadīḥ śailān vanāny upavanāni ca | atikramya muhūrtena kailāsaṃ girim āgamat || 14.3 ||

वह नगरों, नदियों, पर्वतों, वनों और उपवनों को लांघकर, एक ही मुहूर्त में कैलास पर्वत पर पहुँच गया।

श्लोक 4 (uttara.14.4)

सन्निविष्टं गिरौ तस्मिन्राक्षसेन्द्रं निशम्य तु । युद्धे ऽत्यर्थकृतोत्साहं दुरात्मानं समन्त्रिणम् ।। १४.४ ।।

sanniviṣṭaṃ girau tasmin rākṣasendraṃ niśamya tu | yuddhe 'tyarthakṛtotsāhaṃ durātmānaṃ samantriṇam || 14.4 ||

उस पर्वत पर आ बसे राक्षसेन्द्र को, जो युद्ध के लिए अत्यंत उत्साहित और अपने मंत्रियों सहित दुरात्मा था, जानकर —

श्लोक 5 (uttara.14.5)

यक्षा न शेकुः संस्थातुं प्रमुखे तस्य रक्षसः । राज्ञो भ्रातेति विज्ञाय गता यत्र धनेश्वरः ।। १४.५ ।।

yakṣā na śekuḥ saṃsthātuṃ pramukhe tasya rakṣasaḥ | rājño bhrāteti vijñāya gatā yatra dhaneśvaraḥ || 14.5 ||

यक्ष उस राक्षस के सामने खड़े नहीं रह सके; यह जानकर कि वह राजा का भाई है, वे वहाँ गए जहाँ धनेश्वर थे।

श्लोक 6 (uttara.14.6)

ते गत्वा सर्वमाचख्युर्भ्रातुस्तस्य चिकीर्षितम् । अनुज्ञाता ययुर्हष्टा युद्धाय धनदेन ते ।। १४.६ ।।

te gatvā sarvam ācakhyur bhrātus tasya cikīrṣitam | anujñātā yayur hṛṣṭā yuddhāya dhanadena te || 14.6 ||

वहाँ जाकर उन्होंने उस भाई की सारी मंशा बता दी; धनद की अनुमति पाकर वे हर्षित होकर युद्ध के लिए चल पड़े।

श्लोक 7 (uttara.14.7)

ततो बलानां सङ्क्षोभो व्यवर्धत महोदधेः । तस्य नैर्ऋतराजस्य शैलं सञ्चालयन्निव ।। १४.७ ।।

tato balānāṃ saṅkṣobho vyavardhata mahodadheḥ | tasya nairṛtarājasya śailaṃ sañcālayann iva || 14.7 ||

तब उस निशाचरराज की सेनाओं का कोलाहल महासागर के समान बढ़ने लगा, मानो पर्वत को हिला देने वाला हो।

श्लोक 8 (uttara.14.8)

ततो युद्धं समभवद्यक्षराक्षससङ्कुलम् । व्यथिताश्चाभवंस्तत्र सचिवा राक्षसस्य ते ।। १४.८ ।।

tato yuddhaṃ samabhavad yakṣarākṣasasaṅkulam | vyathitāś cābhavaṃs tatra sacivā rākṣasasya te || 14.8 ||

तब यक्षों और राक्षसों के बीच घमासान युद्ध छिड़ गया, और उस राक्षस के वे मंत्री वहाँ व्यथित हो उठे।

श्लोक 9 (uttara.14.9)

स दृष्ट्वा तादृशं सैन्यं दशग्रीवो निशाचरः । हर्षनादान्बहून्कृत्वा स क्रोधादभ्यधावत ।। १४.९ ।।

sa dṛṣṭvā tādṛśaṃ sainyaṃ daśagrīvo niśācaraḥ | harṣanādān bahūn kṛtvā sa krodhād abhyadhāvat || 14.9 ||

उस प्रकार की सेना को देखकर निशाचर दशग्रीव ने अनेक हर्षनाद करते हुए क्रोधपूर्वक धावा बोला।

श्लोक 10 (uttara.14.10)

