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उत्तरकाण्ड · सर्ग 15

कुबेर-विजय और पुष्पक-प्राप्ति

सर्ग 14सर्ग-सूचीसर्ग 16

श्लोक 1 (uttara.15.1)

ततस्ताँल्लक्ष्य वित्रस्तान्यक्षेन्द्रांश्च सहस्रशः । धनाध्यक्षो महायक्षं माणिचारमथाब्रवीत् ।। १५.१ ।।

tatas tāṁl lakṣya vitrastān yakṣendrāṃś ca sahasraśaḥ | dhanādhyakṣo mahāyakṣaṃ māṇicāram athābravīt || 15.1 ||

तब उन हजारों भयभीत यक्षेन्द्रों को देखकर धनाध्यक्ष ने महायक्ष माणिचार से कहा।

श्लोक 2 (uttara.15.2)

रावणं जहि यक्षेन्द्र दुर्वृत्तं पापचेतसम् । शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम् ।। १५.२ ।।

rāvaṇaṃ jahi yakṣendra durvṛttaṃ pāpacetasam | śaraṇaṃ bhava vīrāṇāṃ yakṣāṇāṃ yuddhaśālinām || 15.2 ||

"हे यक्षेन्द्र, इस दुराचारी, पापी-मन रावण का वध करो; युद्धकुशल वीर यक्षों के लिए शरण बनो।"

श्लोक 3 (uttara.15.3)

एवमुक्तो महाबाहुर्माणिभद्रः सुदुर्जयः । वृतो यक्षसहस्रैस्तु चतुर्भिः समयोधयत् ।। १५.३ ।।

evam ukto mahābāhur māṇibhadraḥ sudurjayaḥ | vṛto yakṣasahasrais tu caturbhiḥ samayodhayat || 15.3 ||

यह सुनकर महाबाहु, दुर्जय माणिभद्र, चार हजार यक्षों से घिरा हुआ युद्ध करने लगा।

श्लोक 4 (uttara.15.4)

ते गदामुसलप्रासैः शक्तितोमरमुद्गरैः । अभिघ्नन्तस्तदा यक्षा राक्षसान्समुपाद्रवन् ।। १५.४ ।।

te gadāmusalaprāsaiḥ śaktitomaramudgaraiḥ | abhighnantas tadā yakṣā rākṣasān samupādravan || 15.4 ||

वे यक्ष गदाओं, मूसलों, प्रासों, शक्तियों, भालों और मुद्गरों से आघात करते हुए राक्षसों पर टूट पड़े।

श्लोक 5 (uttara.15.5)

कुर्वन्तस्तुमुलं युद्धं चरन्तः श्येनवल्लघु । बाढं प्रयच्छन्नेच्छामि दीयतामिति भाषिणः ।। १५.५ ।।

kurvantas tumulaṃ yuddhaṃ carantaḥ śyenavallaghu | bāḍhaṃ prayacchann icchāmi dīyatām iti bhāṣiṇaḥ || 15.5 ||

वे घमासान युद्ध करते हुए, बाज पक्षी के समान वेग से घूमते हुए, "यह लो!" कहते हुए बलपूर्वक प्रहार करते जा रहे थे।

श्लोक 6 (uttara.15.6)

ततो देवाः सगन्धर्वा ऋषयो ब्रह्मवादिनः । दृष्ट्वा तत्तुमुलं युद्धं परं विस्मयमागमन् ।। १५.६ ।।

tato devāḥ sagandharvā ṛṣayo brahmavādinaḥ | dṛṣṭvā tat tumulaṃ yuddhaṃ paraṃ vismayam āgaman || 15.6 ||

तब गंधर्वों सहित देवता और ब्रह्मवादी ऋषि उस घमासान युद्ध को देखकर परम विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 7 (uttara.15.7)