ये तु ते राक्षसेन्द्रस्य सचिवा घोरविक्रमाः । तेषां सहस्रमेकैकं यक्षाणां समयोधयन् ।। १४.१० ।।

ye tu te rākṣasendrasya sacivā ghoravikramāḥ | teṣāṃ sahasram ekaikaṃ yakṣāṇāṃ samayodhayan || 14.10 ||

राक्षसेन्द्र के जो भयंकर पराक्रमी मंत्री थे, उनमें से हर एक यक्षों की एक-एक हजार की सेना से जूझने लगा।

श्लोक 11 (uttara.14.11)

ततो गदाभिर्मुसलैरसिभिः शक्तितोमरैः । हन्यमानो दशग्रीवस्तत्सैन्यं समगाहत ।। १४.११ ।।

tato gadābhir musalair asibhiḥ śaktitomaraiḥ | hanyamāno daśagrīvas tat sainyaṃ samagāhata || 14.11 ||

तब गदाओं, मूसलों, तलवारों, शक्तियों और भालों से आहत होते हुए भी दशग्रीव उस सेना में घुस गया।

श्लोक 12 (uttara.14.12)

स निरुच्छ्वासवत्तत्र वध्यमानो दशाननः । वर्षद्भिरिव जीमूतैर्धाराभिरवरुध्यत ।। १४.१२ ।।

sa nirucchvāsavat tatra vadhyamāno daśānanaḥ | varṣadbhir iva jīmūtair dhārābhir avarudhyata || 14.12 ||

वहाँ वध्यमान होते हुए भी दशानन ऐसे ही बिना विश्राम खड़ा रहा, मानो बरसते मेघों की धाराओं से घिर गया हो।

श्लोक 13 (uttara.14.13)

न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रैः समाहतः । महीधर इवाम्भोदैर्धाराशतसमुक्षितः ।। १४.१३ ।।

na cakāra vyathāṃ caiva yakṣaśastraiḥ samāhataḥ | mahīdhara ivāmbhodair dhārāśatasamukṣitaḥ || 14.13 ||

यक्षों के अस्त्रों से आहत होकर भी उसने कोई व्यथा नहीं दिखाई, मानो सैकड़ों जलधाराओं से भीगा हुआ कोई पर्वत हो।

श्लोक 14 (uttara.14.14)

स दुरात्मा समुद्यम्य कालदण्डोपमां गदाम् । प्रविवेश ततः सैन्यं नयन्यक्षान्यमक्षयम् ।। १४.१४ ।।

sa durātmā samudyamya kāladaṇḍopamāṃ gadām | praviveśa tataḥ sainyaṃ nayan yakṣān yamakṣayam || 14.14 ||

वह दुरात्मा यमदंड-सी गदा उठाकर उस सेना में घुस गया, और यक्षों को यमलोक भेजने लगा।

श्लोक 15 (uttara.14.15)

स कक्षमिव विस्तीर्णं शुष्केन्धनमिवाकुलम् । वातेनाग्निरिवायत्तो यक्षसैन्यं ददाह तत् ।। १४.१५ ।।

sa kakṣam iva vistīrṇaṃ śuṣkendhanam ivākulam | vātenāgnir ivāyatto yakṣasainyaṃ dadāha tat || 14.15 ||

वह उस यक्ष-सेना को ऐसे भस्म करता चला गया जैसे विस्तीर्ण घास के मैदान को, अथवा सूखी लकड़ी से भरे ढेर को, वायु द्वारा प्रज्वलित अग्नि जला देती है।

श्लोक 16 (uttara.14.16)

तैस्तु तत्र महामात्यैर्महोदरशुकादिभिः । अल्पावशेषास्ते यक्षाः कृता वातैरिवाम्बुदाः ।। १४.१६ ।।

tais tu tatra mahāmātyair mahodaraśukādibhiḥ | alpāvaśeṣās te yakṣāḥ kṛtā vātair ivāmbudāḥ || 14.16 ||

वहाँ महोदर, शुक आदि उन महामंत्रियों के द्वारा भी वे यक्ष ऐसे अल्पशेष कर दिए गए जैसे वायु द्वारा बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।

श्लोक 17 (uttara.14.17)

केचित्समाहता भग्नाः पतिताः समरक्षितौ । ओष्ठांश्च दशनैस्तीक्ष्णैरदशन्कुपिता रणे ।। १४.१७ ।।

kecit samāhatā bhagnāḥ patitāḥ samarakṣitau | oṣṭhāṃś ca daśanais tīkṣṇair adaśan kupitā raṇe || 14.17 ||