यक्षाणां तु प्रहस्तेन सहस्रं निहतं रणे । महोदरेण चानिन्द्यं सहस्रमपरं हतम् ।। १५.७ ।।

yakṣāṇāṃ tu prahastena sahasraṃ nihataṃ raṇe | mahodareṇa cānindyaṃ sahasram aparaṃ hatam || 15.7 ||

प्रहस्त ने युद्ध में एक हजार यक्षों को मार डाला, और महोदर ने भी एक और सराहनीय हजार यक्षों को मार डाला।

श्लोक 8 (uttara.15.8)

क्रुद्धेन च तदा राजन्मारीचेन युयुत्सुना । निमेषान्तरमात्रेण द्वे सहस्रे निपातिते ।। १५.८ ।।

kruddhena ca tadā rājan mārīcena yuyutsunā | nimeṣāntaramātreṇa dve sahasre nipātite || 15.8 ||

हे राजन्, क्रुद्ध और युद्धेच्छुक मारीच ने तो पलक झपकते ही दो हजार यक्षों को गिरा दिया।

श्लोक 9 (uttara.15.9)

क्व च यक्षार्जवं युद्धं क्व च मायाबलाश्रयम् । रक्षसां पुरुषव्याघ्र तेन ते ऽभ्यधिका युधि ।। १५.९ ।।

kva ca yakṣārjavaṃ yuddhaṃ kva ca māyābalāśrayam | rakṣasāṃ puruṣavyāghra tena te 'bhyadhikā yudhi || 15.9 ||

हे पुरुषव्याघ्र, कहाँ यक्षों का सीधा-सादा युद्ध और कहाँ राक्षसों का माया-बल के सहारे युद्ध — इसी कारण वे युद्ध में अधिक प्रबल सिद्ध हुए।

श्लोक 10 (uttara.15.10)

धूम्राक्षेण समागम्य माणिभद्रो महारणे । मुसलेनोरसि क्रोधात्तडितो न च कम्पितः ।। १५.१० ।।

dhūmrākṣeṇa samāgamya māṇibhadro mahāraṇe | musalenorasi krodhāt tāḍito na ca kampitaḥ || 15.10 ||

उस महासमर में धूम्राक्ष से भिड़कर, माणिभद्र क्रोधवश छाती पर मूसल से आहत हुआ, फिर भी विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 11 (uttara.15.11)

ततो गदां समाविध्य माणिभद्रेण राक्षसः । धूम्राक्षस्ताडितो मूर्ध्नि विह्वलः स पपात ह ।। १५.११ ।।

tato gadāṃ samāvidhya māṇibhadreṇa rākṣasaḥ | dhūmrākṣas tāḍito mūrdhni vihvalaḥ sa papāta ha || 15.11 ||

तब माणिभद्र ने गदा घुमाकर उस राक्षस धूम्राक्ष को सिर पर मारा; वह विह्वल होकर गिर पड़ा।

श्लोक 12 (uttara.15.12)

धूम्राक्षं ताडितं दृष्ट्वा पतितं शोणितोक्षितम् । अभ्यधावत सङ्ग्रामे माणिभद्रं दशाननः ।। १५.१२ ।।

dhūmrākṣaṃ tāḍitaṃ dṛṣṭvā patitaṃ śoṇitokṣitam | abhyadhāvata saṅgrāme māṇibhadraṃ daśānanaḥ || 15.12 ||

धूम्राक्ष को आहत, गिरा हुआ और रक्त से लथपथ देखकर दशानन युद्ध में माणिभद्र की ओर दौड़ा।

श्लोक 13 (uttara.15.13)

तं क्रुद्धमभिधावन्तं माणिभद्रो दशाननम् । शक्तिभिस्ताडयामास तिसृभिर्यक्षपुङ्गवः ।। १५.१३ ।।

taṃ kruddham abhidhāvantaṃ māṇibhadro daśānanam | śaktibhis tāḍayāmāsa tisṛbhir yakṣapuṅgavaḥ || 15.13 ||

उस क्रुद्ध होकर दौड़ते हुए दशानन को यक्षश्रेष्ठ माणिभद्र ने तीन शक्तियों से आघात किया।

श्लोक 14 (uttara.15.14)

ताडितो माणिभद्रस्य मुकुटे प्राहरद्रणे । तस्य तेन प्रहारेण मुकुटं पार्श्वमागतम् ।। १५.१४ ।।

tāḍito māṇibhadrasya mukuṭe prāharad raṇe | tasya tena prahāreṇa mukuṭaṃ pārśvam āgatam || 15.14 ||

आहत होकर उसने युद्ध में माणिभद्र के मुकुट पर प्रहार किया; उस प्रहार से उसका मुकुट एक ओर सरक गया।

श्लोक 15 (uttara.15.15)

ततः संयुध्यमानेन विष्टब्धो न व्यकम्पत । तदाप्रभृति यक्षो ऽसौ पार्श्वमौलिरिति स्मृतः । सन्नादः सुमहान्राजंस्तस्मिन्शैले ऽभ्यवर्तत ।। १५.१५ ।।

tataḥ saṃyudhyamānena viṣṭabdho na vyakampata | tadāprabhṛti yakṣo 'sau pārśvamaulir iti smṛtaḥ | sannādaḥ sumahān rājaṃs tasmin śaile 'bhyavartata || 15.15 ||

तब भी युद्धरत रहते हुए वह स्थिर रहा, विचलित नहीं हुआ; तभी से वह यक्ष 'पार्श्वमौलि' (तिरछा-मुकुटधारी) नाम से जाना जाने लगा; हे राजन्, उस पर्वत पर एक अत्यंत भारी घोष गूँज उठा।

श्लोक 16 (uttara.15.16)

ततो दूरात्प्रददृशे धनाध्यक्षो गदाधरः । शुक्रप्रौष्ठपदाभ्यां च पद्मशङ्खसमावृतः ।। १५.१६ ।।

tato dūrāt pradadṛśe dhanādhyakṣo gadādharaḥ | śukraprauṣṭhapadābhyāṃ ca padmaśaṅkhasamāvṛtaḥ || 15.16 ||

तब दूर से मेस-धारी धनाध्यक्ष दिखाई दिया, शुक्र और प्रौष्ठपद के साथ, तथा पद्म और शंख नामक अपने निधियों से घिरा हुआ।

श्लोक 17 (uttara.15.17)

स दृष्ट्वा भ्रातरं सङ्ख्ये शापाद्विभ्रष्टगौरवम् । उवाच वचनं धीमान्युक्तं पैतामहे कुले ।। १५.१७ ।।

sa dṛṣṭvā bhrātaraṃ saṅkhye śāpād vibhraṣṭagauravam | uvāca vacanaṃ dhīmān yuktaṃ paitāmahe kule || 15.17 ||

युद्ध में अपने भाई को शाप के कारण गौरव-भ्रष्ट देखकर उस बुद्धिमान ने ब्रह्मा के कुल के योग्य यह वचन कहा।

श्लोक 18 (uttara.15.18)

यन्मया वार्यमाणस्त्वं नावगच्छसि दुर्मते । पश्चादस्य फलं प्राप्य ज्ञास्यसे निरयं गतः ।। १५.१८ ।।

yan mayā vāryamāṇas tvaṃ nāvagacchasi durmate | paścād asya phalaṃ prāpya jñāsyase nirayaṃ gataḥ || 15.18 ||

"हे दुर्बुद्धि, मैं तुम्हें रोकता रहा, पर तुम नहीं समझते; बाद में इसका फल पाकर, नरक में जाकर तुम्हें समझ आएगा।"

श्लोक 19 (uttara.15.19)

यो हि मोहाद्विषं पीत्वा नावगच्छति दुर्मतिः । स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मणः फलम् ।। १५.१९ ।।

yo hi mohād viṣaṃ pītvā nāvagacchati durmatiḥ | sa tasya pariṇāmānte jānīte karmaṇaḥ phalam || 15.19 ||