कुछ यक्ष आहत होकर टूट पड़े, युद्धभूमि में गिर पड़े, और क्रोध में अपने ओठों को तीखे दांतों से काटने लगे।

श्लोक 18 (uttara.14.18)

श्रान्ताश्चान्योन्यमालिङ्ग्य भ्रष्टशस्त्रा रणाजिरे । सीदन्ति च तदा यक्षाः कूला इव जलेन ह ।। १४.१८ ।।

śrāntāś cānyonyam āliṅgya bhraṣṭaśastrā raṇājire | sīdanti ca tadā yakṣāḥ kūlā iva jalena ha || 14.18 ||

थके हुए, हथियार गिरा चुके यक्ष रणभूमि में एक-दूसरे का आलिंगन कर, वैसे ही ढह पड़े जैसे जल के वेग से नदी के किनारे ढह जाते हैं।

श्लोक 19 (uttara.14.19)

हतानां गच्छतां स्वर्गं युध्यतां पृथिवीतले । प्रेक्षतामृषिसङ्घानां न बभूवान्तरं दिवि ।। १४.१९ ।।

hatānāṃ gacchatāṃ svargaṃ yudhyatāṃ pṛthivītale | prekṣatām ṛṣisaṅghānāṃ na babhūvāntaraṃ divi || 14.19 ||

मारे गए जो स्वर्ग को जाते थे, जो पृथ्वी पर लड़ रहे थे, और जो देखते हुए ऋषिगण थे — इन सबसे आकाश में कोई स्थान खाली नहीं रह गया था।

श्लोक 20 (uttara.14.20)

भग्नांस्तु तान्समालक्ष्य यक्षेन्द्रांस्तु महाबलान् । धनाध्यक्षो महाबाहुः प्रेषयामास यक्षकान् ।। १४.२० ।।

bhagnāṃs tu tān samālakṣya yakṣendrāṃs tu mahābalān | dhanādhyakṣo mahābāhuḥ preṣayāmāsa yakṣakān || 14.20 ||

उन महाबली यक्षेन्द्रों को टूटता देखकर, महाबाहु धनाध्यक्ष ने और यक्षों को भेजा।

श्लोक 21 (uttara.14.21)

एतस्मिन्नन्तरे राम विस्तीर्णबलवाहनः । प्रेषितो न्यपतद्यक्षो नाम्ना संयोधकण्टकः ।। १४.२१ ।।

etasminn antare rāma vistīrṇabalavāhanaḥ | preṣito nyapatad yakṣo nāmnā saṃyodhakaṇṭakaḥ || 14.21 ||

हे राम, इसी बीच, विशाल सेना और वाहनों सहित, भेजा गया संयोधकण्टक नामक यक्ष वहाँ आ पहुँचा।

श्लोक 22 (uttara.14.22)

तेन चक्रेण मारीचो विष्णुनेव रणे हतः । पतितो भूतले शैलात्क्षीणपुण्य इव ग्रहः ।। १४.२२ ।।

tena cakreṇa mārīco viṣṇuneva raṇe hataḥ | patito bhūtale śailāt kṣīṇapuṇya iva grahaḥ || 14.22 ||

उसने चक्र से मारीच को उसी प्रकार युद्ध में मारा जैसे विष्णु मारते हैं; वह पर्वतशिखर से गिरे हुए, पुण्यक्षीण ग्रह के समान भूतल पर गिर पड़ा।

श्लोक 23 (uttara.14.23)

ससञ्ज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचरः । तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रदुद्रुवे ।। १४.२३ ।।

sasañjñas tu muhūrtena sa viśramya niśācaraḥ | taṃ yakṣaṃ yodhayāmāsa sa ca bhagnaḥ pradudruve || 14.23 ||

क्षणभर विश्राम कर वह निशाचर पुनः चेत में आया और उस यक्ष से लड़ने लगा; परन्तु वह यक्ष टूटकर भाग गया।

श्लोक 24 (uttara.14.24)