"जो मूढ़ मोहवश विष पीकर भी नहीं समझता, वह उसके परिणाम के अंत में ही अपने कर्म का फल जान पाता है।"

श्लोक 20 (uttara.15.20)

देवता नाभिनन्दन्ति धर्मयुक्तेन केनचित् । येन त्वमीदृशं भावं नीतस्सन्नावबुध्यसे ।। १५.२० ।।

devatā nābhinandanti dharmayuktena kenacit | yena tvam īdṛśaṃ bhāvaṃ nītas san nāvabudhyase || 15.20 ||

"देवता किसी भी धर्मयुक्त कार्य से तुम्हारा अभिनंदन नहीं करते; इसी कारण ऐसी दशा को पहुँचकर भी तुम नहीं समझते।"

श्लोक 21 (uttara.15.21)

मातरं पितरं यो हि आचार्यं चावमन्यते । स पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं गतः ।। १५.२१ ।।

mātaraṃ pitaraṃ yo hi ācāryaṃ cāvamanyate | sa paśyati phalaṃ tasya pretarājavaśaṃ gataḥ || 15.21 ||

"जो माता, पिता और आचार्य का अनादर करता है, वह मृत्युराज [यम] के अधीन जाकर उसका फल देखता है।"

श्लोक 22 (uttara.15.22)

अध्रुवे हि शरीरे यो न करोति तपोर्जनम् । स पश्चात्तप्यते मूढो मृतो दृष्ट्वा ऽऽत्मनो गतिम् ।। १५.२२ ।।

adhruve hi śarīre yo na karoti taporjanam | sa paścāt tapyate mūḍho mṛto dṛṣṭvātmano gatim || 15.22 ||

"जो इस नश्वर शरीर में रहते हुए तप का संचय नहीं करता, वह मूढ़ मरने के बाद अपनी गति देखकर पछताता है।"

श्लोक 23 (uttara.15.23)

धर्माद्राज्यं धनं सौख्यमधर्माद्दुःखमेव च । तस्माद्धर्मं सुखार्थाय कुर्यात्पापं विसर्जयेत् ।। १५.२३ ।।

dharmād rājyaṃ dhanaṃ saukhyam adharmād duḥkham eva ca | tasmād dharmaṃ sukhārthāya kuryāt pāpaṃ visarjayet || 15.23 ||

"धर्म से राज्य, धन और सुख मिलते हैं, अधर्म से केवल दुःख; इसलिए सुख के लिए धर्म का आचरण करना चाहिए और पाप का त्याग करना चाहिए।"

श्लोक 24 (uttara.15.24)

पापस्य हि फलं दुःखं तद्भोक्तव्यमिहात्मना । तस्मादात्मापघातार्थं मूढः पापं करिष्यति ।। १५.२४ ।।

pāpasya hi phalaṃ duḥkhaṃ tad bhoktavyam ihātmanā | tasmād ātmāpaghātārthaṃ mūḍhaḥ pāpaṃ kariṣyati || 15.24 ||

"पाप का फल दुःख है, जिसे स्वयं ही यहाँ भोगना पड़ता है; इसलिए मूढ़ ही अपने विनाश के लिए पाप करता है।"

श्लोक 25 (uttara.15.25)

कस्य चिन्न हि दुर्बुद्धेश्छन्दतो जायते मतिः । देवं चेष्टयते सर्वं हतो दैवेन हन्यते । यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते ।। १५.२५ ।।

kasya cin na hi durbuddheś chandato jāyate matiḥ | devaṃ ceṣṭayate sarvaṃ hato daivena hanyate | yādṛśaṃ kurute karma tādṛśaṃ phalam aśnute || 15.25 ||

"किसी भी दुर्बुद्धि की मति स्वेच्छा से उत्पन्न नहीं होती; सब कुछ दैव ही चलाता है, दैव के मारे हुए ही नष्ट होते हैं। जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।"

श्लोक 26 (uttara.15.26)

बुद्धिरूपं फलं पुत्राञ्छौर्यं धीरत्वमेव च । प्राप्नुवन्ति नरा लोके निर्जितं पुण्यकर्मभिः ।। १५.२६ ।।

buddhirūpaṃ phalaṃ putrāñ chauryaṃ dhīratvam eva ca | prāpnuvanti narā loke nirjitaṃ puṇyakarmabhiḥ || 15.26 ||

"बुद्धि, सुंदर रूप, फल-समृद्धि, पुत्र, शौर्य और धैर्य — मनुष्य इस लोक में इन्हें अपने पुण्यकर्मों से ही, जीतकर, प्राप्त करते हैं।"

श्लोक 27 (uttara.15.27)

एवं निरयगामी त्वं यस्य ते मतिरीदृशी । न त्वां समभिभाषिष्ये ऽसद्वृत्तेष्वेव निर्णयः ।। १५.२७ ।।

evaṃ nirayagāmī tvaṃ yasya te matir īdṛśī | na tvāṃ samabhibhāṣiṣye 'sadvṛtteṣv eva nirṇayaḥ || 15.27 ||

"इस प्रकार तुम, जिसकी मति ऐसी है, नरकगामी हो; अब मैं तुमसे और कुछ नहीं कहूँगा — दुष्टों के साथ तो निर्णय हो ही चुका होता है।"

श्लोक 28 (uttara.15.28)

एवमुक्तास्ततस्तेन तस्यामात्याः समाहताः । मारीचप्रमुखाः सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवुः ।। १५.२८ ।।

evam uktās tatas tena tasyāmātyāḥ samāhatāḥ | mārīcapramukhāḥ sarve vimukhā vipradudruvuḥ || 15.28 ||

यह कहे जाने पर, उसके द्वारा घायल किए गए उसके मंत्री, मारीच आदि सब, मुँह मोड़कर भाग खड़े हुए।

श्लोक 29 (uttara.15.29)

ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना । गदयाभिहतो मूर्ध्नि न च स्थानात्प्रकम्पितः ।। १५.२९ ।।

tatas tena daśagrīvo yakṣendreṇa mahātmanā | gadayābhihato mūrdhni na ca sthānāt prakampitaḥ || 15.29 ||

तब उस महात्मा यक्षेन्द्र ने दशग्रीव के सिर पर गदा से प्रहार किया, फिर भी वह अपने स्थान से डिगा नहीं।

श्लोक 30 (uttara.15.30)

ततस्तौ राम निघ्नन्तौ तदान्योन्यं महामृधे । न विह्वलौ न च श्रान्तौ बभूवतुरमर्षणौ ।। १५.३० ।।

tatas tau rāma nighnantau tadānyonyaṃ mahāmṛdhe | na vihvalau na ca śrāntau babhūvatur amarṣaṇau || 15.30 ||

हे राम, तब वे दोनों उस महासमर में परस्पर प्रहार करते हुए, न व्याकुल हुए, न थके, दोनों ही असहिष्णु बने रहे।

श्लोक 31 (uttara.15.31)

आग्नेयमस्त्रं तस्मै स मुमोच धनदस्तदा । राक्षसेन्द्रो वारुणेन तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ।। १५.३१ ।।

āgneyam astraṃ tasmai sa mumoca dhanadas tadā | rākṣasendro vāruṇena tad astraṃ pratyavārayat || 15.31 ||

तब धनद ने उसके विरुद्ध आग्नेयास्त्र छोड़ा; राक्षसेन्द्र ने वारुणास्त्र से उस अस्त्र को रोक दिया।

श्लोक 32 (uttara.15.32)

ततो मायां प्रविष्टो ऽसौ राक्षसीं राक्षसेश्वरः । रूपाणां शतसाहस्रं विनाशाय चकार च ।। १५.३२ ।।

tato māyāṃ praviṣṭo 'sau rākṣasīṃ rākṣaseśvaraḥ | rūpāṇāṃ śatasāhasraṃ vināśāya cakāra ca || 15.32 ||