ततः काञ्चनचित्राङ्गं वैडूर्यरजसोक्षितम् । मर्यादां प्रतिहाराणां तोरणान्तरमाविशत् ।। १४.२४ ।।

tataḥ kāñcanacitrāṅgaṃ vaiḍūryarajasokṣitam | maryādāṃ pratihārāṇāṃ toraṇāntaram āviśat || 14.24 ||

तब सोने से चित्रित अंगों वाला, वैडूर्य की धूल से आच्छादित, द्वारपालों की सीमा-रेखा को लांघकर वह तोरण के भीतर प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 25 (uttara.14.25)

तं तु राजन्दशग्रीवं प्रविशन्तं निशाचरम् । सूर्यभानुरिति ख्यातो द्वारपालो न्यवारयत् ।। १४.२५ ।।

taṃ tu rājan daśagrīvaṃ praviśantaṃ niśācaram | sūryabhānur iti khyāto dvārapālo nyavārayat || 14.25 ||

हे राजन्, उस प्रविष्ट होते हुए निशाचर दशग्रीव को सूर्यभानु नामक विख्यात द्वारपाल ने रोका।

श्लोक 26 (uttara.14.26)

स वार्यमाणो यक्षेण प्रविवेश निशाचरः । यदा तु वारितो राम न व्यतिष्ठत्स राक्षसः ।। १४.२६ ।।

sa vāryamāṇo yakṣeṇa praviveśa niśācaraḥ | yadā tu vārito rāma na vyatiṣṭhat sa rākṣasaḥ || 14.26 ||

उस यक्ष द्वारा रोके जाने पर भी वह निशाचर प्रविष्ट हो गया; हे राम, रोके जाने पर भी वह राक्षस रुका नहीं।

श्लोक 27 (uttara.14.27)

ततस्तोरणमुत्पाट्य तेन यक्षेण ताडितः । रुधिरं प्रस्रवन्भाति शैलो धातुस्रवैरिव ।। १४.२७ ।।

tatas toraṇam utpāṭya tena yakṣeṇa tāḍitaḥ | rudhiraṃ prasravan bhāti śailo dhātusravair iva || 14.27 ||

तब उस यक्ष ने तोरण को उखाड़कर उससे उसे [दशग्रीव को] मारा; रक्त बहाता हुआ वह ऐसे शोभित हुआ जैसे धातुओं के झरनों से युक्त कोई पर्वत हो।

श्लोक 28 (uttara.14.28)

स शैलशिखराभेण तोरणेन समाहतः । जगाम न क्षतिं वीरो वरदानात्स्वयम्भुवः ।। १४.२८ ।।

sa śailaśikharābheṇa toraṇena samāhataḥ | jagāma na kṣatiṃ vīro varadānāt svayambhuvaḥ || 14.28 ||

पर्वतशिखर के समान उस तोरण से आहत होकर भी वह वीर स्वयंभू के वरदान के कारण किसी प्रकार की क्षति को प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 29 (uttara.14.29)

तेनैव तोरणेनाथ यक्षस्तेनाभिताडितः । नादृश्यत तदा यक्षो भस्मीकृततनुस्तदा ।। १४.२९ ।।

tenaiva toraṇenātha yakṣas tenābhitāḍitaḥ | nādṛśyata tadā yakṣo bhasmīkṛtatanus tadā || 14.29 ||

तब उसने उसी तोरण से उस यक्ष को मारा; वह यक्ष तब भस्म हुए शरीर के साथ अदृश्य हो गया।

श्लोक 30 (uttara.14.30)

ततः प्रदुद्रुवुः सर्वे दृष्ट्वा रक्षःपराक्रमम् । ततो नदीर्गुहाश्चैव विविशुर्भयपीडिताः । त्यक्तप्रहरणाः श्रान्ता विवर्णवदनास्तदा ।। १४.३० ।।

tataḥ pradudruvuḥ sarve dṛṣṭvā rakṣaḥparākramam | tato nadīr guhāś caiva viviśur bhayapīḍitāḥ | tyaktapraharaṇāḥ śrāntā vivarṇavadanās tadā || 14.30 ||

उस राक्षस के इस पराक्रम को देखकर सब भाग खड़े हुए; भय से पीड़ित होकर वे नदियों और गुफाओं में जा घुसे, हथियार छोड़कर, थके हुए और मलिन मुख लिए हुए।

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