तब वह राक्षसेश्वर राक्षसी माया में प्रविष्ट हुआ, और विनाश के लिए लाखों रूप धारण कर लिए।

श्लोक 33 (uttara.15.33)

व्याघ्रो वराहो जीमूतः पर्वतः सागरो द्रुमः । यक्षो दैत्यस्वरूपी च सो ऽदृश्यत दशाननः ।। १५.३३ ।।

vyāghro varāho jīmūtaḥ parvataḥ sāgaro drumaḥ | yakṣo daityasvarūpī ca so 'dṛśyata daśānanaḥ || 15.33 ||

बाघ, वराह, मेघ, पर्वत, सागर, वृक्ष, यक्ष और दैत्य के रूप में वह दशानन दिखाई देने लगा।

श्लोक 34 (uttara.15.34)

बहूनि च करोति स्म दृश्यन्ते न त्वसौ ततः । प्रतिगृह्य ततो राम महदस्त्रं दशाननः ।। १५.३४ ।।

bahūni ca karoti sma dṛśyante na tv asau tataḥ | pratigṛhya tato rāma mahad astraṃ daśānanaḥ || 15.34 ||

वह अनेक रूप बनाता रहा, पर वह स्वयं दिखाई नहीं देता था; हे राम, तब दशानन ने एक महान अस्त्र ग्रहण किया।

श्लोक 35 (uttara.15.35)

जघान मूर्ध्नि धनदं व्याविद्ध्य महतीं गदाम् । एवं स तेनाभिहतो विह्वलः शोणितोक्षितः ।। १५.३५ ।।

jaghāna mūrdhni dhanadaṃ vyāviddhya mahatīṃ gadām | evaṃ sa tenābhihato vihvalaḥ śoṇitokṣitaḥ || 15.35 ||

उसने अपनी विशाल गदा को घुमाकर धनद के सिर पर प्रहार किया; इस प्रकार उससे आहत होकर वह विह्वल और रक्त से लथपथ हो गया।

श्लोक 36 (uttara.15.36)

कृत्तमूल इवाशोको निपपात धनाधिपः ।। १५.३६ ।।

kṛttamūla ivāśoko nipapāta dhanādhipaḥ || 15.36 ||

कटे हुए मूल वाले अशोक वृक्ष के समान वह धनाधिप गिर पड़ा।

श्लोक 37 (uttara.15.37)

ततः पद्मादिभिस्तत्र निधिभिः स तदा वृतः । धनदोच्छ्वासितस्तैस्तु वनमानीय नन्दनम् ।। १५.३७ ।।

tataḥ padmādibhis tatra nidhibhiḥ sa tadā vṛtaḥ | dhanadocchvāsitais tais tu vanam ānīya nandanam || 15.37 ||

तब पद्म आदि उन निधियों ने उसे घेर लिया, और उन्होंने ही धनद को सचेत करके नन्दनवन में ले जाकर पहुँचाया।

श्लोक 38 (uttara.15.38)

निर्जित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनदं हृष्टमानसः । पुष्पकं तस्य जग्राह विमानं जयलक्षणम् ।। १५.३८ ।।

nirjitya rākṣasendras taṃ dhanadaṃ hṛṣṭamānasaḥ | puṣpakaṃ tasya jagrāha vimānaṃ jayalakṣaṇam || 15.38 ||

उस धनद को जीतकर हर्षितमन राक्षसेन्द्र ने उसका पुष्पक विमान, जो विजय का चिह्न था, छीन लिया।

श्लोक 39 (uttara.15.39)

काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैडूर्यमणितोरणम् । मुक्ताजालप्रतिच्छन्नं सर्वकामफलद्रुमम् ।। १५.३९ ।।

kāñcanastambhasaṃvītaṃ vaiḍūryamaṇitoraṇam | muktājālapraticchannaṃ sarvakāmaphaladrumam || 15.39 ||

वह विमान सोने के स्तंभों से घिरा था, उसके तोरण वैडूर्यमणि के थे, वह मोतियों के जाल से आच्छादित था, और वह सर्वकामनाओं को पूर्ण करने वाले वृक्षों से युक्त था।

श्लोक 40 (uttara.15.40)

मनोजवं कामगमं कामरूपं विहङ्गमम् । मणिकाञ्चनसोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।। १५.४० ।।

manojavaṃ kāmagamaṃ kāmarūpaṃ vihaṅgamam | maṇikāñcanasopānaṃ taptakāñcanavedikam || 15.40 ||

वह मन के समान वेगवान था, इच्छानुसार गमन करने वाला और इच्छानुसार रूप धारण करने वाला था, पक्षी के समान था; उसकी सीढ़ियाँ मणि-स्वर्ण की और वेदिकाएँ तपाए हुए सोने की थीं।

श्लोक 41 (uttara.15.41)

देवोपवाह्यमक्षय्यं सदादृष्टिमनःसुखम् । बह्वाश्चर्यं भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम् ।। १५.४१ ।।

devopavāhyam akṣayyaṃ sadādṛṣṭimanaḥsukham | bahvāścaryaṃ bhakticitraṃ brahmaṇā parinirmitam || 15.41 ||

वह देवताओं के योग्य वाहन था, अक्षय था, देखने और मन दोनों को सदा सुख देने वाला था, अत्यंत आश्चर्यजनक और भक्तिपूर्ण चित्रकारी से सुसज्जित था, और स्वयं ब्रह्मा द्वारा निर्मित था।

श्लोक 42 (uttara.15.42)

निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् । न तु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम् ।। १५.४२ ।।

nirmitaṃ sarvakāmais tu manoharam anuttamam | na tu śītaṃ na coṣṇaṃ ca sarvartusukhadaṃ śubham || 15.42 ||

वह सब कामनाओं को पूरा करने वाला, मनोहर और सर्वश्रेष्ठ था; न शीत था न उष्ण, प्रत्येक ऋतु में सुखद और शुभ था।

श्लोक 43 (uttara.15.43)

स तं राजा समारुह्य कामगं वीर्यनिर्जितम् । जितं त्रिभुवनं मेने दर्पोत्सेकात्सुदुर्मतिः ।। १५.४३ ।।

sa taṃ rājā samāruhya kāmagaṃ vīryanirjitam | jitaṃ tribhuvanaṃ mene darpotsekāt sudurmatiḥ || 15.43 ||

उस इच्छानुसार गमन करने वाले, अपने पराक्रम से जीते हुए विमान पर चढ़कर, वह अत्यंत दुर्बुद्धि राजा गर्व के आवेश में तीनों लोकों को जीता हुआ मानने लगा।

श्लोक 44 (uttara.15.44)

जित्वा वैश्रवणं देवं कैलासात्समवातरत् ।। १५.४४ ।।

jitvā vaiśravaṇaṃ devaṃ kailāsāt samavātarat || 15.44 ||

देव वैश्रवण को जीतकर वह कैलास से नीचे उतर आया।

श्लोक 45 (uttara.15.45)

स्वतेजसा विपुलमवाप्य तं जयं प्रतापवान्विमलकिरीटहारवान् । रराज वै परमविमानमास्थितो निशाचरः सदसि गतो यथानलः ।। १५.४५ ।।

svatejasā vipulam avāpya taṃ jayaṃ pratāpavān vimalakirīṭahāravān | rarāja vai paramavimānam āsthito niśācaraḥ sadasi gato yathānalaḥ || 15.45 ||

अपने ही तेज से वह विशाल विजय पाकर, प्रतापी और निर्मल मुकुट-हार से सुशोभित, उस श्रेष्ठ विमान पर बैठा हुआ निशाचर ऐसे शोभित हुआ जैसे सभा में प्रवेश किया हुआ अग्नि।

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